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“कोसी की तकदीर लिखने से पहले !” – सझिया समांग.

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कोशीमैया !

कोसीमैया !

कोसीवासी फिर उसी तिराहे पर खडे हैं, जहां तकरीबन पचपन साल पहले थे। उन दिनों जोर-शोर से बहस हुआ करती थी कि आखिर इस चंचल नदी का क्या उपाय किया जाय? क्या बराज और तटबंध के जरिए कोसी को काबू में किया जा सकता है? या बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। या फिर जैसा कि पर्यावरण के जानकार कहा करते हैं, इस चंचल नदी को यूं ही छोड दिया जाय और इसके कोप से तालमेल बिठाकर जीने की कोशिश की जाय।

हालांकि हमारी सरकार ने असफल बराज और तटबंधों के बीच इस शरारती नदी को फिर से कैद करने का फैसला ले लिया है, यह जानने के बावजूद कि बराज और तटबंध 25 साल पहले ही एक्सपायर हो चुके हैं। हमारे इलाके की अच्छी खासी आबादी, खास तौर पर वे लोग जिनके इलाके में इस बार कोसी ने तबाही मचाई है सरकार के इस फैसले से सहमत नजर आते हैं। उनकी नजर में बराज कभी एक्सपायर हुआ ही नहीं। यह भीषणतम हादसा इंजीनियरों-ठेकेदारों की लापरवाही और हठधर्मिता के कारण हुआ। दरअसल इन लोगों ने बराज बनने के बाद की 50 साल की निश्चिंतता को जीया है। हालांकि इस दौरान भी कई बार तटबंध टूटे और भीषण बाढें भी आईं, पर नदी के रास्ता बदलने की खतरनाक अदा से मुक्ति मिल गई थी। मगर ये लोग इस नदी के साथ आने वाली सिल्ट की भीषण समस्या से या तो अनजान हैं या किसी सुपर-नेचुरल सरकारी तुक्के से इसके समाधान की उम्मीद लगा बैठे हैं। जबकि इसी गाद के कारण कई सालों से बराज नाकाम पड़ा है और 9 लाख क्यूसेक तक का बहाव झेल चुका तटबंध इस बार डेढ-पौने दो लाख

बाढ क प्रभाव

बाढ का प्रभाव

क्यूसेक दबाव नहीं बरदाश्त कर पाया। इसके बावजूद अगर सिल्ट की सफाई कराए बगैर कोसी नदी को फिर से तटबंधों के बीच से इसी बराज के रास्ते गुजारने की कोशिश की गई तो हमें और हमारी सरकार को अगले साल फिर से ऐसी तबाही के लिए तैयार रहना होगा। अगर सरकार के पास सचमुच सिल्ट की सफाई की कोई योजना है तो इसे भी सबके सामने आना चाहिए। क्योंकि बराज के अंदर इतना सिल्ट जमा हो चुका है कि जेसीबी मशीन और गाडियों के जरिये इसकी सफाई में लंबा समय लग सकता है।

इस उधेडबुन वाली स्थिति में कई लोग स्थाई समाधान के नाम पर फिर से बराह क्षेत्र में प्रस्तावित हाई डैम की वकालत करने लगे हैं। यह डैम 60-65 साल से प्रस्तावित है, मगर इस पर काम शुरू नहीं किया जा सका क्योंकि यह परियोजना काफी महंगी थी। मगर कभी इस परियोजना को नकारा नहीं गया और इसकी तुलना में बराज को हमेशा तात्कालिक समाधान ही माना जाता रहा। बराज के निर्माण के वक्त भी सबसे आशावादी विशेषज्ञ ने भी इसकी उम्र 25 साल से अधिक नहीं आंकी थी। मगर उस वक्त जिन कारणों से हाई डैम परियोजना को स्थगित कर दिया गया था वे आज भी मौजूद हैं। आज की तारीख में इस परियोजना की लागत तकरीबन 1 लाख करोड़ रु. है। कहा जा रहा है कि इस परियोजना से काफी बिजली बनेगी। जापान की एक वित्तीय एजेंसी इसमें पैसा लगाने के लिए भी तैयार है। मगर इस डैम से उत्पादित होने

पिणे लायक पानी नही रहा !

पीने लायक पानी नही रहा !

वाली बिजली भी काफी महंगी होगी। इसके अलावा बराह क्षेत्र भूकंप प्रभावित जोन में पडता है, ऐसे में अगर यह हाई डैम बन भी गया तो हमेशा एक भीषण आपदा का संकट मंड़राता रहेगा और वह आपदा मौजूदा आपदा से कहीं बड़ी होगी। इस डैम के बारे में एक और दीगर तथ्य यह है कि आज की तारीख में अगर इसका निर्माण शुरू करवा भी दिया जाय तो इसे पूरा होने में लगभग बीस साल का समय लगेगा। लिहाजा इस परियोजना को स्वीकारने और नकारने के बीच बहस की लंबी गुंजाइश है।

अब बांध विरोधी पर्यावरणविदों का रास्ता यानि कोसी नदी के साथ सहजीवन का प्रयास। इन लोगों का मानना है कि नदी के सिल्ट लाने की क्षमता को नकारात्मक नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इस सिल्ट के जरिये भावी पीढि़यों के लिए अच्छी जमीन का निर्माण हो रहा है। इन विशेषज्ञों की यह बात भी सच है कि अगर नदी को आजाद छोड़ दिया जाय तो कभी इतने बडे हादसे होंगे ही नहीं। मगर यह पूरी तरह सच नहीं कि अगर सालाना बाढ़ से तालमेल बिठाकर जीना सीख लिया जाय तो समस्या रहेगी ही नहीं। कोसी नदी की समस्या सिर्फ बाढ की नहीं है यह इसके बारबार रास्ता बदलने और इसके बाद जमीन को परती बना देने की भी है। हर 30-35 सालों में यह रास्ता बदल लेती है, जिसके कारण जानमाल की व्यापक क्षति होती है। हालांकि लोगों को अब याद नहीं पर 1930 के आसपास जब इसने रास्ता बदला था तो सुपौल का नाथनगर कस्बा पूरी तरह तबाह हो गया था। क्या नदी के साथ सहजीवन का अर्थ यह भी है कि हमें ऐसे हादसों के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

खेती भी बह गई !

खेती भी बह गई !

ऐसे में इन इलाकों में कोई पुल नहीं होगा, कोई सडक या रेल नहीं होगी, बिजली नहीं होगी, जैसा कि कोसी नदी के दोनों तटबंधों के बीच के गांवों में आज भी हो रहा है। इक्कीसवीं सदी के विकसित भारत में ऐसे हालात में जीना कौन चाहेगा?

ऐसा नहीं कि हम इनमें से हर उपाय से पूरी तरह असहमत हैं। दरअसल अपने जीवन की कीमत पर हमें हर उपाय अधूरा ही लगता है। खास तौर पर उन हालातों में जब सरकार हमसे पूछे बगैर हमारी किस्मत का फैसला कर चुकी है। हमारा सिर्फ इतना कहना है कि बहस होनी चाहिए, पीडितों की राय भी ली जानी चाहिए। ऐसे में याद आता है आजादी के बाद की बिहार सरकार का वह फैसला जिसके तहत कोसी की पूरी बाढ पीडित आबादी को झारखंड के रामगढ़ में बसाने की योजना बनी थी। आज हम इसे तुगलकी फरमान कहकर इस पर हंस सकते हैं, मगर इस योजना में कम से कम हमलोगों के प्रति सरकार की संवेदना तो झलकती थी। आजादी के बाद लगभग आठ साल बहस चलने के बाद बराज और तटबंध के निर्माण का फैसला लिया गया, मगर इस बार सक्षम लोगों की चुप्पी बहुत अखरने वाली है।

सहयोग का हात !

सहयोग का हात !

सझिया समांग के साथी – कोसी पुनर्निमाण अभियान का कोसी अंचल की एक छोटी सी संस्था सझिया समांग ने यह असंभव सा लगने वाला सपना देखा है। इसके स्वयंसेवक फिलहाल सुपौल जिले के प्रतापगंज ब्लाक के कुछ गांवों में इसी कोशिश में जुटे हैं। आप उन्हें इस पते पर सम्पर्क कर सकते हैं।

डाक पता
सझिया समांग -
द्वारा- श्री ए.के. मिश्रा
महाराणा प्रताप चौक के पास
गौतमनगर, गंगीयाला,
सहरसा-852201
ई मेल: sajhiasamang@gmail.com

साभार- http://biharbaadh.blogspot.com/

‘जल ही जीवन है’

सुना था जल ही जीवन है,
पर बिहार में जल ही जल था,
जीवन के लिए त्राहि-त्राहि थी।
एक छत पर लेटा आदमी सपना देख रहा था,
कि उसके जीवन में खुशियों की बाढ़ आ गई।
परन्तु कोसी की बाढ़ ने आज उसकी आड़ तक ले ली।
अब उसके घर में बची है, उसकी बच्ची अकेली।
बच्ची पांच साल की है, वह तो पानी से खेलती थी।
परन्तु वह क्या जाने , कि इस पानी ने क्या खेला।
इस पानी की खातिर उसके परिवार और बिहार ने क्या झेला।
उसकी जुबां पर तो सिर्फ मां-मां है।
पर ये तो किसी को नहीं पता, कि पानी के इस भीषण बहाव में, उसकी मां कहां है।
लो अब बचाव वाले खाना ले आये।
खाने के लिए भगदड़ मची,
और बेचारी बच्ची उसमें फंसी।
कहीं से एक दाना पाकर, वह खाने के लिए ढूंढ रही है मां के हाथों को ।
पर जैसे ही पानी में हाथ डालती है,
वह पाती है बड़े-बड़े सांपों को ।
हे पानी ये तू है या कोई और,
जिसने छीना है कइयों का ठौर।
अब क्या बचा, एक बूढ़ी मां चिल्ला रही है।
अब तो उसकी प्यारी गाय भी, पानी में बहती जा रही है।
बड़े-बड़े जहाज ऊपर से मंडराते हैं।
बड़े-बड़े नेता टीवी पर लोगों को समझाते हैं।
पर क्या किसी ने इन लोगों के दिल को टटोला?
क्या बहा, क्या रहा, क्या होगा, इसको राजनीति से हटकर तोला।
ऐ मेरे दोस्तों क्या तुम भी, संवेदना से शून्य हो चुके हो ?
बहुत कुछ न खोते हुए भी, तुम बिहार के हजारों बंधु-बांधव खो चुके हो।
अब खोलो आंखें, बढ़ाओ हाथ।
दो उनका साथ, जो हो गये अनाथ।
जिन्होंने खोया है,बाढ़ में सब कुछ।
दिल में लगा है, आघात जिनके सचमुच।
ये अपनी हैं मांएं, ये अपने हैं भाई।
हैं कुछ कारण, जिससे इन पर ये स्थिति बन आई।
अब तो न तूम मूक दर्शक बनो,
भीतर से कुछ आवाजें सुनो।

मोहित कुमार पांडेय भोपाल में पत्रकारिता की पढाई कर रहे हैं. बिहार में बाढ की खबरें पढते, सुनते और देखते हुए वे बेचैन हैं. उन्होंने बाढ को करीब से देखा है और पानी होते जीवन में कई बार मौत से आंखें मिलाई हैं. उनका दर्द इस कविता में जाहिर होता है.

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सभी छबीया गंगाजल नेचर फौंडेशन की सौजन्यसे.

http://gangajal.org.in/blog/?m=200810
http://www.gangajal.org.in/

Written by Vijay Mudshingikar

December 25th, 2008 at 12:02 am

बिहार पूरग्रस्तांच्या मदतीसाठी ‘गंगाजल’ ची धाव, Gangajal’s Helping Hands to Flood Affected Bihar

without comments

Written by Vijay Mudshingikar

October 26th, 2008 at 8:14 am