किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.

पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.

यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.

कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.

सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.

कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.

लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.

भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.

विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.

भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.

कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.

बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html


 

शेखावाटीः चलें गांव की ओर

राजस्थान के झुंझनू का कठराथल गांव, दूर तक नज़र आते लहलहाते खेत, चरते पशु और रंग-बिरंगे पक्षी, कच्ची पगडंडियों के किनारे बने मिट्टी और घास-फूंस के छोटे-ब़डे घर, सौंधी खुशबू वाली आबोहवा और प्रकृति के प्रेम से सराबोर वातारण. इन सबके बीच सुशीला देवी और कान सिंह का घर किसी चित्रकार की कल्पना-सा प्रतीत होता है. घर की दीवारों पर सुंदर रंग-बिरंगी राजस्थानी चित्रकारी बरबस आकर्षित करती है. घर की मुंडेर पर गमलों की कतार और घर के पीछे फैले खलिहान, गांव में सैर के लिए बथान में बंधे घोड़े और सुरक्षा के लिए दो ब़डे पालतू कुत्ते. इन सबमें खास यहां का प्राकृतिक फ्रिज जिसे ज़मीन में ही गड्ढा कर ईंट की दीवार बनाकर छर्रे और मिट्टी से तैयार किया गया है. घर के कमरे जहां बाहर से मिट्टी के हैं, वहीं अंदर आराम का पूरा साजो-सामान है, सोफा, बैड, डायनिंग टेबल और ज़मीन पर बिछी क़ालीन. यहां सुकून का खास इंतज़ाम है. घर के आंगन में झूला खूबसूरती में चार चांद लगाता है. यह घर किसी पेंटिंग का सजीव चित्रण लगता है. यह घर ग्रामीण पर्यटन के लोकप्रिय ठिकानों में से है. इस क्षेत्र से पिछले चार सालों से ज़ुडी सुशीला देवी और उनके परिवार की ज़िंदगी ग्रामीण पर्यटन ने बदल दी है. पहले उनके पास खेतीबा़डी के अलावा कोई और काम नहीं था. प़ढे-लिखे उनके दोनों बेटों का खेती में जी नहीं लगता था. वे शहर जाकर काम करना चाहते थे, दुनिया देखना चाहते थे, लेकिन अब दुनिया चलकर उनके पास आती है. मोरारका फाउंडेशन ने गांव में ही रहकर नए प्रकार के काम करने का आइडिया दिया, जो बच्चों को भी पसंद आया और उन्हें भी. शुरू में घर छोटा होने, सीमित संसाधन होने की वजह से समस्या भी आई, पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया. सुशीला देवी के बच्चे अब फाउंडेशन द्वारा दी गई ट्रेनिंग की बदौलत फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और घर आए मेहमानों को इलाक़े की सैर करवाते हैं, वहां के कला-साहित्य और दूसरी लोक कृतियों से परिचित करवाते हैं. विदेशियों के साथ संचार की कोई समस्या नहीं रह गई. विदेशी पर्यटकों को और क्या चाहिए था. घर की महिला के हाथों से बना शुद्ध पारंपरिक भोजन वह भी पारंपरिक तरीक़े से. सुशीला देवी कहती हैं कि देशी पर्यटकों में ग्रामीण पर्यटन को सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है. वे ब़ुजुर्ग और नौजवान जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा है या फिर अपने गांव को छो़डकर मजबूरन शहर चले गए हैं, वे इसे ज़्यादा पसंद करते हैं. इसके अलावा हनीमून जो़डे और शहर में रहने वाले परिवार भी खूब चाव से यहां ठहरते हैं.

क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के यहां तीन दिनों के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख-समझ कर गए.

मेहमानों को अपनी संस्कृति को अधिक क़रीब से दिखाने के लिए सुशीला देवी घर पर ही मेहंदी प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, लोक नृत्य, कठपुतली का खेल और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं. सुशीला देवी को इस बात पर गर्व होता है कि विदेश से आने वाले लोग उन्हें सुपरवुमैन कहते हैं, क्योंकि वे सुशीला देवी के ब़डे परिवार का प्रबंधन देखकर आश्चर्य में प़ड जाते हैं. यही नहीं सुशीला देवी से मेहमान भारतीय मेहमान नवाज़ी, पशुओं का दूध का़ढना, चारा देना और खेतों पर काम करने जैसा सुखद अनुभव भी लेकर जाते हैं. लेकिन सुशीला देवी और उन जैसे ग्रामीण पर्यटन को ब़ढावा देने वाले किसान परिवारों के लिए यह सब आसान नहीं था. ग्रामीण पर्यटन के लिए गांव वालों के सामने कुछ खास चुनौतियां थीं, जैसे प्रशिक्षित लोगों की कमी, आर्थिक तंगी, लोगों में उत्साह की कमी, ग्रामीण परिवेश की वजह से लोगों का अल्प विकास, सहभागिता की कमी, बिजनेस प्लानिंग क्षमता की कमी, भाषाई समस्या, बुनियादी शिक्षा की कमी, संचार का माध्यम, प्रशिक्षित टूरिस्ट गाइड. लेकिन मोरारका फाउंडेशन ने स्थानीय लोगों और उनके पूरे परिवार को खास ट्रेनिंग दी, जिसकी वजह से सारी चुनौतियां खत्म हो गईं. ग्रामीण पर्यटन को राजस्थान में 500 से ज़्यादा चिन्हित परिवारों से जो़डकर मोरारका फाउंडेशन ने यहां की सभ्यता और संस्कृति को विश्व पटल पर उकेरने में ब़डी भूमिका निभाई है. पर्यावरण हित को ध्यान में रखते हुए प्रकृतिजन्य पर्यटन का विकास करवाया है. ग्रामीण समुदायों को पर्यटन का हिस्सा बनाकर उनके आर्थिक और शैक्षिक स्तर का विकास करवाया है, जिससे ग्रामीणों के शहरों की तऱफ पलायन में कमी आ सके. का़फी वक़्त से ग्रामीणों की स्थिति खराब होती जा रही थी. इसका मुख्य कारण था कृषि की उपेक्षा, इसके प्रति लापरवाही, इसे किसी अन्य व्यवसाय के मुक़ाबले कम आंकना और युवाओं का इससे न जु़डना. इसी समस्या को दूर करने का उपाय मोरारका फाउंडेशन ने खोज निकाला फार्म पर्यटन के ज़रिए. क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के तीन दिन के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख और समझ कर गए. फार्म पर्यटन पर आए फ्रांस के 21 लोगों को बिडोदी के किसान मनोज शर्मा के यहां दो दिन के लिए ठहरना भारत से विशेष लगाव का अहसास दे गया. शेखावाटी में किसानों को पर्यटकों के स्वागत के लिए खासतौर से तैयार किया गया, ताकि वे पर्यटकों के साथ अच्छी तरह संबंध बना सकें और उन्हें ठहरने के दौरान कोई परेशानी न आए. शेखावाटी क्षेत्र में मीलों का बास के हरीराम मील ने साल भर में 16 फ्रांसीसी मूल के पर्यटकों को ठहराया, तो बीदासर के किसान नेकीराम गोदारा ने कजाकिस्तान से आए दो पर्यटकों और फ्रांस से आए 16 पर्यटकों की दो दिन तक खातिरदारी की. वाहिपुरा के कृष्ण सिंह शेखावत ने 11 और कल्याणपुरा के रामअवतार बुगालिया ने 19 फ्रांसीसी पर्यटकों को दो दिन में अपनी संस्कृति से रूबरू करा दिया. वहीं वाहिदपुरा के सुरेंद्र कुमार ने 4 स्विस पर्यटकों को दो दिन में ही गांव की आबोहवा का क़ायल बना दिया. पिछले कुछ सालों में हज़ारों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को गांवों में भ्रमण कर ग्रामीण जीवनशैली को नज़दीक से जानने, समझने, परखने का मौक़ा मिला है.

मोरारका फाउंडेशन ने ग्रामीण पर्यटन द्वारा सफलता की एक नई कहानी लिखी है. इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि चूंकि केवल पर्यटन से आजीविका कमाने के अवसर ब़ढ जाते हैं जिससे किसान लगातार पर्यटन के कार्य से जु़डकर कृषि जैसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण कार्य को छो़डने की भूल कर सकते हैं. इसी वजह से यहां फार्म पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. ग्रामीण पर्यटन से न केवल विकल्प रोज़गार के अवसर विकसित होते हैं, बल्कि कई तरह के फायदे होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि गांववालों को आजीविका का साधन मिल जाता है, खासकर ग्रामीण युवा को. इससे जीवन स्तर में सुधार आता है मसलन शिक्षा, सेहत का भी स्तर बेहतर हो जाता है. गांव में ज़मीन की क़ीमत ब़ढती है, व्यापारिक वस्तुओं और पब्लिक सेवाओं के दाम भी ब़ढते हैं. स्थानीय कारोबार जैसे क्षेत्रीय कला, ट्रांसपोर्ट और दुकानदारों इत्यादि को फायदा पहुंचता है. गांव के सीधे-सादे लोग विदेशों-शहरों के समझदार लोगों से बेवकू़फ न बन जाएं या फिर ब़डे शहरों और विदेशों से आने वाले लोगों से बातचीत कर सकें, इसके लिए गांव के लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता भी ब़ढी है.

शेखावाटी के गांवों के लोग ब़डे समझदार हैं. शहर से आने वाले लोगों से न केवल आय कमा रहे हैं, बल्कि जीने का सलीक़ा भी सीख लेते हैं. गांव के लोग स्वस्थ वातावरण के साथ स़फाई व्यवस्था, स़डक, बिजली, दूरसंचार के नए माध्यम और रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वाले आधुनिक उपकरण के इस्तेमाल और जीवन को सुलभ बनाने वाली तकनीकी चीज़ों से रूबरू होते हैं. इसके अलावा शहर से आए बुद्धिजीवियों से प्राकृतिक आवास, जैव-विविधता और ऐतिहासिक स्मारकों, धरोहरों का संरक्षण करने के नए उपायों के बारे में सीखते हैं और प्राकृतिक उद्यानों को सहेजने के प्रति जागरूक होते हैं. परंपराओं को सर आंखों पर रखने वाले गांव के ब़डे बुज़ुर्गों को यह चिंता थी कि ग्रामीण पर्यटन से ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति को क्षति पहुंच सकती है और गांव की युवा पी़ढी आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी संस्कृति से दूर हो जाएगी. मगर फाउंडेशन ने इस डर को दूर किया. फाउंडेशन ने सिखाया कि दरअसल गांव का परिवेश और परंपरागत चीज़ें ही उनके काम की शान हैं और इसे ब़ढावा दे सकती हैं. इस लिहाज़ से ब़ुजुर्गों का यह डर भी खत्म हो गया कि ग्रामीण पर्यटन के विकास से गांव के परंपरागत व्यापार और उद्योग, रोज़गार और माहौल पर ग़लत असर हो सकता है. मोरारका फाउंडेशन ग्रामीण पर्यटन के प्रति इतनी अधिक रुचि और लगन से कार्य करवा रहा है कि इस क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.

गाइड ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू कराते है

मीण पर्यटन एवं ऊंची-ऊंची हवेलियों की वजह से नवलग़ढ राजस्थान में जाना पहचाना नाम है. हर साल तक़रीबन 30,000 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्यटक न नवलग़ढ की खूबसूरत हवेलियों, मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों और जैविक खेती के प्रयासों को देखने समझने आ रहे हैं. यहां के गाइड इन भ्रमणीय स्थलों से पर्यटकों का जोडते हैं. यह गाइड पहले अप्रशिक्षित थे, कम प़ढे-लिखे थे. उनके पास समुचित विषयपरख जानकारी जुटाने का न तो कोई स्त्रोत था और न ही अवसर, इसलिए  गाइड सुनी-सुनाई जानकारियों को अनगढ़ तरीक़े से पर्यटकों को पेश करते थे, और पर्यटक मजबूरन उनकी सेवाएं लेते थे. उपेक्षा और सरकारी नियमों की आ़ड में उन्हें न तो कोई प्रशिक्षण दिया गया था और न ही कोई सुविधा मुहैया कराई गई थी. ऐसे में मोरारका फाउंडेशन ने आगे ब़ढकर स्थानीय नगर पालिका से बात करके इन अप्रशिक्षित गाइडों को विधिवत शिक्षण देना प्रारंभ किया, जिसके तहत स्थानीय हैरिटेज, होटल, स्मारक पर्यटन, व्यापार से जु़डे विशेषज्ञों की मदद से 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया. इसमें नवलग़ढ के सभी अप्रशिक्षित गाइड समुदाय ने हिस्सा लेकर और शिविर से जुड़कर नवलग़ढ के बारे में पर्यटन की दृष्टि से पूरी जानकारी प्राप्त की. यही नहीं पर्यटन से जु़डे अन्य आयामों के बारे में भी जाना. ट्रेनिंग पाकर खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे गाइड आबिद खान कहते हैं कि इस प्रशिक्षण से न केवल आत्म विश्वास ब़ढा, बल्कि हम अधिकार पूर्वक पर्यटन से जु़डे विषयों पर पर्यटकों को जानकारी देने में भी सक्षम हो गए हैं. एक अन्य गाइड मनोज शर्मा का कहना है कि हैरिटेज की जानकारी तो मोरारका फाउंडेशन पहले भी हैरिटेज संरक्षण शिविर के माधयम से दे रहा है, पर पर्यटकों को ये जानकारियां किस तरह की पूरी तहज़ीब और संस्कृति के साथ दी जाएं, इसका पता इस शिविर के माध्यम से ही चला. साथ ही बहुत से अनछुए पहलुओं पर चर्चाएं भी उपयोगी सिद्ध हुई हैं. उन्हें सबसे ज़्यादा तो खुशी इस बात की हुई कि अप्रशिक्षित का लेबल अब हमेशा के लिए हट गया है और वह भी अब गर्व  के साथ पर्यटकों को नवलग़ढ की विरासत से रूबरू करवा रहे हैं.


साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/11/shekhawati-towards-village.html

 

 

बुंदेलखंडः फटती धरती, कांपते लोग

बुंदेलखंड में बेतरतीब ढंग से खनन और भूजल दोहन के चलते ख़तरे की घंटी बज चुकी है. हमीरपुर में सबसे अधिक 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष भूजल दोहन हो रहा है. महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में खनन मा़फ़िया नियम-क़ायदों को तिलांजलि देकर पहाड़ के पहाड़ समतल भूमि में बदल रहे हैं. ललितपुर में डायस्फोर, पैराप्लाइट, राक फास्फेट, ग्रेनाइट एवं इमारती पत्थरों के भंडार हैं. उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक के बावजूद वन क्षेत्र वाले जनपदों में इमारती पत्थरों का खनन जारी है. यमुना, बेतवा और केन में बालू मा़फ़ियाओं ने नदी के पेटे को चीर डाला है. खनन मा़फ़िया और नेता काले कारोबार से ख़ूब फल-फूल रहे हैं, जनता ने मजबूरन आत्महत्या को मुक्ति का पर्याय समझ लिया है. वर्ष 2010-11 में भारत सरकार के भूगर्भ निदेशालय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 72 में से 40 ज़िले अति दोहित की श्रेणी में हैं. यहां पानी का भंडार घट रहा है. आंकड़ों के अनुसार, यहां प्रतिवर्ष एक लाख 92 हज़ार हेक्टेयर मीटर पानी का दोहन किया जा रहा है, जबकि भूगर्भ जल विकास दर दोहन की अपेक्षा अत्यंत कम है. बांदा, चित्रकूट, महोबा एवं हमीरपुर में भूगर्भ जल उपलब्धता 20 लाख 24 हज़ार 627 हेक्टेयर बताई गई है, जिसमें सबसे कम भूगर्भ जल हमीरपुर (महोबा सहित) में उपलब्ध है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हमीरपुर के अलावा ललितपुर, झांसी और जालौन में जल संकट बरसात की कमी के कारण हुआ है. बुंदेलखंड पर गहरी नज़र रखने वाले शिव प्रसाद भारती बताते हैं कि बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के 7 और मध्य प्रदेश के 21 ज़िलों में फैला एक विस्तृत क्षेत्र है. हमीरपुर यमुना और बेतवा के मध्य बसा है.

बुंदेलखंड अपनी वन संपदा, खनिज संपदा और शूरवीरता के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है. पानी की कमी, ग़रीबी और भुखमरी यहां की मुख्य समस्याएं हैं. पिछले चार-पांच सालों से यहां धरती फटने की नई समस्या पैदा हो गई है, जिसने किसानों को संकट में डाल दिया है. बीते 14 जून को हमीरपुर के मदारपुर गांव में एक अजीब घटना हुई. रात में 700 मीटर लंबाई में धरती फट गई, जिसकी चौड़ाई ढाई मीटर और गहराई 8-10 फीट थी. इसके बाद भरुआ सुमेरपुर में ज़मीन फटने एवं तीन मकानों में दरार पड़ने और फिर एक जुलाई को भिलावा मेरापुर में धरती फटने की घटना हुई. इसके पहले 2007 एवं 2008 में भी धरती फटने की घटनाएं हो चुकी हैं. धरती फटने से कहीं धुआं निकला, कहीं पानी निकल पड़ा और कहीं जोरदार आवाज़ निकली, जिससे ग्रामीण भयभीत हुए. इन घटनाओं की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाई गई तो घटनास्थलों पर लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अगस्त 2007 में जब पहली बार जिगनी (हमीरपुर) में धरती फटने की घटना हुई तो वहां 350 फीट लंबी और एक फीट चौड़ी दरार पड़ गई थी. ज़्यादातर लोगों ने उसका वैज्ञानिक कारण जानने का प्रयास नहीं किया, बल्कि देवताओं के नाराज़ होने और बुंदेलखंड को श्राप देने जैसी बातें चर्चा में थीं. जब धरती फटने की लगातार हो रही घटनाओं के संबंध में ज़िला प्रशासन ने शासन को लिखा तो फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों की एक टीम आई, जिसने घटनास्थलों का दौरा करके अपनी रिपोर्ट तैयार की. वैज्ञानिकों का कहना था कि बुंदेलखंड में कई वर्षों से पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, जिससे भूजल की कमी हो गई है, जबकि जल का दोहन बराबर किया जा रहा है और उससे ज़मीन के अंदर गैप बन गया है. इसीलिए तनाव पैदा हुआ और धरती फट गई. वैज्ञानिकों ने यह भी कहा था कि हो सकता है, जिस जगह धरती फटी, उसके नीचे बह रही दो विशाल धाराओं में संभवत: प्रभावित क्षेत्रों का भूजल चला गया हो और उसकी वजह से गैप बन गया, जिसके कारण धरती फट गई. वैज्ञानिकों का आशय यह था कि बुंदेलखंड में पानी की कमी ही इसका मुख्य कारण है.

बुंदेलखंड अपनी वन संपदा, खनिज संपदा और शूरवीरता के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है. पानी की कमी, ग़रीबी और भुखमरी यहां की मुख्य समस्याएं हैं. पिछले चार-पांच सालों से यहां धरती फटने की नई समस्या पैदा हो गई है, जिसने किसानों को संकट में डाल दिया है. बीते 14 जून को हमीरपुर के मदारपुर गांव में एक अजीब घटना हुई. रात में 700 मीटर लंबाई में धरती फट गई, जिसकी चौड़ाई ढाई मीटर और गहराई 8-10 फीट थी.

केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बुंदेलखंड में 4 लाख 42 हज़ार 299 हेक्टेयर मीटर भूमिगत पानी बचा है. एक लाख 92 हज़ार 549 हेक्टेयर मीटर हर वर्ष जल दोहन हो रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वार्षिक दोहन के मामले में बुंदेलखंड में हमीरपुर सबसे आगे है (1995 से पहले महोबा हमीरपुर में शामिल था). हमीरपुर का वार्षिक भूजल दोहन 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर बताया गया. संभवत: इसी कारण यहां धरती फटने की घटनाएं अधिक हो रही हैं. सबसे कम भूजल दोहन 10 हज़ार 642 हेक्टेयर मीटर चित्रकूट में हो रहा है. केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय का कहना है कि आने वाले समय में खेतों और लोगों के जीवनयापन के लिए पानी का संकट बढ़ सकता है. भूगर्भ विज्ञानी सईद उल हक़ कहते हैं कि पानी की समस्या हमारी ख़ुद की पैदा की हुई है. यहां बारिश के पानी के संचयन और जल प्रबंधन को लेकर गंभीरता से काम नहीं किया गया. बुंदेलखंड में दिल्ली के बराबर बारिश होती है, किंतु यहां की मिट्टी में ग्रेनाइट होने के कारण जल संचयन में कठिनाई है. फिर भी यदि ईमानदारी से जल प्रबंधन होता तो यह समस्या नहीं पैदा होती. पानी की कमी के कारण चित्रकूट मंडल की सबसे कम कृषि उत्पादन वाली सर्वाधिक 18 न्याय पंचायतें हमीरपुर की हैं. जन प्रतिनिधियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नदियों और पहाड़ों में रात-दिन अंधाधुंध खनन हो रहा है, बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती छलनी की जा रही है. नदियों से निरंतर रेत और मौरंग निकाली जा रही है, पहाड़ों पर विस्फोट किए जा रहे हैं, जिससे भूगर्भ जल निकल रहा है, इसलिए तत्काल खनिज दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. जल की उपलब्धता और भूगर्भ जलस्तर बढ़ाने के लिए बुंदेलखंड राहत पैकेज में तालाब, चेकडैम और नहरों के निर्माण की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन उनके कार्यान्वयन में कोताही का आलम यह है कि करोड़ों रुपये ख़र्च होने के बाद भी समस्या जस की तस है.

फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों द्वारा रिपोर्ट पेश किए जाने पर शासन ने काफी गंभीरता दिखाई थी. तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता ने कहा था कि जिन स्थानों पर धरती फटी है, वहां भूमि संरक्षण का कार्य प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा, किंतु तीन वर्षों के बाद भी स्थिति जस की तस है. ललितपुर में जहां पत्थर मा़फ़िया अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं, वहीं खदानों में कार्यरत मज़दूरों को सिल्कोसिस नामक जानलेवा बीमारी मज़दूरी शुरू करने के सात सप्ताह बाद ही जकड़ लेती है. खांसी, जुकाम और बुखार से शुरू होने वाली सिल्कोसिस एक वर्ष पूरा होते-होते मज़दूरों की मौत पक्की कर देती है. इस दौरान सीने में दर्द और मुंह से ख़ून गिरने की शिकायत होने लगती है. यह बीमारी सिलिका नामक धूल की वजह से पैदा होती है, जो पत्थर काटते समय श्वांस लेने पर फेफड़ों में जमा हो जाती है और उन्हें कमज़ोर कर देती है. इस बीमारी का अभी तक कोई इलाज संभव नहीं है, इसलिए प्रतिवर्ष सैकड़ों मज़दूर मौत के मुंह में जा रहे हैं. 1986 में सिल्कोसिस से पीड़ित 16 मज़दूरों की एक साथ मौत होने पर तत्कालीन सांसद शरद यादव ने राज्यसभा का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा था, तब केंद्र सरकार ने इस रोग की पहचान एवं उपचार के लिए डॉ. एच एन सैय्यद के नेतृत्व में राष्ट्रीय व्यवसायिक स्वास्थ्य संस्थान, अहमदाबाद के एक विशेषज्ञ दल को सर्वेक्षण हेतु ललितपुर भेजा था. उक्त दल ने इस क्षेत्र के 500 से अधिक मज़दूरों में सिल्कोसिस के लक्षण पाए थे. वर्तमान में ग्राम नाराहट, डोगराकला, पाली, जाखलौन, धौर्रा, कपासी, मादोन, बंट, पटना, पारोट, राजघाट, भरपतुरा, मदनपुर एवं सौरई आदि के पास स्थित पत्थर खदानों में काम करने वाले खनिक इस बीमारी के शिकार हैं.

बेतरतीब खनन के परिणामस्वरूप पर्यावरण को काफी नुक़सान हुआ. क्रशरों और बालू के अवैध खनन के चलते यहां की जीवनदायिनी नदी बेतवा के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है. बीते पांच वर्षों में आजीविका पर बढ़ते संकट के कारण 267 लोगों ने आत्महत्या करके इसे अभागा क्षेत्र बना दिया. बुंदेलखंड के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट रोकने के लिए जब तक सार्थक पहल नहीं होती, तब तक कभी भूकंप का डर तो कभी सूखे की मार जैसी आपदाएं इस इलाक़े के भाग्य पर मंडराती रहेंगी. नरैनी में बड़े पैमाने पर अवैध खनन जारी है. यहां कुल 250 हेक्टेयर भूमि अनुमानित तौर पर लीज के दायरे में आती है. महोबा में कुल 330 खदानें हैं, जिनमें 2500 हेक्टेयर भूमि प्रभावित है. चित्रकूट में 272 खदानों में पत्थर तोड़ने का कार्य किया जाता है, यहां लगभग 2200-2400 हेक्टेयर भूमि खनन क्षेत्र में है. बुंदेलखंड को लेकर सियासी हमले करके जनता की अदालत में केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लगी मायावती सरकार का असली चेहरा यहीं देखने को मिलता है. पूरे बुंदेलखंड में खनिज व्यापारी, क्रशर मालिक और ठेकेदार गुंडा टैक्स के कारण हड़ताल करने को विवश हो गए हैं. अवैध उगाही का यह काम कभी सपा मुखिया की आंखों के तारे रहे पोंटी चड्‌ढा के आदमी कर रहे हैं, जो इन दिनों मायावती सरकार के चहेते हैं. बांदा, चित्रकूट, महोबा और झांसी में तक़रीबन साढ़े पांच सौ क्रशर प्लांटों में उत्पादन पूरी तरह ठप है, हज़ारों मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं. क्रशर मालिकों का कहना है कि उनसे जबरन गुंडा टैक्स वसूला जा रहा है. गिट्टी में सरकारी रॉयल्टी 68 रुपये प्रति घन मीटर और 15 प्रतिशत बिक्री कर चुकाना पड़ता है. दस टायर ट्रकों में 10 घन मीटर और छह टायर ट्रकों में छह घन मीटर गिट्टी भरी जाती है. इस तरह दस टायर ट्रक में तक़रीबन 800 रुपये का सरकारी टैक्स चुकाना पड़ता है. 50 ट्रकों के लिए रॉयल्टी शुल्क 34 हज़ार, सेल टैक्स 6 हज़ार यानी कुल 40 हज़ार रुपये राजस्व बुक जारी कराते समय चुका दिए जाते हैं. गुंडा टैक्स राजस्व बुक यानी एमएम-11 जारी कराते समय ही खनिज विभाग के बाहर मौजूद गुंडे वसूलते हैं. यह प्रति ट्रक 1500 यानी 50 ट्रकों पर 75 हज़ार रुपये तत्काल देने पड़ते हैं. बांदा के सदर विधायक विवेक कुमार सिंह का कहना है कि खनिज विभाग के अधिकारियों को निर्देश देकर गुंडा टैक्स की वसूली कराई जा रही है. बबेरू विधायक विशंभर सिंह यादव का कहना है कि जबरिया वसूली नहीं होनी चाहिए. तिंदवारी विधायक विशंभर प्रसाद निषाद ने कहा कि सिंडीकेट सिस्टम से वसूली पर अधिकारी चुप हैं, सरकार मौन है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवता द्विजेंद्र त्रिपाठी ने बसपा नेताओं के अवैध खनन, आबकारी और भूमि घोटालों की सीबीआई जांच कराने की मांग की है. त्रिपाठी बताते हैं कि सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों ने अवैध तरीक़े से पत्थर और बालू खनन के ठेके अपने चहेतों के पक्ष में करा लिए. सरकारी संरक्षण में नदियों से अनाधिकृत तरीक़े से बालू का अंधाधुंध खनन कराया जा रहा है. क्रशर यूनियन अध्यक्ष ध्यान सिंह, महामंत्री मिथलेश गर्ग, स्टोन मिल मालिक संजय सिंह, पंकज माहेश्वरी, सुनील बाहरी, संतोष पटेल एवं शुभलाल सिंह ने कहा कि चाहे जो हो जाए, अब वे गुंडा टैक्स नहीं देंगे.


साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/11/bundelkhand-earth-breaks-trembling-people.html

Lozol

How to rewrite the Durban script……..! by – Sunita Narain

It’s that time of the year again. Climate change talks are heating up, with the next conference of parties scheduled in Durban in end-November. There is heat but no light. The negotiations are stuck despite the clear signs of climate change: dangerous and potentially catastrophic extreme weather events.

Not much is expected in Durban, except the usual shadow-boxing. The European Union is leading the pack of climate champions. It wants the world to fast track negotiations for a single, legally binding treaty on cutting emissions. It does not say (loudly) that its real plan is to junk the Kyoto Protocol, which demands that industrialised countries cut emissions marginally, roughly 6 per cent below the 1990 levels by 2008-2012. The agreement in this Protocol is that rich countries, major historical and current emitters, go first, creating ecological and economic space for the developing world to grow. In time, the rest would follow. To facilitate actions in the developing and emerging world, technology and funds would be committed. All this done well would lead to a real deal. But it was not to be.

The US and its allies walked out of the Kyoto Protocol and now EU wants to dump it as well. It finds it difficult to meet its commitments to reduce emissions domestically.

At Durban, once again the stage is set for a dud act. EU will advocate climate action and its proposal for a single, legally binding treaty will get predictable responses. The US, the world’s biggest climate renegade, which pulls all strings, will oppose the proposal. Its objective is to do little at home, but most importantly, not to be made responsible for taking action based on contribution to the problem. It wants the distinction between the past and present polluters to be removed. It wants no discussion on a legal instrument. The other big polluting guns—Australia, Japan, New Zealand and Canada—will stand behind the US.

In the Durban-script the roles for the rest of the actors have also been written. The Association of Small Island States (AOSIS), which is rightfully angry over inaction, will go with the EU-designed approach. It will see no choice but to back EU’s proposal, even as it knows the stalemate will only prolong. On the other hand, China and India will side with the US and join the deniers. The rest, with small differences, will wait for the game to play out.

The host, South Africa, will want a deal in its city. What will this be? This country more than any other reflects the climate dilemma: to act or not to act? It has very high per capita emissions—almost equal to Europe’s —but it is yet to share economic benefits and energy access with its majority poor. It is dependent on coal mining and exports, which it cannot jeopardise. But it wants to play the gracious host and somehow get its basic friends—the coalition of the emerging polluters, Brazil, India and China—to dine the last supper. Brazil may play along; it hosts the next big environment summit and would want to look good. But China and India will know too much is at stake. Once they accept a single instrument, they will have to take costly action, with no resources.

The die is not even cast. But the end game is known.

So what can change the outcome? I believe there is no other way but that the developing world regroups and takes leadership. Our world is the worst hit. We do not need to be preached about the pain of climate change. We know it. This leadership will require making tough demands. It will mean demanding drastic emission reduction targets for the rich world. But it is equally important that our world does not hide behind the intransigence of the US. Our world must explain that it is already doing much to reduce emission intensity of its growth—growth of renewables in China, reduction of deforestation in Brazil and energy efficiency in India. It can and will do more. However, the high costs of transition to low-carbon growth must be paid for. This leadership must be firm on principles of climate justice and effective action.

This approach, I know, will be scoffed at and derided as being impractical. It is partly because the non-governmental groups following climate negotiations mirror the divide in the world. One half, the followers of the US and its grouping, will say this stance will jeopardise their democratic government and bring back the dreaded Republicans—Neanderthals who do not believe climate change is real. The other group, followers of EU and its grouping, will say this is good in words, but will not lead to effective action. In Durban they will want a deal, at whatever costs.

But their hedging will hide the one truth that needs to be revealed: most of the low-hanging fruit—easy options to reduce emissions—have already been picked in the climate-threatened world. This fact cannot be more inconvenient coming at a time when the rich world is faced with a double-digit recession; the euro-zone is threatened; and people are worked up against austerity measures.

The Durban deal (like its predecessors Copenhagen and Cancun) will be bad for all if not based on accepting the hard truths of climate change. It is time we grew up.

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To follow the buzz prior to Durban, do see our events section below.

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MORE FROM DOWN TO EARTH
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Courtesy-  DOWN TO EARTH

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‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्याना’साठी ११ नोव्हेंबरपासून आगळी मोहीम

 दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा
सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन
कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत
प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड

फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. यावर मात करण्यासाठी आता राष्ट्रीय उद्यानाचे संचालक व मुख्य वनसंरक्षक सुनील लिमये यांनी एक नवी शक्कल लढवली आहे. त्यासाठी पर्यटकांचीच मदत घेण्याचा निर्णय घेतला असून सायकल वरून रपेट करणाऱ्या पर्यटकांनी पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा केल्यास त्यांना सायकल भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्याचप्रमाणे येत्या ११ नोव्हेंबरपासून ‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्यान’ ही मोहीम राबविली  जाणार असून त्यात कचरा टाकणाऱ्यांविरोधात दंडाची तरतूदही              करण्यात आली आहे.
प्लास्टिकचा कचरा ही राष्ट्रीय उद्यानासाठी मोठीच डोकेदुखी ठरली आहे. दररोज उद्यानातून गोळा होणारे प्लास्टिक खूप मोठय़ा प्रमाणावर असते असे उद्यानाची सूत्रे स्वीकारल्यानंतर काही दिवसांतच लिमये यांच्या लक्षात आले. त्यानंतर त्यांनी कर्मचाऱ्यांच्या मदतीने काही महिन्यांसाठी प्लास्टिकच्या कचऱ्याचे मोजमाप करण्याचा निर्णय घेतला. त्यात समोर आलेली गेल्या पाच महिन्यांतील आकडेवारी धक्कादायक होती.
दरदिवशी उद्यानातून गोळा होणारा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल २५० किलो एवढा होता. तर सुट्टीच्या दिवशी हा आकडा तिपटीने वाढायचा. कचरा गोळा करणे आणि त्याची आकडेवारी करणे याच कालखंडात पर्यटकांना विनंती करण्याची मोहीमही पार पडली. उद्यानात प्लास्टिकविरोधात नवीन फलक जागोजागी लावण्यात आले. त्यातून प्लास्टिकच्या होणाऱ्या दुष्परिणामांची माहितीही देण्यात आली. मात्र त्याने फारसा कोणताही फरक पडला नाही.
अखेरीस हा प्लास्टिकचा भस्मासूर रोखण्यासाठी कडक धोरण अवलंबण्याचा आणि विद्यमान कायद्यातील तरतूदींचा आधार घेण्याचा निर्णय घेतला, असे सांगून संचालक सुनील लिमये म्हणाले की, वन्यजीव संरक्षण कायद्यातील कलम ३५ (६) नुसार, वन्यजीवनास धोका पोहोचवणारे कोणतेही कृत्य करणाऱ्यास तब्बल २५ हजार रुपये दंड आणि तीन महिने साध्या कैदेची तरतूद आहे. याच तरतुदीनुसार दंडात्मक कारवाईचा अधिकारही देण्यात आला आहे. तो आता वापरण्यात येणार आहे. त्यानुसार प्लास्टिक टाकताना पहिल्यांदा पकडले गेल्यास १०० रुपये आणि दुसऱ्यांदा पकडले गेल्यास ५०० रुपये दंड करण्यात येणार आहे. तिसऱ्यांदा पकडले गेल्यास त्या व्यक्तिविरुद्ध गुन्हा दाखल करून न्यायालयात खटला गुदरण्यात       येईल.  याशिवाय इतरही काही अभिनव मार्ग अवलंबण्यात येणार आहेत. गेल्या महिन्याभरापासून पर्यावरणप्रेमी उपक्रम म्हणून सायकल फेरी सुरु करण्यात आली आहे. त्यासाठीच्या सायकली वन विभागातर्फेच राष्ट्रीय उद्यानाच्या प्रवेशद्वारावर उपलब्ध करून दिल्या जातात. दोन तासांसाठी ४० रुपये भाडे आकारले जाते. या पर्यटकांना सायकल देताना ११ नोव्हेंबरपासून एक कापडी पिशवीही देण्यात येणार आहे. त्यांनी या फेरीदरम्यान पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा करून आणल्यास त्यांना भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेण्यात आला आहे. खरेतर हे उद्यान पर्यटकांसाठी आहे, त्यामुळे त्यांच्यावर कारवाई करण्याची इच्छा नव्हती. मात्र प्लास्टिकच्या भस्मासुराकडे पाहता असे लक्षात आले की, त्याला वेळीच आवर घातला नाही तर हा मानवजातीवरच उलटणार आहे. त्यामुळे अतिशय गांभीर्याने हा निर्णय घेतल्याचे लिमये यांनी सांगितले.

विनायक परब

साभार- लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=191453:2011-11-02-19-35-24&catid=73:mahatwachya-baatmyaa&Itemid=104

गंगा क्रांती आहवान…!

साभार- गंगा जलबिरदरी, जयपुर.

स्पीड का नया दावा

स्विटज़रलैंड में यूरोपीय परमाणु अनुसंधान केंद्र (सर्न) और इटली के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि उन्हें ऐसे पार्टिकल मिले हैं जो प्रकाश की गति से तेज चलते हैं. वैज्ञानिक ख़ुद भी चकित हुए. पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि उन्हें न्यूट्रिनो नामक पार्टिकल मिले हैं, जो प्रकाश की गति से भी तेज चलते हैं. अगर यह कहीं और से भी साबित हो जाता है तो आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत ग़लत साबित हो जाएगा. स्विटजरलैंड की सर्न प्रयोगशाला और इटली की प्रयोगशाला में हुए प्रयोग के दौरान यह तथ्य सामने आया. पाया गया कि ये छोटे सब-एटॉमिक पार्टिकल 3,00,00,06 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से जा रहे हैं जो प्रकाश की गति से क़रीब छह किलोमीटर प्रति सेकेंड ज़्यादा है. इस प्रयोग के प्रवक्ता भौतिकविद्‌ एंटोनियो एरेडिटाटो ने कहा, यह नतीजा हमारे लिए भी आश्चर्यजनक है. हम न्यट्रिनो की गति नापना चाहते थे, लेकिन हमें ऐसा अद्भुत नतीजा मिलने की उम्मीद नहीं थी. हमने क़रीब छह महीने जांच, परीक्षण, नियंत्रण और फिर से जांच करने के बाद यह घोषणा की है. न्यूट्रिनो प्रकाश की तुलना में 60 नैनो सेकेंड जल्दी पहुंचे. इस प्रयोग में शामिल वैज्ञानिकों ने इसके नतीजों के बारे में नपे-तुले शब्दों में बात की. सर्न के निदेशक सर्गियो बेर्टोलुची ने कहा, अगर इस नतीजे की पुष्टि हो जाती है तो भौतिकी को देखने का हमारा नज़रिया बदल जाएगा. न्यूट्रिनो पर कोई आवेश नहीं होता और ये इतने छोटे होते हैं कि इनका द्रव्यमान भी अभी-अभी ही पता चल सका है. इनकी संख्या तो बहुत होती है, लेकिन इनका पता लगाना मुश्किल है. इन्हें भुतहा कण भी कहा जाता है और ये न्यूक्लियर फ्यूजन के कारण पैदा होते हैं. इस प्रयोग के तहत वैज्ञानिकों ने स्विटज़रलैंड और इटली की प्रयोगशालाओं के बीच प्रकाश पुंज फेंका. दोनों प्रयोगशालाओं के बीच 730 किलोमीटर की दूरी है. पार्टिकल फिजिक्स की दुनिया में इस घोषणा से सनसनी फैल गई है. फ्रांस में भौतिकी संस्थान के पिएरे बिनेट्यूरी ने कहा, सामान्य सापेक्षता और विशेष सापेक्षता दोनों ही सिद्धांतों पर इससे सवाल खड़ा हुआ है. भौतिकविद्‌ एंटोनियो जिचिषी कहते हैं, अगर आप प्रकाश की गति को छोड़ दें तो विशेष सापेक्षता का सिद्धांत तो नाकाम हो जाएगा.


 साभार- चौथि दुनिया

HAPPY DIWALI

Diwali…..”FESTIVAL OF LIGHTS” let us take pledge to avoid crackers, avoid Air & Noise Pollution… Gangajal nature Foundation, Mumbai

Gangajal Nature Foundation’s 3rd National Documentary, Photography and Essay Competition The Winners have been announced!

Gangajal Nature Foundation’s3rd National Documentary, Photography and Essay Competition

The Winners have been announced!

Photography

First Prize : Ghanshyam Kahar, Vadodara, Gujrat (Entry Name : DI IT…!) View
Second Prize : Dimple Kumar I. Pancholi, Vadodara, Gujrat (Entry Name : FARMING IS NESSASRY FOR MOTHER EARTH)View
Third Prize : Narayan D. Patel, Vadodara, Gujrat (Entry Name : SAVE TREES FOR OUR PLANNET)View

Documentary

First Consolation Price : Santosh Deodar, Kalyan, Maharashtra (Entry Name : PRESERVING DREAM)
Second Consolation Price : Hitesh Parmar, Vadodara, Gujrat (Entry Name : GREEN EARTH)

Essay

First Prize :Amol Sitaphale, Sholapur, Maharashtra (Entry Name : GREEN EARTH)
Second Prize : Bhagyshri Sontakke, Kalyan, Maharashtra (Entry Name : HAREET VASUNDHARA)

जैविक खेती समय की जरूरत….!

राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है. शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत है. फाउंडेशन के इस सपने को पूरा करने का भागीरथ प्रयास किया है संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष मुकेश गुप्ता ने. शेखावाटी में जैविक खेती से जुड़े तमाम मसलों पर चौथी दुनिया के समन्वय संपादक डॉ. मनीष कुमार ने उनसे विस्तार से बातचीत की. पेश हैं प्रमुख अंश…

इस इलाक़े में का़फी बदलाव देखने को मिल रहा है, आखिर यह परिवर्तन कैसे संभव हो पाया?

अगर इलाक़े की फिज़ा बदल गई है तो उसमें बहुत बड़ा योगदान किसानों का रहा है. इस इलाक़े की एक विशेषता यह है कि यहां किसी नए विचार को स्वीकार करने की क्षमता शायद भारत के दूसरे इलाकों से ज़्यादा है. 15-16 साल पहले यहां मुख्यत: दो प्रकार की खेती होती थी. एक बरसात पर निर्भर रहने वाली और दूसरी एरीगेशन बेसिस पर होने वाली. उसका रकबा लगभग 8-9 प्रतिशत था. दोनों ही प्रकार की खेती में कई समस्याएं थीं. उसके अंदर इनपुट यानी केमिकल फर्टिलाइज़र की बात कहें या कुछ थोड़े-बहुत पेस्टिसाइज जिनका प्रयोग होता था, से किसानों की उपज की लागत बढ़ती जा रही थी, लेकिन उन्हें बाज़ार में मिलने वाली क़ीमत का परपोशनेट या रिटर्न नहीं मिल रहा था. जो बाराने खेती थी, उसमें दो समस्याएं थीं, जैसे बरसात का कम होना. यह इलाक़ा 500 मिलीमीटर से कम बारिश वाले क्षेत्रों में आता है. यहां बाराने खेती करने वाले किसानों को एक नई तकनीक से परिचित कराया गया. विशेष तौर पर बाजरे की जो देसी किस्म की खेती होती थी, उसका प्रतिशत बहुत था. अब स़िर्फ 10-12 फीसदी बाजरा ही देसी रह गया है. उसकी जगह 70 से 90 फीसदी तथाकथित हाईब्रिड हो गया. हम लोगों ने फाउंडेशन की ओर से किसानों से बातचीत शुरू की, उनकी समस्याएं सुनीं और कैसे उनका समाधान किया जा सकता है, इस पर काम करना शुरू किया. हमने दो प्रमुख उपाय अपनी ओर से शुरू किए. एक तो पशुओं के गोबर और खेतों से निकलने वाले खर-पतवार से बढ़िया किस्म की खाद बनानी शुरू की, क्योंकि इसमें पानी सोखने की क्षमता अधिक होती है.

शुरुआत में जब फाउंडेशन ने काम करना शुरू किया तो किसानों ने उसे किस रूप में स्वीकार किया?

पहली बात तो यह कि जितने भी किसान इस क्षेत्र में हैं, जिनसे हम बातचीत करते थे, वे अपने खेतों में खुद के खाने के लिए नॉन केमिकल स्वरूप में गोबर की खाद डालकर देसी बीज से खेती करते थे. इसका मतलब उन्हें समझ में आता था कि देसी मामला ज़रा बेहतर है. दूसरी बात यह कि हमने जो तकनीक यहां इंट्रोड्यूज की, खासकर वर्मी कल्चर तकनीक, उसे यहीं विकसित किया गया. उससे तत्काल उत्पादन लागत कम हो गई. तीसरे स्तर पर हमने देखा कि यह काफी प्रचलन में आ गया है. उसी समय संपूर्ण विश्व में 1995 से 2005 के बीच फूड विदाउट केमिकल्स (रसायन रहित खाद्य पदार्थ) का आर्गेनिक फार्मिंग के रूप में प्रचलन शुरू हुआ था.

शेखावाटी में कितने किसान फाउंडेशन से जुड़े हैं और राष्ट्रीय स्तर पर कितने लोग जुड़े हुए हैं?

सबसे पहले हम लोगों ने करीब 10 हज़ार स्थानीय किसानों को फाउंडेशन से जोड़ा. उसके बाद लगातार लोग हमसे जुड़ते गए और उनकी संख्या क़रीब 70 हजार हो गई. शेखावाटी क्षेत्र में मुख्य तौर पर सीकर, झुंझुनू और चुरू ज़िले आते हैं. अब 10-11 वर्ष के बाद पूरे राष्ट्रीय स्तर करीब ढाई-पौने तीन लाख किसान हमसे जुड़ चुके हैं.

आगे की योजना क्या है, जिन राज्यों में आप नहीं जा सके, वहां क्या संदेश लेकर जाएंगे?

पूरे राजस्थान और देश के अंदर हमने बड़ी संख्या में किसानों को जोड़ लिया है और अब उन्हें मार्केट लिंकेज भी प्रोवाइड करने लगे हैं. किसानों की उपज को उपभोक्ताओं ने खूब सराहा. हालांकि उपभोक्ताओं ने हमारे सामने कुछ समस्याएं रखीं. उन्होंने कहा कि हमारी रसोई में अगर आप बीस आइटम ऑर्गेनिक देंगे और पचास नॉन आर्गेनिक, तो हमारे साथ पूरा न्याय नहीं होगा. लिहाजा हमारी पहली प्राथमिकता यह रही कि सामान्य भारतीय रसोई में कितने प्रतिशत आइटम हम आर्गेनिक रूप में उपलब्ध करा सकते हैं. हम सिक्किम गए, क्योंकि अदरक वहीं होती है सबसे अच्छी. हम गुजरात गए, क्योंकि केसर वहां होता है. महाराष्ट्र जाना पड़ा, क्योंकि वहां सोयाबीन, उड़द और अरहर की दाल अच्छी होती है. इस प्रकार हमारे कार्यक्रम का विस्तार होता गया.

जो लोग अपने खेतों को ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार करना चाहें तो उनका पहला क़दम क्या होगा?

अब इस तरह की मांग लगातार बढ़ रही है. इसीलिए हमने तय किया है कि अब अपना ऑनलाइन पोर्टल क्रिएट करेंगे. इस बाबत हमने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सर्विस डिवीजन अलग से बना दिया है. इसका काम होगा कि पूरे देश में कहीं से भी किसान हमसे संपर्क करें और चाहें कि वे जैविक खेती करना चाहते हैं और उन्हें तकनीकी सहायता की ज़रूरत है तो यह उन्हें ऑनलाइन सपोर्ट उपलब्ध कराए.

आपने ऑनलाइन सपोर्ट तो उपलब्ध करा दिया, लेकिन उसके लिए प्रशिक्षण की ज़रूरत होगी, शेखावाटी के किसानों को प्रशिक्षित करने की दिशा में आप क्या कर रहे हैं?

यह सही है कि किसानों का इंटरनेट पर जाना संभव नहीं है. जहां भी हम अपने कार्यक्रम की शुरुआत करें, वहां हमारा कोई न कोई प्रतिनिधि होना चाहिए. चाहे वे हमारे फील्ड वर्कर हों या हम ऐसे प्रगतिशील किसानों को चिन्हित करें, जो हमारी बात सुनकर, हमसे प्रेरित होकर काम करें. हमने जो ऑनलाइन सर्विस शुरू की है, यह टोल फ्री टेलीफोन नंबर है. इसमें किसानों के सवालों का जवाब हम उन्हीं की भाषा में देंगे. इसके सपोर्ट बैकअप में हमने देश के 19 राज्यों में अपने कदम बढ़ाए हैं. कुछ ही राज्य बचे हैं, उनके लिए भी हम प्रयास कर रहे हैं.

अपने कलेक्शन सेंटर और उसकी मार्केट चेन के बारे में कुछ जानकारी दें.

इसकी शुरुआत से लेकर अंत तक, जिसे हम वैल्यू चेन मैनेजमेंट कहते हैं, सबसे पहले किसान और हमारा संपर्क होता है. उसके बाद एक-दूसरे के बीच भरोसा कायम होता है. किसान वास्तव में जैविक खेती करने को इच्छुक है. तीसरी कड़ी होती है उसके सर्टिफिकेशन का, जिसका सारा रिकॉर्ड अब हम टेलीफोन के ज़रिए रखते हैं. एक बार जब किसान सर्टिफाइड हो जाता है, जिसमें अधिकतम तीन वर्ष लगते हैं. उसके बाद हमें पता चलता है कि कौन-कौन से किसान हैं, कहां उनका खेत है और क्या-क्या फसलें उन्होंने बोई हैं. उसी के अनुसार हम अपनी योजना बनाते हैं. अगर किसी एक कलस्टर के अंदर लगे कि यहां पर एक ट्रक अनाज मिल सकता है तो हमारी टीम क्षेत्र के किसानों से उनकी उपज खरीद लेती है. इससे किसानों को दो फायदे होते हैं. एक तो उन्हें मंडी नहीं जाना पड़ता, दूसरे खर्च भी नहीं लगता. छोटे किसानों के लिए यह काफी फायदेमंद है. कोई आढ़त नहीं लगती और न कोई कमीशन. मंडी में थोड़ी-बहुत लूटपाट होती है, उससे भी वे बच जाते हैं. पहले नकदी ले जाने में ज़रूर हमें दिक्कत होती थी, लेकिन अब हम उनके लिए आरटीजीएस खाते खोल रहे हैं. किसानों से खरीदी गई उपज हमारे केंद्रीय गोदाम में आ जाती है. फिर हम उसकी प्रोसेसिंग करते हैं, उससे ज़रूरत की चीजें बनाते हैं. किसानों की उपज की हम ब्रांडिंग करते हैं. इसके लिए हमने डाउन टू अर्थ बनाया है, जहां सभी जैविक खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं. इसका हमने काफी विस्तार किया है. हमारी कोशिश यही है कि उपभोक्ताओं को इसके प्रति जागरूक किया जाए कि जैविक खाद्य पदार्थ में क्या अच्छाइयां हैं और उसे क्यों खाना चाहिए.

आम लोगों के बीच एक भ्रम है कि जैविक पदार्थ महंगे होते हैं, आपका क्या कहना है?

यदि आप किसी भी शहर की ऐसी दुकान पर जाएं, जिसे अच्छी क्वालिटी का सामान बेचने के लिए जाना जाता हो. अगर उसके और हमारे ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्‌स की मार्केट प्राइस देखें तो आप पाएंगे कि हम शायद उसके म़ुकाबले काफी सस्ता सामान बेच रहे हैं. यह अलग बात है कि कोई अगर ए ग्रेड के माल की तुलना सी ग्रेड के माल से करे तो उसे महंगा लगेगा.

आपकी ग्रेडिंग प्रणाली क्या है?

पहले हर शहर और हर परिवार के अंदर हमें हर प्रकार के भोजन के आइटम की जानकारी होती थी. जब हमारे घरों में पापड़ बनता था तो कहा जाता था कि मूंग की दाल वहीं की होनी चाहिए. उत्तर भारत के अंदर अगर किसी को अरहर की दाल पसंद थी तो वह दुकानदार से कहता था कि मुझे कानपुर की अरहर की दाल दीजिए. इसी तरह गेहूं किसी और क्षेत्र का है, चावल किसी और क्षेत्र का. मसलन उनकी जो प्रसिद्धि थी, वह उनकी क्वालिटी को लेकर थी. लेकिन हमने देखा कि 1970 के बाद जिस प्रकार कृषि वैज्ञानिकों ने हाईब्रिड को इंट्रोड्यूज किया, उसी का परिणाम है कि अब रिटेल काउंटरों पर जो आम उपभोक्ता आते हैं, उन्हें सुंदर दिखने वाली चीजें अच्छी लगती हैं और जो सुंदर न दिखे, वह उनके हिसाब से खराब है. लिहाजा हम यह जागरूकता भी लोगों में पैदा कर रहे हैं कि यदि उन्हें बाजरे की रोटी खानी है तो हाईब्रिड बाजरे की जगह वह देसी बाजरे की रोटी खाएं तो उन्हें स्वाद भी पसंद आएगा और सेहत भी सही रहेगी. फर्ज करें, आप किसी शहर के रेस्तरां में जाते हैं, वहां परिवार के कुल खाने का खर्च 500- 600 रुपये के बीच आता है. मुझे नहीं लगता कि 100 रुपये बचाने के लिए कोई कम स्वाद वाला भोजन पसंद करेगा. यही बात हम उपभोक्ताओं को बताते हैं कि आप ऊपरी चमक-दमक के बजाय गुणवत्ता देखिए.

शेखावाटी में अभी और कितने किसानों को आप अपने साथ जोड़ना चाहेंगे?

हम पूरे देश में 270 आर्गेनिक आइटम, जो अमूमन रसोई के अंदर इस्तेमाल किए जाते हैं, उन्हें मुहैय्या कराने की स्थिति में हैं. तकरीबन 95 से 98 फीसदी रसोई के आइटम हम देने की क्षमता रखते हैं. जैसे-जैसे बाज़ार में हम इसका विस्तार कर रहे हैं, इसकी मांग बढ़ रही है. लिहाजा हमारा प्रयास है कि हम उन फसलों को उन क्षेत्रों में बढ़ावा दें, जिनकी मांग बहुत अधिक है. मसलन, शेखावाटी का गेहूं हमने सात साल पहले यहां के बाज़ार में ही लांच किया और जानबूझ कर उसकी क़ीमत मध्य प्रदेश के गेहूं से अधिक रखी थी. शुरू में हमें काफी परेशानी हुई. ग्राहकों ने यह कहा कि यह शेखावाटी का गेहूं क्या चीज है. हमने तो पहली बार इसका नाम सुना है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी बनी रोटी, बाटी, पूड़ी और पराठे जब लोगों ने खाना शुरू किया तो उन्हें अच्छा लगा. कहने का मतलब यह कि शेखावाटी के गेहूं को हमने नई पहचान दी और इसकी मांग बढ़ती जा रही है. शेखावाटी में हमारी योजना है कि यहां हम 10 लाख टन गेहूं का उत्पादन करें.

बाज़ार में मिलने वाली हरी सब्जियों और आपके द्वारा बेची जाने वाली सब्जियों में क्या फर्क़ है?

भारत के संदर्भ में अगर हम खाद्य पदार्थों में मिलावट की बात करें तो पहले हमारे यहां इसकी गुंजाइश नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान तरक्की कर रहा है, मिलावट करने के तरीकों में नित्य बढ़ोत्तरी हो रही है. कहीं दूध की जगह सिंथेटिक दूध मिल रहा है तो कहीं घी में तेल की मिलावट की जा रही है. बाजार में विक्रेताओं की दलील है कि ग्राहकों को सस्ती चीजें चाहिए, इसी वजह से मिलावटखोरी का धंधा फल-फूल रहा है. हम शुद्ध मूंग और मसाले का पापड़ बनाते हैं. हमारी लागत 180-190 रुपये प्रति किलो आती है. वहीं हम देखते हैं कि बाज़ार में 100 रुपये प्रति किलो की दर से पापड़ बिक रहा है. आखिर क़ीमत में इतने अंतर की वजह क्या है. करेला, तोरई, टिंडा और लौकी में ऑक्सीटॉक्सिन का इंजेक्शन लगाकर रातोंरात उसे बड़ा कर दिया जाता है. लौकी का जूस आप पी रहे हैं सेहत के लिए, लेकिन आपके शरीर में ऑक्सीटॉक्सिन भी जा रहा है, जिससे न जाने कितनी बीमारियों का खतरा बना रहता है. आज बड़े पैमाने पर किडनी, लीवर और पेट की बीमारियां हो रही हैं. उसकी वजह ऐसी दूषित सब्जियां हैं, जिन्हें तैयार करने में बड़े पैमाने पर रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. फूड एडेलट्रेशन रोकने के लिए हमारे देश में जो प्रशासनिक और कानूनी तंत्र है, वह का़फी लचर है. मैं मीडिया को धन्यवाद देना चाहूंगा कि पिछले 5-10 वर्षों में उसने लोगों के अंदर एडेलट्रेशन को लेकर का़फी जागरूकता पैदा की. सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया है. हालांकि हाल में खाद्य सुरक्षा अधिनियम बनाया गया है. इस एक्ट से हमें काफी उम्मीदें हैं. अब तक किसी रिटेल स्टोर पर मिलावट पकड़े जाने पर कंपनी पर कार्रवाई होती थी, लेकिन नए कानून के मुताबिक, मिलावटखोरी के आरोप में अब रिटेलर भी दोषी माने जाएंगे. इसके अलावा डिस्ट्रीब्यूटर और कंपनी पर भी कार्रवाई की जाएगी.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/10/organic-farming-needs-time.html