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		<title>एक बार फिर जीएम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 03 Sep 2010 18:24:59 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img src="file:///C:/DOCUME%7E1/user/LOCALS%7E1/Temp/moz-screenshot-1.png" alt="" /></p>
<p style="text-align: justify;">खाद्य  सुरक्षा के नाम पर<img class="alignleft" title="एक बार फिर जी एम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2010/09/8-b-250x150.jpg" alt="" width="250" height="150" /> एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य  पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों  और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार  संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का  मन बना रही है. इस विधेयक को लाने के पीछे सरकार की दलील है कि इससे मुल्क  में जीएम फूड और फसलों को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ भूख की समस्या भी हल  होगी. ऐसे व़क्त में जब दुनिया के कई मुल्कों ने अपने यहां जेनेटिक  मोडिफिकेशन से विकसित फसलों की खेती पर पाबंदी लगा दी है, तब हमारे मुल्क  के नीति नियंताओं द्वारा इसकी खेती के लिए दरवाजे खोलना किसी के भी गले  नहीं उतर रहा है. ग़ौरतलब है कि बीते साल जैव प्रौद्योगिकी नियामक द्वारा  बीटी बैगन की व्यवसायिक खेती को मंजूरी मिलने के बाद से ही पूरे मुल्क में  यह बहस जारी है कि जीन परिवर्धित खाद्यानों की खेती क्या हमारी ज़रूरत बन गई  है या हम इसे हड़बड़ी में बिना इसके ख़तरों को जाने-पहचाने अपने यहां लागू कर  रहे हैं? बीटी बैगन के देशव्यापी विरोध के बाद हालांकि सरकार ने उस व़क्त  अपने बढ़ते क़दम पीछे खींच लिए थे, लेकिन अपना इरादा नहीं बदला. इसी का नतीजा  है कि जीएम फूड लाने के लिए इस मर्तबा सरकार पूरी तैयारी से आ रही है.  संसद में इसके लिए बाक़ायदा विधेयक लाया जा रहा है. इस विधेयक में  अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे कई प्रावधान हैं, जो विधेयक की नीयत पर सीधे-सीधे  सवाल खड़े करते हैं.</p>
<blockquote style="text-align: justify;"><p><strong>&#8216;अमेरिका की जीएम फूड  कंपनियों और उनके उत्पाद मुल्क में जल्द से जल्द और  बिना किसी रोक-टोक आ  सकें, इसके लिए सरकार कमर बांध कर तैयारियों में लगी  हुई है. विधेयक के  मार्फत दरअसल सरकार जीएम फसलों के विरोध को पूरी तरह  कुचलना चाहती है. इस  पूरी कवायद के पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निजी हित  भी काम कर रहे हैं.  लिहाज़ा वे जीएम फसलों के हक़ में माहौल बना रही हैं.  प्रायोजित रिसर्च के  जरिए इन फसलों के फायदे गिना रही हैं. अफसोस की बात यह  है कि इन प्रायोजित  रिसर्चों में हमारे कृषि वैज्ञानिक भी आगे-आगे हैं.&#8217;</strong></p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">बीते कुछ सालों से खाद्य सुरक्षा, जीएम तकनीक एवं उसके उत्पादों के  नतीजों की ओर अवाम और सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचने में सक्रिय संगठन  पैरवी के निदेशक अजय कुमार झा विधेयक के कई प्रावधानों से सहमत नहीं हैं.  वह कहते हैं कि इस विधेयक में स्वास्थ्य और जैव सुरक्षा को लेकर बहुत कमज़ोर  नियम हैं. यहां तक कि हिंदुस्तानी हालत और उपयुक्तता को देखने के लिए कई  इलाक़ों में परीक्षण की बात यह विधेयक नहीं करता है. ग़ैर जीएम प्रजातियों के  संदूषण को रोकने के लिए भी इसमें कोई प्रावधान नहीं है. न ही संदूषण के  लिए बीज निर्माता पर कोई ज़िम्मेदारी डाली गई है. जानकारी के संदर्भ में भी  इसमें बहुत बेतुके प्रावधान हैं. इनके मुताबिक़ जीएम फूड के बारे में किए गए  किसी भी निर्णय को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा गया है. साथ ही  जीएम फूड और फसलों के बारे में बिना सबूत ग़लत और भ्रामक जानकारी फैलाने  वालों के लिए गंभीर दंड का प्रावधान है. जब दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों में  मानव, जीव-जंतुओं और पर्यावरण पर जीएम फूड के दूरगामी प्रभावों के बारे  में एक राय नहीं है, ऐसे में इन प्रावधानों का मक़सद निश्चित तौर पर जीएम  फूड और फसलों का विरोध कर रहे लोगों को प्रताड़ित करना है.</p>
<p style="text-align: justify;">विधेयक में इसके अलावा एक कमी और है, इसमें स्वामीनाथन टास्क फोर्स की  अनुशंसाओं को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया है. स्वामीनाथन टास्क फोर्स ने  सरकार को अपनी स़िफारिशें सौंपते हुए कहा था कि किसी भी बायो तकनीक नियमन  नीति का मक़सद पर्यावरण की सुरक्षा, किसान परिवार का कल्याण, कृषि व्यवस्था  का पर्यावरणगत एवं आर्थिक टिकाऊपन, उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य एवं पोषण के  मामले में सुरक्षा और देशी-विदेशी व्यापार की सुरक्षा एवं देश की जैव  सुरक्षा. लेकिन अफसोस! विधेयक बनाते समय इन चिंताओं पर बिल्कुल भी ध्यान  नहीं दिया गया. विधेयक में जिस तरह के प्रावधान हैं, वे जीएम तकनीक और  उत्पादों का नियमन नहीं, बल्कि विनियमन का काम करेंगे. दिखने में भले ही यह  विधेयक नया दिख रहा हो, पर एक तरह से देखें तो यह विधेयक पुराने एनबीआरए  नामक बिल का थोड़ा बदला रूप है, जिसका मुल्क भर में कृषि विशेषज्ञों,  सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और 11 सूबाई सरकारों ने कड़ा विरोध किया था.  बावजूद इसके अमेरिका की जीएम फूड कंपनियों और उनके उत्पाद मुल्क में जल्द  से जल्द और बिना किसी रोक-टोक आ सकें, इसके लिए सरकार कमर बांध कर  तैयारियों में लगी हुई है. विधेयक के मार्फत दरअसल सरकार जीएम फसलों के  विरोध को पूरी तरह कुचलना चाहती है. इस पूरी कवायद के पीछे बहुराष्ट्रीय  कंपनियों के निजी हित भी काम कर रहे हैं. लिहाज़ा वे जीएम फसलों के हक़ में  माहौल बना रही हैं. प्रायोजित रिसर्च के जरिए इन फसलों के फायदे गिना रही  हैं. अफसोस की बात यह है कि इन प्रायोजित रिसर्चों में हमारे कृषि  वैज्ञानिक भी आगे-आगे हैं. यहां तक कि सरकार भी राष्ट्रीय हितों की ह़िफाज़त  करने के बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वागत में लगी हुई है.</p>
<p style="text-align: justify;">कुल मिलाकर जीएम फसलों के टेस्ट के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से जितने गहन  और लंबे परीक्षण की ज़रूरत होती है, वे वास्तव में हमारे यहां हुए ही नहीं  हैं. और यदि हुए हैं तो भी वे नाकाफी हैं. दुनिया भर का तजुर्बा हमें यह  बतलाता है कि खेती में जेनेटिक इंजीनियरिंग ख़तरनाक ही साबित हुई है.  जहां-जहां भी जीएम खाद्य फसलों का उत्पादन हो रहा है, वहां यह फूड क्रॉप्स  के तौर पर नहीं है. अमेरिका, जिसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में हिंदुस्तान  के बीज बाज़ार पर क़ब्ज़ा करने की होड़ लगी है, में भी स़िर्फ जीएम सोयाबीन एवं  मक्का पैदा किया जा रहा है और उसका इस्तेमाल फूड क्रॉप्स के तौर पर नहीं  किया जाता. यूरोप के मुल्कों ने साफ तौर पर अपने यहां बीटी बैगन जैसे  जेनेटिक मोडिफिकेशन से विकसित फसलों की खेती पर पाबंदी लगा रखी है. जीएम  फूड के नतीजों का गंभीरता से जायज़ा लिए बिना उसे बढ़ावा देने की कोशिश  आख़िरकार हिंदुस्तानी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य से खेलना है. गोया कि यह  फसलें इंसान की सेहत और पर्यावरण दोनों के एतबार से ख़तरनाक हैं. जब तक दीगर  मुल्कों में जीएम फसलों के नतीजे साफ नहीं हो जाते, तब तक हिंदुस्तानी  सरकार को भी इन फसलों की पैरवी करने से बचना चाहिए, क्योंकि एक बार यह  विधेयक पास हो गया तो फिर सरकार के हाथ में भी कुछ नहीं रह जाएगा.</p>
<p><strong>साभार- चौथी दुनिया</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.chauthiduniya.com/2010/09/ek-bar-fir-ji-m-khadh-padarth-lane-ki-taiyari.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2010/09/ek-bar-fir-ji-m-khadh-padarth-lane-ki-taiyari.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2010/09/ek-bar-fir-ji-m-khadh-padarth-lane-ki-taiyari.html</a></p>
<p style="text-align: justify;"><img src="file:///C:/DOCUME%7E1/user/LOCALS%7E1/Temp/moz-screenshot.png" alt="" /></p>
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		<title>वेदांता के लिए लाल झंडी, पास्को के लिए लाल जाजम&#8230;</title>
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		<pubDate>Thu, 02 Sep 2010 18:26:07 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है, उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/Orissa.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6187" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/Orissa.jpg" alt="" width="522" height="218" /></a>केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है,  उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट  पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी  के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की  जमीन पर बॉक्साइट की खदान को खोदने की अनुमति वेदांता को नहीं दी गई।  इससेचेयरमेन अनिल अग्रवाल का वह सपना चकनाचूर हो गया, जिसमें वे भारत के  बड़े उद्योगपति बनना चाहते थे। एक तरफ उड़ीसा में वेदांत का प्रोजेक्ट  विवादास्पद बन गया है, तो दूसरी तरफ पास्को के लिए नरमी बरत रही है।<br />
वेदांता  के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि उसके प्रोजेक्ट को रिलायंस  वाले मुकेश अंबानी की कंपनी को दिया जा रहा है। बात यह है कि मुकेश अंबानी  को यह अच्छी तरह से पता है कि सरकार को कैसे पटाया जाए? वैसे यह गुण उन्हें  अपने पिता से विरासत में मिला है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम  रमेश वेदांत कंपनी के प्रोजेक्ट की जाँच के लिए एन.सी. सक्सेना समिति को  जवाबदारी सौंपी थी। सक्सेना समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट में तीन बातों का  विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि नियामगिरी पर्वत  पर जहाँ वेदांत कंपनी का माइनिंग प्रोजेक्ट की योजना है, वह स्थान वहाँ  बसने वाले डोगरिया कौध जाति के लिए वरदान है। नियामगिरी की पहाड़ियों में  इन आदिवासियों का दिल धड़कता है। इन्हीं पहाड़ियों से उनका जीवन चलता है।  इस पर्वत को वे साक्षात ईश्वर का दर्जा देते हैं। इसे वे ‘नियाम राजा’ के  नाम से पुकारते हैं। इस पर्वत के साथ उनकी धार्मिक भावनाएँ भी जुड़ी हैं।  समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उड़ीसा सरकार ने संयंत्र के लिए  भू-अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की मंजूरी लेने की आवश्यक औपचारिकता पूरी  नहीं की। वेदांता रिसोर्सेस को उड़ीसा की नियामगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट  की खुदाई के लिए पहले पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई थी. लेकिन जांच की  रिपोर्ट के अनुसार वेदांता द्वारा किए जाने वाले खनन से लगभग 70 लाख वर्ग  किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद हो जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार इस तबाही से  स्थानीय डोंगरिया कौंध जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। समिति के  अनुसार यदि इस जंगल में बाक्साइट के खनन की अनुमति दी जाती है, तो करीब 125  लाख पेड़ों को काटना होगा। इतने वृक्षों का संहार करके वेदांता जितना खनिज  निकालेगी, उसकी आयु मात्र 4 वर्ष ही होगी। जंगल अधिकार कानून के अनुसार  यदि किसी जंगल की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है, तो उस  जमीन पर रहने वालों की अनुमति लेना आवश्यक है। कौंध जाति के  लोग अपनी जमीन  वेदांता को देने के लिए तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने खनन के लिए आदिवासियों  की अनुमति मिल गई है, इसके झूठे दस्तावेज तैयार किए गए। यह बात सक्सेना  समिति की जाँच में सामने आई।<br />
वेदांता कंपनी उड़ीसा में जिस प्रोजेक्ट पर  काम कर रही है, उसमें कुल 17 अरब डॉलर यानी करीब 7650 करोड़ रुपए के जंगी  निवेश की योजना थी। केवल <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/mining.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-6188" title="mining" src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/mining.jpg" alt="" width="500" height="426" /></a>पर्यावरण नियमों का पालन न करने के कारण प्रोजेक्ट  को कैंसल कर देने का देश में यह पहला मामला है। केंद्रीय वन एव पर्यावरण  मंत्री जयराम रमेश ने देश भर के 64 प्रोजेक्ट को इसी तरह पर्यावरण विभाग की  अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसमें मुम्बई में वैकल्पिक एयरपोर्ट का  मामला भी शामिल है।<br />
वेदांता से सात गुना अधिक निवेश करने वाली पॉस्को  कंपनी द्वारा लोहे का कारखाना स्थापित करने का प्रोजेक्ट भी पर्यावरणीय  विवाद का शिकार हुआ है। दक्षिण कोरिया की पास्को कंपनी उड़ीसा के  जगतसिंहपुर जिले में लोहे का कारखाना स्थापित करना चाहती है। इसके माध्यम  से करीब 52 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश भारत आएगा। अब तक का यह सबसे  बड़ा विदेश निवेश है। पास्को कंपनी के खिलाफ भी पर्यावरण और जंगल अधिकार  मामलों में नियम कायदों का उल्लंधन करने की जानकारी केंद्र सरकार को है।  इसके बाद भी वेदांता कंपनी को काम बंद करने का आदेश देने वाली केंद्र सरकार  पास्को के खिलाफ सख्त नहीं हो पाई है। सरकार वेदांता के बजाए पास्को कंपनी  को प्राथमिकता दे रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पास्को का केंद्र और  उड़ीसा सरकार के बीच समझौता हो चुका है। उड़ीसा सरकार ने 2005 में पास्को  के साथ जगतसिंहपुर जिले के फुजंगा में 1.20 करोड टन स्टील के उत्पादन की  क्षमता वाले कारखाना स्थापित करने का समझौता किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए  पास्का को 4000 एकड़ उपजाऊ जमीन देने का वचन उड़ीसा सरकार ने दिया था।  इसमें से 3500 एकड़ जमीन पर सरकार का ही अधिकार है। शेष 500 एकड़ जमीन निजी  है। जिनकी निजी जमीन है, वे अपनी जमीन पास्को को किसी भी कीमत पर बेचने के  लिए तैयार नहीं है। जमीन हस्तगत करने के लिए सरकार ने जमीन मालिकों पर बल  का प्रयोग किया, किसानों पर कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। लाशें भी बिछ गई।  पास्को को जो जमीन देनी है, उसमें 284 एकड़ जमीन धीकिया नामक गाँव की है।  इस गाँव की पंचायत ने बैठक में सर्वसम्मति से पास्को को अपनी जमीन न देने  का प्रस्ताव पारित किया था। बाजू के गाँव गोविंदपुर में भी इस तरह का  प्रस्ताव पारित किया गया था। ये गाँव पूरी तरह से पास्को के खिलाफ हैं।  यहाँ तक कि पास्को के किसी भी अधिकारी के इन गाँवों में प्रवेश पर पाबंदी  लगा दी गई है। उड़ीसा सरकार पास्को पर पूरी तरह से मेहरबान है। उस कंपनी के  लिए सुंदरगढ़ की खान भी उसे समर्पित कर दी है। यही नहीं महानदी और  ब्राrाणी नदी का पानी भी उसे देने का वचन सरकार दे चुकी है। उड़ीसा सरकार  ने पारादीप बंदरगाह के बाजू में स्थित जटाधारी नामक निजी बंदरगाह भी पास्को  को देने की अनुमति दे चुकी है। इस बंदरगाह का उपयोग पास्को उच्च गुणवत्ता  का स्टील निर्यात करने और हल्की गुणवत्ता का खनिज आयात करने के लिए करेगा।<br />
पास्को  प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों पर सरकार बुरी तरह से पेश आई। पास्को के  सामने उड़ीसा सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। लेकिन वेदांता के लिए कठोर।  आखिर ऐसा क्यों? यह समझ से परे है। पास्को ने भी वही सब किया है, जिसके  आधार पर वेदांता को उड़ीसा से खारिज कर दिया गया है। वहाँ की जनता भी  वेदांता के उतनी ही खिलाफ है, जितनी पास्को के। लेकिन सरकार पास्को की  तरफदारी कर रही है। पास्को के खिलाफ पर्यावरण मंत्री न तो कुछ सुनना चाहते  हैं और न ही कुछ बोलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा के  मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि पास्को कंपनी  के प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए रास्ते की सारी बाधाओं को दूर  करेंगे। यदि पास्को से भी पर्यावरण की हानि हो रही है, तो फिर उस पर सरकार  कठोर क्यों नहीं हो रही है? आखिर पास्को से ऐसा क्या मिला, जो वेदांता से  नहीं मिल पाया?<br />
<em><strong>डॉ. महेश परिमल </strong></em></p>
<p><strong>साभार &#8211; संवेदनाआँ के पंख</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/" href="http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/" target="_blank">http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/</a></p>
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		<title>गरीब रिक्‍शेवाले कहां जाएंगे&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Sep 2010 19:09:15 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[मानव श्रम के दोहन के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है सड़कों पर चलने वाला रिक्शा. और यह रोजी-रोटी कमाने के सबसे पुराने तरीक़ों में से भी एक है. न जाने कब से इस सवारी के घूमते तीन चक्कों के साथ न जाने कितनी ज़िंदगियों की क़िस्मत घूमती रही है. अशिक्षा और भूमिहीनता के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/DSCN5143.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6176" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/DSCN5143.jpg" alt="" width="400" height="300" /></a>मानव श्रम के दोहन के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है सड़कों पर चलने  वाला रिक्शा. और यह रोजी-रोटी कमाने के सबसे पुराने तरीक़ों में से भी एक  है. न जाने कब से इस सवारी के घूमते तीन चक्कों के साथ न जाने कितनी  ज़िंदगियों की क़िस्मत घूमती रही है. अशिक्षा और भूमिहीनता के चलते भुखमरी  झेलने को अभिशप्त समाज के सबसे निचले और कमज़ोर तबके के लिए रिक्शा पेट  पालने का अभिन्न और अक्सर एकमात्र साधन रहा है. सदियों से रिक्शेवालों का  यह तबका दूसरे भारत या दूसरे हिंदुस्तान का आईना भी रहा है. लेकिन दिल्ली  सरकार और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) का वश चले तो वे राजधानी की सड़कों पर  रिक्शों का चलना ही बंद कर दें. तभी तो अदालतों से बार-बार मनाही के बावजूद  एमसीडी दिल्ली की सड़कों पर रिक्शों की संख्या 99 हज़ार तक सीमित करना चाहता  है. एक अनुमान के मुताबिक़, दिल्ली में पांच लाख से ज़्यादा रिक्शे सड़कों पर  दौड़ते हैं और क़रीब चालीस लाख लोगों की दो जून की रोटी इन रिक्शों पर  आश्रित है. एमसीडी की मानें तो रिक्शा सड़कों पर यातायात के लिए सबसे बड़ी  रुकावट है और वह इसी वजह से इनकी संख्या कम करना चाहता है. टाटा और फोर्ड  जैसी कंपनियों द्वारा निर्मित नए जमाने की तेज़ रफ्तार कारों के लिए मानव  चालित रिक्शे की कछुआ चाल अवरोध का कारण तो है ही, उससे ज़्यादा यह समाज के  समृद्ध तबके की आंखों की किरकिरी है. यह समाज का वह हिस्सा है, जिसे ध्यान  में रखकर तमाम आर्थिक नीतियां आज देश में बनती हैं. तभी तो कारों,  मोटरसाइकिलों एवं मोबाइलों की क़ीमतें हर साल कम होती हैं, लेकिन चावल-दाल  की क़ीमत कभी कम नहीं होती. एमसीडी इसी तबके की पसंद का खयाल रखते हुए  रिक्शों को राजधानी की सड़कों से ओझल करना चाहता है. उसे न तो चार लाख  बेरोज़गारों और पैंतीस लाख ज़िंदगियों के भविष्य की चिंता है, न ही लगातार  प्रदूषण से बेहाल होती दिल्ली के पर्यावरण की.</p>
<blockquote style="text-align: justify;">
<p style="text-align: center;"><strong>दिल्ली सरकार और  एमसीडी राजधानी की सड़कों पर मानव चालित रिक्शों की संख्या  को केवल सीमित  ही नहीं करना चाहते, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे पूरी तरह ख़त्म  करने की सोच  रहे हैं. नगर निगम इसकी जगह सौर ऊर्जा से चलने वाले इलेक्ट्रिक  रिक्शा  चलाने की योजना बना रहा है. निगम का तर्क है कि तेज़ गति से चलने  वाले  इलेक्ट्रिक रिक्शे दिल्ली को यातायात जाम से निजात दिलाने में मददगार   होंगे.</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">दरअसल, एमसीडी ने एक क़ानून के तहत राजधानी में रिक्शों के लिए लाइसेंसों  की संख्या 99 हज़ार तक सीमित कर दी थी. एक एनजीओ ने इसके ख़िला़फ दिल्ली  हाईकोर्ट में याचिका दायर की. इस साल 10 फरवरी को हाईकोर्ट ने अपने एक  फैसले के द्वारा इस क़ानून को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने एमसीडी को कड़ी फटकार  लगाते हुए कहा कि सड़कों पर लाखों की संख्या में दौड़ रही कारों और  मोटरसाइकिलों को कम करने के लिए नीति पहले बनानी चाहिए, क्योंकि ये राजधानी  के पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं. लेकिन एमसीडी ने हाईकोर्ट के फैसले  के ख़िला़फ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. बीते 5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने  उसकी इस अपील को ख़ारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि रिक्शा चलाना हर इंसान  को संविधान से मिली रोज़गार की स्वतंत्रता के दायरे में आता है और इसे छीनने  का कोई हक एमसीडी के पास नहीं है. निगम को नसीहत देते हुए सर्वोच्च  न्यायालय ने यह भी कहा कि पेट्रोल, डीजल और सीएनजी से चलने वाली गाड़ियों की  बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाना ज़्यादा ज़रूरी है. अदालत के इस फैसले से  रिक्शाचालकों को फिलहाल राहत भले मिल गई हो, लेकिन एमसीडी और सरकार के  रवैये को देखते हुए इसकी कोई गारंटी नहीं कि भविष्य में फिर ऐसे किसी क़ानून  की मदद से उनके सिर पर तलवार नहीं लटकेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">दिल्ली सरकार और एमसीडी राजधानी की सड़कों पर मानव चालित रिक्शों की  संख्या को केवल सीमित ही नहीं करना चाहते, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे पूरी <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/DSCN5145.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-6177" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/DSCN5145.jpg" alt="" width="400" height="300" /></a>तरह  ख़त्म करने की सोच रहे हैं. नगर निगम इसकी जगह सौर ऊर्जा से चलने वाले  इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाने की योजना बना रहा है. निगम का तर्क है कि तेज़ गति  से चलने वाले इलेक्ट्रिक रिक्शे दिल्ली को यातायात जाम से निजात दिलाने में  मददगार होंगे. चौथी दुनिया ने इस संबंध में दिल्ली के मेयर पृथ्वीराज  चौहान से बात की तो उन्होंने यह तो नहीं माना कि निगम राजधानी की सड़कों से  रिक्शों को पूरी तरह हटाना चाहता है, लेकिन यह ज़रूर कहा कि रिक्शा यातायात  की चाल को धीमा करता है. शायद चौहान को यह नहीं पता कि दिल्ली के कई  हिस्सों में रिक्शों के प्रवेश पर प्रतिबंध है, फिर भी इन इलाक़ों में  यातायात जाम की बात आम है. एमसीडी की इस मुहिम में दिल्ली सरकार भी पीछे  नहीं है. अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों से पहले राजधानी की  यातायात व्यवस्था को ईको फ्रेंडली बनाने की तैयारी है. इसके लिए बैटरी से  चलने वाले रिक्शा ई-रिक को लांच किया गया है. क्या सरकार यह नहीं जानती कि  पर्यावरण को प्रदूषित करने में मानव चालित रिक्शों का कोई योगदान नहीं,  बल्कि इसके लिए पेट्रोल और डीजल से चलने वाली गाड़ियां ज़िम्मेदार हैं? सरकार  और एमसीडी मुद्दे से जुड़े मानवीय पहलुओं की भी अनदेखी कर रहे हैं. राजधानी  या देश के किसी भी हिस्से में रिक्शा चलाने वाले अधिकांश लोग निरक्षर और  अप्रशिक्षित होते हैं. कहीं नौकरी नहीं मिली, भुखमरी की नौबत आ गई तो भाड़े  पर रिक्शा चलाने लगे. यदि उनसे रोज़गार का यह साधन भी छीन लिया गया तो उनकी  ज़िंदगी में पूरी तरह अंधेरा छा जाएगा. इस मुद्दे का एक आर्थिक पहलू भी है.  सौर ऊर्जा से चलने वाले इलेक्ट्रिक रिक्शे की क़ीमत 30 से 40 हज़ार के क़रीब  है, दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किए गए ई-रिक की क़ीमत एक लाख 50 हज़ार रुपये  है, जबकि मानव चालित रिक्शे की क़ीमत केवल 10-12 हज़ार रुपये होती है. ग़रीब  रिक्शा चालकों के पास इलेक्ट्रिक रिक्शा ख़रीदने के लिए पैसे कहां से आएंगे,  यह भी एक बड़ी समस्या है. सरकार या एमसीडी के पास इसके लिए कोई योजना नहीं  है. निजी या सरकारी बैंकों से ॠण उपलब्ध कराने की योजना बनी भी तो ब्याज के  बोझ तले इनका जीवन नर्क होकर रह जाएगा. दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट  प्लेस इलाक़े में दिन और रात का फर्क़ करना मुश्किल है. सूरज की रोशनी कम  होते ही पब-रेस्तराओं एवं सजी हुई दुकानों से निकलते बहुरंगे प्रकाश के साथ  सड़क के दोनों किनारे लगी स्ट्रीट लाइट्‌स यह एहसास ही नहीं होने देती कि  दिन कब गुज़र गया, लेकिन इस इलाक़े से कुछ ही दूर स्थित नई दिल्ली रेलवे  स्टेशन के आसपास रिक्शा चलाने वाला उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले का रहमत  अली दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद भी रात को ठीक से सो नहीं पाता. दिल्ली  में अकेले रह रहे रहमत अली के ऊपर पत्नी और पांच बच्चों के अलावा बूढ़े  मां-बाप की भी ज़िम्मेदारी है. वह सुबह सात बजे से लेकर शाम के सात बजे तक  सवारियों को यहां से वहां ले जाता है और औसतन 150-200 रुपये की कमाई कर  लेता है, लेकिन अपना रिक्शा न होने की वजह से उसे रोजाना 50 रुपये इसके  मालिक को देने पड़ते हैं. बाक़ी पैसों में वह ख़ुद क्या खाए और घरवालों को  क्या भेजे, यही सोच-सोचकर उसकी रात बीत जाती है. वह रात को भी रिक्शा चलाना  चाहता है, लेकिन रिक्शे का मालिक ऐसा करने नहीं देता, क्योंकि उसने नाइट  शिफ्ट के लिए किसी दूसरे शख्स को रिक्शा किराए पर दे रखा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/DSCN5144.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6178" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/DSCN5144.jpg" alt="" width="400" height="300" /></a>बिहार के पूर्णिया ज़िले से आए 60 साल के नवल कामत का किस्सा तो इससे भी  ज़्यादा दर्दनाक है. गांव में मज़दूरी करके जीवनयापन कर रहे नवल की पत्नी की  चार साल पहले मौत हो गई. पत्नी की मौत के बाद उसकी सारी उम्मीदें दो जवान  बेटों पर टिकी थीं, लेकिन बेटों ने ऐसा रंग बदला कि उसे घर से भागने को  मजबूर होना पड़ा. घरवालों से निराश वह किसी तरह दिल्ली पहुंचा. काम की तलाश  में दो-तीन दिनों तक यहां-वहां घूमता रहा, लेकिन कहीं काम नहीं मिला. भूख  से बेहाल उसने रिक्शा चलाने की सोची, क्योंकि वह पढ़ने-लिखने की बात तो दूर,  ढंग से हिंदी बोल भी नहीं सकता था. वह ढाई साल से रिक्शा चलाकर किसी तरह  ज़िंदा है, बढ़ती उम्र में दूसरे इंसानों का बोझ ढोते-ढोते वह कई बीमारियों  का शिकार भी हो चुका है, लेकिन चाहे भी तो काम छोड़ नहीं सकता. उसके पास  रोज़गार का और कोई साधन नहीं है और अपने गांव वापस जा नहीं सकता. कमोबेश यही  हाल बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान जैसे राज्यों से आने  वाले हर रिक्शाचालक का है. लेकिन एमसीडी को इनकी कोई चिंता नहीं है. उड़ीसा  के मयूरभंज ज़िले के बदरी ओरांव को एमसीडी के इस क़ानून के बारे में ज़्यादा  नहीं पता, लेकिन बताए जाने पर वह यही कहता है कि यदि ऐसा हुआ तो उसके पास  दो ही विकल्प बचेंगे, छोटे-मोटे अपराध कर अपने और अपने परिवार का पेट पाले  या फिर उन्हें मारकर ख़ुद भी मौत के हवाले हो जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">एमसीडी के इस क़ानून में वैसे भी कई अड़चनें हैं. रिक्शों की संख्या 99  हज़ार तक सीमित करने के बाद भी लाखों रिक्शे सड़कों पर दौड़ रहे हैं तो इसके  लिए नगर निगम के अधिकारियों का भ्रष्ट रवैया और राजधानी में सक्रिय रिक्शा  मा़फिया ज़िम्मेदार हैं. दिल्ली में कुछेक हज़ार रिक्शाचालकों के पास ही अपना  रिक्शा है. अधिकतर लोग किराए पर लेकर रिक्शा चलाते हैं, जिसका मालिकाना हक  इन्हीं माफिया तत्वों के हाथों में होता है. अधिकारियों की मिलीभगत से  एक-एक आदमी हज़ारों रिक्शे चलवाता है और ग़रीब रिक्शाचालकों के ख़ून की क़ीमत  पर करोड़ों की कमाई करता है. पृथ्वीराज चौहान भी यह स्वीकार करते हैं कि  दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले अधिकांश रिक्शों के पास लाइसेंस नहीं है. वह  बताते हैं कि 99 हज़ार की सीलिंग से संबंधित क़ानून को अदालत ने मान लिया  होता तो इस पर लगाम कसी जा सकती थी. मतलब यह कि एमसीडी अपने भ्रष्ट  अधिकारियों को काबू में नहीं कर सकता, लेकिन ग़रीब रिक्शाचालकों के पेट पर  लात मारने के लिए आमादा है. मानो इस देश में सारे क़ानून ग़रीबों के लिए ही  बनाए जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सवाल केवल एमसीडी के इस क़ानून का ही नहीं है, सवाल निगम के आकाओं के  नज़रिए का भी है. लंदन, सिंगापुर, न्यूयॉर्क, बीजिंग जैसे शहरों में आज बड़ी  गाड़ियों के मुक़ाबले रिक्शों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसकी वजह यह है  कि इसमें ईंधन की खपत नहीं होती और प्रदूषण पैदा नहीं होता. पर्यावरण  विशेषज्ञों की राय में प्रदूषण का बढ़ता स्तर मनुष्य के अस्तित्व के लिए  सबसे बड़ा ख़तरा बन चुका है. दिल्ली को पहले ही दुनिया के सबसे प्रदूषित  महानगरों में गिना जाता है. इसके बावजूद राज्य सरकार और एमसीडी बड़ी गाड़ियों  की संख्या को सीमित करने के बारे में नहीं सोच रहे, बल्कि कमज़ोर और  विकल्पहीन रिक्शाचालकों के भविष्य के साथ खेलने की कोशिश कर रहे हैं. सत्ता  के शीर्ष पर बैठे लोग अक्सर वास्तविकता से दूर हो जाते हैं, ऐसे तत्वों से  घिर जाते हैं, जो उन्हें ज़मीनी हक़ीक़त से रूबरू नहीं कराते, बल्कि हवा-हवाई  बातें करके अपने स्वार्थ की सिद्धि में लगे रहते हैं. दिल्ली सरकार और  एमसीडी में भी आज ऐसे ही अधिकारियों का बोलबाला है, जिन्हें पेट्रोल और  डीजल की गंध से उबकाई नहीं आती, लेकिन इंसानों के पसीने की बदबू से उनका जी  मितलाने लगता है.</p>
<p><strong>साभार- चौथी दुनिया</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.chauthiduniya.com/2010/08/garib-rikashevale-kahan-jayenge.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2010/08/garib-rikashevale-kahan-jayenge.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2010/08/garib-rikashevale-kahan-jayenge.html</a></p>
<p>छायाकार- विजय मुडशिंगीकर</p>
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		<title>पर्यावरणरक्षणासाठी खारीचा वाटा. . . .</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Sep 2010 18:50:29 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[ढासळते पर्यावरण सावरण्याची इच्छा असणारी मनं आणि प्रयत्न करणारे हात यांची संख्या दिवसेंदिवस वाढते आहे, ही खूप प्रेरणादायी बाब आहे. ‘द ग्रीन पॅट्रीऑट वर्किंग ग्रुप’ ही लॉस एंजेलिस इथे कार्यरत असलेली संख्या अशा प्रयत्नवादींपैकीच एक. पर्यावरणाच्या ऱ्हासाला आळा घालण्यासाठी ते करत असलेल्या प्रयत्नाचा एक भाग म्हणजे त्यांनी प्रसिद्ध केलेले ‘५० सिंपल स्टेप्स टू सेव्ह द [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/opd03.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6171" title="opd03" src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/09/opd03.jpg" alt="" width="77" height="99" /></a>ढासळते पर्यावरण सावरण्याची इच्छा असणारी मनं आणि प्रयत्न करणारे हात यांची  संख्या दिवसेंदिवस वाढते आहे, ही खूप प्रेरणादायी बाब आहे. ‘द ग्रीन  पॅट्रीऑट वर्किंग ग्रुप’ ही लॉस एंजेलिस इथे कार्यरत असलेली संख्या अशा  प्रयत्नवादींपैकीच एक. पर्यावरणाच्या ऱ्हासाला आळा घालण्यासाठी ते करत  असलेल्या प्रयत्नाचा एक भाग म्हणजे त्यांनी प्रसिद्ध केलेले ‘५० सिंपल  स्टेप्स टू सेव्ह द अर्थ फ्रॉम ग्लोबल वॉर्मिग’ हे पुस्तक.   ‘हे पुस्तक लिहिण्याच्या निमित्तानं आमच्यात खूप सकारात्मक बदल झाले आणि  हे पुस्तक वाचल्यानंतर वाचकांच्याही मनात खूप बदल होतील’ अशी या संस्थेला  खात्री वाटते.<br />
अशी खात्री बाळगायला हरकत नाही, अशी आजची परिस्थिती  नक्कीच आहे. कारण प्रत्येक माणसानं पर्यावरणरक्षणात अगदी खारीचा वाटा उचलला  तरी परिस्थिती आटोक्यात येऊ शकेल. त्यासाठी त्याला खूप मोठे प्रयत्न  करण्याचीही गरज नाही. अगदी साध्या साध्या प्रयत्नातूनही हे करता येईल. पण  यासाठी सर्वात महत्त्वाचं आहे ते दृष्टीकोन बदलण्याची, सवयी बदलण्याची.  ‘चलता है’ ही वृत्ती सोडून देण्याची. ‘दुनिया इधर की उधर हो जाये, मला काय  त्याचं!’ ही आत्मकेंद्रीतता त्यागण्याची. स्वत:त असे बदल जाणीवपूर्वक घडवून  आणले तर पर्यावरणाचा प्रश्न सुटला नाही तरी चिघळणार तरी नाही. ही पायरी  गाठली की, हळूहळू प्रश्न सुटायला वेळ लागणार नाही.<br />
मग असे कोणते बदल  सामान्य माणसानं अंगिकारायला हवेत? खरं तर हे बदल वारंवार समाजासमोर  आणण्याचा प्रयत्न झालेला आहे. पण अजून समाजसुधारणा होत नसेल, जनता त्याकडे  दुर्लक्ष करत असेल तर त्या गोष्टी पुन्हा पुन्हा समाजासमोर ठेवाव्या  लागतात. झोपी गेलेल्याला जागं होईपर्यंत गदागदा हलवत राहावं लागतं, तशातलाच  हा प्रकार आहे. त्यासाठी थोडय़ाथोडक्या नाही तर ५० टीप्स या पुस्तकात  एकत्रितपणे वाचायला मिळतात. यात जुन्या टीप्स आहेत, तशा काही नव्याही आहेत.  या टीप्स समाजानं का पाळाव्यात, त्याचा काय फायदा होईल, याचीही सविस्तरपणे  माहिती दिली आहे.<br />
कार्बन डाय ऑक्साईड हा पर्यावरणाचा शत्रू नंबर वन.  साहजिकच टीप्सची सुरुवात होते ती ‘डिटरमाईन युवर कार्बन फूटप्रिंट’ या  लेखानं. कार्बन फूट प्रिंट म्हणजे दिवसाला आपण कार्बन डाय ऑक्साईड किती  मार्गानी वातावरणात सोडतो, याचं मोजमाप. वाहनं, एसी, इलेक्ट्रीकल  अप्लायन्सेस यांचा वापर ही काही मुख्य कारणं. इतर कारणं अनेक. हा कार्बन  डाय ऑक्साईड शोषून घेऊन ऑक्सिजन बाहेर टाकणं आणि त्यायोगे समतोल राखणं, हे  झाडांचं काम. त्यामुळे परिसंस्थेत वृक्षांचं स्थान महत्त्वाचं असूनही  मानवानं झाडांवर बेलगामपणे कुऱ्हाड चालवून स्वत:च्या पायावर धोंडा पाडून  घेतला आहे. व्यक्तिगत कार्बन एमिशन काऊंट मोजण्यासाठी www.safeclimate.net   किंवा www.carbonfund.org यासारख्या साईट्सचा उपयोग करता येईल आणि  त्याप्रमाणे उपाय करता येतील.<br />
यासाठीसुचवलेल्या अनेक उपायातला एक अगदी  साधा उपाय म्हणजे तुमच्या वाहनाच्या चाकातील दाब तपासून घ्या. अमेरिकन  ऑटोमोबाईल असोसिएशनच्या निरीक्षणानुसार रस्त्यावर धावणाऱ्या ८० टक्के  वाहनांमधील एक किंवा अधिक चाकांमधील दाब कमी असतो. त्यामुळे त्यांना जास्त  शक्ती आणि पर्यायानं जास्त इंधन लागते. घरातले बल्ब बदलणे हाही एक अगदी  साधा उपाय. आतापर्यंत वापरत होतो, त्या बल्बपेक्षा सीएफएल (कॉम्पक्ट  फ्ल्यूरोसंट लाइटस्) वापरावे याचा आज सगळीकडेच जोरदार प्रसार केला जात आहे.  घरातून बाहेर पडतांना किंवा खोलीत कुणी नसताना दिवे बंद करा, हेही वारंवार  सांगितलं जातंय, त्याचप्रमाणे शक्य असेल तिथं नैसर्गिक उजेडाचा वापर  केल्यास, तेही अधिक संयुक्तिक ठरेल.<br />
मांसाहाराचा आणि पर्यावरणाचाही  संबंध असतो, याबाबतीत आजही अनभिज्ञता आहे. ग्रीनहाऊस गॅसेसमध्ये कार्बन डाय  ऑक्साईड नंबर एकवर आहे तर मिथेन दुसऱ्या नंबरवर आहे. ‘डाएट फॉर अ न्यू  अमेरिका’ या पुस्तकाचा लेखक जॉन रॉबिन्सच्या मते ५० टक्के मिथेन मानवी  कृत्यांमुळे निर्माण होतो आणि त्यापैकी ३७ टक्के पशुसंवर्धनामुळे निर्माण  होतो. मांसाहारींचे प्रमाण वाढत गेल्यामुळे मिथेनची पातळीही वेगाने वाढते  आहे. साहजिकच शाकाहारी व्हा, असा संदेश न देता, मांसाहाराला आठवडय़ातून एक  दिवस तरी फाटा द्या, असं या पुस्तकात सांगण्यात आलं आहे. गाडीलाही कधी तरी  विश्रांती द्या. आठवडय़ातून एक दिवस गाडी बाहेर न काढता चालत जा किंवा सायकल  वापरा. सायकली तर आता गरीब लोकांचंच वाहन झालं आहे. पूर्वी विद्यार्थीवर्ग  फार मोठय़ा प्रमाणावर सायकलींचा वापर करत असे. पण आजकाल हा वर्ग  सायकलींपेक्षा स्कूटर, बाईक्सना प्राधान्य देतो. त्यामुळे वाहत्या  रस्त्यांवर गाडय़ा आणि टू व्हीलर्सचा नुसता सावळा गोंधळ असतो. याचा परिणाम  पर्यावरणावर खूप मोठय़ा प्रमाणावर झाला. त्यामुळेच एक दिवस तरी इंधनावर  चालणाऱ्या वाहनांना आराम देण्याची सूचना या पुस्तकात करण्यात आली आहे आणि  त्याची अंमलबजावणी करणं माणसाच्याच हातात आहे.<br />
असाच आणखी एक निर्णय  माणूस अंमलात आणू शकतो तो म्हणजे गरम पाण्याचा कमी वापर करणे. पाणी  तापवणाऱ्या गिझर किंवा वॉटर हीटरमुळे कार्बन डाय ऑक्साईडची पातळी वाढते.  त्यामुळे रोज जे गार पाण्यानं आंघोळ करतात, त्यांचा प्रश्नच नाही. पण  ज्यांना रोज जमत नाही, त्यांनी निदान आठवडय़ातून एकदा-दोनदा तरी गार  पाण्यानं आंघोळ करून पाणी गरम करणे टाळले पाहिजे.<br />
हे आणि असे अगदी  सोपे-सोपे ५० उपाय या पुस्तकात दिले आहेत. सध्या वेगवेगळ्या ‘डेज’ची फॅशन  आहे. सारी डे, रोझ डे, मदर्स डे, फादर्स डे अशा काहीच साध्य न करणाऱ्या  ‘डेज’पेक्षा काही तरी उद्देशाने हे ‘डेज’ पाळले गेले, तर ते अधिक संयुक्तिक  होईल. त्यामुळे ज्यानं त्यानं आपापल्या परीनं, आपापल्या सोयीनं ‘नो हॉट  वॉटर डे’, ‘नो कार डे’, ‘नो नॉनव्हेज डे’, ‘नो एसी डे’ असे वेगवेगळे ‘डेज’  पाळावेत आणि पर्यावरणाची ऱ्हास टाळण्याचा आणि हानी भरून काढण्याचा प्रयत्न  करावा, हाच या पुस्तकाचा उद्देश आहे.<br />
<strong>५० सिंपल स्टेप्स टू सेव्ह द अर्थ<br />
फ्रॉम ग्लोबल वॉर्मिग.<br />
द ग्रीन पॅट्रीसॉट वर्किंग ग्रुप<br />
जयको पब्लिशिंग हाऊस.<br />
पृष्ठे : १६४, मूल्य : २५० रुपये</strong></p>
<p><strong>साभार लोकसत्ता.</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.loksatta.in/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=86446:2010-07-16-15-05-32&amp;catid=34:2009-07-09-02-04-26&amp;Itemid=11" href="http://www.loksatta.in/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=86446:2010-07-16-15-05-32&amp;catid=34:2009-07-09-02-04-26&amp;Itemid=11" target="_blank">http://www.loksatta.in/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=86446:2010-07-16-15-05-32&amp;catid=34:2009-07-09-02-04-26&amp;Itemid=11</a></p>
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		<title>Water is Precious, Conserve it.</title>
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		<pubDate>Tue, 31 Aug 2010 06:06:32 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[In India, culture lives along the rivers, because water is life. Nature has given the human being everything in abundance, but following the development of mans needs all the natural resources becoming dearer and dearer. Water is one of them. Man started building huge dams after spending crores and crores of rupees to meet their [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN6765.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6161" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN6765.jpg" alt="" width="336" height="224" /></a>In India, culture lives along the rivers, because water is life. Nature has given the human being everything in abundance, but following the development of mans needs all the natural resources becoming dearer and dearer. Water is one of them. Man started building huge dams after spending crores and crores of rupees to meet their ever growing needs for drinking water, agriculture, industrial, construction purposes etc. But following the changes in climate, erratic rainfall or drought like situation, water became dearer and valuable commodity.</p>
<p style="text-align: justify;">In ancient times water was used, stored and means of easy availability was done in a very very practical and less expensive manner. One of them was by building very small wall (about 10 to 20 ft wall) along the path of river at regular interval (every few kilometer), to meet the requirement of every village and small towns along the rivers. In this manner the water is stored along the path of river and as water overflows every small dams and flows into the next one. As a result the ground water level was always maintained and water is available almost throughout the year. Most of rained water gets collected in the small dams all along <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN6781.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-6162" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN6781.jpg" alt="" width="480" height="320" /></a>the river path. Such small dams do not cost much. If the costs of all such small dams all along the river are put together, it works out to much more less than any one big dam and can be completed in a very short time (within  2 years or less at local level).</p>
<p style="text-align: justify;">The water stored in such small dams is around 20 &#8211; 200 million liters which is enough to meet the requirement of all villages nearby such dams. The path of river before it reaches sea is around 1500 to 3000 kilometers. If dams of 10 to 15 ft. height are built at every 3 to10 km. distance depending upon location and river bed size there could be 300 to 600 such small dams along the path of one river, and water stored is around 50-100 billion liters. Since water remains in the dams almost through out the year, the water level of wells are also maintained and available round the year which is available in addition. Every drop of water is useful before it is drained out to sea. All efforts are must to conserve the water, because it is life.</p>
<p style="text-align: justify;">Bharatbhai Gada</p>
<p style="text-align: justify;">+919820627084</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #0000ff;"><span style="text-decoration: underline;">brgada16@gmail.com </span></span></p>
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		<title>हिमालय की गागर में, विद्युत का सागर.. टिहरी धरण</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Aug 2010 10:07:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मोठी धरणं असावीत की नसावीत यावरून जगभर ऊहापोह होत आहे. काही स्वयंसेवी संस्था-संघटनांनी मोठय़ा धरणांना विस्थापन, पर्यावरणीय प्रश्न, जैववैविध्य हानी आणि भावनात्मक पातळीचा स्पर्श करीत विरोध केला आहे. पण भगीरथ प्रयत्नांनी उभारल्या जाणाऱ्या अशा धरणांचे फायदेही दुर्लक्षून चालणार नाहीत. सिंचनाबरोबरच ऊर्जा निर्मितीचे मोठे स्रोत असलेली टिहरीसारखी धरणे ही मानवतेची आधुनिक मंदिरे आहेत. महाराष्ट्रात कृष्णा, तापी, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h4 style="text-align: justify;"><span style="color: #800000;">मोठी धरणं असावीत की नसावीत यावरून जगभर ऊहापोह होत  आहे. काही स्वयंसेवी संस्था-संघटनांनी मोठय़ा धरणांना विस्थापन, पर्यावरणीय  प्रश्न, जैववैविध्य हानी आणि भावनात्मक पातळीचा स्पर्श करीत विरोध केला  आहे. पण भगीरथ प्रयत्नांनी उभारल्या जाणाऱ्या अशा धरणांचे फायदेही  दुर्लक्षून चालणार नाहीत. सिंचनाबरोबरच ऊर्जा निर्मितीचे मोठे स्रोत असलेली  टिहरीसारखी धरणे ही मानवतेची आधुनिक मंदिरे आहेत.</span> <span style="color: #800000;"> महाराष्ट्रात कृष्णा, तापी, कोकण, गोदावरी अशी मोठी  खोरी आहेत. या खोऱ्यात बांधलेल्या धरणांचा ऊर्जानिर्मितीच्या दृष्टीने  विचार व्हायला हवा. उत्तराखंडमधील टिहरी जलविद्युत प्रकल्प त्यासाठी नक्कीच  मार्गदर्शक ठरेल! या पाश्र्वभूमीवर टिहरी प्रकल्पाचा घेतलेला हा आढावा..</span></h4>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSC05143AA.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6143" title="DSC05143AA" src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSC05143AA.jpg" alt="" width="420" height="280" /></a>हिमालयाच्या उत्तुंग पर्वतरांगांमधून प्रवास करताना एक वाक्य नजरेस पडले..  हिमालय की गागर में, विद्युत का सागर! हे वाक्य वाचल्यानंतर सुरुवातीला  त्याचा बोध झाला नाही, पण त्यानंतर अवघ्या काही तासांनी ‘टिहरी’ या  बहुचर्चित धरण प्रकल्पाला भेट दिल्यावर त्याची खरोखर प्रचिती आली. भगीरथाने  गंगा पृथ्वीवर आणण्यासाठी प्रयत्नांची पराकाष्टा केली आणि गंगा पृथ्वीवर  अवतरली. पण ही गंगा तिच्या रौद्ररुपात आली तर पृथ्वीचा विनाश होईल.  पृथ्वीवरील जीवसृष्टी होत्याची नव्हती होऊन जाईल हे भगवान शंकरांनी जाणले  आणि गंगेला आपल्या जटेत जखडून ठेवले. गंगेची एक धारा आपल्या जटेतून  शंकरांनी पृथ्वीवर सोडली अशी आख्यायिका सांगितली जाते.<br />
गंगेला वर्षांतून  दोनवेळा पूर येतो. पावसाळ्यात आणि हिमालयाचे बर्फ वितळल्यावर उन्हाळयात.  गंगेच्या महापुराला जखडून ठेवण्याच्ंो काम मानवी कल्पनेच्या आवाक्याबाहेरचे  आहे. पण भारतीय अभियंत्यांनी त्यांच्या अनोख्या अभियांत्रिकी कौशल्याचा  आविष्कार दाखविला आणि गंगेची उपनदी असलेल्या भागीरथी नदीवर बांध घातला. हा  बांध म्हणजेच टिहरी जलविद्युत प्रकल्प! महाकाय, अजस्त्र आणि कल्पनातीत.  भारतीय अभियांत्रिकी कौशल्याची जगभराने दखल घ्यावी अशीच ही धरणाची रचना.  टिहरी प्रकल्पाचाच एक भाग असलेले कोटेश्वर धरण म्हणजे सिमेंट काँक्रिटमध्ये  घडवलेले आधुनिक शिल्पच. भारतीयांची मान अभिमानाने उंचवावी अशीच ही  कलाकृती.<br />
पंडित जवाहरलाल नेहरू यांनी देशातील धरणे ही आधुनिक मंदिरे  असल्याचे म्हटले होते. टिहरी प्रकल्प पाहिल्यावर त्यांच्या या दूरदृष्टीची  कल्पना येते. टिहरी जलविद्युतनिर्मिती प्रकल्पाला खरेतर १९७२ मध्येच मंजुरी  मिळाली. पण प्रकल्पाच्या उभारणीला १९७८ मध्ये खऱ्याअर्थाने सुरुवात झाली.  पण हा प्रकल्प पूर्ण होण्यास तब्बल २६ वर्षांचा काळ लोटावा लागला. या  प्रकल्पाचा मोठा अडथळा ठरला तो धरणग्रस्तांनी उभारलेला लढा. धरणग्रस्तांचे  नेते<a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN9725.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-6144" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN9725.jpg" alt="" width="420" height="280" /></a> सुंदरलाल बहुगुणा यांनी ‘चिपको’ आंदोलनाच्या माध्यमातून या प्रकल्पाला  कडाडून विरोध केला. धरणग्रस्तांनी अविरतपणे केलेला विरोधही जगाच्या  कानाकोपऱ्यात पोहोचला. ‘धरणग्रस्तांच्या अश्रूंवर बांधलेला प्रकल्प’ अशा  शब्दांत बहुगुणा यांनी आपल्या रोषाला वाट करून दिली आहे. आजच्या स्थितीत हा  प्रकल्प कार्यान्वित झाला आहे आणि धरणग्रस्तांचा विरोधही मावळला आहे.  टिहरी प्रकल्पाच्या पहिल्या टप्प्यात एक हजार मेगावॉट वीजनिर्मिती केली जात  आहे. येत्या वर्षभरात कोटेश्वर प्रकल्पातून चारशे मेगावॉट वीजनिर्मिती  होईल. पुढच्या टप्प्यात ‘पंप स्टोअरेज प्लँट’मधून एक हजार मेगावॉट वीज  गढवालच्या दऱ्याखोऱ्यातून उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश व दिल्लीत पोहोचेल.  धरणग्रस्तांचे पुनर्वसन हा सर्वात मोठा प्रश्न उत्तर प्रदेश (सध्याचे  उत्तराखंड) सरकारपुढे होता. या प्रकल्पामुळे टिहरी शहरासह चाळीस गावे  पूर्णत: व ७२ गावे अंशत: बुडित क्षेत्रात आली. या गावांतील सुमारे ५ हजार  २०० हेक्टर जमीन पाण्याखाली गेली. एक लाख नागरिकांवर विस्थापनाची वेळ आली.  पण आज ‘न्यू टिहरी’ ही संपूर्ण पुनर्वसित वसाहत पाहिली तर धरणग्रस्तांचा  प्रश्न सुटला असे म्हणणे वावगे ठरणार नाही. याचा अर्थ धरणग्रस्तांचे सर्वच  प्रश्न निकाली लागले असे म्हणता येणार नाही. पण टिहरी प्रकल्पात घरटी  माणसांना काम, उद्योगाला संधी आणि मुख्य म्हणजे तब्बल २ लाख ७० हजार हेक्टर  क्षेत्राला सिंचन व्यवस्था हे लाभही दुर्लक्षून चालणार नाही. शिवाय  उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश व दिल्लीला पिण्यासाठी हमखास पाणी हा फायदाही  लक्षात घ्यावा लागेल.<br />
टिहरीचा जन्मच मुळात वादातून झाला आहे. एवढय़ा  अजस्त्र धरणाची गरज काय ते विस्थापितांची संख्या यावरून धरणग्रस्तांसाठी  काम करणाऱ्या स्वयंसेवी संस्था-संघटनांनी विरोधाचे अस्त्र परजले. ही  विरोधाची धार तब्बल सव्वीस वर्षे कायम होती. अखेर अडथळे पार करीत सन २००६  मध्ये हा प्रकल्प कार्यान्वित झाला. अडीचशे मेगावॉटची चार जनित्रे  वीजनिर्मिती करू लागली. पण त्यासाठी अभियंत्यांना आपले अभियांत्रिकी कौशल्य  पणाला <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN97271.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6158" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/DSCN97271.jpg" alt="" width="400" height="300" /></a>लावावे लागले. दोन डोंगरांच्या अरुंद खोबणीत हे धरण बांधण्यात आले  आहे. धरणासाठी अतिशय उत्तम अशी ही साईट. हिमाचलच्या या पर्वत रांगांचा दगड  अतिशय ठिसूळ (अनस्टेबल रॉक). त्यामुळे डेहराडून आणि मसुरीला वास्तव्य  करणारे ब्रिटिशही या ठिकाणी धरण बांधण्यास धजावले नसावेत. मात्र ही किमया  भारतीय अभियंत्यांनी केली आहे. ‘रॉक फिल डॅम’ पद्धतीचे हे धरण आहे.  (धरणाच्या दोन्ही बाजूंना दगडांचा भराव आणि मध्यभागी काळी माती) या धरणाची  उंची २६० मीटर म्हणजे तब्बल ८५५ फूट आहे. जगातील सर्वात उंच धरणांमध्ये  टिहरीचा समावेश होतो. धरणाच्या भिंतीलगतच्या डोंगरातूनच दोन बोगद्यांद्वारे  पाणी वीजनिर्मितीसाठी नेण्यात आले आहे. या बोगद्यातून साडेआठशे फूट खाली  आलेल्या पाण्यावर अडीचशे मेगावॉट क्षमतेची चार जनित्रे चालविली जातात. तसेच  डोंगराखाली काही मजले वीजगृह बांधण्यात आले आहे. या विद्युतगृहातून  निर्माण झालेली वीज राष्ट्रीय वाहिनीला जोडली जाते. धरणग्रस्तांबरोबरच  टिहरी धरणाला हिमालयातील साधू-संतांनीही जोरदार विरोध केला होता. गंगेचे  पाणी वीजनिर्मिती करणाऱ्या टर्बाईनमधून आल्यावर शुद्ध राहात नाही असा  आक्षेप त्यांनी घेतला. गंगेचे पाणी थेट नदीत यायला हवे असा आग्रह त्यांनी  धरला आणि त्यासाठी धरणातून एक स्वतंत्र जलवाहिनी टाकून पाणी थेट  सांडव्याखालच्या बाजूस (अवजल धारा) सोडण्यात आले. त्यानंतर साधू-संत-महंत  मंडळींचा विरोध मावळला. हे पाणी आणण्यासाठी मात्र कोटय़वधी रुपये खर्च करावा  लागला.<br />
महाराष्ट्रातील १०५ अब्ज घनफूट जलसंचय क्षमता असलेल्या कोयना  धरणातून १ हजार ९५० मेगावॉट वीजनिर्मिती केली जाते. कोयना धरणातून  वीजनिर्मितीसाठी खोदण्यात आलेले बोगदे, लेक टॅपिंगचा प्रयोग हे सुद्धा  प्रगत झालेल्या अभियांत्रिकीचे द्योतक आहे. लेक टॅपिंगचा प्रयोग तर कोयनेत  देशात प्रथमच करण्यात आला.<br />
पण कमी पाण्यात अधिक वीजनिर्मिती करण्याचे  मानक टिहरी प्रकल्पाने दिले आहेत. टिहरी प्रकल्पाचाच एक भाग असलेल्या  कोटेश्वर धरणात फक्त तीन अब्ज घनफूट (टीएमसी) पाणी साठणार आहे. (खडकवासला  धरणाएवढा पाणीसाठा) पण या धरणातून वीजनिर्मिती होणार आहे ती तब्बल चारशे  मेगावॉट. पुण्यातील ब्रिटिशकालीन खडकवासला धरणातून तेवढय़ाच पाण्यावर फक्त  दोन मेगावॉट वीजनिर्मिती होणार आहे. हा प्रकल्प अजून उभारणीच्या टप्प्यातच  आहे तर भाटघर धरणात २३ टीएमसी पाणीसाठा होतो आणि वीजनिर्मिती होते केवळ १६  मेगावॉट. यावरून टिहरी प्रकल्पाच्या भव्यतेचा अंदाज येऊ शकतो. अधिक  उंचीवरून प्रवाही पद्धतीने पाणी आणल्यास अशा प्रकारे वीजनिर्मिती शक्य होऊ  शकते. कोटेश्वर जलविद्युतनिर्मिती प्रकल्पाचे काम येत्या वर्षभरात  पूर्णत्वाला जाणार आहे. या धरणाची उंची आहे ९७ मीटर म्हणजे साधारणत: २९१  फूट आहे. ही उंची सुद्धा असाधारणच आहे. या धरणासाठी बसविण्यात येणारे  दरवाजेही आशिया खंडात सर्वात मोठे असणार आहेत. धरणाच्या कामासाठी खास  अमेरिकेहून महाकाय क्रेन आणण्यात आली आहे. या प्रकल्पाचा सुरुवातीचा  अंदाजित खर्च तेराशे कोटी रुपयांचा आहे. कोटेश्वर प्रकल्पाचे काम म्हणजे  मोठे दिव्यच आहे. ‘अनस्टेबल रॉक’ असलेल्या डोंगरांच्या दरीत हे धरण बांधले  जात आहे. कोणत्याही क्षणी धरणावर दरड कोसळण्याची भीती आहे. त्यामुळेच  आजूबाजूच्या डोंगराला सिमेंटने बंदिस्त करण्यात येत आहे. डोंगरात साठणारे  पाणी विशिष्ट पद्धतीने बाहेर पडेल याचीही व्यवस्था करण्यात आली आहे.  त्यातून दरडी कोसळण्याचा धोका कमी करण्यात आला आहे. धरणा लगतच्या डोंगरांना  केलेले सिमेंटचे ‘पिचिंग’ पाहिल्यास या कामाच्या भव्यतेची कल्पना येते.  धरणांना आधुनिक मंदिरे व शिल्पांची दिलेली उपमा किती सार्थ आहे हे  त्यांच्या लाभावरून दिसते. केवळ विरोधाला विरोध करण्याचा सूर काढूनही उपयोग  नाही. शेवटी विकासाच्या वाटा या कोणाच्या तरी बलिदानातून आणि त्यागातून  जात असतात. परंतु त्याचा दूरगामी विचार केला तर भावी पिढय़ा सुखी आणि समृद्ध  जीवन जगतील यात शंका नाही. अर्थात कोणाचेही बलिदान व त्यागाचे योग्य मूल्य  दिले तर अशा विकासाला विरोध होणार नाही हे सुद्धा तेवढेच सत्य आहे.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>धनंजय जाधव</strong></p>
<p><strong>साभार लोकसत्ता.</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=96320:2010-08-27-07-45-25&amp;catid=212:2009-08-18-16-27-53&amp;Itemid=210" href="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=96320:2010-08-27-07-45-25&amp;catid=212:2009-08-18-16-27-53&amp;Itemid=210" target="_blank">http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=96320:2010-08-27-07-45-25&amp;catid=212:2009-08-18-16-27-53&amp;Itemid=210</a></p>
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		<title>वाहतूक, इंधन आणि वाहनांची कार्यक्षमता</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Aug 2010 08:43:26 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ (सीएमएस) या संस्थेतर्फे हैदराबाद येथे नुकतीच माध्यमांच्या प्रतिनिधींसाठी ‘फ्युएल इफिशियन्सी’ या विषयावर कार्यशाळा आयोजित करण्यात आली होती. त्यात भारतीय वाहतुकीचा प्रश्न व वाहनांच्या कार्यक्षमतेचे वास्तव समजून घेता आले तसेच वाहतूक कोंडीबरोबरच एकूणच वाहतुकीच्या व त्यातून उद्भवणाऱ्या प्रदूषण, आरोग्य ते कार्बन उत्सर्जनाच्या प्रश्नातून मार्ग काढण्यासाठी किती प्रयत्न करावे लागणार आहेत, याचासुद्धा अंदाज [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/viv04.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6151" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/viv04.jpg" alt="" width="150" height="117" /></a>‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ (सीएमएस) या संस्थेतर्फे हैदराबाद येथे नुकतीच  माध्यमांच्या प्रतिनिधींसाठी ‘फ्युएल इफिशियन्सी’ या विषयावर कार्यशाळा  आयोजित करण्यात आली होती. त्यात भारतीय वाहतुकीचा प्रश्न व वाहनांच्या  कार्यक्षमतेचे वास्तव समजून घेता आले तसेच वाहतूक कोंडीबरोबरच एकूणच  वाहतुकीच्या व त्यातून उद्भवणाऱ्या प्रदूषण, आरोग्य ते कार्बन  उत्सर्जनाच्या प्रश्नातून मार्ग काढण्यासाठी किती प्रयत्न करावे लागणार  आहेत, याचासुद्धा अंदाज घेता आला.<br />
पाश्चात्त्य देश, अमेरिका व जपानमधील वाहनांच्या तुलनेत भारतीय वाहनांची  स्थिती काय? विशेषत: इंधनाच्या बाबतीत त्यांची कार्यक्षमता किती आहे? वरवर  विचार केला तर तंत्रज्ञानाच्या बाबतीत आपली वाहने व कार्यक्षमता कमी  असल्याचे वाटेल. प्रत्यक्षात मात्र स्थिती तितकी वाईट नाही. किंबहुना, इंधन  कार्यक्षमतेच्या दृष्टीने म्हणजेच एक लिटरमध्ये जास्त अंतर जाण्याचा हिशेब  मांडला तर अमेरिकन मोटारींच्या तुलनेत भारतीय मोटारी अधिक कार्यक्षम आहेत,  कारण त्या वजनाने हलक्या, कमी क्षमतेच्या इंजिनच्या आणि त्यामुळेच भारतीय  ग्राहकांच्या ‘काटकसरी’ पसंतीला उतरणाऱ्या आहेत. अर्थातच, आपण अमेरिकेला  मागे टाकत असलो तरी या मुद्दय़ावर जपान व युरोपच्या मोटारींना मागे  टाकण्यासाठी बरेच काही करावे लागणार आहे.<br />
‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’  (सीएमएस) या संस्थेतर्फे हैदराबाद येथे नुकतीच माध्यमांच्या प्रतिनिधींसाठी  ‘फ्युएल इफिशियन्सी’ या विषयावर कार्यशाळा आयोजित करण्यात आली होती. त्यात  भारतीय वाहतुकीचा प्रश्न व वाहनांच्या कार्यक्षमतेचे वास्तव समजून घेता  आले. एकीकडे सर्वसामान्य भारतीय नागरिकाचे मोटार बाळगण्याचे स्वप्न आणि  दुसरीकडे वाहनांची संख्या वाढून उभ्या राहणाऱ्या वाहतुकीच्या समस्या अशा  परस्परविरोधी गोष्टींमुळे निर्माण झालेली ‘कोंडी’सुद्धा तज्ज्ञांकडून सर्व  अंगांनी माहिती करून घेता आली. या कोंडीबरोबरच एकूणच वाहतुकीच्या व त्यातून  उद्भवणाऱ्या प्रदूषण, आरोग्य ते कार्बन उत्सर्जनाच्या प्रश्नातून मार्ग  काढण्यासाठी किती प्रयत्न करावे लागणार आहेत, याचासुद्धा अंदाज घेता आला.<br />
वाहनसंख्या : वाढती तरीही कमीच!<br />
देशात  स्वातंत्र्यानंतर सुरुवातीच्या काळात वाहनांची संख्या फारच थोडी होती.  अगदी १९७० पर्यंत ती केवळ १८ लाखांच्या आसपास होती. त्यानंतर १९८०पर्यंत  विशेष वाढ झाली नाही. मात्र, १९८३-८४ च्या आसपास कडक सरकारी नियंत्रण हटवून  काहीसे मुक्त धोरण अवलंबण्यात आले. त्यामुळे दुचाकी व हलक्या व्यावसायिक  वाहनांच्या निर्मितीत परकीय गुंतवणुकीला अंशत: मंजुरी देण्यात आली. त्याचा  परिणाम झाला आणि वाहनांची संख्या कितीतरी पटीने वाढून ती १९९० च्या सुमारास  २ कोटी १० लाखांवर पोहोचली. पुढे १९९० च्या दशकात आर्थिक सुधारणांच्या  पाठोपाठ ही संख्या झपाटय़ाने वाढत गेली. २००० साली ती आणखी दुपटीने वाढून ४  कोटी ९० लाखांवर पोहोचली. त्यानंतरही त्यात वेगाने वाढ होतच आहे. विशेष  म्हणजे १९९० ते २००४ या काळात देशाच्या लोकसंख्येत ५० टक्के वाढ झाली. याच  काळात वाहनांची संख्या मात्र तब्बल ४०० टक्क्यांनी वाढली. अलीकडच्या काळात  हाच वेग कायम आहे, किंबहुना त्यात वाढच होत आहे. त्याचे विपरीत परिणाम  मुख्यत: मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नईसह सर्वच बडय़ा शहरांमध्ये पाहायला  मिळत आहेत. या परिस्थितीला सामोरे जात असतानाच दुसरीकडे आणखी एक वास्तव  पाहायला मिळत आहे. ते म्हणजे भारतात लोकसंख्येच्या प्रमाणात वाहनांची  संख्या जागतिक तुलनेत खूपच कमी आहे. मोटारींबाबत बोलायचे तर भारतात हजार  माणसांमागे केवळ आठ मोटारी आहेत. चीनमध्ये हा आकडा १०, श्रीलंकेत १३,  थायलंडमध्ये ३५ आहे. विकसित देशांत तर हे प्रमाण खूपच जास्त आहे. जपानमध्ये  हजार माणसांमागे ४४१ मोटारी, ब्रिटनमध्ये ४४५, तर अमेरिकेत ४६५ आहेत.<br />
सार्वजनिक वाहतुकीचा टक्का घटला<br />
हे  आकडे दाखवून भारत मोटारींच्या वापराच्या दृष्टीने कसा पिछाडीवर आहे, हे  सांगितले जाते. त्याचबरोबर भारतात मोटारींची संख्या वाढविणे कसे आवश्यक  आहे, हे बोलले जाते. विशेषत: वाहननिर्मिती कंपन्यांचे प्रतिनिधित्व  करणाऱ्या सोसायटी फॉर इंडियन ऑटोमोबॉईल इंडस्ट्रिज (सियाम) या संस्थेकडून  हा मुद्दा मांडला जातो. अजूनही मुख्यत: मोटारींची विक्री होते ती  शहरांमध्येच! त्यामुळे शहरातील मोटारींच्या संख्येत आणखी वाढ झाल्यास  वाहतुकीचा काय बट्टय़ाबोळ होईल, याची कल्पना येईल. भविष्यात ही समस्या अतिशय  उग्र स्वरूप धारण करण्याची शक्यता आहे. पण असे असले तरी आजही अनेक  शहरांमध्ये खासगी वाहतूक व्यवस्था अजिबात समाधानकारक नाही. दहा लाखांपेक्षा  जास्त लोकसंख्या असलेल्या ३५ शहरांपैकी केवळ आठ शहरांमध्ये खास शहरी  प्रवासी वाहतुकीसाठी वाहिलेली स्वतंत्र बससेवा आहे. काही शहरांमध्ये अशी  बससेवा खासगी व्यावसायिकांना भाडय़ाने देण्यात आलेली आहे. यावरून सार्वजनिक  वाहतूक व्यवस्थेकडे किती लक्ष दिले जाते, याचा अंदाज येईल.<br />
शहरांमधील  लोकसंख्येत वेगाने वाढ होत असताना त्याचा अंदाज घेऊन नागरी नियोजन होत  नसल्याने ही समस्या दिवसेंदिवस चिघळत चालली आहे. सार्वजनिक वाहतूक व्यवस्था  नागरिकांच्या गरजा पुऱ्या करण्यास सक्षम नसल्याने पर्यायी व्यवस्था म्हणून  मोटारसायकली व मोटारींची संख्या वेगाने वाढत आहे. आता तर मध्यमवर्ग व  कनिष्ठ मध्यमवर्गाची क्रयशक्ती वाढल्याने त्यांची मोटारीची स्वप्ने सहजी  पूर्ण होऊ लागली आहेत. या सर्व परिस्थितीचा परिणाम म्हणून दिवसेंदिवस  सार्वजनिक वाहतूक व्यवस्थेचा टक्का घटू लागला आहे. याचबरोबर बडय़ा  शहरांमध्ये दिसून आलेला आणखी एक बदल म्हणजे तेथील ‘नॉन-मोटराईज्ड  ट्रान्सपोर्ट’चे प्रमाण बरेच घटले आहे. म्हणजे एकूण वाहतुकीच्या प्रमाणात  सायकल चालविणारे, पायी चालणारे यांचे प्रमाण हळूहळू कमी होत चालले आहे.  परिणामी, वाढत्या मोटारी आणि त्यांच्यामुळे बाहेर पडणारा धूर व कार्बन  वायूंच्या प्रमाणातही वाढ हे पाहायला मिळत आहे. ही समस्या मुख्यत:  महानगरांमध्येच वाढत आहे. त्यामुळे हवेतील धूलिकण, नायट्रस ऑक्साईड, सल्फर  डाय ऑक्साईड, कार्बन मोनॉक्साईड यांसारखे घातक वायू हवेत मिसळण्याचे प्रमाण  वाढले आहे. दिल्लीत असे वायू हवेत मिसळण्याचे प्रमाण रोज १०४६ टन इतके  जास्त आहे. या पाठोपाठ मुंबई (६६० टन), कोलकाता (२९४ टन) आणि चेन्नई (२२६  टन) यांचा क्रमांक लागतो. त्यामुळे दमा, फुफ्फुसाचे विकार, श्वसन यंत्रणेची  खराबी, कर्करोग, मेंदूचा विकास थांबणे, त्वचा-डोळय़ांचे विकार असे घातक  परिणाम पाहायला मिळत आहेत. अलीकडच्याच एका अभ्यासावरून असे पाहायला मिळाले  आहे की शहरी लोकसंख्येने खासगी वाहने न वापरता सार्वजनिक यंत्रणेचा वापर  केला तर कार्बन मोनॉक्साईडसारख्या अतिशय घातक वायूचे प्रमाण ९७ टक्क्यांनी  कमी करणे शक्य आहे. त्याचप्रमाणे सल्फर डाय ऑक्साईड ४६.१ टक्क्यांनी कमी  होईल, तर हवेत मिसळणारा धूर २७.६ टक्क्यांनी कमी होऊ शकेल. यावरून  सार्वजनिक वाहतूक व्यवस्थेचे महत्त्व ठसठशीतपणे अधोरेखित होते. विशेष  म्हणजे भारतात वाहनांमुळे होणाऱ्या एकूण प्रदूषणापैकी ४० टक्के प्रदूषण  फक्त २० शहरांमध्ये होते. त्यामुळे या शहरांमधील व्यवस्था सुधारल्या तर  देशातील एकूण प्रदूषण लक्षणीयरीत्या कमी करणे शक्य होईल. या प्रश्नाला  असलेला आणखी एक पदर म्हणजे कार्बन वायूंच्या उत्सर्जनात होत असलेली वाढ!  वस्तुत: भारताकडून होणारे माणशी उत्सर्जनाचे प्रमाण जागतिक तुलनेत बरेच कमी  आहे. प्रत्येक भारतीय वर्षांला सव्वा टन कार्बन वायूचे उत्सर्जन करतो.  प्रत्येक अमेरिकन माणसाचे हे प्रमाण २० टनाच्या आसपास आहे. पण लोकसंख्येचा  विचार करता वाहनांच्या संख्येत वाढ झाली तर भारताचा वाटा झपाटय़ाने  वाढण्याची शक्यता आहे. त्याचबरोबर ही बाब भारतातील वाहतुकीची समस्या  वाढविण्यासही कारणीभूत ठरणार आहे. त्यामुळेच यातून मार्ग काढणे अतिशय  महत्त्वाचे ठरणार आहे.<br />
उपायांच्या दिशेने..<br />
या परिस्थितीतून मार्ग  काढण्यासाठी काही उपाय हाती घ्यावे लागणार आहेत. कारण मोटारींच्या संख्येत  आतासारखी वाढ कायम राहिली तर ती शाश्वत वाहतूक व्यवस्थेसाठी हानिकारक असेल.  एकूणच आशिया खंडात ही स्थिती आहे. भारतात प्रदूषण कमी करण्यासाठी इंधनाचा  दर्जा सुधारण्यावर भर दिला जात आहे. त्यानुसार, काही महानगरांमध्ये ‘भारत  २’, ‘भारत ३’ दर्जाचे इंधन उपलब्ध करून देण्यात आले आहे. हे असले तरी  इंधनाच्या कार्यक्षमतेबाबत व मोटारींमुळे उत्सर्जित होणाऱ्या कार्बन डाय  ऑक्साईड वायूबाबत भारताने कोणतेही भविष्यकालीन उद्दिष्ट ठरवलेले नाही.  वाहनांच्या दृष्टीने मोठी बाजारपेठ असलेल्या, पण असे उद्दिष्ट नसलेल्या  महत्त्वाच्या तीन देशांमध्ये भारताचा रशिया व मेक्सिको यांच्या बरोबरीने  समावेश होतो. त्यामुळेच अभ्यासकांकडून काही उपाय सुचविण्यात आले आहेत.  त्यानुसार दिल्ली व एकूणच देशासाठी २०३० सालापर्यंत प्रदूषणाबाबत काही  किमान उद्दिष्टे ठरवायला हवीत. त्याअंतर्गतच देशपातळीवर व प्रत्येक  शहराच्या पातळीवरसुद्धा कार्बन डाय ऑक्साइडच्या उत्सर्जनाचे कमाल उद्दिष्ट  ठरवून द्यायला हवे. ही उद्दिष्टे पूर्ण करण्यासाठी त्याच्याशी सुसंगत धोरणे  निर्माण करून ती कालबद्ध कार्यक्रम ठरवून राबवायला हवी.<br />
ही धोरणे तयार  करताना शाश्वत सार्वजनिक वाहतूक व्यवस्था अस्तित्वात आणण्याच्या दृष्टीने  महत्त्वपूर्ण सुधारणा कराव्या लागणार आहेत. त्याअंतर्गत सार्वजनिक वाहतूक  व्यवस्था, नॉन-मोटराईज्ड ट्रान्सपोर्ट आणि पर्यावरण संरक्षण व देखभाल या  तीन मुद्दय़ांकडे प्रामुख्याने लक्ष द्यावे लागणार आहे.<br />
लोकांनी खासगी  वाहनांकडून सार्वजनिक वाहतुकीकडे वळावे या दृष्टीने धोरणे ठरवावी लागतील.  त्यासाठी आधुनिक व सोयीनीयुक्त बस वाहतूक व्यवस्था विकसित करण्यास  प्राधान्य देणे, मेट्रो रेल व्यवस्थेच्या उपयुक्ततेचे परीक्षण करणे  (तज्ज्ञांच्या मते चीनचा अनुभव असे सांगतो, की मेट्रो करूनही तेथील खासगी  वाहनांची संख्या कमी झालेली नाही), इंधनाचे पुरेपूर ज्वलन होईल अशी इंजिन्स  बसेसमध्ये बसविणे, बसेस अधिक सुरक्षित व सोयीस्कर बनाव्यात म्हणून बंद  दरवाजे, कमी उंचीच्या पायऱ्या व सोयीस्कर बसथांबे तयार करणे असे उपाय हाती  घ्यावे लागतील.<br />
नॉन मोटराईज्ड व्यवस्थेला प्रोत्साहन मिळावे म्हणून  पादचारी व सायकलींसाठी सुरक्षितठरतील अशी रस्त्यांची रचना करणे, सर्व मोठय़ा  शहरांमध्ये सायकलींसाठी स्वतंत्र लेन राखणे, पादचाऱ्यांसाठी भुयारी मार्ग व  तत्सम व्यवस्था निर्माण करणे. याशिवाय पर्यावरण संरक्षणाच्या दृष्टीने  उपायही हाती घ्यावे लागतील. त्याअंतर्गत स्वच्छ इंधन विकसित करणे आणि  इंधनाचा पुरेपूर वापर होईल, असे तंत्रज्ञान वाहनात वापरले जाईल यासाठी  प्रोत्साहन देणे.<br />
हे उपाय मांडणे सोपे आहे, पण त्यांच्या प्रत्यक्ष  अंमलबजावणीसाठी इच्छाशक्ती, पुरेशी गुंतवणूक आणि आवश्यक तो पाठपुरावा करावा  लागणार आहे. हे उपाय प्रत्यक्षात आले तरच खासगी वाहनाची वाढती संख्या व  त्यांच्यामुळे वाढणारे प्रदूषण रोखणे म्हणजेच शहरातील जीवन सुसहय़ बनविणे  शक्य आहे.<br />
इंधन बचतीचे काही उपाय<br />
प्रत्येक वाहनचालकाने वैयक्तिक  पातळीवर काही उपाय केले तरी इंधनाची मोठी बचत शक्य आहे. भारतीय मोटारी ताशी  ४५ किलोमीटर या वेगाने चालविल्या तर कार्यक्षमता सर्वाधिक असते. वेग ताशी  ६० किलोमीटपर्यंत वाढल्यास १५ टक्के अधिक इंधन जळते. ताशी ८५ किलोमीटर  वेगाला ३० टक्के जास्त इंधन जळते. मोटारीने ताशी ४० किलोमीटरचा वेग  पकडल्यास ‘टॉप’ गियर टाकावा. विनाकारण वारंवार ब्रेक वापरू नये, एअर फिल्टर  नियमित साफ करावा, इंजिन नियमित टय़ून करावे, मोटारीला शिफारस केलेल्या  दर्जाचेच इंधन वापरावे.<br />
मोटारींचे ‘लेबलिंग’<br />
अनेक देशांमध्ये  मोटारींची कार्यक्षमता दर्शविण्यासाठी ‘लेबलिंग’ केले जाते. त्यात वाहनातून  बाहेर पडणारे कार्बन डाय ऑक्साईडचे प्रमाण, एका लीटर इंधनात अंतर  कापण्याची क्षमता, त्याचे वजन-आकार अशा घटकांचा विचार करून मानांकन दिले  जाते. जपान, सिंगापूर, न्यूझीलंड, युरोपीय युनियन, ब्राझील, अमेरिका,  ऑस्ट्रेलिया, चीन या देशांमध्ये तशी पद्धत आहे. त्यामुळे वाहनाची नेमकी  माहिती उपलब्ध होते. त्यामुळे वाहनखरेदीचा निर्णय घेणे सोपे जाते.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>अभिजित घोरपडे</strong></p>
<p><strong>साभार- लोकसत्ता.</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=96853:2010-08-28-15-11-25&amp;catid=55:2009-07-20-04-00-45&amp;Itemid=13" href="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=96853:2010-08-28-15-11-25&amp;catid=55:2009-07-20-04-00-45&amp;Itemid=13" target="_blank">http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=96853:2010-08-28-15-11-25&amp;catid=55:2009-07-20-04-00-45&amp;Itemid=13</a></p>
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		<title>एका आईची शताब्दी!</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Aug 2010 18:58:14 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[ती दयेची माता होती, ती कारुण्यसिंधू होती, ती भवदु:खहारी होती, ती गोरगरिबांची, भुकेलेल्यांची माता होती. जशी असायला हवी तशीच तीही एक आई होती. शंभर वर्षांपूर्वी आजच्याच दिवशी जन्मलेल्या आणि नंतर दिगंत कीर्ती झालेल्या या महिलेने हजारो-लाखो जिवांना धीर दिला, जगण्याचे बळ दिले. ही आई म्हणजे अर्थातच मदर तेरेसा! २६ ऑगस्ट १९१० रोजी अल्बानियात जन्मलेल्या मुलीचा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/mother_teresa_0820.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6134" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/mother_teresa_0820.jpg" alt="" width="360" height="235" /></a>ती दयेची माता होती, ती कारुण्यसिंधू होती, ती भवदु:खहारी होती, ती  गोरगरिबांची, भुकेलेल्यांची माता होती. जशी असायला हवी तशीच तीही एक आई  होती. शंभर वर्षांपूर्वी आजच्याच दिवशी जन्मलेल्या आणि नंतर दिगंत कीर्ती  झालेल्या या महिलेने हजारो-लाखो जिवांना धीर दिला, जगण्याचे बळ दिले.   ही आई म्हणजे अर्थातच मदर तेरेसा! २६ ऑगस्ट १९१० रोजी अल्बानियात  जन्मलेल्या मुलीचा हा प्रवासच मुळी थक्क व्हायला भाग पाडणारा आहे. भारत हा  देश या मुलीने आपला मानला आणि नंतरच्या काळात ‘मदर’ ही उपाधी सर्वार्थाने  सार्थकी लावणाऱ्या तेरेसांनी कोलकाता या शहराला आनंदनगरी ही ओळख दिली.  महात्मा गांधी यांचे नाव घेतले, की ज्याप्रमाणे भारताच्या तत्त्वज्ञानाचा  आरंभ होतो, तसेच मदर तेरेसा यांचे नाव उच्चारले, की भारताचा इतिहास जागतिक  पटलावर उभा राहतो. स्वातंत्र्याच्या उंबरठय़ावर मदर तेरेसांनी कोलकात्यात  आपल्या कामाला प्रारंभ केला तेव्हा त्यांनी भीषण दंगली पाहिल्या, हजारो  जणांना प्राण सोडतानाही  अनुभवले. अनेकांचे टाहो त्यांनी ऐकले, किंकाळय़ा  ऐकल्या. तो काळ अशांततेचा होता. फाळणीनंतर द्वेष, हिंसाचार, मारामाऱ्या  यांचे कोलकात्यावरच काय संपूर्ण देशावरच अधिराज्य होते. अशा वेळी त्यांनी  गरिबातल्या गरिबापर्यंत जाऊन काम करण्याचा निर्धार केला. आपला नेहमीचा  पोशाख बदलून त्या सफाई कामगाराप्रमाणे सुती साडी नेसून रस्त्यावर उतरल्या.  येशू ख्रिस्ताच्या डोळय़ांमध्ये जे कारुण्य दिसते, त्याचेच प्रतिरूप मदर  तेरेसांच्या ठायी आपण अनुभवले आहे. अगदी अलीकडच्या काळात प्रमुख निवडणूक  आयुक्तपदावरून निवृत्त झालेले नवीन चावला हे मदर तेरेसा यांचे अधिकृत  चरित्रकार! त्यांनाही तेरेसा यांनी नाही, होय करत अखेरीस चरित्र लिहायला  परवानगी दिली. त्यांनी ते लिहिले म्हणून त्यांच्यावर आधीचे निवडणूक आयुक्त  जे. एम. (जेम्स मायकेल) लिंगडोह यांच्याप्रमाणे कडवट टीकाही झाली. यावरूनही  आपल्या देशात वावरणाऱ्या जात्यंध हिंदुत्ववाद्यांची वृत्ती किती संकुचित  आहे ते स्पष्ट होते. चावलांनी एकदा तेरेसांचा उल्लेख ‘जगातली सर्वात  शक्तिशाली महिला’ असा केला, तेव्हा त्या त्यांना म्हणाल्या, ‘मी खरोखरच तशी  असते तर <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/12images.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-6135" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/12images.jpg" alt="" width="201" height="251" /></a>मी जगात शांतता प्रस्थापित करू शकले असते.’ चावलांनी त्यांना  मुलाखतीसाठी बराच आग्रह केला, तेव्हा त्यांनी ते प्रश्न बाजूला करून  म्हटले, की आता मला निघायला हवे. तुम्ही  आमच्या असंख्य ‘घरां’ना भेटी  दिल्या असतील, तिथे आमच्या ‘सिस्टर्स’ अशाच पद्धतीच्या साडय़ा नेसून काम  करताना तुम्ही पाहिलेही असेल, त्या साधे जेवण घेतानाही तुम्ही पाहिले असेल,  पण मदर तेरेसा सगळीकडे कुठे असतात, तरीही काम चालतेच. आम्ही गरिबातल्या  गरिबाच्या सेवेत मग्न आहोत, तोपर्यंत या कामाला काही कमी पडणार नाही.’ आपण  आणि आपले काम यापलीकडे काहीही न पाहणाऱ्या मदर तेरेसा यांनी आपल्याला  रेल्वेने प्रवास करावा लागतो आणि त्यासाठी रांगेत उभे राहून वेळही काढावा  लागतो, असे प्रख्यात ज्येष्ठ पत्रकार खुशवंतसिंग यांना सहज म्हटले, तेव्हा  खुशवंतसिंगांनी तेव्हाच्या पंतप्रधान इंदिरा गांधी यांना पत्र लिहून मदर  तेरेसांना रेल्वेचा संपूर्ण देशाचा पास देण्याविषयी कळवले. त्यावर इंदिरा  गांधींनी त्यांना विमानाचा पास काढून दिला. त्या भारतात ख्रिश्चन धर्माचा  प्रसार करण्यासाठी आल्या, त्यांनी अनेकांना तसा बाप्तिस्मा दिला, अशा  असंख्य वार्ता त्या काळात उठत राहिल्या, पण तो सगळा बकवास होता. आपण कोणतेच  सामाजिक कार्य करायचे नाही आणि जे कोणी ते करत असतील, त्यात मोडता  घालायचा, ही वृत्तीच याही ठिकाणी दिसली आहे. त्या एकदा अशाच टीकेला त्रासून  म्हणाल्या, की होय, मी त्यांचे ‘धर्मातर’ घडवते. हिंदूंना अधिक चांगले  हिंदू बना असे मी म्हणते, मुस्लिमांना मी अधिक चांगले मुस्लिम व्हा, असे  सांगते आणि ख्रिश्चनांकडे अधिक चांगले ख्रिश्चन बना असा आग्रह धरते.  कोलकात्याच्या आणि लंडनच्या रस्त्यावर उभे राहून त्यांनी आपल्या  अनाथालयासाठी भाजीपाला आणि अन्नधान्य यांची अक्षरश: भीक मागितली आहे.  कोलकात्यातच रामकृष्ण मिशनने यासारखे काम केले आहे, पण अशा कामांना स्वत:ला  वाहून घेणाऱ्या संस्था फारच रोडावल्या आहेत. आज तर त्यांची संख्या नगण्य  वाटावी अशीच आहे. मदर तेरेसांनी गरिबीला उघडय़ावर संसार करण्यापासून रोखले  आणि आपल्या घरात आणून ठेवले. सर्वसाधारण मनुष्यस्वभाव हा जास्तीत जास्त  मिळवायच्या मागे लागलेला असताना, त्यांनी समाजासाठी सर्वस्व पणाला लावले  होते. जो दारिद्रय़ात आहे, ज्याला <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/images1.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6136" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/images1.jpg" alt="" width="199" height="254" /></a>कुणीही नाही, जो मृत्यूचीच वाट पाहतो आहे,  अशांना त्यांनी आधार दिला आणि त्यांचे जीवन आणि मरणसुद्धा त्यांनी सुसहय़  बनवले. अनेक अंधांना शारीरिकदृष्टय़ा नसले तरीही त्यांनी डोळस केले. ही  त्यांची जादूविद्या नव्हती, त्यांच्यातल्या माणुसकीचा तो सर्वोच्च गुणधर्म  होता. रस्त्यावर टाकून दिलेल्या, कचराकुंडीत सोडून दिलेल्या हजारो जिवांना  त्यांनी ‘आयुष्यमान भव!’ हा आशीर्वाद दिला, त्याचे जीवन सुखावह केले. अनेक  मरणासन्न जिवांना काळाच्या तावडीतून सोडवून त्यांनी पुनर्जन्म दिला. तो जो  कुणी आहे, त्याचा धर्म कुठलाही असो, त्याला त्याच्या धर्माप्रमाणे शांतताही  लाभू दिली. ज्यांनी आयुष्यातही कधी अंघोळ पाहिली नाही, अशांना हाताने  स्पर्श करून त्यांनी अंघोळ तर घातलीच, पण त्यांच्या जखमाही धुतल्या. तो वा  ती यांच्यापैकी कुणी यातनांनी विव्हळलेच तर ‘सॉरी’ या शब्दांनी त्यांना धीर  दिला. त्यांना ताजेतवाने बनवले. ‘एचआयव्ही’बाधितांनाही त्यांनी हे जीवन  सुंदर असल्याचा साक्षात्कार घडवला. कुष्ठरोगी आणि असंख्य रुग्णांची त्यांनी  केलेली सेवा ही अपूर्व अशीच होती. या अशा अनेक जिवांसाठी त्याही वणवण  भटकल्या. त्या म्हणतात, की मी हिंडले हे ठीक आहे, पण मी तशी हिंडले नसते तर  मला त्यांची ही व्यथा कशी समजली असती? १९७९ मध्ये त्यांना ‘नोबेल  पुरस्कार’ मिळाला तेव्हा आणि १९८० मध्ये त्यांना ‘भारतरत्न’ हा किताब  देण्यात आला, तेव्हाही त्या म्हणाल्या, की आपल्याला दिव्यांच्या लखलखाटात  जायला अजिबात आवडत नाही. अशा समारंभातून जाऊ लागलो तर आपले काम बुडणार आहे,  याचे भान मात्र त्या बोलून दाखवत. कोणत्याही कार्यक्रमाला जायचे तर  त्यांची साधी मागणी साबणाच्या ३०० वडय़ा आणि ३०० साडय़ा यांची असे.  अनेकांच्या फाटक्या लक्तरांना त्यांनी ऊब लाभू दिली. ‘गांधी’ चित्रपटात  अशाच <a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/motherteresa1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-6137" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/motherteresa1.jpg" alt="" width="528" height="672" /></a>एका लक्तरे ल्यायलेल्या महिलेच्या दिशेने आपल्या खांद्यावरच्या पंचाला  सोडून देणाऱ्या गांधीजींइतकाच भावविवश करणारा हा भाग आहे. मदर तेरेसा  धाडसीही होत्या. बैरूतला वेढा पडलेला असताना त्यांनी १९८२ मध्ये  पॅलेस्टेनियन बंडखोर आणि इस्रायली सैनिक यांच्यात तात्पुरता समझोता घडवून  आणून रेडक्रॉसच्या मदतीने ३७ लहान मुलांची सुटका घडवून आणली. त्या स्वत:  युद्धभूमीवर निर्भयतेने हिंडल्या. पूर्व युरोप ज्या वेळी अधिक मोकळा  व्हायला लागला होता, त्या वेळी त्यांनी कम्युनिस्ट देशांमध्ये ‘मिशनरीज ऑफ  चॅरिटीज’चा प्रसार केला. तोपर्यंत कम्युनिस्टांना मदर तेरेसा हे या  पृथ्वीतलावरचे गूढ वाटत होते. (पश्चिम बंगालमधले डावे त्यास अपवाद होते.)  त्यांच्यापैकी कोणी त्या ‘सीआयए’च्या हस्तक असल्याचा शोध लावला नव्हता हे  आपले नशीबच! इथिओपियामधल्या भुकेलेल्यांना त्यांनी आधार दिला. त्या तिथे  गेल्या, ज्या काळात चेर्नोबिलच्या किरणोत्सर्गाची घटना घडली तेव्हाही  आपल्याला त्याचा त्रास होईल किंवा नाही याची चिंता करत बसण्यापेक्षा  त्यांनी तिथे जाऊन ज्यांना तो त्रास झाला त्यांना आधार दिला. त्या वेळच्या  राजकारण्यांना जे साधले नाही ते त्यांनी करून दाखवले. आपल्या संस्थेसाठी  मदत देणारा कोण आहे, त्याने पैसा कशा पद्धतीने जमवला आहे, हे पाहात राहिलो  तर चांगल्या कामासाठी आपल्याला एक पैसाही जमवता येणार नाही, असे त्या  म्हणत. ते किती खरे असले पाहिजे असे आताची परिस्थिती पाहिली असता वाटायला  लागते. कोणत्याही युद्धाला त्यांचा महात्मा गांधींसारखाच विरोध होता. त्या  म्हणायच्या, की युद्ध हे राजकारणाचे फळ आहे. त्या शांततेच्या दूत होत्या  म्हणूनच त्या सर्वाच्या आई बनू शकल्या. त्या आईची आज शताब्दी आहे.</p>
<p>संपादकीय,</p>
<p><strong>साभार- लोकसत्ता.</strong></p>
<p><a title="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=95962:2010-08-25-15-45-43&amp;catid=29:2009-07-09-02-02-07&amp;Itemid=7" href="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=95962:2010-08-25-15-45-43&amp;catid=29:2009-07-09-02-02-07&amp;Itemid=7" target="_blank">http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=95962:2010-08-25-15-45-43&amp;catid=29:2009-07-09-02-02-07&amp;Itemid=7</a></p>
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		<title>महाराष्ट्रातील नद्यां होणार स्वच्छ&#8230; ३० प्रदूषित नद्यांसाठी कृती कार्यक्रम. ﻿</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Aug 2010 02:38:56 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[राज्यातील भीमा, गोदावरी, कृष्णा अशा प्रमुख ३० नद्यांचे पाणी प्रदूषित असून या नद्या स्वच्छ करण्यासाठी राज्य सरकारने कृती कार्यक्रम आखला आहे. यात भीमा नदीचे प्रदूषण दूर करण्याचे काम येत्या तीन महिन्यात सुरु होणार आहे. कारखान्यामधून सोडले जाणारे दूषित पाणी, महापालिका आणि नगरपालिका क्षेत्रातून बाहेर टाकले जाणारे सांडपाणी यामुळे राज्यातील ३० नद्या प्रदूषित झाल्या आहेत. देशातील [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><!--google_ad_region_start=article--></p>
<p style="text-align: justify;">राज्यातील    भीमा, गोदावरी,    कृष्णा अशा    प्रमुख ३०    नद्यांचे    पाणी    प्रदूषित    असून या नद्या    स्वच्छ    करण्यासाठी    राज्य    सरकारने कृती    कार्यक्रम    आखला आहे. यात    भीमा नदीचे    प्रदूषण दूर    करण्याचे काम    येत्या तीन    महिन्यात    सुरु होणार    आहे.</p>
<p>कारखान्यामधून    सोडले जाणारे    दूषित पाणी,    महापालिका    आणि    नगरपालिका    क्षेत्रातून    बाहेर टाकले    जाणारे    सांडपाणी    यामुळे    राज्यातील ३०    नद्या    प्रदूषित    झाल्या आहेत.    देशातील अनेक    प्रमुख नद्या    प्रदूषणाच्या    विळख्यात    सापडल्या    असून त्या    नद्याचे    प्रदूषण नष्ट    करण्यासाठी    केंद    सरकारच्या    राज्य    सरकारच्या    मदतीने कृती    कार्यक्रम    आखला    आहे.</p>
<p>यात    राज्यातील    प्रमुख    नद्यांचे    पाणी स्वच्छ    करण्यासंदर्भात    मुख्य सचिव जे.    पी. डांगे    यांच्या    अध्यक्षतेखालील    मंगळवारी    मंत्रालयात    बैठक झाली.    नद्यांचे    प्रदूषण नष्ट    करण्यासाठी    केंद सरकार ७५    टक्के तर    राज्य सरकार    २५ टक्के निधी    देणार आहे.    वर्षभरात हा    कृती    कार्यक्रम    राबवायचा    असून या    कार्यक्रमांची    सुरुवात भीमा    नदीपासून    करण्यात    येणार    आहे.</p>
<p>नद्या    स्वच्छ    करतानाच    भविष्यात या    नद्या    प्रदूषित    होणार नाहीत,    यासाठी    संबंधित    महापालिका,    नगरपालिका    यांच्यावर    कायदेशीर    बंधन    घालण्यात    येणार आहेत.    तसेच    महापालिका    आणि    नगरपालिका    क्षेत्रातील    दूषित पाणी    नदीत सोडणारे    कारखाने    यांच्यावरही    कठोर कारवाई    करण्यात    येणार आहे.    प्रदूषण    करणाऱ्यांवर    कारवाई    करण्यास    दिरंगाई    करणाऱ्या    संबंधित    अधिकाऱ्यांवरही    कारवाई    करण्यात यावी,    असे आदेश    मुख्य सचिव जे.    पी. डांगे    यांनी दिले    आहेत.</p>
<p style="text-align: center;">﻿﻿<a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/115.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-6119" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/115.jpg" alt="" width="700" height="500" /></a></p>
<p style="text-align: center;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/212.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-6120" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/212.jpg" alt="" width="700" height="500" /></a></p>
<p style="text-align: center;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/35.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-6121" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/35.jpg" alt="" width="1000" height="700" /></a></p>
<p style="text-align: center;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/MT3-final.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-6126" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/MT3-final.jpg" alt="" width="728" height="510" /></a></p>
<p>साभार- महाराष्ट्र टाइम्स</p>
<p><a class="aligncenter" title="http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/6429175.cms" href="http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/6429175.cms" target="_self">http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/6429175.cms</a></p>
<p style="text-align: center;">
<h2 style="text-align: center;">
<table cellspacing="0" cellpadding="0" align="left">
<tbody>
<tr>
<td id="bellyad"></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</h2>
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		<title>जयराम रमेश यांचा दणका</title>
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		<pubDate>Wed, 25 Aug 2010 18:31:51 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[देशाची आर्थिक प्रगती घडविण्याच्या मार्गातला पर्यावरण हा एक उपदवी मुद्दा आहे असे मानणाऱ्यांना केंदीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश यांनी एक जोरदार द णका दिला आहे. वन संवर्धन कायदा, वन हक्क कायदा आणि पर्यावरण रक्षण कायदा या सर्वांना धाब्यावर बसवून ओरिसाच्या नियामगिरी हिल भागात बॉक्साईटची खाण सुरू करण्याच्या प्रयत्नात असलेल्या वेदान्त या बहुराष्ट्रीय कंपनीला तसेच ओरिसा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img src="file:///C:/DOCUME%7E1/user/LOCALS%7E1/Temp/moz-screenshot.png" alt="" /><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/Jairam-Ramesh.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6109" title="Jairam Ramesh" src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2010/08/Jairam-Ramesh.jpg" alt="" width="284" height="196" /></a>देशाची    आर्थिक    प्रगती    घडविण्याच्या    मार्गातला    पर्यावरण हा    एक उपदवी    मुद्दा आहे    असे    मानणाऱ्यांना    केंदीय    पर्यावरण    मंत्री जयराम    रमेश यांनी एक    जोरदार द</p>
<table cellspacing="0" cellpadding="0" align="left">
<tbody>
<tr>
<td id="bellyad"></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p style="text-align: justify;">णका    दिला आहे. वन    संवर्धन    कायदा, वन हक्क    कायदा आणि    पर्यावरण    रक्षण कायदा    या सर्वांना    धाब्यावर    बसवून    ओरिसाच्या    नियामगिरी    हिल भागात    बॉक्साईटची    खाण सुरू    करण्याच्या    प्रयत्नात    असलेल्या    वेदान्त या    बहुराष्ट्रीय    कंपनीला तसेच    ओरिसा    सरकारला    त्यांनी ही    खाण सुरू    करण्याची    परवानगी    देण्यास    सपशेल नकार    दिला आहे.    देशाला    आथिर्क    महासत्ता    करायचे    असल्यामुळे    कारखानदारी,    औद्योगिकीकरण,    विमानतळे,    महामार्ग    बांधणे हे    आवश्यक झाले    आहे, पण ते    करताना    पर्यावरणाकडे    दुर्लक्ष    केले तरी    चालेल, असे    म्हणणाऱ्यांना    केंदीय    पर्यावरण    खात्याने या    नकाराद्वारे    चांगलाच दणका    दिला आहे. याचा    अर्थ    पर्यावरण    खात्याचा    सर्व विकास    प्रकल्पांना    विरोध आहे असे    नव्हे. कारण    जमिनीतील    खनिज संपत्ती    मिळविल्याशिवाय    आणि कारखाने    सुरू    केल्याशिवाय    देशाची    आथिर्क    प्रगती होणार    नाही. पण ते    करताना    पर्यावरणाचा    विचार टाळता    येणार नाही.    युरोपने    गेल्या शतकात    पर्यावरणाचा    विचार न करता    आपली    औद्योगिक    प्रगती साधली.    पण त्याचे    दुष्परिणाम    जाणवू लागताच    जागतिक    पर्यावरणाच्या    रक्षणासाठी    पुढाकार    घेतला.    त्यासाठी    मोठी    गुंतवणूक    करून संशोधन    केले.    त्यांच्या    अनुभवावरून    शहाणे होऊन    भारताने    पर्यावरणविषयक    कायदे केले    आहेत. ते पाळणे    अत्यंत    जरुरीचे आहे.    हे कायदे    म्हणजे    प्रगतीच्या    मार्गातील    अडथळा आहे, असा    प्रचार होतो.    तो ऱ्हस्व    दृष्टीचे    द्योतक आहे.    मुळात    पर्यावरण    कायद्यात    आदिवासी व    वनवासींच्या    जंगलात    राहण्याच्या    हक्काचा    संकोच    करण्यात आला    आहे आणि    देशातील ७३    टक्के वनजमीन    औद्योगिकीकरणासाठी    राखून    ठेवण्यात आली    आहे, असा    पर्यावरणवाद्यांचा    आक्षेप आहे. पण    हा आक्षेप    डावलून हा    कायदा    संसदेने संमत    केला आहे.    त्यामुळे    मुळातच    वनवासींचे    वनावरील हक्क    कमी केले गेले    आहेत. अशा    अवस्थेत    त्यांचे जे    काही हक्क    आहेत ते    वेदान्त आणि    ओरिसा    सरकारने    राखून मग    प्रकल्पाला    हात घालणे    आवश्यक होते,    पण हे उरले    सुरले वनवासी    हक्कही    नाकारून हा    प्रकल्प पुढे    रेटण्याचा    प्रयत्न    करण्यात येत    होता. त्याला    पर्यावरण    खात्याने    आक्षेप घेतला    यात गहजब    करण्यासारखे    काही नाही.    पर्यावरण    खात्याने असे    केले नसते तर    आपल्या    कर्तव्याकडे    कानाडोळा    केला असे झाले    असते. एवढेच    नाही तर    याबाबत जैविक    बहुविधतेसंबंधीच्या    रिओ    आंतरराष्ट्रीय    कराराचा आणि    संयुक्त    राष्ट्रांच्या    वनसंरक्षणासंबंधीच्या    शिफारसी    मोडल्याचा    ठपका आला असता.    ओरिसातील    प्रकल्प    उभारताना    पर्यावरणाकडे    दुर्लक्ष    करण्याच्या    वेदान्तच्या    या    प्रवृत्तीवर    याआधी    ब्रिटिश    सरकारनेही    ताशेरे ओढले    आहेत.    त्यामुळे    केंदीय    पर्यावरण    खात्याने    वेदान्तला    बॉक्साईटच्या    खाणीची    परवानगी    नाकारून आपले    राष्ट्रीय व    आंतरराष्ट्रीय    कर्तव्य पार    पाडले आहे.    वेदान्तला    पर्यावरणीय    संमती    देण्यासाठी    पर्यावरण    खात्याने    नियोजन    मंडळाचे एक    सदस्य एन. सी.    सक्सेना    यांच्या    नेतृत्वाखाली    एक समिती    नेमली होती. या    समितीने    खाणीच्या    जागेची पाहणी    करून, या    भागातील    आदिवासी व    ग्रामसभा    यांच्याशी    चर्चा करून    याबाबतचा    अहवाल तयार    केला आहे.    अहवालात या    भागातील    जैविक    बहुविधतेवर    होणारा    दुष्परिणाम,    या भागात    राहणारे    डोंगरिया आणि    कुटिया कोंढ    आदिवासी    जमातींचे    येथील    वनसंपत्तीवर    अवलंबून    असणारे    दैनंदिन जीवन,    वनांवर    त्यांचा    असणारा हक्क    यांचे कसे    उल्लंघन होत    आहे याचे    विस्तृत    विवेचन केले    आहे. असे असले    तरी    वेदान्तला    त्याबद्दल    दंड आकारून    परवानगी    द्यावी असे    ओरिसा    सरकारातील    काही लोकांचे    म्हणणे होते.    याचा अर्थ,    पर्यावरणविषयक    कायदे मोडा    आणि दंड भरून    मोकळे व्हा    असा झाला असता.    महाराष्ट्रासह    देशात अनेक    ठिकाणी विकास    प्रकल्पांची    आखणी करण्यात    येत आहे, पण ते    करताना    पर्यावरणाचा    विचार दुय्यम    मानण्यात येत    आहे. मग तो नवी    मुंबईतील    विमानतळाचा    प्रश्ान् असो    की, पश्चिम घाट    प्रकल्प असो.    बहुतेकांची    अशी धारणा    झाली आहे की,    आथिर्क    विकासाचा वेग    वाढवायचा    असल्यामुळे    पंतप्रधान    पर्यावरणाकडे    दुर्लक्ष    करून या    प्रकल्पांना    मंजुरी    मिळवून देतील.    पण    पंतप्रधानांचे    हात    कायद्याने    बांधले गेले    आहेत.    पर्यावरणाचा    अजिबात विचार    न करता    प्रकल्पांना    मंजुरी    द्यायची असेल    तर त्यांना    आधी पर्यावरण    खाते रद्द    करावे लागेल.    एवढेच नाही तर    पर्यावरणाबाबतचे    आंतरराष्ट्रीय    कायदे    केराच्या    टोपलीत    टाकावे    लागतील. तसे    काहीही    होण्याची    शक्यता नाही    आणि विकास    प्रकल्पांची    आखणी करताना    पर्यावरणाला    डावलता येणार    नाही, हाच    जयराम रमेश    यांच्या या    निर्णयामागचा    संदेश आहे.</p>
<p>संपादकीय,<br />
साभार- महारष्ट्र टाइम्स</p>
<p><a class="aligncenter" title="http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/6429484.cms" href="http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/6429484.cms" target="_blank"><span style="color: #0000ff;"><span style="text-decoration: underline;">http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/6429484.cms</span></span></a></p>
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