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	<title>gangajal blog &#187; Yamuna</title>
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		<title>अवैध खनन : सरकार एजेंट की भूमिका निभा रही है</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Jan 2012 18:11:17 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[देश में अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है. राजनेताओं के संरक्षण और अ़फसरों की मिलीभगत से खनन मा़फिया देश के खनिज बहुल राज्यों में प्राकृतिक खनिजों को लूटने में जुटे हैं. अ़फसोस की बात तो यह है कि लोकतांत्रिक देश की सरकार और जनप्रतिनिधि जनहित को ताक़ पर रखकर पूंजीपतियों के एजेंट की भूमिका [...]]]></description>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=30517" rel="attachment wp-att-30517"><img class="alignleft" title="अवैध खनन : सरकार एजेंट की भूमिका निभा रही है" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/12/52-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>देश में अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है. राजनेताओं के संरक्षण और अ़फसरों की मिलीभगत से खनन मा़फिया देश के खनिज बहुल राज्यों में प्राकृतिक खनिजों को लूटने में जुटे हैं. अ़फसोस की बात तो यह है कि लोकतांत्रिक देश की सरकार और जनप्रतिनिधि जनहित को ताक़ पर रखकर पूंजीपतियों के एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं. कर्नाटक के लोकायुक्त एन संतोष हेग़डे की अवैध खनन मामले में आई रिपोर्ट भी इस अवैध कारोबार में सरकार और जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता को साबित करती है. अवैध खनन के कारोबार में कांग्रेस और भाजपा नेताओं का गठजो़ड रहा है. संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के साथ ही पिछले दस साल में कर्नाटक की कांग्रेस, जनतादल सेक्युलर और भाजपा की सभी सरकारों को दोषी क़रार दिया गया है. हालांकि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा विदेश मंत्री एस एम कृष्णा का कहना है कि उनके कार्यकाल में खनन का कोई लाइसेंस नहीं दिया गया. लोकायुक्त कोर्ट के विशेष न्यायाधीश एन के सुधींद्र राव द्वारा अवैध खनन मामले में उनकी जांच के आदेश दिए जाने के बाद उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए मैंने खान एवं भूगर्भ विभाग अपने पास कभी नहीं रखा.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">बंगलुरु के व्यापारी टी जे अब्राहम ने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि एस एम कृष्णा, धर्म सिंह और एच डी कुमारस्वामी के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में अवैध खनन हुआ, जिसे उन्होंने नहीं रोका. याचिका में 11 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है. एस एम कृष्णा 11 अक्टूबर, 1999 से 28 मई, 2004 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर गठबंधन की सरकार में एन धर्म सिंह 28 मई, 2004 से 28 जनवरी, 2006 तक मुख्यमंत्री रहे. जबकि इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी और जनता दल सेक्युलर गठजो़ड की सरकार में एच डी कुमारस्वामी 2 फरवरी, 2006 से 8 अक्टूबर, 2007 तक मुख्यमंत्री रहे. एन धर्म सिंह इस समय उत्तरी कर्नाटक के बिदर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं, जबकि कुमारस्वामी बंगलुरु के समीप रामनगरम से सांसद हैं. रिपोर्ट में मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा और कई अन्य मंत्रियों को दोषी ठहराया गया, जिनमें पूर्व मंत्री कट्टा सुब्रमन्या नायडू, एस एन शेट्टी और मौजूदा गृह मंत्री आर अशोका, उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी एवं गृह निर्माण मंत्री वी सोमाना शामिल हैं. इससे जहां भाजपा की खासी किरकिरी हुई, वहीं येदियुरप्पा को अपनी कुर्सी भी गंवानी प़डी. कर्नाटक में लोकायुक्त की जांच के  घेरे में आने वाले सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है. विधानसभा अध्यक्ष के जी बोपैया के खिला़फ भी धन का दुरुपयोग करने के मामले में जांच शुरू हो चुकी है. हाल में केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने आंध्र प्रदेश की भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी वाई श्रीलक्ष्मी को जेल भेज दिया. उन पर आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की सरकार के कार्यकाल में खनन विभाग की सचिव रहते हुए रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम कंपनी को लाइसेंस देने में पक्षपात करने का आरोप है. खनन माफिया, अ़फसरों और नेताओं का गठजोड़ चांदी कूटने के साथ ही सरकारी खज़ाने को अरबों का चूना भी लगा रहा है. कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेग़डे की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006-2010 के बीच राज्य से क़रीब तीन करो़ड टन अवैध लौह अयस्क का खनन किया गया. इससे देश को क़रीब 16,200 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ. वहीं गोवा में 12,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है. पिछले पांच वर्षों में राज्य में 1.42 करो़ड टन अवैध खनन हुआ. राज्य का खनन विभाग मुख्यमंत्री दिगंबर कामत के पास है. यहां से सालाना 5.4 करो़ड टन लौह अयस्क का निर्यात होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी. पिछले दिनों लीक हुई इस रिपोर्ट में राज्य में ब़डे खनन घोटाले का ज़िक्र किया गया था. उड़ीसा में देश का लगभग एक तिहाई लौह अयस्क भंडार है. यहां की 243 खदानों में वर्ष 2009 से खनन बंद है. अकेले उड़ीसा में अवैध खनन से सरकारी खज़ाने को तीन लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो चुका है. सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक़, अवैध खनन के कारण पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में क़रीब 1500 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी एक रिपोर्ट में अवैध खनन के मामले में राज्य के खनन मंत्री राजेंद्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को ज़िम्मेदार ठहराया है, जबकि दोनों ही मंत्रियों ने इन आरोपों को ग़लत बताया है. छत्तीसग़ढ में 700 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़, झारखंड में अवैध खनन से सरकार को सालाना 600 करो़ड रुपये का ऩुकसान होता है. यहां के पूर्व मुख्यमंत्री मधु को़डा पर भी अवैध खनन में शामिल होने के आरोप लगे हैं. राजस्थान में पिछले पांच वर्षों में सरकार को 150 करो़ड रुपये के राजस्व का नुक़सान हुआ है.</p>
<p style="text-align: justify;">खनन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि देश में अवैध खनन का कारोबार फल-फूल रहा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006 से 2010 तक देश भर में अवैध खनन के एक लाख 61 हज़ार 140 मामले सामने आए. इनमें सर्वाधिक 39670 मामले अकेले आंध्र प्रदेश के थे. इसके बाद गुजरात में 24936 मामले दर्ज किए गए. महाराष्ट्र में 22885, मध्य प्रदेश में 17397, कर्नाटक में 12191, राजस्थान में 11513, केरल में 8204, छत्तीसगढ़ में 7402, तमिलनाडु में 5191, हरियाणा में 3897, हिमाचल प्रदेश में 2095, गोवा में 492, झारखंड में 953 और पश्चिम बंगाल में 901 मामले सामने आए. अ़फसोस की बात यह है कि कई राज्यों में तो अवैध खनन के मामलों में प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हुई है. देश भर में स़िर्फ 44 हज़ार 445 मामलों में ही कार्रवाई हुई. आंध्र प्रदेश में कोई भी मामला अदालत तक नहीं पहुंच पाया, जबकि छत्तीसग़ढ में 2383, गुजरात में आठ, हरियाणा में 138, हिमाचल प्रदेश में 711, झारखंड में 39, कर्नाटक में 771, मध्य प्रदेश में 16157, महाराष्ट्र में 13, उड़ीसा में 86, राजस्थान में 59, तमिलनाडु में 421 और बंगाल में 91 मामले अदालत में गए. गुजरात में 158 मामले पुलिस में दर्ज किए गए, जबकि हरियाणा में 103, झारखंड में 205, कर्नाटक में 959, मध्य प्रदेश में पांच, महाराष्ट्र में 20197, उड़ीसा में 57, राजस्थान में 607, तमिलनाडु में 579 और पश्चिम बंगाल में 974 मामले पुलिस तक पहुंचे.</p>
<p style="text-align: justify;">देश के विभिन्न राज्यों में कोयला, एल्यूमिनियम, अभ्रक, तांबा और मैगनीज आदि क़ीमती खनिजों का भंडार है. सुप्रीमकोर्ट की सख्त हिदायतों के बावजूद अवैध खनन पर रोक नहीं लग पा रही है. अवैध खनन के कारण पर्यावरण को खतरा पैदा हो गया है. पश्चिम बंगाल के रानीगंज, आसनसोल और झारखंड के झरिया का उदाहरण सबके सामने है. अवैध खनन के कारण यहां का एक ब़डा क्षेत्र कभी भी भयानक रूप ले सकता है, क्योंकि यहां ज़मीन के भीतर आग दहक रही है. यहां ज़मीन में प़डी दरारों से आग की लपटें निकलती हैं. यहां का क़ीमती कोयला हर पल राख के ढेर में बदल रहा है. काग़ज़ों में तो यहां की कई खदानें बदं प़डी हैं, लेकिन कोयला माफियाओं के लिए यहां आज भी काम बदस्तूर जारी है. अवैध खनन के कारण जहां मज़दूरों की जान खतरे में रहती है, वहीं अत्यधिक खनन से खनिजों के भंडार भी खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं, मगर राजनीतिज्ञों के संरक्षण के कारण यह धंधा बिना रोक-टोक के चल रहा है. इस धंधे ने लोगों को स़डक से उठाकर मंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया है. जनार्दन रेड्डी को ही लीजिए. सामान्य हेड कांस्टेबल चेंगा रेड्डी के घर में पैदा हुए जनार्दन रेड्डी ने 1995 में बेल्लारी में चिटफंड कंपनी खोली, लेकिन तीन साल बाद ही खुद को दिवालिया घोषित करके उसे बंद कर दिया. इसके बाद उन्होंने होटल और मीडिया बिजनेस शुरू किया, वहां भी उन्हें घाटा उठाना प़डा, लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव के व़क्त उनके दिन बदल गए. सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज के  बीच चुनावी म़ुकाबले में उन्होंने सुषमा स्वराज के लिए काम किया. सुषमा स्वराज को भले ही हार का मुंह देखना प़डा हो, लेकिन रेड्डी बंधुओं का भला हो गया. सियासत में आते ही उन्होंने खनन उद्योग में क़दम रखा और अवैध खनन के चलते वे दौलतमंद होते चले गए. जनार्दन रेड्डी और उनके साले श्रीनिवास रेड्डी ने राजनीतिज्ञों से संबंधों के कारण कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पैर जमा लिए. हालत यह हो गई कि उन्होंने बेल्लारी की लोहे की खानों को खाली कर डाला. कर्नाटक में अवैध खनन पर जारी लोकायुक्त की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2009-10 में ही रेड्डी बंधुओं ने 4635 करोड़ रुपये का अवैध खनन किया. रेड्डी बंधु भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं और जी जनार्दन रेड्डी के अलावा उनके भाई जी करुणाकर रेड्डी कर्नाटक की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. आंध्र प्रदेश के  पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का भी उन्हें संरक्षण हासिल था. यह रेड्डी बंधुओं का प्रभाव ही था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2009 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन के रोसैया सरकार द्वारा अनंतपुर ज़िले में अवैध खनन और धांधली के आरोप में रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के खिला़फ मामला दर्ज कराने के बावजूद सीबीआई ने उनके खिला़फ कार्रवाई करने में देर की. इसमें कोई दो राय नहीं कि सर्वदलीय सहमति और केंद्रीय खनन मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय खनन ब्यूरो और सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत के बग़ैर इतना ब़डा अवैध खनन का कारोबार चल ही नहीं सकता. केंद्र सरकार की नीतियों ने भी अवैध खनन को ब़ढावा देने का काम किया. 1993 में केंद्र की नरसिम्हाराव सरकार ने खनन को निजी और विदेशी पूंजी के हवाला कर दिया. नतीजतन, पोस्को से लेकर वेदांता जैसी कंपनियां भी क़ीमती खनिजों की लूट में शामिल हो गईं.</p>
<p style="text-align: justify;">सिद्धांतों का ढोल पीटने वाली भाजपा ने भी अवैध खनन को का़फी ब़ढावा दिया. भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखंड में गंगा में अवैध खनन जारी है. इसके खिला़फ आमरण अनशन पर बैठे स्वामी निगमानंद की कथित हत्या के बाद भी सरकार खनन पर रोक नहीं लगा पाई. स्वामी निगमानंद के गुरु शिवानंद का आरोप है कि खनन माफिया पार्टी फंड के लिए चंदे के रूप में एक मोटी रक़म देता है, इसलिए भाजपा सरकार ने उसे खनन की खुली छूट दे रखी है. अवैध खनन से जहां सरकारी खज़ाने को ऩुकसान होता है, वहीं इससे सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश पर भी विपरीत असर प़डता है. आदिवासियों से उनकी पैतृक ज़मीन छीनी जा रही है. आदिवासियों को अपनी पुश्तैनी जगह छो़डकर दूरदराज के इलाक़ों में पलायन करना प़ड रहा है. इससे उनके सामने रोज़गार का संकट पैदा हो गया है, उनकी सांस्कृतिक पहचान, उनके रीति-रिवाज भी खत्म होते जा रहे हैं. विकास के लिए खनन ज़रूरी है, लेकिन सुधार के नाम पर किए जा रहे अति खनन यानी अवैध खनन के दूरगामी नतीजे अच्छे नहीं होंगे. सरकार को चाहिए कि वह जनहित के मद्देनज़र अवैध खनन पर रोक लगाए, वरना वह दिन दूर नहीं, जब खानों से खनिजों के भंडार समय से पहले खत्म हो जाएंगे.</p>
<h3><strong>अवैध खनन रोकने की सरकारी क़वायद</strong><strong></strong></h3>
<p style="text-align: justify;">अवैध खनन रोकने की क़वायद का दावा करते हुए इसी साल सितंबर माह में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है. इसमें प्रावधान है कि कोयला खनन कंपनियों को हर साल अपने शुद्ध लाभ का 26 फीसदी और अन्य खनिज कंपनियों को रॉयल्टी के बराबर धनराशि ज़िलास्तरीय खनिज न्यास को देनी होगी. इस रक़म का इस्तेमाल स्थानीय लोगों के विकास के लिए किया जाएगा. केंद्रीय खान मंत्री दिनशा पटेल का कहना है कि खनन से पहले प्रभावित होने वाले लोगों से बात करना अनिवार्य होगा. अवैध खनन से संबंधित मामलों के निपटारे के लिए राज्य स्तर पर विशेष अदालतें स्थापित करने का प्रावधान किया गया है. देश के 60 ऐसे ज़िलों में राष्ट्रीय खनन नियामक प्राधिकरण और राष्ट्रीय खनिज ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे, जहां खनिज संसाधन काफ़ी प्रचुर मात्रा में हैं. इस विधेयक के आने से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी 4500 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,500 करोड़ रुपये हो जाएगी. विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि खनन कंपनियों को राज्य सरकार को कुल रॉयल्टी पर 10 फीसदी और केंद्र सरकार को 2.5 फीसदी का उपकर जमा करना होगा. सरकार का दावा है कि इस विधेयक में अवैध खनन रोकने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं. आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखकर ही इसे तैयार किया गया. इसके तहत कोयला कंपनियों के शुद्ध लाभ का 26 फीसदी हिस्सा प्रभावित लोगों के विकास के लिए खर्च किया जाएगा. यह विधेयक खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम 1957 की जगह लेगा.</p>
<div id="textchange"> <strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></div>
<div><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/illegal-mining-the-government-is-playing-role-of-agent.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/illegal-mining-the-government-is-playing-role-of-agent.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/12/illegal-mining-the-government-is-playing-role-of-agent.html</a></div>
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		<title>वनों में प्रकाश की किरण</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Dec 2011 02:22:59 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए [...]]]></description>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=29896" rel="attachment wp-att-29896"><img class="alignleft" title="वनों में प्रकाश की किरण" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/12/71-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.</p>
<blockquote><p>समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.</p></blockquote>
<h3 style="text-align: justify;">पृष्ठभूमि</h3>
<p style="text-align: justify;">जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.</p>
<h3 style="text-align: justify;">परिवर्तन की पहली लहर</h3>
<p style="text-align: justify;">पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.</p>
<h3 style="text-align: justify;">वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन</h3>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.</p>
<p style="text-align: justify;">तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.</p>
<p style="text-align: justify;">चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">कार्यान्वयन की चुनौतियां</h3>
<p style="text-align: justify;">आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.</p>
<h3 style="text-align: justify;">निष्कर्ष</h3>
<p style="text-align: justify;">वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>- प्रांजुल भंडारी</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)</strong></p>
<h2 style="text-align: justify;">साभार- चौथि दुनिया</h2>
<p><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html">http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html</a></p>
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		<title>किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!</title>
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		<pubDate>Sat, 10 Dec 2011 17:39:58 +0000</pubDate>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=29891" rel="attachment wp-att-29891"><img class="alignleft" title="किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/12/360x216x61-360x216.jpg.pagespeed.ic.skILeS5Ghn.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.</p>
<blockquote><p>पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.</p>
<p style="text-align: justify;">कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.</p>
<p style="text-align: justify;">भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.</p>
<p style="text-align: justify;">कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.</p>
<p style="text-align: justify;">बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<h2 style="text-align: justify;"><strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></h2>
<p style="text-align: justify;"><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html">http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html</a></p>
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		<title>‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्याना’साठी ११ नोव्हेंबरपासून आगळी मोहीम</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Nov 2011 03:49:51 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[ दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong> दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा<br />
सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन<br />
कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत<br />
प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/05102008011.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-7594" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/05102008011.jpg" alt="" width="378" height="284" /></a>फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. यावर मात करण्यासाठी आता राष्ट्रीय उद्यानाचे संचालक व मुख्य वनसंरक्षक सुनील लिमये यांनी एक नवी शक्कल लढवली आहे. त्यासाठी पर्यटकांचीच मदत घेण्याचा निर्णय घेतला असून सायकल वरून रपेट करणाऱ्या पर्यटकांनी पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा केल्यास त्यांना सायकल भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्याचप्रमाणे येत्या ११ नोव्हेंबरपासून ‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्यान’ ही मोहीम राबविली  जाणार असून त्यात कचरा टाकणाऱ्यांविरोधात दंडाची तरतूदही              करण्यात आली आहे.<br />
प्लास्टिकचा कचरा ही राष्ट्रीय उद्यानासाठी मोठीच डोकेदुखी ठरली आहे. दररोज उद्यानातून गोळा होणारे प्लास्टिक खूप मोठय़ा प्रमाणावर असते असे उद्यानाची सूत्रे स्वीकारल्यानंतर काही दिवसांतच लिमये यांच्या लक्षात आले. त्यानंतर त्यांनी कर्मचाऱ्यांच्या मदतीने काही महिन्यांसाठी प्लास्टिकच्या कचऱ्याचे मोजमाप करण्याचा निर्णय घेतला. त्यात समोर आलेली गेल्या पाच महिन्यांतील आकडेवारी धक्कादायक होती.<br />
दरदिवशी उद्यानातून गोळा होणारा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल २५० किलो एवढा होता. तर सुट्टीच्या दिवशी हा आकडा तिपटीने वाढायचा. कचरा गोळा करणे आणि त्याची आकडेवारी करणे याच कालखंडात पर्यटकांना विनंती करण्याची मोहीमही पार पडली. उद्यानात प्लास्टिकविरोधात नवीन फलक जागोजागी लावण्यात आले. त्यातून प्लास्टिकच्या होणाऱ्या दुष्परिणामांची माहितीही देण्यात आली. मात्र त्याने फारसा कोणताही फरक पडला नाही.<br />
अखेरीस हा प्लास्टिकचा भस्मासूर रोखण्यासाठी कडक धोरण अवलंबण्याचा आणि विद्यमान कायद्यातील तरतूदींचा आधार घेण्याचा निर्णय घेतला, असे सांगून संचालक सुनील लिमये म्हणाले की, वन्यजीव संरक्षण कायद्यातील कलम ३५ (६) नुसार, वन्यजीवनास धोका पोहोचवणारे कोणतेही कृत्य करणाऱ्यास तब्बल २५ हजार रुपये दंड आणि तीन महिने साध्या कैदेची तरतूद आहे. याच तरतुदीनुसार दंडात्मक कारवाईचा अधिकारही देण्यात आला आहे. तो आता वापरण्यात येणार आहे. त्यानुसार प्लास्टिक टाकताना पहिल्यांदा पकडले गेल्यास १०० रुपये आणि दुसऱ्यांदा पकडले गेल्यास ५०० रुपये दंड करण्यात येणार आहे. तिसऱ्यांदा पकडले गेल्यास त्या व्यक्तिविरुद्ध गुन्हा दाखल करून न्यायालयात खटला गुदरण्यात       येईल.  याशिवाय इतरही काही अभिनव मार्ग अवलंबण्यात येणार आहेत. गेल्या महिन्याभरापासून पर्यावरणप्रेमी उपक्रम म्हणून सायकल फेरी सुरु करण्यात आली आहे. त्यासाठीच्या सायकली वन विभागातर्फेच राष्ट्रीय उद्यानाच्या प्रवेशद्वारावर उपलब्ध करून दिल्या जातात. दोन तासांसाठी ४० रुपये भाडे आकारले जाते. या पर्यटकांना सायकल देताना ११ नोव्हेंबरपासून एक कापडी पिशवीही देण्यात येणार आहे. त्यांनी या फेरीदरम्यान पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा करून आणल्यास त्यांना भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेण्यात आला आहे. खरेतर हे उद्यान पर्यटकांसाठी आहे, त्यामुळे त्यांच्यावर कारवाई करण्याची इच्छा नव्हती. मात्र प्लास्टिकच्या भस्मासुराकडे पाहता असे लक्षात आले की, त्याला वेळीच आवर घातला नाही तर हा मानवजातीवरच उलटणार आहे. त्यामुळे अतिशय गांभीर्याने हा निर्णय घेतल्याचे लिमये यांनी सांगितले.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनायक परब</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong></strong>साभार- लोकसत्ता</p>
<p style="text-align: justify;"><a title=" लोकसत्ता" href="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=191453:2011-11-02-19-35-24&amp;catid=73:mahatwachya-baatmyaa&amp;Itemid=104" target="_blank">http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=191453:2011-11-02-19-35-24&amp;catid=73:mahatwachya-baatmyaa&amp;Itemid=104</a></p>
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		<pubDate>Wed, 28 Sep 2011 02:48:35 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[निसर्गात मोठय़ा प्रमाणात जैवविविधता आढळते. भूतलावरील प्रत्येक कोपर्‍यात सृष्टीचे हे अद्भूत रुप पाहता येते. त्यासाठी गरज असते ती फक्त धैर्य आणि निरिक्षणशक्तीची. रोजच्या धकाधकीच्या जीवनात सभोवती निसर्ग असूनही हे सौंदर्य आपल्याला अनुभवता येत नाही. त्यामुळे आनंदाचे बहुमोल क्षण आपल्या हातून निघून जातात. किर्लोस्कर आंतरराष्ट्रीय वसुंधरा चित्रपट महोत्सवाच्या निमित्ताने आयोजित &#8216;नेचर वॉक&#8217;मध्ये सहभागी झालेल्या रत्नागिरीकरांच्या मनात [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;"><img class="alignleft" style="border: 0pt none;" src="http://globalmarathi.com/20110925/images/5298142674199447688/5356280712332221626_Org.jpg" border="0" alt="" width="442" height="196" /></div>
<p style="text-align: justify;">निसर्गात  मोठय़ा प्रमाणात जैवविविधता आढळते. भूतलावरील प्रत्येक कोपर्‍यात सृष्टीचे  हे अद्भूत रुप पाहता येते. त्यासाठी गरज असते ती फक्त धैर्य आणि  निरिक्षणशक्तीची. रोजच्या धकाधकीच्या जीवनात सभोवती निसर्ग असूनही हे  सौंदर्य आपल्याला अनुभवता येत नाही. त्यामुळे आनंदाचे बहुमोल क्षण आपल्या  हातून निघून जातात. किर्लोस्कर आंतरराष्ट्रीय वसुंधरा चित्रपट महोत्सवाच्या  निमित्ताने आयोजित &#8216;नेचर वॉक&#8217;मध्ये सहभागी झालेल्या रत्नागिरीकरांच्या  मनात हीच भावना असावी.</p>
<p style="text-align: justify;">निसर्गाचा वरदहस्त असलेल्या या जिल्ह्यात  निसर्गप्रेमींच्या प्रयत्नाने हा महोत्सव होत आहे. चित्रपट महोत्सव जरी  असला तरी त्यानिमित्ताने विविध उपक्रमांचे आयोजन करण्यात येत आहे. त्याचाच  एक भाग म्हणून महोत्सव काळात सकाळी सात वाजता &#8216;नेचर वॉक&#8217;चे आयोजन करून  निसर्गाच्या सान्निध्यात त्याचे पैलू जाणून घेण्याची संधी निसर्गप्रेमींना  उपलब्ध झाली आहे. शुक्रवारी पक्ष्यांच्या दुनियेबद्दल जाणून घेतल्यानंतर  शनिवारी कातळावरील जैवविविधता जाणून घेण्यासाठी डॉ.मधुकर बाचुळकर  यांच्यासमवेत &#8216;नेचर वॉक&#8217;चे आयोजन करण्यात आले होते.</p>
<p style="text-align: justify;">रत्नागिरी  शहराच्या बाहेरील बाजूस पावस रस्त्यावरील मोकळ्या पठाराची यासाठी निवड  करण्यात आली होती. त्या ठिकाणी जातांना रस्त्यात भाटय़े समुद्र किनार्‍याचे  दर्शन घडले. खाडीवरील पूल ओलांडतांना पश्चिमेकडील समुद्रकिनार्‍याकडे  फेसाळत येणार्‍या शुभ्र लाटा आणि पूर्वेकडे कोवळ्या सुर्यकिरणात चमकणारे  खाडीतील &#8216;सोनेरी&#8217; पाणी असे विलोभनीय दृष्य पाहतांना समुद्रावरून येणार्‍या  गार वार्‍याचा स्पर्श मनात आनंदाची शिरशिरी निर्माण करीत होता. अशा  स्वर्गीय आनंदाला आपण दररोज मुकतो&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8230; या नेचरवॉकसाठी शुक्रवारी  दुपारच्या सत्रात झालेल्या व्याख्यानाने चांगली वातावरण निर्मिती केली  होती. या व्याख्यानात डॉ.बाचुळकरांनी पश्चिम घाट आणि विशेषत: कोकणातील  जैवविविधतेविषयी सविस्तर आणि तेवढीच उद्बोधक माहिती दिली. जगातील ५०  टक्क्यापेक्षा जास्त जैवविविधता विषुववृत्तीय परिसरातील केवळ ७ टक्के  भूभागावर आहे. एकटय़ा मदागास्कर देशात वनस्पतींच्या १२ हजार प्रजाती आढळतात  आणि त्यापैकी ८ हजार इतरत्र कुठेही आढळत नाही. ग्लोबल वॉर्मिंगमुळे काही  वर्षांनी या देशाचे अस्तित्त्वच धोक्यात येणार आहे.</p>
<p style="text-align: justify;">जगात वनस्पती  आणि प्राण्यांच्या एकूण १५ ते १६ लाख प्रजाती आहेत. त्यापैकी केवळ १८ टक्के  प्रजातींची माहिती अभ्यासाअंती प्राप्त झाली आहे. त्यात २ लाख ५० हजार ७५०  सपुष्प आणि १ लाख ३० हजार अपुष्प वनस्पतींचा समावेश आहे. जगात सर्वाधिक  जैवविविधता आढळणारे १२ देश आहेत. त्यात भारताचा सहावा क्रमांक लागतो.  युरोपातील एकाही देशाचा त्यात समावेश नाही तर दक्षिण अमेरीकेतील देशांची  संख्या सर्वाधिक आहे. भारतात जगात आढळणार्‍या एकूण जैवविविधतेपैकी ६.७  टक्के प्रजाती आढळतात. त्यात ८१ हजार प्राणी आणि ४७ हजार ५२० वनस्पतींच्या  प्रजातींचा समावेश आहे. त्यात धान्य ५१, फळ १०४, मसाले २७, भाज्या ५५  (जंगलात निवास करणार्‍यांकडून वापरल्या जाणार्‍या प्रजाती आणखी वेगळ्या असू  शकतात.), तेलबिया १२ आणि वनौषधींच्या ८ हजार प्रजातींचा समावेश आहे. कोकण  वनौषधींच्या बाबतीत समृद्ध आहे. या ८ हजार पैकी १२० नष्ट होण्याच्या  मार्गावर असून ३० वनस्पतींच्या वापरावर शासनाने बंदी आणली आहे. भारतातील  ईशान्य हिमालय आणि पश्चिम घाटात सर्वाधिक जैवविविधता आढळते. प.घाटातील ४९०  वनस्पतींपैकी ३०८ प्रजाती इतरत्र कुठेच आढळत नाही. अशी समृद्ध जैवविविधता  अभ्यसतांना एका अभ्यासानुसार जगात रोज एक वनस्पती नष्ट होत असल्याचे  अभ्यासकांच्या निदर्शनास आले आहे. ही जैवविविधता जपण्यासाठी त्याचा अभ्यास  होणे आणि नागरिकांनी त्यासाठी प्रयत्न करणे आवश्यक असल्याचे बाचुळकरांनी  सांगितले.</p>
<p style="text-align: justify;">&#8230;वॉकचे ठिकाण सात किलोमीटर अंतरावर असूनही निसर्गप्रेमी  वेळेवर एकत्रित झाले होते. बदलता निसर्ग, त्याच्या लहरीपणामुळे निर्माण  होणार्‍या समस्या यामुळे हळूहळू त्याच्याविषयीची जागरूकता वाढत असल्याचा  सूर त्या ठिकाणी उमटला. खरं तर निसर्ग नव्हे तर माणूस बदललाय, तो निसर्गाला  ओरबाडायला लागलायं आणि त्याची प्रतिक्रीया निसर्गाकडून होतेय&#8230;चर्चेतील  आणखी एक विचार&#8230;निसर्गाविषयीच्या विचारांची अशी देवाणघेवाण होत असतांनाच  नेचर वॉकला सुरुवात झाली.</p>
<p style="text-align: justify;">समोरच्या विस्तीर्ण कातळावर पिवळ्या  फुलांचा गालिचा पसरलेला दिसत होता. मधूनच जांभळ्या रंगाची रानफुले डोकं वर  काढून जणू आपल्या अस्तित्त्वाची जाणीव करून देत होती. फुलांच्या या नाजूक  विश्वाकडे पाहतांना मैदानावर मुक्तपणे बागडणार्‍या शाळकरी चिमुकल्यांचा  घोळका नजरेसमोर सहजच आला.</p>
<p style="text-align: justify;">&#8216;आईच्या मांडीवर बसुनी झोके घ्यावे गावी गाणी<br />
याहुनि ठावे काय तियेला साध्या भोळ्या फुलराणीला&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">असं  फुलांचं नाजूक विश्व जाणून घेतांना होणारा आनंद निराळाच असतो. शब्दात  त्याचं वर्णन शक्य नाही. शास्त्र त्यांची माहिती देईल पण त्यांना  जपण्यासाठी शास्त्रासोबत मनाची सौंदर्यदृष्टी आणि निसर्गाबद्दलची  संवेदनशिलताच हवी.</p>
<p style="text-align: justify;">&#8216;तुझी गोजिरी शिकुन भाषा गोष्टी तुजल्या सांगाव्या<br />
तुझे शिकावे खेळ आणखी जादू तुजल्या शिकवाव्या&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">त्या  विश्वात रममाण होऊन स्वर्गीय आनंद घेण्यासाठी ही भावना मनात निर्माण होणं  महत्त्वाचं आहे. फुलांचं &#8216;स्ट्रक्चर&#8217; समजावून घेतांना त्याचं हे सहज-सोपं  आणि तेवढच अवखळ नी नाजूक &#8216;नेचर&#8217; समजाऊन घेतलं तर मिळणारा आनंद निश्चित  द्विगुणीत होईल आणि त्यातूनच पर्यावरण रक्षणाची भावना आणखी घट्टपणे मनात  रुजेल&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">&#8230;डॉ.बाचूळकर यांनी कोकणात आढळणार्‍या विविध वनस्पती  प्रजातींची माहिती दिली. विशेषत: ऑर्कीडचे आढळणारे प्रकार, त्यांचे परागण  याविषयी ते भरभरून बोलले. पावस परिसरातील कातळावर आढळणार्‍या वनस्पतींचे  जिवनमान केवळ १५-२० दिवसाचे असते. तो कालावधी झाल्यानंतर नवी वनस्पती त्या  ठिकाणी उगवते. कुठली वनस्पती केव्हा उगवावी याचा क्रम आणि वेळ निसर्गाने  निश्चित केलेली असते. डॉ.बाचूळकरांनी दिलेल्या माहितीमुळे छान वातावरण  निर्मिती झाली. विशेषत: प्रत्येक प्रकारच्या ऑर्किडचे परागण एकाच विशिष्ट  प्रकारच्या किटकापासून होते हे ऐकून निसर्गाचे कौतुक वाटले.</p>
<p style="text-align: justify;">त्यांच्यासोबत  कातळावर भटकंती करताना पिवळ्या फुलांचे स्मितीया, आयुर्वेदिक उपयुक्ततेचे  कुरडू आणि बला, मेंदीच्या कुळातील पाणलवक, बारीक रेषेदार चिमणचारा, औषधी  टाकळा, किटभक्षी ब्लँडरवर्ट आणि ड्रासेरा, भोपळ्याच्या कुळातलं मिलोफ्रीया,  उग्र वास असणारं विमिया, औषधी गुण असणार्‍या विष्णूप्रांता अशा विविध  प्रकारच्या वनस्पतींच्या प्रजातिंविषयी बाचूळकर यांनी माहिती दिली.  उपस्थितांपैकी काही उत्साही मंडळी कातळावरील एखादे फुल, गवत किंवा रोपटे  आणून दाखवत होती आणि डॉ.बाचूळकर त्याची माहिती सांगत होते.</p>
<p style="text-align: justify;">माहितीचा  काही भाग अत्यंत रोचक असा होता. ब्लँडरवर्ट पाण्याच्या प्रवाहातील किटक  पकडतात, ड्रासेराच्या खोडावर बारीक उन्हात चमकणारे केस असल्याने किटक  त्याकडे आकर्षीत होऊन चिकटतात,तुतारीच्या फुलाची एका रात्रीत लांबी वाढते,  विमिया परिसरात लावले तर त्याच्या उग्र वासाने किटक येणार नाही, अशी अत्यंत  उपयुक्त आणि निसर्गाचा चमत्कार स्पष्ट कराणारी माहिती मिळाल्यामुळे ही  निसर्गयात्रादेखील आनंददायी ठरली. घराकडे पतरतांना</p>
<p style="text-align: justify;">&#8216;तुझ्या नृत्याचा उल्लास सदाबहर<br />
वृक्षवेलींच्या माथ्यावर<br />
वसणार्‍या ढगावर<br />
सुकदुकीचा विसर&#8217;</p>
<p style="text-align: justify;">या  ओळी मनात होत्या. हा निसर्ग जपायला हवा हीच भावना प्रत्येकाची असावी. हीच  जाणीव निर्माण करण्यासाठी कदाचीत या महोत्सवाचे आयोजन असावे.</p>
<p style="text-align: justify;">-डॉ.किरण मोघे</p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>साभार- ग्लोबल मरठी</strong></h2>
<p style="text-align: justify;"><a class="aligncenter" title="http://globalmarathi.com/20110925/4832047505703110914.htm" href="http://globalmarathi.com/20110925/4832047505703110914.htm" target="_blank">http://globalmarathi.com/20110925/4832047505703110914.htm</a></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>उत्तर प्रदेश: हर तरफ पानी ही पानी&#8230;.!</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Sep 2011 16:23:56 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[बाढ़ और पानी से शहरी जनता हलकान है, वहीं किसान परेशान. किसी के खेत पानी में डूब गए हैं तो किसी का घर-मकान और राशन-पानी बाढ़ लील गई. क़रीब 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. लोग छतों पर तिरपाल लगाकर, स्कूलों के बरामदों में, कुछ नहीं तो खुले में ही जीवनयापन कर रहे हैं. बाढ़ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table id="border-table" border="0" cellpadding="0" width="100%">
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<h3><a href="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/09/7-c.jpg"><img class="alignleft" title="बाढ़ और पानी से शहरी जनता हलकान है, वहीं किसान परेशान. किसी के खेत पानी में डूब गए हैं तो किसी का घर-मकान और राशन-पानी बाढ़ लील गई. क़रीब 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. लोग छतों पर तिरपाल लगाकर, स्कूलों के बरामदों में, कुछ नहीं तो खुले में ही जीवनयापन कर रहे हैं. बाढ़ के कहर ने सूखे से बेहाल हुए किसानों की कमर तोड़कर रख दी है. शारदा एवं घाघरा आदि नदियों में बनबसा एवं शारदा बैराज से लाखों क्यूसेक पानी छोड़े जाने से लखीमपुर खीरी, सीतापुर, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, फैज़ाबाद एवं अंबेडकर नगर आदि ज़िलों में बाढ़ ने विकराल रूप धारण कर लिया है. गंगा, यमुना, रामगंगा एवं कोसी आदि नदियों में उफान के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक गंगा, यमुना, चौका एवं गोबरहिया आदि नदियों के किनारे बसे शहरों और गांवों की हालत ख़राब है. बाढ़ से निपटने और राहत कार्यों के लिए राज्य सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय आपदा राहत बल की टुकड़ियां भेजने का आग्रह किया था, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया. बिजनौर में बाकरपुर-यूसुफपुर बांध टूटने के कारण लगभग सौ गांवों में पानी भर गया, वहीं बिजनौर, हरिद्वार एवं रामपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-24 पर पानी बह रहा है. इससे लखनऊ-दिल्ली राजमार्ग पर यातायात प्रभावित हुआ. बनबसा बैराज से अचानक चार लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने से गोंडा एवं बाराबंकी ज़िले के क़रीब 200 गांव प्रभावित हुए. बहराइच में घाघरा के तटबंध के पास बसे कायमपुर में तेज बहाव के चलते दो लोगों की मौत हो गई. घाघरा का जलस्तर ख़तरे के निशान से 65 सेमी ऊपर पहुंच गया है. सरयू और घाघरा ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही हैं. गोंडा ज़िले के कर्नलगंज और तरबगंज तहसील क्षेत्रों के क़रीब 104 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं. ज़िला प्रशासन ने लोगों से सुरक्षित स्थानों पर चले जाने को कहा है. अकेले गोंडा ज़िले में दो लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. घाघरा के कटान से कई घर नदी में समा चुके हैं. बहराइच में बाढ़ के कारण कैसरगंज के कई गांव पानी से घिरे हैं, जिनकी कुल आबादी 85,373 है. इसके अलावा खासेपुर, अहाता, ढपाली पुरवा एवं गोड़हिया के दो दर्जन गांवों में भी पानी भर गया. राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव और राहत आयुक्त के के सिन्हा ने बताया कि मुरादाबाद और गोंडा की हालत ज़्यादा ख़राब है. केंद्र से एनडीआरएफ की टुकड़ियां भेजने का आग्रह किया गया है, जिन्हें अभी फिलहाल गोंडा और मुरादाबाद में छह-छह नावों के साथ तैनात किया जाएगा. बहराइच और गोरखपुर में पीएसी के जवान बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए तैनात हैं. उत्तराखंड के भीम गोडा बांध से 10 हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाने से बिजनौर ज़िले की मालन नदी उफना गई है, वहीं बाकरपुर-यूसुफपुर बांध टूट गया. बिजनौर-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी पानी आ गया, जिसके चलते उसे बंद करना पड़ा. कालागढ़ बांध से छोड़े गए पानी के चलते रामगंगा का जलस्तर ख़तरे के निशान से ऊपर चला गया, जिससे बिजनौर एवं मुरादाबाद ज़िले के लगभग सौ गांव प्रभावित हुए. रामपुर में कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने से क़रीब 22 गांव बाढ़ की चपेट में हैं. हरिद्वार से गंगा में दो लाख 90 हज़ार क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद मुज़फ़्फ़्रनगर की जानसठ तहसील के कई गांव बाढ़ की चपेट में आ गए. हरियाणा के ताजवाला बैराज से यमुना में क़रीब सवा छह लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने से भी ज़िले के तटवर्ती गांवों में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई. बदायूं में भी बाढ़ का ख़तरा बढ़ गया है. प्रशासन ने सभी 13 बाढ़ चौकियों को अलर्ट कर दिया है. लखीमपुर खीरी में शारदा नदी का तांडव चल रहा है. पीलीभीत-बस्ती मार्ग अवरुद्ध हो गया है. पहाड़ों पर लगातार बारिश और डैमों से पानी छोड़े जाने से शाहजहांपुर की सभी नदियां उफना गई हैं. रामगंगा एवं गंगा नदी का जलस्तर बढ़ जाने से निचले ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति हो गई है. गांवों में भी नदियों का पानी घुसना शुरू हो गया. भारी वर्षा एवं किच्छा बैराज से छोड़े गए पानी के चलते बरेली की मीरगंज तहसील के एक सौ से अधिक गांव जलमग्न हो गए और सुल्तानपुर गांव तो पूरी तरह नदी में समा गया. प्रशासन ने 38 गांवों के जलमग्न होने की पुष्टि की है. सीतापुर में गांजरी क्षेत्र की नदियों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है. बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोग घर छोड़कर पलायन कर गए हैं. लखीमपुर खीरी में मूसलाधार बारिश के चलते उफनाई नदियां अपनी जगह छोड़कर बस्ती में घुसने लगी हैं. बाढ़ की विकरालता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मुद्दा राज्यसभा तक पहुंच गया. भाजपा के कलराज मिश्र ने कहा कि केंद्र सरकार को बाढ़ राहत कार्यों में फौरन अपना योगदान करना चाहिए. भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि राज्य के 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. मुख्यमंत्री मायावती ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत-बचाव कार्यों में तेजी लाने और पीड़ितों को समुचित चिकित्सा सुविधाएं मुहैय्या कराने के निर्देश दिए हैं. वहीं शहरी क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए प्रभावी क़दम उठाने को कहा गया है." src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/09/7-c-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a></h3>
<p style="text-align: justify;">बाढ़ और पानी से शहरी जनता हलकान है, वहीं किसान परेशान. किसी के खेत  पानी में डूब गए हैं तो किसी का घर-मकान और राशन-पानी बाढ़ लील गई. क़रीब  24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. लोग छतों पर तिरपाल लगाकर, स्कूलों के  बरामदों में, कुछ नहीं तो खुले में ही जीवनयापन कर रहे हैं. बाढ़ के कहर ने  सूखे से बेहाल हुए किसानों की कमर तोड़कर रख दी है. शारदा एवं घाघरा आदि  नदियों में बनबसा एवं शारदा बैराज से लाखों क्यूसेक पानी छोड़े जाने से  लखीमपुर खीरी, सीतापुर, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, फैज़ाबाद एवं अंबेडकर नगर  आदि ज़िलों में बाढ़ ने विकराल रूप धारण कर लिया है.</p>
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<p style="text-align: justify;">भाजपा के मुख्तार अब्बास  नकवी ने कहा कि राज्य के 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं. मुख्यमंत्री  मायावती ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत-बचाव कार्यों में तेजी लाने  और पीड़ितों को समुचित चिकित्सा सुविधाएं मुहैय्या कराने के निर्देश दिए  हैं. वहीं शहरी क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति से निपटने के लिए प्रभावी  क़दम उठाने को कहा गया है.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">गंगा, यमुना, रामगंगा एवं कोसी आदि नदियों में उफान के कारण पश्चिमी  उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक गंगा, यमुना, चौका एवं  गोबरहिया आदि नदियों के किनारे बसे शहरों और गांवों की हालत ख़राब है. बाढ़  से निपटने और राहत कार्यों के लिए राज्य सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय  के अधीन कार्यरत राष्ट्रीय आपदा राहत बल की टुकड़ियां भेजने का आग्रह किया  था, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया. बिजनौर में बाकरपुर-यूसुफपुर बांध  टूटने के कारण लगभग सौ गांवों में पानी भर गया, वहीं बिजनौर, हरिद्वार एवं  रामपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-24 पर पानी बह रहा है. इससे  लखनऊ-दिल्ली राजमार्ग पर यातायात प्रभावित हुआ. बनबसा बैराज से अचानक चार  लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने से गोंडा एवं बाराबंकी ज़िले के क़रीब 200  गांव प्रभावित हुए. बहराइच में घाघरा के तटबंध के पास बसे कायमपुर में तेज  बहाव के चलते दो लोगों की मौत हो गई. घाघरा का जलस्तर ख़तरे के निशान से 65  सेमी ऊपर पहुंच गया है. सरयू और घाघरा ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही हैं.  गोंडा ज़िले के कर्नलगंज और तरबगंज तहसील क्षेत्रों के क़रीब 104 गांव बाढ़  से प्रभावित हैं. ज़िला प्रशासन ने लोगों से सुरक्षित स्थानों पर चले जाने  को कहा है. अकेले गोंडा ज़िले में दो लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित  हैं. घाघरा के कटान से कई घर नदी में समा चुके हैं. बहराइच में बाढ़ के  कारण कैसरगंज के कई गांव पानी से घिरे हैं, जिनकी कुल आबादी 85,373 है.  इसके अलावा खासेपुर, अहाता, ढपाली पुरवा एवं गोड़हिया के दो दर्जन गांवों  में भी पानी भर गया. राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव और राहत आयुक्त के के  सिन्हा ने बताया कि मुरादाबाद और गोंडा की हालत ज़्यादा ख़राब है. केंद्र  से एनडीआरएफ की टुकड़ियां भेजने का आग्रह किया गया है, जिन्हें अभी फिलहाल  गोंडा और मुरादाबाद में छह-छह नावों के साथ तैनात किया जाएगा. बहराइच और  गोरखपुर में पीएसी के जवान बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए तैनात हैं.  उत्तराखंड के भीम गोडा बांध से 10 हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाने से बिजनौर  ज़िले की मालन नदी उफना गई है, वहीं बाकरपुर-यूसुफपुर बांध टूट गया.  बिजनौर-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी पानी आ गया, जिसके चलते उसे बंद  करना पड़ा. कालागढ़ बांध से छोड़े गए पानी के चलते रामगंगा का जलस्तर ख़तरे  के निशान से ऊपर चला गया, जिससे बिजनौर एवं मुरादाबाद ज़िले के लगभग सौ  गांव प्रभावित हुए. रामपुर में कोसी नदी का जलस्तर बढ़ने से क़रीब 22 गांव  बाढ़ की चपेट में हैं. हरिद्वार से गंगा में दो लाख 90 हज़ार क्यूसेक पानी  छोड़े जाने के बाद मुज़फ़्फ़्रनगर की जानसठ तहसील के कई गांव बाढ़ की चपेट  में आ गए. हरियाणा के ताजवाला बैराज से यमुना में क़रीब सवा छह लाख क्यूसेक  पानी छोड़े जाने से भी ज़िले के तटवर्ती गांवों में बाढ़ की स्थिति पैदा  हो गई. बदायूं में भी बाढ़ का ख़तरा बढ़ गया है. प्रशासन ने सभी 13 बाढ़  चौकियों को अलर्ट कर दिया है. लखीमपुर खीरी में शारदा नदी का तांडव चल रहा  है. पीलीभीत-बस्ती मार्ग अवरुद्ध हो गया है. पहाड़ों पर लगातार बारिश और  डैमों से पानी छोड़े जाने से शाहजहांपुर की सभी नदियां उफना गई हैं.  रामगंगा एवं गंगा नदी का जलस्तर बढ़ जाने से निचले ग्रामीण क्षेत्रों में  बाढ़ जैसी स्थिति हो गई है. गांवों में भी नदियों का पानी घुसना शुरू हो  गया. भारी वर्षा एवं किच्छा बैराज से छोड़े गए पानी के चलते बरेली की  मीरगंज तहसील के एक सौ से अधिक गांव जलमग्न हो गए और सुल्तानपुर गांव तो  पूरी तरह नदी में समा गया. प्रशासन ने 38 गांवों के जलमग्न होने की पुष्टि  की है. सीतापुर में गांजरी क्षेत्र की नदियों का जलस्तर बढ़ता जा रहा है.  बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोग घर छोड़कर पलायन कर गए हैं. लखीमपुर खीरी  में मूसलाधार बारिश के चलते उफनाई नदियां अपनी जगह छोड़कर बस्ती में घुसने  लगी हैं. बाढ़ की विकरालता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह  मुद्दा राज्यसभा तक पहुंच गया. भाजपा के कलराज मिश्र ने कहा कि केंद्र  सरकार को बाढ़ राहत कार्यों में फौरन अपना योगदान करना चाहिए. भाजपा के  मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि राज्य के 24 ज़िले बाढ़ से प्रभावित हैं.  मुख्यमंत्री मायावती ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत-बचाव कार्यों में  तेजी लाने और पीड़ितों को समुचित चिकित्सा सुविधाएं मुहैय्या कराने के  निर्देश दिए हैं. वहीं शहरी क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति से निपटने के  लिए प्रभावी क़दम उठाने को कहा गया है.</p>
<hr />
<h3>साभार- चौथी दुनिया</h3>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.chauthiduniya.com/2011/09/uttar-pradesh-everywhere-only-water-and-water.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/09/uttar-pradesh-everywhere-only-water-and-water.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/09/uttar-pradesh-everywhere-only-water-and-water.html</a></p>
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		<title>बिहारः बाढ़ का क़हर, पीडि़त भगवान भरोसे&#8230;.!</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Sep 2011 16:05:16 +0000</pubDate>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/09/71.jpg"><img class="alignleft" title="बाढ का क़हर : पीडित भगवान भरोसे" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/09/71-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>लगातार  बारिश और नेपाल द्वारा पानी छोड़े जाने के कारण उत्तर बिहार के लोग बाढ़  से बुरी तरह प्रभावित हैं. शहरी इलाक़ों में बाढ़ की स्थिति भयावह नहीं दिख  रही है, लेकिन मधुबनी, समस्तीपुर, खगड़िया, बेगूसराय, सहरसा, सुपौल,  मधेपुरा, अररिया, भागलपुर, कटिहार, मुंगेर एवं पूर्णियां सहित कई ज़िले  बाढ़ की चपेट में हैं. प्रभावित लोग तटबंधों और अन्य ऊंची जगहों पर शरण ले  रहे हैं. राज्य सरकार द्वारा समुचित राहत की कोई व्यवस्था नहीं है.  शासन-प्रशासन की बेरुखी के कारण दर्जनों गांव के लोगों के समक्ष रोटी की  समस्या उत्पन्न हो गई है. भूखे बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है. लोग  मवेशियों के लिए चारा जुटाने के लिए कोई भी जोख़िम उठाने से नहीं हिचक रहे  हैं. बावजूद इसके प्रशासन कई ज़िलों में बाढ़ की स्थिति सामान्य बता रहा  है.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अररिया, भागलपुर एवं मुंगेर  सहित कई अन्य जगहों पर भी बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. बावजूद इसके  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि स्थिति सामान्य है, निश्चित रूप से  जले पर नमक छिड़कने के समान है. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के परिणामस्वरूप  अगर बाढ़ प्रभावित लोग उग्र रूप धारण करने को मजबूर हो जाएं तो सरकारी  अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के मुखिया को भी आश्चर्य में नहीं पड़ना  चाहिए.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">प्रभावित ज़िलों में भी कई स्थानों पर राहत सामग्री नहीं पहुंच सकी है,  जिससे लोगों की परेशानी बढ़ गई है. स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका इस बार  संदेह के घेरे में है, क्योंकि कुछ जगहों पर उन्होंने राहत शिविर का बैनर  तो लगा दिया है, लेकिन राहत के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है. मुट्ठी भर  राहत देकर स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रशासन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ  ली है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रभावित इलाक़ों का हवाई सर्वेक्षण  करने के बाद बाढ़ की स्थिति सामान्य बताते हुए कहा कि वहां राहत सामग्री के  वितरण के साथ-साथ आवागमन के लिए पर्याप्त नौकाएं उपलब्ध कराने का आदेश  दिया गया है. इस आदेश का अधिकारियों पर कितना असर हुआ और यह कितना कारगर  होगा, यह तो व़क्त बताएगा, लेकिन जब चौथी दुनिया द्वारा प्रभावित इलाक़ों  का जायज़ा लिया गया तो प्रमाणित हो गया कि लोग शासन-प्रशासन से अधिक भगवान  पर भरोसा करने को मजबूर हैं. ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार द्वारा बाढ़  प्रभावित इलाक़ों में पर्याप्त नौकाएं उपलब्ध कराने का दावा तो किया गया,  लेकिन हक़ीक़त कुछ और है. नौकाएं न होने के कारण लोग जान जोख़िम में डालकर  यहां-वहां आने-जाने के लिए मजबूर हैं. अब तक दो दर्जन से अधिक लोग इस चक्कर  में डूबकर अपनी जान गंवा चुके हैं. कई इलाक़ों में नावों की व्यवस्था तो  की गई है, लेकिन वे इतनी जर्जर हैं कि लोग उन पर सवारी करने से बच रहे हैं.  कोसी, बागमती, काली कोसी एवं करेह सहित कई नदियों के जलस्तर में अत्यधिक  वृद्वि न होने से कुछ इलाक़े पूर्ण रूप से और कुछ आंशिक रूप से प्रभावित  हुए हैं,  लेकिन गंगा एवं बूढ़ी गंडक की उफनती धार ने कई नए इलाक़ों में  कोहराम मचा दिया है. बाढ़ आने के पूर्व एकत्र किए गए खाद्यान्न से ही कई  परिवार किसी तरह अपनी भूख मिटा रहे हैं. अब जबकि खाद्यान्न लगभग ख़त्म होने  को है, इसलिए बाढ़ का जायज़ा लेने पहुंच रहे प्रशासनिक अधिकारियों को  प्रभावित लोगों द्वारा खदेड़ा जा रहा है. बेगूसराय ज़िले में गंगा नदी में  आई भयंकर बाढ़ के कारण मटिहानी, बलिया, शाम्हो एवं सनहा सहित कई अन्य  इलाक़ों के लोग तबाही झेलने को मजबूर हैं. सनहा गोरगामा बांध के कई हिस्सों  में दरार पड़ने के कारण कई इलाक़ों में दहशत का माहौल है. गंगा की दहाड़  से सहमे लोगों के साथ-साथ प्रशासन द्वारा लगातार स्थिति पर नज़र रखी जा रही  है. दियारा इलाक़े में रहने वाले लोगों के लिए जान बचाना मुश्किल होता जा  रहा है. कई ऐसे प्रभावित गांव हैं, जहां अभी तक राहत वितरण की बात तो दूर,  प्रशासनिक अधिकारी जायज़ा लेने भी नहीं पहुंचे हैं. समस्तीपुर ज़िले के  मोहिउद्दीनगर एवं मोहनपुर सहित पटोरी प्रखंड की कई पंचायतों में सैलाब ने  लोगों की ज़िंदगी पटरी से उतार दी है. घरेलू सामान और मवेशियों के साथ  इलाक़े से पलायन कर चुके लोग सिर छिपाने के लिए इधर-इधर भटक रहे हैं.  खगड़िया ज़िले के 59 गांवों में बाढ़ का कहर जारी है. गोगरी अनुमंडल के  बाढ़ प्रभावित लोगों में प्रशासन के प्रति खासी नाराज़गी देखी जा रही है.  राहत से वंचित लोगों का कहना है कि राहत वितरण के नाम पर जमकर धांधली बरती  जा रही है. अभी तक नाव की व्यवस्था नहीं की गई है. कटघरा निवासी विनोद राय,  सुमन राय, गौतम राय एवं बिनोद महतो और भूड़िया गांव निवासी अवधेश यादव एवं  सूखो यादव आदि ने बताया कि सरकारी स्तर से नाव उपलब्ध न कराए जाने के कारण  लोगों को निजी नावों पर सवारी करनी पड़ रही है. अधिक कमाई की चाहत में  नाविकों द्वारा क्षमता से अधिक लोगों को नाव पर लादने के कारण हर समय  दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. खगड़िया प्रखंड के रहीमपुर नया टोला, नगर  परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 24 एवं 26 सहित अन्य इलाक़ों में भी कमोबेश  यही स्थिति देखने को मिल रही है. नाव न होने के कारण लोग नाद (मवेशियों का  भोजन पात्र) या अन्य साधनों का सहारा लेकर आ-जा रहे हैं. खगड़िया से होकर  गुजरने वाले एनएच- 31 एवं रेलवे ब्रिज के पास बूढ़ी गंडक ख़तरे के निशान से  ऊपर बह रही है. नतीजतन राष्ट्रीय राजमार्ग-31 पर भी ख़तरा मंडराने लगा है.  यह अलग बात है कि कार्यपालक अभियंता का कहना है कि एनएच-31 से पानी पांच  फीट नीचे है. कोसी नदी भी बलतारा, बसुआ और कुरसैला में खतरे के निशान से  ऊपर बह रही है. गोगरी-नगरपाड़ा तटबंध एवं बदला-नगरपाड़ा तटबंध के कई  हिस्सों पर बूढ़ी गंडक नदी का दबाव बना हुआ है, जबकि नारायणपुर लिंक बांध  पर भी ख़तरा उत्पन्न हो गया है. गोगरी के साथ-साथ परबत्ता प्रखंड में गंगा  एवं बूढ़ी गंडक ने जनजीवन प्रभावित कर दिया है. बन्नी, बौरना एवं गोगरी  पंचायत सहित कई अन्य इलाक़ों में बाढ़ की स्थिति भयावह बनी हुई है. मधुआ  गांव के पास बूढ़ी गंडक नदी का पानी बाएं तटबंध को भेद चुका है. परबत्ता  प्रखंड के सौढ़ उत्तरी एवं सलारपुर पंचायत के लोगों का जीना मुहाल हो गया  है. सुपौल, मधेपुरा एवं कटिहार में भी बाढ़ का कहर जारी है. मधेपुरा ज़िले  के पास एनएच-107 पर बना बलुआहा डायवर्सन ध्वस्त हो जाने के कारण तीन ज़िलों  का पटना मुख्यालय से सड़क संपर्क भंग हो गया है. खगड़िया-बेलदौर के बीच  बना डुमरी पुल पहले ही ध्वस्त होने के कारण मधेपुरा, सहरसा एवं सुपौल के  लोगों को पूर्णियां होकर पटना पहुंचना पड़ता था. मधेपुरा ज़िले के चौसा  प्रखंड की आधा दर्जन पंचायतें पूरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं. सुपौल ज़िले  की कई पंचायतों में बाढ़ का पानी कहर बरपा रहा है. यहां के लोगों के लिए  राहत की बात यह है कि अमहा के समीप नहर टूट जाने से पानी कम होने लगा है.  बिहार-बंगाल सीमा के समीप बहने वाली नागर नदी के जलस्तर में वृद्वि होने के  कारण कटिहार ज़िले के बारसोई एवं विघोर के कई गांव जलमग्न हो गए हैं.  नजराबाड़ी, पीरासन एवं डेंगरापाड़ा में बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है,  जबकि कई गांवों पर ख़तरा मंडरा रहा है. अररिया, भागलपुर एवं मुंगेर सहित कई  अन्य जगहों पर भी बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. बावजूद इसके  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि स्थिति सामान्य है, निश्चित रूप से  जले पर नमक छिड़कने के समान है. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के परिणामस्वरूप  अगर बाढ़ प्रभावित लोग उग्र रूप धारण करने को मजबूर हो जाएं तो सरकारी  अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के मुखिया को भी आश्चर्य में नहीं पड़ना  चाहिए.</p>
<hr />
<h3>साभार- चौथी दुनिया</h3>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.chauthiduniya.com/2011/09/bihar-torture-of-the-flood-injured-trusts-on-god.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/09/bihar-torture-of-the-flood-injured-trusts-on-god.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/09/bihar-torture-of-the-flood-injured-trusts-on-god.html</a></p>
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		<title>&#8216;GANGA&#8217; SAMMELAN, ALLAHABAD (23/24th Sept’2011)</title>
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		<pubDate>Sun, 04 Sep 2011 18:46:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[All- pervasive corruption in the country has reduced most national rivers to gutters. The sacred Ganga which traditionally carried “nectar” now transports sewage and toxic effluents. This has occurred over time from 1985, when the Government initiated the exercise of cleaning up the dirty waters of Ganga. In spite of the huge expenditure, the river [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong> </strong></p>
<p style="text-align: justify;">All- pervasive corruption in the country has reduced most national rivers to gutters. The sacred Ganga which traditionally carried “nectar” now transports sewage and toxic effluents. This has occurred over time from 1985, when the Government initiated the exercise of cleaning up the dirty waters of Ganga. In spite of the huge expenditure, the river has become a bigger conveyor of filth. And the Government is again working on it, with more funds to be expended. It is my contention that more expenditure will only increase the number of gutters. Allowing rivers to degrade to sewers is the biggest form of corruption. And the result of corruption can only be rectified with a disciplined effort, not just money. To restore the status of Ganga as benevolent mother from its current gutter, like state, a disciplined and scientific scheme is required for her to again carry “holy water” and sustain livelihood. It is therefore imperative to begin by defining a River Policy.</p>
<p style="text-align: justify;">Starting from September’10, we have traversed the entire length of the Ganga to understand the problems and issues first-hand, conducting several workshops and meetings with all stake-holders. A proforma of the River Policy has emerged from this exercise. The core has been formulated by dialogue with people across the nation, and has gained wide consensus. This widely accepted proforma prepared by the people will aid the formulation of a national policy for all rivers. With this in mind, we are convening a meeting of all people country‐wide who value rivers to finalise the River Policy in Allahabad on 23/24 September,’11. Accommodation and food will be provided by the UP Jal Biradari and activists from Allahabad.</p>
<p style="text-align: justify;">This meeting is being co-ordinated by Shri Brijendra Pratap Singh (099362 37855),</p>
<p>email: bps1977@gmail.com. Program details will be available by email:</p>
<p>sammelan@jalsangrah.org</p>
<p>It is our earnest request that you join us to contribute in the making of the national</p>
<p>River Policy.</p>
<p>Sincerely,</p>
<p>Rajendra Singh<strong> </strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>हिमालय को बचाने की अंतरराष्ट्रीय पहल</title>
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		<pubDate>Sun, 28 Aug 2011 12:46:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ का जैव विविधता पर नकारात्मक असर पड़ा है. इंसान अपने फायदे के लिए एक तऱफ जहां जंगलों का सफाया कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ उसने प्राकृतिक संपदा की लूटखसोट मचा रखी है, बग़ैर इस बात का ख्याल किए हुए कि इस पर अन्य जीवों का [...]]]></description>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/08/71.jpg"><img class="alignleft" title="हिमालय को बचाने की अंतरराष्ट्रीय पहल" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/08/71-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>जलवायु  परिवर्तन और प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ का जैव विविधता पर नकारात्मक असर  पड़ा है. इंसान अपने फायदे के लिए एक तऱफ जहां जंगलों का सफाया कर रहा है  तो वहीं दूसरी तरफ उसने प्राकृतिक संपदा की लूटखसोट मचा रखी है, बग़ैर इस  बात का ख्याल किए हुए कि इस पर अन्य जीवों का भी समान अधिकार है. बढ़ते  मानवीय हस्तक्षेप ने पर्वतीय क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र को भी गड़बड़ कर  दिया है, जिससे यहां पाए जाने वाले कई जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की  प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं या होने के कगार पर हैं. पहाड़ों पर हो रही  पेड़ों की अवैध कटान एवं खनन कार्यों ने इस क्षेत्र को अंदर से खोखला कर  दिया है. जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल बढ़ती गर्मी से ग्लेशियरों का  पिघलना लगातार जारी है. ऐसे में पहाड़ों पर रहने वालों का अस्तित्व संकट में  पड़ गया है. हिमालय जहां हमारे लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, वहीं  इसे जड़ी-बूटियों की उपलब्धता के लिए भी जाना जाता है.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">वैश्वीकरण के बढ़ते असर से  पर्वतीय क्षेत्रों की आबादी के समक्ष खाद्य सुरक्षा का खतरा पैदा हो गया  है. वहीं पर्यटन और आधुनिक तकनीक ने इन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय  समुदायों को भी प्रभावित किया है. वास्तव में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों  में प्राकृतिक संसाधनों के अपार भंडार हैं.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">संस्कृत के शब्द हिम (ब़र्फ) और आलय (घर) से मिलकर बने हिमालय को  पुराणों में देव स्थान के नाम से भी पुकारा गया है. हज़ारों वर्षों से यह  ॠषि-मुनियों की भूमि रही है. धर्मग्रंथों में कई जगह हिमालय की विशेषता का  उल्लेख मिलता है. 12 हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाक़े में फैले हिमालय में 15 हज़ार  से ज़्यादा ग्लेशियर मौजूद हैं. भारत और नेपाल के लोगों की प्यास बुझाने और  कृषि कार्यों के लिए पानी की अधिकांश आपूर्ति इसी से निकलने वाली नदियां  करती रही हैं. वहीं पन बिजली उत्पादन के लिए भी यह हमारा प्रमुख स्रोत रहा  है, लेकिन विकास के नाम पर इंसानों द्वारा नासमझी में किए जा रहे कार्यों  और इसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वैश्वीकरण के बढ़ते असर से पर्वतीय क्षेत्रों की आबादी के समक्ष खाद्य  सुरक्षा का खतरा पैदा हो गया है. वहीं पर्यटन और आधुनिक तकनीक ने इन  क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय समुदायों को भी प्रभावित किया है. वास्तव  में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के अपार भंडार  हैं. जम्मू-कश्मीर से उत्तराखंड होते हुए उत्तर पूर्व तक फैला हिमालय अपने  अंदर विविधताएं समेटे हुए है, जिन्हें विकास के नाम पर नष्ट किया जा रहा  है. हालांकि इस संबंध में अब कई अहम क़दम उठाए जा रहे हैं. भू-वैज्ञानिकों  द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति व्यक्त की जा रही चिंताएं सार्थक साबित  हो रही हैं और इस दिशा में प्रयास शुरू हो चुके हैं. पिछले दिनों पर्यटन  नगरी नैनीताल में भूगोल वेत्ताओं के अंतरराष्ट्रीय संगठन आईजीयू की  संगोष्ठी को इसी संदर्भ में एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. कुमांऊ  विश्वविद्यालय में आयोजित इस संगोष्ठी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित  प्रख्यात भू-वैज्ञानिक प्रो. मार्टिन प्राइस समेत देश एवं विदेश के तक़रीबन  दो सौ से अधिक भूगोलविदों ने हिस्सा लिया और खतरे में पड़े पारिस्थितिक  तंत्र, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा  की. प्रो. मार्टिन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पर्वतीय क्षेत्रों के  पारिस्थितिक तंत्र को बचाने के लिए वैज्ञानिक आधार पर योजनाएं बनाने की  आवश्यकता है. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि विकास के नाम पर हो रहे  प्राकृतिक दोहन को अगर वक़्त रहते नहीं रोका गया तो इसका खामियाज़ा आने वाली  पीढ़ी को भुगतना पड़ सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">आईजीयू कमीशन के महासचिव प्रो. वाल्टर लिमग्रूवर ने कहा, पर्वतीय  क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की अपार संभावनाएं मौजूद हैं, जिनके  उपयोग के लिए उचित तकनीक की आवश्यकता है, ताकि बिना नुक़सान पहुंचाए उनका  भरपूर उपयोग किया जा सके और इसके लिए सरकार को जल्द से जल्द पहल करनी  चाहिए. उन्होंने कहा कि विशेष नियोजन के माध्यम से ही पर्वतीय क्षेत्रों से  पलायन रोका जा सकता है. भूगर्भ विज्ञानी प्रो. खडग सिंह वल्दिया के  अनुसार, पर्वतीय क्षेत्रों में ज़मीन के अंदर सबसे ज़्यादा हलचल रहती है,  जिससे भूकंप की आशंका बनी रहती है. शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर हिमालय तक  के क्षेत्र की ज़मीन के नीचे कई फाल्ट मौजूद हैं. भारतीय प्लेट तिब्बत से  शुरू होने वाली एशियन प्लेट में हर साल पांच सेंटीमीटर समाहित हो रही है,  जिसके कारण हिमालय साल में औसतन 18 से 20 मिमी ऊंचा हो रहा है. इस हलचल का  असर उत्तराखंड के भूभाग पर भी पड़ता है और यह अपनी सतह से 3 से 5 मिमी ऊपर  उठ रहा है. ऐसे में विकास का मॉडल बनाते वक़्त इन बातों को नज़रअंदाज़ करना  महंगा साबित हो सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">जैविक विकास में पहाड़ों का अहम योगदान रहा है. विश्व का 24 प्रतिशत  हिस्सा पहाड़ों से घिरा है, जिस पर कुल आबादी का 12 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक  और आर्थिक रूप से निर्भर है. यह निर्भरता केवल जनजातीय समुदायों तक ही  सीमित नहीं है, बल्कि विकास की अंधी दौड़ में शामिल आम इंसान भी उतने ही  निर्भर हैं. यह समझना ज़रूरी है कि जैव विविधता अमूल्य है, उसे बचाने के ठोस  प्रयास करने होंगे. यह कार्य किसी एक व्यक्ति, संगठन अथवा सरकार द्वारा  नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति और प्रयासों से संभव है. समय की मांग है कि  हम विकास की रूपरेखा को तैयार करते वक़्त टिकाऊ विकास के मॉडल को अपनाएं,  ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित भविष्य का निर्माण हो सके. इसके लिए  विकसित देशों को पहल करने की आवश्यकता है. (चरखा)</p>
<p><strong>साभार- चौथी दुनिया</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.chauthiduniya.com/2011/08/international-initiatives-to-save-the-himalayas.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/08/international-initiatives-to-save-the-himalayas.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/08/international-initiatives-to-save-the-himalayas.html</a></p>
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		<title>लेक नावडती या घरची!</title>
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		<pubDate>Sun, 17 Jul 2011 08:50:31 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[समाजातील गावंढळ समजुती तंत्रज्ञानाला कशा वेठीस धरतात हे गेल्या काही दिवसांतील घटनांतून दिसून आले. सोनोग्राफी हे सर्वार्थाने उपयुक्त तंत्रज्ञान. अनेक विकारांचे योग्य निदान होण्यासाठी ते उपयोगी पडते. पोटातील गर्भ कसा आहे, त्यामध्ये काही व्यंग आहे का किंवा मातेच्या गर्भाशयात काही गुंतागुंत झाली आहे का, हे त्वरित समजून घेण्यासाठी सोनोग्राफी उपयोगी पडते. ही तपासणी करीत असताना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">समाजातील गावंढळ समजुती तंत्रज्ञानाला कशा वेठीस धरतात हे गेल्या काही  दिवसांतील घटनांतून दिसून आले. सोनोग्राफी हे सर्वार्थाने उपयुक्त  तंत्रज्ञान. अनेक विकारांचे योग्य निदान होण्यासाठी ते उपयोगी पडते.  पोटातील गर्भ कसा आहे,   त्यामध्ये काही व्यंग आहे का किंवा मातेच्या गर्भाशयात काही गुंतागुंत  झाली आहे का, हे त्वरित समजून घेण्यासाठी सोनोग्राफी उपयोगी पडते. ही  तपासणी करीत असताना आपोआपच तो गर्भ मुलगा आहे की मुलगी आहे हे कळून येते.  मात्र गर्भाच्या व्यंगाचे वा आरोग्याचे निदान करण्यासाठी सोनोग्राफीचा  उपयोग करण्याऐवजी केवळ गर्भलिंग चाचणीसाठी या तंत्रज्ञानाचा उपयोग करण्याचे  उद्योग देशात सुरू झाले. मुलीपेक्षा मुलगा श्रेष्ठ अशी एक विचित्र समजूत  आपल्या समाजात रूढ झाली आहे. मुलगा होण्यात मातृत्वाचे सर्वस्व आहे, अशा  मूर्ख समजुतीत हा समाज बुडलेला आहे. एकीकडे आईचे गोडवे हा समाज गातो.  संतांना माऊलीची उपमा देतो. आई म्हणून देवतांची पूजा करतो. मात्र घरात लेक  जन्माला येणे या समाजाला नकोसे वाटते. ‘लेक लाडकी या घरची’ म्हणायचे,  प्रत्यक्षात तिला नावडतीची वागणूक द्यायची, अशी ही दुटप्पी वृत्ती आहे.  जनगणनेतील आकडेवारीनुसार पंजाब, गुजरात यांसारख्या श्रीमंत राज्यांमध्येही  मुलांच्या तुलनेत मुलींचे प्रमाण बरेच कमी आहे. महाराष्ट्रही त्यामध्ये  मागे नाही. श्रीमंत राज्यांमध्ये मुलींचे प्रमाण कमी होण्यामागे  तंत्रज्ञानाचा दुरुपयोग हे मुख्य कारण आहे. सोनोग्राफीसारख्या  तंत्रज्ञानाचा वापर करून गर्भाचे लिंग तपासायचे आणि मुलगी असेल तर गर्भपात  करायचा हा प्रकार देशात सर्वत्र चालतो. यासाठी पैसा लागतो व तो अर्थातच  गरिबांपेक्षा श्रीमंताकडे सहज उपलब्ध असतो. मुलगा की मुलगी हे तपासून  जन्मापूर्वीच गर्भाचा निकाल लावण्याचा पर्याय पैसा नसल्याने गरिबांना  उपलब्ध नसतो. ते गर्भपात करून घेत नसले तरी मुलगी जन्माला आली की तिच्याकडे  दुर्लक्ष करून तिचे आयुष्य कोवळ्या वयातच कसे संपेल हे पाहतात किंवा   प्रसंगी संपवितातही.सरकारी आकडेवारीत हे चित्र स्पष्टपणे दाखविलेले आहे.  पुरेसे अन्न, कपडालत्ता व औषधे न मिळाल्यामुळे सहा वर्षे पूर्ण  होण्यापूर्वीच मरण पावणाऱ्या बालकांमध्ये मुलींची संख्या जास्त आहे. मुलगी  नको हा सामाजिक समजुतीचा विळखा सर्व समाजाभोवती किती घट्टपणे पडला आहे हे  यावरून दिसून येईल. गेल्या आठवडय़ात मुंबई, ठाणे, पुणे अशा शहरांमध्ये  सरकारी कारवाई करून गर्भलिंग चाचणी करीत असल्याचा संशय असणाऱ्या अनेक  सोनोग्राफी केंद्रांना सील ठोकले. ठाणे व मुंबईतील उच्च मध्यमवर्गीयांच्या  वस्तीत व्यवसाय करणाऱ्या डॉक्टरांना स्टिंग ऑपरेशन करून रंगेहाथ पकडण्यात  आले. ‘लेक लाडकी’ या संस्थेच्या वतीने ही कारवाई करण्यात आली. या कारवाईचे  वैशिष्टय़ असे की ‘लेक लाडकी’च्या कार्यकर्त्यांनी डॉक्टरांचा पर्दाफाश  करण्यासाठी तंत्रज्ञानाचाच वापर केला. दोघांकडूनही अद्ययावत तंत्रज्ञान  वापरले गेले. मात्र उच्चशिक्षित डॉक्टरांकडून केवळ भरपूर पैसा झटपट  मिळविण्यासाठी तंत्रज्ञानाचा दुरुपयोग होत होता, तर सामाजिक  कार्यकर्त्यांनी सामाजिक हितासाठी तंत्रज्ञानाचा योग्य वापर केला. गर्भलिंग  चाचणीसाठी व मुलगी असल्यास गर्भपात करून घेण्यासाठी पन्नास हजार ते एक लाख  रुपयांची मागणी या डॉक्टरांकडून होत होती. बाजारपेठीय अर्थव्यवस्थेचे लोण  सध्या सर्वच क्षेत्रात पसरले असून वैद्यक ही सेवा न राहता कमशिर्यल उद्योग  बनला आहे. परिणामी झटपट पैसा मिळविण्यासाठी गैरमार्ग अवलंबिण्यास काही  डॉक्टरही मागेपुढे पाहात नाहीत. तथापि, या स्टिंग ऑपरेशन्समधून संपूर्ण  वैद्यक क्षेत्राला आरोपीच्या पिंजऱ्यात उभे करण्याचा उद्योग काही मंडळींनी  सुरू केला असून तो पूर्णपणे चुकीचा ठरेल. काही डॉक्टरांकडून गैरमार्गाचा  अवलंब होतो म्हणून सर्वच डॉक्टर नालायक ठरत नाहीत. किंबहुना अपराधी  डॉक्टरांवर कडक कारवाई करावी अशीच बहुसंख्य डॉक्टरांची मागणी आहे.  ठाण्यातील डॉक्टरांवर कारवाई करताना रेडोलॉजिस्ट असोसिएशनच्या सरचिटणीसाने  साक्षीदार म्हणून काम केले ही बाब येथे उल्लेखनीय ठरेल.सोनोग्राफी केंद्रात  येणाऱ्या प्रत्येक गर्भवती स्त्रीचा एक फॉर्म डॉक्टरांनी भरून द्यायचा  आहे. हा फॉर्म अतिशय किचकट असून त्यामध्ये चुका होण्याची शक्यता अनेक  डॉक्टर बोलून दाखवितात. फॉर्म भरताना झालेल्या क्षुल्लक चुकांचा बागुलबुवा  उभा करून सरकारचे वैद्यकीय अधिकारी अनेक प्रामाणिक डॉक्टरांना नाडतात.  सरकारी वैद्यकीय अधिकाऱ्यांच्या या दंडेलीला चाप कसा लावता येईल हे सरकारने  पाहिले पाहिजे. सरकारी वैद्यकीय अधिकाऱ्यांकडून धाडी घालण्यापेक्षा ठाणे,  मुंबईत करण्यात आलेली स्टिंग ऑपरेशन्स संशयितांना पकडण्यासाठी अधिक उपयोगी  पडतात. अशी स्टिंग ऑपरेशन्स करण्यास डॉक्टरांचाही पाठिंबा आहे.  सोनोग्राफीची सोय जास्तीत जास्त सरकारी इस्पितळांमध्ये करून देणे हा एक  उपाय असून सरकार तो योजण्याचा विचार करीत असल्याचे आरोग्यमंत्र्यांनी  सांगितले. यामुळे सर्वच डॉक्टरांकडे संशयाने पाहणे कमी होणार असले तरी मूळ  समस्या सुटणारी नाही. मुलीला नकार देण्याची मानसिकता ही कोणत्याही  कायद्याच्या कठोर अंमलबजावणीने दूर होणारी नाही. या असंस्कृत  मानसिकतेविरुद्ध लढण्यासाठी अनेक पातळींवरून प्रयत्न करावे लागतील.   मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यांनी याबाबत समंजस भूमिका घेतली असून  कायद्याच्या धाकाबरोबरच समाजशिक्षण महत्त्वाचे ठरेल असे म्हटले.  सेलिब्रेटिंग गर्ल चाइल्ड अशी संकल्पना त्यांनी मांडली. समाजात मुलींचे  महत्त्व वाढावे, त्यांना प्रतिष्ठा मिळावी यासाठी सरकारने अनेक योजना सुरू  केल्या आहेत. त्याला प्रतिसादही मिळतो. परंतु समाजाची मानसिकता बदलण्याची  प्रक्रिया फार मंद चालते. अनेक वर्षांच्या अथक प्रयत्नांनंतर  कुटुंबनियोजनाला सकारात्मक प्रतिसाद मिळण्यास अलीकडे सुरुवात झाली. गेल्या  जनगणनेमध्ये लोकसंख्यावाढीचा वेग थोडा कमी झाल्याचे आढळून आले. वाढत्या  कुटुंबाचा आर्थिक भार मोठा असतो हे वास्तव अनुभवास येत असूनही  कुटुंबनियोजनाला पहिली अनेक वर्षे म्हणावा तसा प्रतिसाद मिळत नव्हता. मात्र  आता चित्र झपाटय़ाने बदलत असून पुढील जनगणनेत त्याचे अधिक स्पष्ट प्रतिबिंब  पडेल. मुलींना प्रतिष्ठा मिळवून देणारी मानसिकता समाजात रुजायला असाच काही  काळ जावा लागेल. मात्र समाजाला त्या दिशेने नेण्यासाठी समाजशिक्षण व  कायद्याचा धाक अशा दोन्ही स्तरांवर सातत्याने प्रयत्न करणे गरजेचे असते.  ‘वंशाचा दिवा’ जन्माला घालण्याची घाई आणि ‘म्हातारपणाची काठी’ म्हणून  मुलाकडे पाहण्याचा समाजाचा दृष्टीकोन हा यातला सर्वात मोठा अडथळा आहे.या  आठवडय़ात लोकसंख्या दिनाच्या निमित्ताने गर्भातील मुलींना वाचविण्याची मोहीम  सरकारने हाती घेतली व जिकडे-तिकडे धाडी घालण्याचे सत्र सुरू झाले. मात्र  ‘लेक लाडकी’ या संस्थेने परिश्रमपूर्वक पुरावे गोळा करून डॉक्टरांना पकडले  तसे सरकारी यंत्रणेने केलेले नाही. खरे तर सरकारी यंत्रणेकडून असे काम  अपेक्षित होते. संशयित डॉक्टरांविरुद्ध ठोस पुरावे जमा करण्याऐवजी जास्तीत  जास्त सोनोग्राफी यंत्रांना सील ठोकण्याचा कार्यक्रम हाती घेण्यात आला.  एकदा हा लोकसंख्या दिनाचा विशेष संपला की या मोहिमेतील सरकारचा उत्साह  मावळेल. समाजशिक्षणाची मोहीमही थंडावेल. पुढील जनगणनेमध्ये मुलांच्या  तुलनेत मुलींचे प्रमाण आणखी खाली आले, जन्म घेणाऱ्या मुलींची संख्या घटत  चालली आहे हे दिसून आले की पुन्हा एकदा सर्वाना या मोहिमेची जाग येईल. हे  टाळायचे असेल तर गर्भलिंग चाचणीच्या विरोधात सुरू झालेली मोहीम सातत्याने  सुरू राहिली पाहिजे. ही मोहीम योग्यरीतीने चालली तर त्याला डॉक्टरांचा  विरोध होणार नाही. तसा विरोध झाला तर अशा डॉक्टरांच्या सचोटीबद्दल संशय  घ्यावा लागेल. मुलीला नाकारणे हे लांच्छन आहे, अशी समजूत समाजात दृढ  होईपर्यंत उसंत घेता येणार नाही.  अनेक देशांमध्ये ही मानसिकता  समाजशिक्षणातूनच बदलली गेली. समाज आरोग्यसंपन्न करण्यासाठी तंत्रज्ञानाचा  वापर झाला पाहिजे, कुणाचा जगण्याचा हक्क नाकारण्यासाठी नव्हे.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>साभार- संपादकीय, लोकसत्ता</strong></p>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=169931:2011-07-12-17-03-56&amp;catid=29:2009-07-09-02-02-07&amp;Itemid=7" href="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=169931:2011-07-12-17-03-56&amp;catid=29:2009-07-09-02-02-07&amp;Itemid=7" target="_blank">http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=169931:2011-07-12-17-03-56&amp;catid=29:2009-07-09-02-02-07&amp;Itemid=7</a></p>
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