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	<title>gangajal blog &#187; we love Mumbai</title>
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		<title>अवैध खनन : सरकार एजेंट की भूमिका निभा रही है</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Jan 2012 18:11:17 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[देश में अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है. राजनेताओं के संरक्षण और अ़फसरों की मिलीभगत से खनन मा़फिया देश के खनिज बहुल राज्यों में प्राकृतिक खनिजों को लूटने में जुटे हैं. अ़फसोस की बात तो यह है कि लोकतांत्रिक देश की सरकार और जनप्रतिनिधि जनहित को ताक़ पर रखकर पूंजीपतियों के एजेंट की भूमिका [...]]]></description>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=30517" rel="attachment wp-att-30517"><img class="alignleft" title="अवैध खनन : सरकार एजेंट की भूमिका निभा रही है" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/12/52-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>देश में अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है. राजनेताओं के संरक्षण और अ़फसरों की मिलीभगत से खनन मा़फिया देश के खनिज बहुल राज्यों में प्राकृतिक खनिजों को लूटने में जुटे हैं. अ़फसोस की बात तो यह है कि लोकतांत्रिक देश की सरकार और जनप्रतिनिधि जनहित को ताक़ पर रखकर पूंजीपतियों के एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं. कर्नाटक के लोकायुक्त एन संतोष हेग़डे की अवैध खनन मामले में आई रिपोर्ट भी इस अवैध कारोबार में सरकार और जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता को साबित करती है. अवैध खनन के कारोबार में कांग्रेस और भाजपा नेताओं का गठजो़ड रहा है. संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के साथ ही पिछले दस साल में कर्नाटक की कांग्रेस, जनतादल सेक्युलर और भाजपा की सभी सरकारों को दोषी क़रार दिया गया है. हालांकि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा विदेश मंत्री एस एम कृष्णा का कहना है कि उनके कार्यकाल में खनन का कोई लाइसेंस नहीं दिया गया. लोकायुक्त कोर्ट के विशेष न्यायाधीश एन के सुधींद्र राव द्वारा अवैध खनन मामले में उनकी जांच के आदेश दिए जाने के बाद उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए मैंने खान एवं भूगर्भ विभाग अपने पास कभी नहीं रखा.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">बंगलुरु के व्यापारी टी जे अब्राहम ने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि एस एम कृष्णा, धर्म सिंह और एच डी कुमारस्वामी के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में अवैध खनन हुआ, जिसे उन्होंने नहीं रोका. याचिका में 11 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है. एस एम कृष्णा 11 अक्टूबर, 1999 से 28 मई, 2004 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर गठबंधन की सरकार में एन धर्म सिंह 28 मई, 2004 से 28 जनवरी, 2006 तक मुख्यमंत्री रहे. जबकि इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी और जनता दल सेक्युलर गठजो़ड की सरकार में एच डी कुमारस्वामी 2 फरवरी, 2006 से 8 अक्टूबर, 2007 तक मुख्यमंत्री रहे. एन धर्म सिंह इस समय उत्तरी कर्नाटक के बिदर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं, जबकि कुमारस्वामी बंगलुरु के समीप रामनगरम से सांसद हैं. रिपोर्ट में मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा और कई अन्य मंत्रियों को दोषी ठहराया गया, जिनमें पूर्व मंत्री कट्टा सुब्रमन्या नायडू, एस एन शेट्टी और मौजूदा गृह मंत्री आर अशोका, उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी एवं गृह निर्माण मंत्री वी सोमाना शामिल हैं. इससे जहां भाजपा की खासी किरकिरी हुई, वहीं येदियुरप्पा को अपनी कुर्सी भी गंवानी प़डी. कर्नाटक में लोकायुक्त की जांच के  घेरे में आने वाले सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है. विधानसभा अध्यक्ष के जी बोपैया के खिला़फ भी धन का दुरुपयोग करने के मामले में जांच शुरू हो चुकी है. हाल में केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने आंध्र प्रदेश की भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी वाई श्रीलक्ष्मी को जेल भेज दिया. उन पर आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की सरकार के कार्यकाल में खनन विभाग की सचिव रहते हुए रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम कंपनी को लाइसेंस देने में पक्षपात करने का आरोप है. खनन माफिया, अ़फसरों और नेताओं का गठजोड़ चांदी कूटने के साथ ही सरकारी खज़ाने को अरबों का चूना भी लगा रहा है. कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेग़डे की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006-2010 के बीच राज्य से क़रीब तीन करो़ड टन अवैध लौह अयस्क का खनन किया गया. इससे देश को क़रीब 16,200 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ. वहीं गोवा में 12,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है. पिछले पांच वर्षों में राज्य में 1.42 करो़ड टन अवैध खनन हुआ. राज्य का खनन विभाग मुख्यमंत्री दिगंबर कामत के पास है. यहां से सालाना 5.4 करो़ड टन लौह अयस्क का निर्यात होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी. पिछले दिनों लीक हुई इस रिपोर्ट में राज्य में ब़डे खनन घोटाले का ज़िक्र किया गया था. उड़ीसा में देश का लगभग एक तिहाई लौह अयस्क भंडार है. यहां की 243 खदानों में वर्ष 2009 से खनन बंद है. अकेले उड़ीसा में अवैध खनन से सरकारी खज़ाने को तीन लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो चुका है. सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक़, अवैध खनन के कारण पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में क़रीब 1500 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी एक रिपोर्ट में अवैध खनन के मामले में राज्य के खनन मंत्री राजेंद्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को ज़िम्मेदार ठहराया है, जबकि दोनों ही मंत्रियों ने इन आरोपों को ग़लत बताया है. छत्तीसग़ढ में 700 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़, झारखंड में अवैध खनन से सरकार को सालाना 600 करो़ड रुपये का ऩुकसान होता है. यहां के पूर्व मुख्यमंत्री मधु को़डा पर भी अवैध खनन में शामिल होने के आरोप लगे हैं. राजस्थान में पिछले पांच वर्षों में सरकार को 150 करो़ड रुपये के राजस्व का नुक़सान हुआ है.</p>
<p style="text-align: justify;">खनन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि देश में अवैध खनन का कारोबार फल-फूल रहा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006 से 2010 तक देश भर में अवैध खनन के एक लाख 61 हज़ार 140 मामले सामने आए. इनमें सर्वाधिक 39670 मामले अकेले आंध्र प्रदेश के थे. इसके बाद गुजरात में 24936 मामले दर्ज किए गए. महाराष्ट्र में 22885, मध्य प्रदेश में 17397, कर्नाटक में 12191, राजस्थान में 11513, केरल में 8204, छत्तीसगढ़ में 7402, तमिलनाडु में 5191, हरियाणा में 3897, हिमाचल प्रदेश में 2095, गोवा में 492, झारखंड में 953 और पश्चिम बंगाल में 901 मामले सामने आए. अ़फसोस की बात यह है कि कई राज्यों में तो अवैध खनन के मामलों में प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हुई है. देश भर में स़िर्फ 44 हज़ार 445 मामलों में ही कार्रवाई हुई. आंध्र प्रदेश में कोई भी मामला अदालत तक नहीं पहुंच पाया, जबकि छत्तीसग़ढ में 2383, गुजरात में आठ, हरियाणा में 138, हिमाचल प्रदेश में 711, झारखंड में 39, कर्नाटक में 771, मध्य प्रदेश में 16157, महाराष्ट्र में 13, उड़ीसा में 86, राजस्थान में 59, तमिलनाडु में 421 और बंगाल में 91 मामले अदालत में गए. गुजरात में 158 मामले पुलिस में दर्ज किए गए, जबकि हरियाणा में 103, झारखंड में 205, कर्नाटक में 959, मध्य प्रदेश में पांच, महाराष्ट्र में 20197, उड़ीसा में 57, राजस्थान में 607, तमिलनाडु में 579 और पश्चिम बंगाल में 974 मामले पुलिस तक पहुंचे.</p>
<p style="text-align: justify;">देश के विभिन्न राज्यों में कोयला, एल्यूमिनियम, अभ्रक, तांबा और मैगनीज आदि क़ीमती खनिजों का भंडार है. सुप्रीमकोर्ट की सख्त हिदायतों के बावजूद अवैध खनन पर रोक नहीं लग पा रही है. अवैध खनन के कारण पर्यावरण को खतरा पैदा हो गया है. पश्चिम बंगाल के रानीगंज, आसनसोल और झारखंड के झरिया का उदाहरण सबके सामने है. अवैध खनन के कारण यहां का एक ब़डा क्षेत्र कभी भी भयानक रूप ले सकता है, क्योंकि यहां ज़मीन के भीतर आग दहक रही है. यहां ज़मीन में प़डी दरारों से आग की लपटें निकलती हैं. यहां का क़ीमती कोयला हर पल राख के ढेर में बदल रहा है. काग़ज़ों में तो यहां की कई खदानें बदं प़डी हैं, लेकिन कोयला माफियाओं के लिए यहां आज भी काम बदस्तूर जारी है. अवैध खनन के कारण जहां मज़दूरों की जान खतरे में रहती है, वहीं अत्यधिक खनन से खनिजों के भंडार भी खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं, मगर राजनीतिज्ञों के संरक्षण के कारण यह धंधा बिना रोक-टोक के चल रहा है. इस धंधे ने लोगों को स़डक से उठाकर मंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया है. जनार्दन रेड्डी को ही लीजिए. सामान्य हेड कांस्टेबल चेंगा रेड्डी के घर में पैदा हुए जनार्दन रेड्डी ने 1995 में बेल्लारी में चिटफंड कंपनी खोली, लेकिन तीन साल बाद ही खुद को दिवालिया घोषित करके उसे बंद कर दिया. इसके बाद उन्होंने होटल और मीडिया बिजनेस शुरू किया, वहां भी उन्हें घाटा उठाना प़डा, लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव के व़क्त उनके दिन बदल गए. सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज के  बीच चुनावी म़ुकाबले में उन्होंने सुषमा स्वराज के लिए काम किया. सुषमा स्वराज को भले ही हार का मुंह देखना प़डा हो, लेकिन रेड्डी बंधुओं का भला हो गया. सियासत में आते ही उन्होंने खनन उद्योग में क़दम रखा और अवैध खनन के चलते वे दौलतमंद होते चले गए. जनार्दन रेड्डी और उनके साले श्रीनिवास रेड्डी ने राजनीतिज्ञों से संबंधों के कारण कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पैर जमा लिए. हालत यह हो गई कि उन्होंने बेल्लारी की लोहे की खानों को खाली कर डाला. कर्नाटक में अवैध खनन पर जारी लोकायुक्त की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2009-10 में ही रेड्डी बंधुओं ने 4635 करोड़ रुपये का अवैध खनन किया. रेड्डी बंधु भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं और जी जनार्दन रेड्डी के अलावा उनके भाई जी करुणाकर रेड्डी कर्नाटक की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. आंध्र प्रदेश के  पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का भी उन्हें संरक्षण हासिल था. यह रेड्डी बंधुओं का प्रभाव ही था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2009 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन के रोसैया सरकार द्वारा अनंतपुर ज़िले में अवैध खनन और धांधली के आरोप में रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के खिला़फ मामला दर्ज कराने के बावजूद सीबीआई ने उनके खिला़फ कार्रवाई करने में देर की. इसमें कोई दो राय नहीं कि सर्वदलीय सहमति और केंद्रीय खनन मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय खनन ब्यूरो और सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत के बग़ैर इतना ब़डा अवैध खनन का कारोबार चल ही नहीं सकता. केंद्र सरकार की नीतियों ने भी अवैध खनन को ब़ढावा देने का काम किया. 1993 में केंद्र की नरसिम्हाराव सरकार ने खनन को निजी और विदेशी पूंजी के हवाला कर दिया. नतीजतन, पोस्को से लेकर वेदांता जैसी कंपनियां भी क़ीमती खनिजों की लूट में शामिल हो गईं.</p>
<p style="text-align: justify;">सिद्धांतों का ढोल पीटने वाली भाजपा ने भी अवैध खनन को का़फी ब़ढावा दिया. भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखंड में गंगा में अवैध खनन जारी है. इसके खिला़फ आमरण अनशन पर बैठे स्वामी निगमानंद की कथित हत्या के बाद भी सरकार खनन पर रोक नहीं लगा पाई. स्वामी निगमानंद के गुरु शिवानंद का आरोप है कि खनन माफिया पार्टी फंड के लिए चंदे के रूप में एक मोटी रक़म देता है, इसलिए भाजपा सरकार ने उसे खनन की खुली छूट दे रखी है. अवैध खनन से जहां सरकारी खज़ाने को ऩुकसान होता है, वहीं इससे सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश पर भी विपरीत असर प़डता है. आदिवासियों से उनकी पैतृक ज़मीन छीनी जा रही है. आदिवासियों को अपनी पुश्तैनी जगह छो़डकर दूरदराज के इलाक़ों में पलायन करना प़ड रहा है. इससे उनके सामने रोज़गार का संकट पैदा हो गया है, उनकी सांस्कृतिक पहचान, उनके रीति-रिवाज भी खत्म होते जा रहे हैं. विकास के लिए खनन ज़रूरी है, लेकिन सुधार के नाम पर किए जा रहे अति खनन यानी अवैध खनन के दूरगामी नतीजे अच्छे नहीं होंगे. सरकार को चाहिए कि वह जनहित के मद्देनज़र अवैध खनन पर रोक लगाए, वरना वह दिन दूर नहीं, जब खानों से खनिजों के भंडार समय से पहले खत्म हो जाएंगे.</p>
<h3><strong>अवैध खनन रोकने की सरकारी क़वायद</strong><strong></strong></h3>
<p style="text-align: justify;">अवैध खनन रोकने की क़वायद का दावा करते हुए इसी साल सितंबर माह में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है. इसमें प्रावधान है कि कोयला खनन कंपनियों को हर साल अपने शुद्ध लाभ का 26 फीसदी और अन्य खनिज कंपनियों को रॉयल्टी के बराबर धनराशि ज़िलास्तरीय खनिज न्यास को देनी होगी. इस रक़म का इस्तेमाल स्थानीय लोगों के विकास के लिए किया जाएगा. केंद्रीय खान मंत्री दिनशा पटेल का कहना है कि खनन से पहले प्रभावित होने वाले लोगों से बात करना अनिवार्य होगा. अवैध खनन से संबंधित मामलों के निपटारे के लिए राज्य स्तर पर विशेष अदालतें स्थापित करने का प्रावधान किया गया है. देश के 60 ऐसे ज़िलों में राष्ट्रीय खनन नियामक प्राधिकरण और राष्ट्रीय खनिज ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे, जहां खनिज संसाधन काफ़ी प्रचुर मात्रा में हैं. इस विधेयक के आने से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी 4500 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,500 करोड़ रुपये हो जाएगी. विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि खनन कंपनियों को राज्य सरकार को कुल रॉयल्टी पर 10 फीसदी और केंद्र सरकार को 2.5 फीसदी का उपकर जमा करना होगा. सरकार का दावा है कि इस विधेयक में अवैध खनन रोकने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं. आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखकर ही इसे तैयार किया गया. इसके तहत कोयला कंपनियों के शुद्ध लाभ का 26 फीसदी हिस्सा प्रभावित लोगों के विकास के लिए खर्च किया जाएगा. यह विधेयक खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम 1957 की जगह लेगा.</p>
<div id="textchange"> <strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></div>
<div><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/illegal-mining-the-government-is-playing-role-of-agent.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/illegal-mining-the-government-is-playing-role-of-agent.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/12/illegal-mining-the-government-is-playing-role-of-agent.html</a></div>
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		<title>वनों में प्रकाश की किरण</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Dec 2011 02:22:59 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए [...]]]></description>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=29896" rel="attachment wp-att-29896"><img class="alignleft" title="वनों में प्रकाश की किरण" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/12/71-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.</p>
<blockquote><p>समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.</p></blockquote>
<h3 style="text-align: justify;">पृष्ठभूमि</h3>
<p style="text-align: justify;">जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.</p>
<h3 style="text-align: justify;">परिवर्तन की पहली लहर</h3>
<p style="text-align: justify;">पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.</p>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.</p>
<h3 style="text-align: justify;">वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन</h3>
<p style="text-align: justify;">यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.</p>
<p style="text-align: justify;">तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.</p>
<p style="text-align: justify;">चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.</p>
<h3 style="text-align: justify;">कार्यान्वयन की चुनौतियां</h3>
<p style="text-align: justify;">आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.</p>
<p style="text-align: justify;">उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.</p>
<h3 style="text-align: justify;">निष्कर्ष</h3>
<p style="text-align: justify;">वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>- प्रांजुल भंडारी</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)</strong></p>
<h2 style="text-align: justify;">साभार- चौथि दुनिया</h2>
<p><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html">http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html</a></p>
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		<title>किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!</title>
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		<pubDate>Sat, 10 Dec 2011 17:39:58 +0000</pubDate>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=29891" rel="attachment wp-att-29891"><img class="alignleft" title="किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/12/360x216x61-360x216.jpg.pagespeed.ic.skILeS5Ghn.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.</p>
<blockquote><p>पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.</p>
<p style="text-align: justify;">कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.</p>
<p style="text-align: justify;">भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.</p>
<p style="text-align: justify;">कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.</p>
<p style="text-align: justify;">बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<h2 style="text-align: justify;"><strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></h2>
<p style="text-align: justify;"><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html">http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html</a></p>
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		<title>शेखावाटीः चलें गांव की ओर</title>
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		<pubDate>Thu, 24 Nov 2011 12:17:50 +0000</pubDate>
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<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://gangajal.org.in/blog/?attachment_id=28586" rel="attachment wp-att-28586"><img class="alignleft" title="चलें गाँव की ओर" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/11/7-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a></strong>राजस्थान के झुंझनू का कठराथल गांव, दूर तक नज़र आते लहलहाते खेत, चरते पशु और रंग-बिरंगे पक्षी, कच्ची पगडंडियों के किनारे बने मिट्टी और घास-फूंस के छोटे-ब़डे घर, सौंधी खुशबू वाली आबोहवा और प्रकृति के प्रेम से सराबोर वातारण. इन सबके बीच सुशीला देवी और कान सिंह का घर किसी चित्रकार की कल्पना-सा प्रतीत होता है. घर की दीवारों पर सुंदर रंग-बिरंगी राजस्थानी चित्रकारी बरबस आकर्षित करती है. घर की मुंडेर पर गमलों की कतार और घर के पीछे फैले खलिहान, गांव में सैर के लिए बथान में बंधे घोड़े और सुरक्षा के लिए दो ब़डे पालतू कुत्ते. इन सबमें खास यहां का प्राकृतिक फ्रिज जिसे ज़मीन में ही गड्ढा कर ईंट की दीवार बनाकर छर्रे और मिट्टी से तैयार किया गया है. घर के कमरे जहां बाहर से मिट्टी के हैं, वहीं अंदर आराम का पूरा साजो-सामान है, सोफा, बैड, डायनिंग टेबल और ज़मीन पर बिछी क़ालीन. यहां सुकून का खास इंतज़ाम है. घर के आंगन में झूला खूबसूरती में चार चांद लगाता है. यह घर किसी पेंटिंग का सजीव चित्रण लगता है. यह घर ग्रामीण पर्यटन के लोकप्रिय ठिकानों में से है. इस क्षेत्र से पिछले चार सालों से ज़ुडी सुशीला देवी और उनके परिवार की ज़िंदगी ग्रामीण पर्यटन ने बदल दी है. पहले उनके पास खेतीबा़डी के अलावा कोई और काम नहीं था. प़ढे-लिखे उनके दोनों बेटों का खेती में जी नहीं लगता था. वे शहर जाकर काम करना चाहते थे, दुनिया देखना चाहते थे, लेकिन अब दुनिया चलकर उनके पास आती है. मोरारका फाउंडेशन ने गांव में ही रहकर नए प्रकार के काम करने का आइडिया दिया, जो बच्चों को भी पसंद आया और उन्हें भी. शुरू में घर छोटा होने, सीमित संसाधन होने की वजह से समस्या भी आई, पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया. सुशीला देवी के बच्चे अब फाउंडेशन द्वारा दी गई ट्रेनिंग की बदौलत फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और घर आए मेहमानों को इलाक़े की सैर करवाते हैं, वहां के कला-साहित्य और दूसरी लोक कृतियों से परिचित करवाते हैं. विदेशियों के साथ संचार की कोई समस्या नहीं रह गई. विदेशी पर्यटकों को और क्या चाहिए था. घर की महिला के हाथों से बना शुद्ध पारंपरिक भोजन वह भी पारंपरिक तरीक़े से. सुशीला देवी कहती हैं कि देशी पर्यटकों में ग्रामीण पर्यटन को सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है. वे ब़ुजुर्ग और नौजवान जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा है या फिर अपने गांव को छो़डकर मजबूरन शहर चले गए हैं, वे इसे ज़्यादा पसंद करते हैं. इसके अलावा हनीमून जो़डे और शहर में रहने वाले परिवार भी खूब चाव से यहां ठहरते हैं.</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के यहां तीन दिनों के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख-समझ कर गए.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">मेहमानों को अपनी संस्कृति को अधिक क़रीब से दिखाने के लिए सुशीला देवी घर पर ही मेहंदी प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, लोक नृत्य, कठपुतली का खेल और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं. सुशीला देवी को इस बात पर गर्व होता है कि विदेश से आने वाले लोग उन्हें सुपरवुमैन कहते हैं, क्योंकि वे सुशीला देवी के ब़डे परिवार का प्रबंधन देखकर आश्चर्य में प़ड जाते हैं. यही नहीं सुशीला देवी से मेहमान भारतीय मेहमान नवाज़ी, पशुओं का दूध का़ढना, चारा देना और खेतों पर काम करने जैसा सुखद अनुभव भी लेकर जाते हैं. लेकिन सुशीला देवी और उन जैसे ग्रामीण पर्यटन को ब़ढावा देने वाले किसान परिवारों के लिए यह सब आसान नहीं था. ग्रामीण पर्यटन के लिए गांव वालों के सामने कुछ खास चुनौतियां थीं, जैसे प्रशिक्षित लोगों की कमी, आर्थिक तंगी, लोगों में उत्साह की कमी, ग्रामीण परिवेश की वजह से लोगों का अल्प विकास, सहभागिता की कमी, बिजनेस प्लानिंग क्षमता की कमी, भाषाई समस्या, बुनियादी शिक्षा की कमी, संचार का माध्यम, प्रशिक्षित टूरिस्ट गाइड. लेकिन मोरारका फाउंडेशन ने स्थानीय लोगों और उनके पूरे परिवार को खास ट्रेनिंग दी, जिसकी वजह से सारी चुनौतियां खत्म हो गईं. ग्रामीण पर्यटन को राजस्थान में 500 से ज़्यादा चिन्हित परिवारों से जो़डकर मोरारका फाउंडेशन ने यहां की सभ्यता और संस्कृति को विश्व पटल पर उकेरने में ब़डी भूमिका निभाई है. पर्यावरण हित को ध्यान में रखते हुए प्रकृतिजन्य पर्यटन का विकास करवाया है. ग्रामीण समुदायों को पर्यटन का हिस्सा बनाकर उनके आर्थिक और शैक्षिक स्तर का विकास करवाया है, जिससे ग्रामीणों के शहरों की तऱफ पलायन में कमी आ सके. का़फी वक़्त से ग्रामीणों की स्थिति खराब होती जा रही थी. इसका मुख्य कारण था कृषि की उपेक्षा, इसके प्रति लापरवाही, इसे किसी अन्य व्यवसाय के मुक़ाबले कम आंकना और युवाओं का इससे न जु़डना. इसी समस्या को दूर करने का उपाय मोरारका फाउंडेशन ने खोज निकाला फार्म पर्यटन के ज़रिए. क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के तीन दिन के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख और समझ कर गए. फार्म पर्यटन पर आए फ्रांस के 21 लोगों को बिडोदी के किसान मनोज शर्मा के यहां दो दिन के लिए ठहरना भारत से विशेष लगाव का अहसास दे गया. शेखावाटी में किसानों को पर्यटकों के स्वागत के लिए खासतौर से तैयार किया गया, ताकि वे पर्यटकों के साथ अच्छी तरह संबंध बना सकें और उन्हें ठहरने के दौरान कोई परेशानी न आए. शेखावाटी क्षेत्र में मीलों का बास के हरीराम मील ने साल भर में 16 फ्रांसीसी मूल के पर्यटकों को ठहराया, तो बीदासर के किसान नेकीराम गोदारा ने कजाकिस्तान से आए दो पर्यटकों और फ्रांस से आए 16 पर्यटकों की दो दिन तक खातिरदारी की. वाहिपुरा के कृष्ण सिंह शेखावत ने 11 और कल्याणपुरा के रामअवतार बुगालिया ने 19 फ्रांसीसी पर्यटकों को दो दिन में अपनी संस्कृति से रूबरू करा दिया. वहीं वाहिदपुरा के सुरेंद्र कुमार ने 4 स्विस पर्यटकों को दो दिन में ही गांव की आबोहवा का क़ायल बना दिया. पिछले कुछ सालों में हज़ारों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को गांवों में भ्रमण कर ग्रामीण जीवनशैली को नज़दीक से जानने, समझने, परखने का मौक़ा मिला है.</p>
<p style="text-align: justify;">मोरारका फाउंडेशन ने ग्रामीण पर्यटन द्वारा सफलता की एक नई कहानी लिखी है. इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि चूंकि केवल पर्यटन से आजीविका कमाने के अवसर ब़ढ जाते हैं जिससे किसान लगातार पर्यटन के कार्य से जु़डकर कृषि जैसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण कार्य को छो़डने की भूल कर सकते हैं. इसी वजह से यहां फार्म पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. ग्रामीण पर्यटन से न केवल विकल्प रोज़गार के अवसर विकसित होते हैं, बल्कि कई तरह के फायदे होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि गांववालों को आजीविका का साधन मिल जाता है, खासकर ग्रामीण युवा को. इससे जीवन स्तर में सुधार आता है मसलन शिक्षा, सेहत का भी स्तर बेहतर हो जाता है. गांव में ज़मीन की क़ीमत ब़ढती है, व्यापारिक वस्तुओं और पब्लिक सेवाओं के दाम भी ब़ढते हैं. स्थानीय कारोबार जैसे क्षेत्रीय कला, ट्रांसपोर्ट और दुकानदारों इत्यादि को फायदा पहुंचता है. गांव के सीधे-सादे लोग विदेशों-शहरों के समझदार लोगों से बेवकू़फ न बन जाएं या फिर ब़डे शहरों और विदेशों से आने वाले लोगों से बातचीत कर सकें, इसके लिए गांव के लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता भी ब़ढी है.</p>
<p style="text-align: justify;">शेखावाटी के गांवों के लोग ब़डे समझदार हैं. शहर से आने वाले लोगों से न केवल आय कमा रहे हैं, बल्कि जीने का सलीक़ा भी सीख लेते हैं. गांव के लोग स्वस्थ वातावरण के साथ स़फाई व्यवस्था, स़डक, बिजली, दूरसंचार के नए माध्यम और रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वाले आधुनिक उपकरण के इस्तेमाल और जीवन को सुलभ बनाने वाली तकनीकी चीज़ों से रूबरू होते हैं. इसके अलावा शहर से आए बुद्धिजीवियों से प्राकृतिक आवास, जैव-विविधता और ऐतिहासिक स्मारकों, धरोहरों का संरक्षण करने के नए उपायों के बारे में सीखते हैं और प्राकृतिक उद्यानों को सहेजने के प्रति जागरूक होते हैं. परंपराओं को सर आंखों पर रखने वाले गांव के ब़डे बुज़ुर्गों को यह चिंता थी कि ग्रामीण पर्यटन से ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति को क्षति पहुंच सकती है और गांव की युवा पी़ढी आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी संस्कृति से दूर हो जाएगी. मगर फाउंडेशन ने इस डर को दूर किया. फाउंडेशन ने सिखाया कि दरअसल गांव का परिवेश और परंपरागत चीज़ें ही उनके काम की शान हैं और इसे ब़ढावा दे सकती हैं. इस लिहाज़ से ब़ुजुर्गों का यह डर भी खत्म हो गया कि ग्रामीण पर्यटन के विकास से गांव के परंपरागत व्यापार और उद्योग, रोज़गार और माहौल पर ग़लत असर हो सकता है. मोरारका फाउंडेशन ग्रामीण पर्यटन के प्रति इतनी अधिक रुचि और लगन से कार्य करवा रहा है कि इस क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.</p>
<h3><strong>गाइड ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू कराते है </strong></h3>
<p style="text-align: justify;">मीण पर्यटन एवं ऊंची-ऊंची हवेलियों की वजह से नवलग़ढ राजस्थान में जाना पहचाना नाम है. हर साल तक़रीबन 30,000 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्यटक न नवलग़ढ की खूबसूरत हवेलियों, मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों और जैविक खेती के प्रयासों को देखने समझने आ रहे हैं. यहां के गाइड इन भ्रमणीय स्थलों से पर्यटकों का जोडते हैं. यह गाइड पहले अप्रशिक्षित थे, कम प़ढे-लिखे थे. उनके पास समुचित विषयपरख जानकारी जुटाने का न तो कोई स्त्रोत था और न ही अवसर, इसलिए  गाइड सुनी-सुनाई जानकारियों को अनगढ़ तरीक़े से पर्यटकों को पेश करते थे, और पर्यटक मजबूरन उनकी सेवाएं लेते थे. उपेक्षा और सरकारी नियमों की आ़ड में उन्हें न तो कोई प्रशिक्षण दिया गया था और न ही कोई सुविधा मुहैया कराई गई थी. ऐसे में मोरारका फाउंडेशन ने आगे ब़ढकर स्थानीय नगर पालिका से बात करके इन अप्रशिक्षित गाइडों को विधिवत शिक्षण देना प्रारंभ किया, जिसके तहत स्थानीय हैरिटेज, होटल, स्मारक पर्यटन, व्यापार से जु़डे विशेषज्ञों की मदद से 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया. इसमें नवलग़ढ के सभी अप्रशिक्षित गाइड समुदाय ने हिस्सा लेकर और शिविर से जुड़कर नवलग़ढ के बारे में पर्यटन की दृष्टि से पूरी जानकारी प्राप्त की. यही नहीं पर्यटन से जु़डे अन्य आयामों के बारे में भी जाना. ट्रेनिंग पाकर खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे गाइड आबिद खान कहते हैं कि इस प्रशिक्षण से न केवल आत्म विश्वास ब़ढा, बल्कि हम अधिकार पूर्वक पर्यटन से जु़डे विषयों पर पर्यटकों को जानकारी देने में भी सक्षम हो गए हैं. एक अन्य गाइड मनोज शर्मा का कहना है कि हैरिटेज की जानकारी तो मोरारका फाउंडेशन पहले भी हैरिटेज संरक्षण शिविर के माधयम से दे रहा है, पर पर्यटकों को ये जानकारियां किस तरह की पूरी तहज़ीब और संस्कृति के साथ दी जाएं, इसका पता इस शिविर के माध्यम से ही चला. साथ ही बहुत से अनछुए पहलुओं पर चर्चाएं भी उपयोगी सिद्ध हुई हैं. उन्हें सबसे ज़्यादा तो खुशी इस बात की हुई कि अप्रशिक्षित का लेबल अब हमेशा के लिए हट गया है और वह भी अब गर्व  के साथ पर्यटकों को नवलग़ढ की विरासत से रूबरू करवा रहे हैं.</p>
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<h2><strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></h2>
<p><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/11/shekhawati-towards-village.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/11/shekhawati-towards-village.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/11/shekhawati-towards-village.html</a></p>
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		<title>‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्याना’साठी ११ नोव्हेंबरपासून आगळी मोहीम</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Nov 2011 03:49:51 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[ दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong> दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा<br />
सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन<br />
कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत<br />
प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/05102008011.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-7594" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/05102008011.jpg" alt="" width="378" height="284" /></a>फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. यावर मात करण्यासाठी आता राष्ट्रीय उद्यानाचे संचालक व मुख्य वनसंरक्षक सुनील लिमये यांनी एक नवी शक्कल लढवली आहे. त्यासाठी पर्यटकांचीच मदत घेण्याचा निर्णय घेतला असून सायकल वरून रपेट करणाऱ्या पर्यटकांनी पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा केल्यास त्यांना सायकल भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्याचप्रमाणे येत्या ११ नोव्हेंबरपासून ‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्यान’ ही मोहीम राबविली  जाणार असून त्यात कचरा टाकणाऱ्यांविरोधात दंडाची तरतूदही              करण्यात आली आहे.<br />
प्लास्टिकचा कचरा ही राष्ट्रीय उद्यानासाठी मोठीच डोकेदुखी ठरली आहे. दररोज उद्यानातून गोळा होणारे प्लास्टिक खूप मोठय़ा प्रमाणावर असते असे उद्यानाची सूत्रे स्वीकारल्यानंतर काही दिवसांतच लिमये यांच्या लक्षात आले. त्यानंतर त्यांनी कर्मचाऱ्यांच्या मदतीने काही महिन्यांसाठी प्लास्टिकच्या कचऱ्याचे मोजमाप करण्याचा निर्णय घेतला. त्यात समोर आलेली गेल्या पाच महिन्यांतील आकडेवारी धक्कादायक होती.<br />
दरदिवशी उद्यानातून गोळा होणारा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल २५० किलो एवढा होता. तर सुट्टीच्या दिवशी हा आकडा तिपटीने वाढायचा. कचरा गोळा करणे आणि त्याची आकडेवारी करणे याच कालखंडात पर्यटकांना विनंती करण्याची मोहीमही पार पडली. उद्यानात प्लास्टिकविरोधात नवीन फलक जागोजागी लावण्यात आले. त्यातून प्लास्टिकच्या होणाऱ्या दुष्परिणामांची माहितीही देण्यात आली. मात्र त्याने फारसा कोणताही फरक पडला नाही.<br />
अखेरीस हा प्लास्टिकचा भस्मासूर रोखण्यासाठी कडक धोरण अवलंबण्याचा आणि विद्यमान कायद्यातील तरतूदींचा आधार घेण्याचा निर्णय घेतला, असे सांगून संचालक सुनील लिमये म्हणाले की, वन्यजीव संरक्षण कायद्यातील कलम ३५ (६) नुसार, वन्यजीवनास धोका पोहोचवणारे कोणतेही कृत्य करणाऱ्यास तब्बल २५ हजार रुपये दंड आणि तीन महिने साध्या कैदेची तरतूद आहे. याच तरतुदीनुसार दंडात्मक कारवाईचा अधिकारही देण्यात आला आहे. तो आता वापरण्यात येणार आहे. त्यानुसार प्लास्टिक टाकताना पहिल्यांदा पकडले गेल्यास १०० रुपये आणि दुसऱ्यांदा पकडले गेल्यास ५०० रुपये दंड करण्यात येणार आहे. तिसऱ्यांदा पकडले गेल्यास त्या व्यक्तिविरुद्ध गुन्हा दाखल करून न्यायालयात खटला गुदरण्यात       येईल.  याशिवाय इतरही काही अभिनव मार्ग अवलंबण्यात येणार आहेत. गेल्या महिन्याभरापासून पर्यावरणप्रेमी उपक्रम म्हणून सायकल फेरी सुरु करण्यात आली आहे. त्यासाठीच्या सायकली वन विभागातर्फेच राष्ट्रीय उद्यानाच्या प्रवेशद्वारावर उपलब्ध करून दिल्या जातात. दोन तासांसाठी ४० रुपये भाडे आकारले जाते. या पर्यटकांना सायकल देताना ११ नोव्हेंबरपासून एक कापडी पिशवीही देण्यात येणार आहे. त्यांनी या फेरीदरम्यान पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा करून आणल्यास त्यांना भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेण्यात आला आहे. खरेतर हे उद्यान पर्यटकांसाठी आहे, त्यामुळे त्यांच्यावर कारवाई करण्याची इच्छा नव्हती. मात्र प्लास्टिकच्या भस्मासुराकडे पाहता असे लक्षात आले की, त्याला वेळीच आवर घातला नाही तर हा मानवजातीवरच उलटणार आहे. त्यामुळे अतिशय गांभीर्याने हा निर्णय घेतल्याचे लिमये यांनी सांगितले.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>विनायक परब</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong></strong>साभार- लोकसत्ता</p>
<p style="text-align: justify;"><a title=" लोकसत्ता" href="http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=191453:2011-11-02-19-35-24&amp;catid=73:mahatwachya-baatmyaa&amp;Itemid=104" target="_blank">http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&amp;view=article&amp;id=191453:2011-11-02-19-35-24&amp;catid=73:mahatwachya-baatmyaa&amp;Itemid=104</a></p>
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		<title>गंगा क्रांती आहवान&#8230;!</title>
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		<pubDate>Tue, 01 Nov 2011 03:27:09 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[साभार- गंगा जलबिरदरी, जयपुर.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/Invitation-letter-18-19-Nov.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-7585" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/Invitation-letter-18-19-Nov-780x1024.jpg" alt="" width="780" height="1024" /></a><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/allahabad-ghoshna-patr-1.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-7586" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/allahabad-ghoshna-patr-1-637x1024.jpg" alt="" width="637" height="1024" /></a><a href="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/allahabad-ghoshna-patr-2.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-7589" title=" " src="http://gangajal.org.in/blog/wp-content/uploads/2011/11/allahabad-ghoshna-patr-2-637x1024.jpg" alt="" width="637" height="1024" /></a><span style="text-decoration: underline;"><strong>साभार- गंगा जलबिरदरी, जयपुर.</strong></span></p>
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		<title>स्पीड का नया दावा</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Oct 2011 12:46:56 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[स्विटज़रलैंड में यूरोपीय परमाणु अनुसंधान केंद्र (सर्न) और इटली के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि उन्हें ऐसे पार्टिकल मिले हैं जो प्रकाश की गति से तेज चलते हैं. वैज्ञानिक ख़ुद भी चकित हुए. पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि उन्हें न्यूट्रिनो नामक पार्टिकल मिले हैं, जो प्रकाश की गति से भी तेज चलते [...]]]></description>
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<h2></h2>
</td>
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<div>
<div id="textchange">
<p style="text-align: justify;"><img class="alignright" title="स्पीड का नया दावा" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/10/10-c3-360x216.jpg" alt="" width="252" height="151" />स्विटज़रलैंड में यूरोपीय परमाणु अनुसंधान केंद्र (सर्न) और इटली के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि उन्हें ऐसे पार्टिकल मिले हैं जो प्रकाश की गति से तेज चलते हैं. वैज्ञानिक ख़ुद भी चकित हुए. पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि उन्हें न्यूट्रिनो नामक पार्टिकल मिले हैं, जो प्रकाश की गति से भी तेज चलते हैं. अगर यह कहीं और से भी साबित हो जाता है तो आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत ग़लत साबित हो जाएगा. स्विटजरलैंड की सर्न प्रयोगशाला और इटली की प्रयोगशाला में हुए प्रयोग के दौरान यह तथ्य सामने आया. पाया गया कि ये छोटे सब-एटॉमिक पार्टिकल 3,00,00,06 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से जा रहे हैं जो प्रकाश की गति से क़रीब छह किलोमीटर प्रति सेकेंड ज़्यादा है. इस प्रयोग के प्रवक्ता भौतिकविद्‌ एंटोनियो एरेडिटाटो ने कहा, यह नतीजा हमारे लिए भी आश्चर्यजनक है. हम न्यट्रिनो की गति नापना चाहते थे, लेकिन हमें ऐसा अद्भुत नतीजा मिलने की उम्मीद नहीं थी. हमने क़रीब छह महीने जांच, परीक्षण, नियंत्रण और फिर से जांच करने के बाद यह घोषणा की है. न्यूट्रिनो प्रकाश की तुलना में 60 नैनो सेकेंड जल्दी पहुंचे. इस प्रयोग में शामिल वैज्ञानिकों ने इसके नतीजों के बारे में नपे-तुले शब्दों में बात की. सर्न के निदेशक सर्गियो बेर्टोलुची ने कहा, अगर इस नतीजे की पुष्टि हो जाती है तो भौतिकी को देखने का हमारा नज़रिया बदल जाएगा. न्यूट्रिनो पर कोई आवेश नहीं होता और ये इतने छोटे होते हैं कि इनका द्रव्यमान भी अभी-अभी ही पता चल सका है. इनकी संख्या तो बहुत होती है, लेकिन इनका पता लगाना मुश्किल है. इन्हें भुतहा कण भी कहा जाता है और ये न्यूक्लियर फ्यूजन के कारण पैदा होते हैं. इस प्रयोग के तहत वैज्ञानिकों ने स्विटज़रलैंड और इटली की प्रयोगशालाओं के बीच प्रकाश पुंज फेंका. दोनों प्रयोगशालाओं के बीच 730 किलोमीटर की दूरी है. पार्टिकल फिजिक्स की दुनिया में इस घोषणा से सनसनी फैल गई है. फ्रांस में भौतिकी संस्थान के पिएरे बिनेट्यूरी ने कहा, सामान्य सापेक्षता और विशेष सापेक्षता दोनों ही सिद्धांतों पर इससे सवाल खड़ा हुआ है. भौतिकविद्‌ एंटोनियो जिचिषी कहते हैं, अगर आप प्रकाश की गति को छोड़ दें तो विशेष सापेक्षता का सिद्धांत तो नाकाम हो जाएगा.</p>
<hr />
<div id="textchange"><strong> साभार- चौथि दुनिया</strong></div>
<div><a title="http://www.chauthiduniya.com/2011/10/new-claim-of-speed.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/10/new-claim-of-speed.html" target="_blank"> http://www.chauthiduniya.com/2011/10/new-claim-of-speed.ht</a>ml</div>
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</td>
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		<title>Gangajal Nature Foundation&#8217;s  3rd National Documentary, Photography and Essay Competition The Winners have been announced!</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Oct 2011 13:46:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Gangajal Nature Foundation&#8217;s3rd National Documentary, Photography and Essay Competition The Winners have been announced! Photography First Prize : Ghanshyam Kahar, Vadodara, Gujrat (Entry Name : DI IT&#8230;!) View Second Prize : Dimple Kumar I. Pancholi, Vadodara, Gujrat (Entry Name : FARMING IS NESSASRY FOR MOTHER EARTH)View Third Prize : Narayan D. Patel, Vadodara, Gujrat (Entry [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h1>Gangajal Nature Foundation&#8217;s3rd National Documentary, Photography and Essay Competition</h1>
<h2>The Winners have been announced!</h2>
<h3>Photography</h3>
<p><strong>First Prize : Ghanshyam Kahar</strong>, Vadodara, Gujrat (Entry Name : DI IT&#8230;!) <a href="http://www.gangajal.org.in/images/1_2011.jpg">View</a><br />
<strong>Second Prize : Dimple Kumar I. Pancholi</strong>, Vadodara, Gujrat (Entry Name : FARMING IS NESSASRY FOR MOTHER EARTH)<a href="http://www.gangajal.org.in/images/2_2011.jpg">View</a><br />
<strong>Third Prize : Narayan D. Patel</strong>, Vadodara, Gujrat (Entry Name : SAVE TREES FOR OUR PLANNET)<a href="http://www.gangajal.org.in/images/3_2011.jpg">View</a></p>
<h3>Documentary</h3>
<p><strong>First Consolation Price : Santosh Deodar</strong>, Kalyan, Maharashtra (Entry Name : PRESERVING DREAM)<br />
<strong>Second Consolation Price : Hitesh Parmar</strong>, Vadodara, Gujrat (Entry Name : GREEN EARTH)</p>
<h3>Essay</h3>
<p><strong>First Prize :Amol Sitaphale</strong>, Sholapur, Maharashtra (Entry Name : GREEN EARTH)<br />
<strong>Second Prize : Bhagyshri Sontakke</strong>, Kalyan, Maharashtra (Entry Name : HAREET VASUNDHARA)</p>
]]></content:encoded>
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		<title>जैविक खेती समय की जरूरत&#8230;.!</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Oct 2011 18:50:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<table id="border-table" style="height: 2016px;" border="0" cellpadding="0" width="733">
<tbody>
<tr>
<td align="left" valign="top">
<table border="0" cellpadding="0" width="100%">
<tbody>
<tr>
<td align="left" valign="top"></td>
<td width="94" align="left" valign="top"></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<div id="textchange">
<p style="text-align: justify;"><img class="alignleft" title="जैविक खेती समय की जरूरत" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/10/72-360x216.jpg" alt="" width="360" height="216" />राजस्थान  के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे.  खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत  दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी  क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है.  शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत  है. फाउंडेशन के इस सपने को पूरा करने का भागीरथ प्रयास किया है संस्था के  कार्यकारी अध्यक्ष मुकेश गुप्ता ने. शेखावाटी में जैविक खेती से जुड़े तमाम  मसलों पर चौथी दुनिया के समन्वय संपादक डॉ. मनीष कुमार ने उनसे विस्तार से  बातचीत की. पेश हैं प्रमुख अंश…</p>
<p>इस इलाक़े में का़फी बदलाव देखने को मिल रहा है, आखिर यह परिवर्तन कैसे संभव हो पाया?</p>
<p style="text-align: justify;">अगर इलाक़े की फिज़ा बदल गई है तो उसमें बहुत बड़ा योगदान किसानों का रहा  है. इस इलाक़े की एक विशेषता यह है कि यहां किसी नए विचार को स्वीकार करने  की क्षमता शायद भारत के दूसरे इलाकों से ज़्यादा है. 15-16 साल पहले यहां  मुख्यत: दो प्रकार की खेती होती थी. एक बरसात पर निर्भर रहने वाली और दूसरी  एरीगेशन बेसिस पर होने वाली. उसका रकबा लगभग 8-9 प्रतिशत था. दोनों ही  प्रकार की खेती में कई समस्याएं थीं. उसके अंदर इनपुट यानी केमिकल  फर्टिलाइज़र की बात कहें या कुछ थोड़े-बहुत पेस्टिसाइज जिनका प्रयोग होता था,  से किसानों की उपज की लागत बढ़ती जा रही थी, लेकिन उन्हें बाज़ार में मिलने  वाली क़ीमत का परपोशनेट या रिटर्न नहीं मिल रहा था. जो बाराने खेती थी,  उसमें दो समस्याएं थीं, जैसे बरसात का कम होना. यह इलाक़ा 500 मिलीमीटर से  कम बारिश वाले क्षेत्रों में आता है. यहां बाराने खेती करने वाले किसानों  को एक नई तकनीक से परिचित कराया गया. विशेष तौर पर बाजरे की जो देसी किस्म  की खेती होती थी, उसका प्रतिशत बहुत था. अब स़िर्फ 10-12 फीसदी बाजरा ही  देसी रह गया है. उसकी जगह 70 से 90 फीसदी तथाकथित हाईब्रिड हो गया. हम  लोगों ने फाउंडेशन की ओर से किसानों से बातचीत शुरू की, उनकी समस्याएं  सुनीं और कैसे उनका समाधान किया जा सकता है, इस पर काम करना शुरू किया.  हमने दो प्रमुख उपाय अपनी ओर से शुरू किए. एक तो पशुओं के गोबर और खेतों से  निकलने वाले खर-पतवार से बढ़िया किस्म की खाद बनानी शुरू की, क्योंकि इसमें  पानी सोखने की क्षमता अधिक होती है.</p>
<p>शुरुआत में जब फाउंडेशन ने काम करना शुरू किया तो किसानों ने उसे किस रूप में स्वीकार किया?</p>
<p style="text-align: justify;">पहली बात तो यह कि जितने भी किसान इस क्षेत्र में हैं, जिनसे हम बातचीत  करते थे, वे अपने खेतों में खुद के खाने के लिए नॉन केमिकल स्वरूप में गोबर  की खाद डालकर देसी बीज से खेती करते थे. इसका मतलब उन्हें समझ में आता था  कि देसी मामला ज़रा बेहतर है. दूसरी बात यह कि हमने जो तकनीक यहां  इंट्रोड्यूज की, खासकर वर्मी कल्चर तकनीक, उसे यहीं विकसित किया गया. उससे  तत्काल उत्पादन लागत कम हो गई. तीसरे स्तर पर हमने देखा कि यह काफी प्रचलन  में आ गया है. उसी समय संपूर्ण विश्व में 1995 से 2005 के बीच फूड विदाउट  केमिकल्स (रसायन रहित खाद्य पदार्थ) का आर्गेनिक फार्मिंग के रूप में  प्रचलन शुरू हुआ था.</p>
<p>शेखावाटी में कितने किसान फाउंडेशन से जुड़े हैं और राष्ट्रीय स्तर पर कितने लोग जुड़े हुए हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे पहले हम लोगों ने करीब 10 हज़ार स्थानीय किसानों को फाउंडेशन से  जोड़ा. उसके बाद लगातार लोग हमसे जुड़ते गए और उनकी संख्या क़रीब 70 हजार हो  गई. शेखावाटी क्षेत्र में मुख्य तौर पर सीकर, झुंझुनू और चुरू ज़िले आते  हैं. अब 10-11 वर्ष के बाद पूरे राष्ट्रीय स्तर करीब ढाई-पौने तीन लाख  किसान हमसे जुड़ चुके हैं.</p>
<p>आगे की योजना क्या है, जिन राज्यों में आप नहीं जा सके, वहां क्या संदेश लेकर जाएंगे?</p>
<p style="text-align: justify;">पूरे राजस्थान और देश के अंदर हमने बड़ी संख्या में किसानों को जोड़ लिया  है और अब उन्हें मार्केट लिंकेज भी प्रोवाइड करने लगे हैं. किसानों की उपज  को उपभोक्ताओं ने खूब सराहा. हालांकि उपभोक्ताओं ने हमारे सामने कुछ  समस्याएं रखीं. उन्होंने कहा कि हमारी रसोई में अगर आप बीस आइटम ऑर्गेनिक  देंगे और पचास नॉन आर्गेनिक, तो हमारे साथ पूरा न्याय नहीं होगा. लिहाजा  हमारी पहली प्राथमिकता यह रही कि सामान्य भारतीय रसोई में कितने प्रतिशत  आइटम हम आर्गेनिक रूप में उपलब्ध करा सकते हैं. हम सिक्किम गए, क्योंकि  अदरक वहीं होती है सबसे अच्छी. हम गुजरात गए, क्योंकि केसर वहां होता है.  महाराष्ट्र जाना पड़ा, क्योंकि वहां सोयाबीन, उड़द और अरहर की दाल अच्छी होती  है. इस प्रकार हमारे कार्यक्रम का विस्तार होता गया.</p>
<p>जो लोग अपने खेतों को ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार करना चाहें तो उनका पहला क़दम क्या होगा?</p>
<p style="text-align: justify;">अब इस तरह की मांग लगातार बढ़ रही है. इसीलिए हमने तय किया है कि अब अपना  ऑनलाइन पोर्टल क्रिएट करेंगे. इस बाबत हमने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सर्विस  डिवीजन अलग से बना दिया है. इसका काम होगा कि पूरे देश में कहीं से भी  किसान हमसे संपर्क करें और चाहें कि वे जैविक खेती करना चाहते हैं और  उन्हें तकनीकी सहायता की ज़रूरत है तो यह उन्हें ऑनलाइन सपोर्ट उपलब्ध कराए.</p>
<p>आपने ऑनलाइन सपोर्ट तो उपलब्ध करा दिया,  लेकिन उसके लिए प्रशिक्षण की ज़रूरत होगी, शेखावाटी के किसानों को  प्रशिक्षित करने की दिशा में आप क्या कर रहे हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">यह सही है कि किसानों का इंटरनेट पर जाना संभव नहीं है. जहां भी हम अपने  कार्यक्रम की शुरुआत करें, वहां हमारा कोई न कोई प्रतिनिधि होना चाहिए.  चाहे वे हमारे फील्ड वर्कर हों या हम ऐसे प्रगतिशील किसानों को चिन्हित  करें, जो हमारी बात सुनकर, हमसे प्रेरित होकर काम करें. हमने जो ऑनलाइन  सर्विस शुरू की है, यह टोल फ्री टेलीफोन नंबर है. इसमें किसानों के सवालों  का जवाब हम उन्हीं की भाषा में देंगे. इसके सपोर्ट बैकअप में हमने देश के  19 राज्यों में अपने कदम बढ़ाए हैं. कुछ ही राज्य बचे हैं, उनके लिए भी हम  प्रयास कर रहे हैं.</p>
<p>अपने कलेक्शन सेंटर और उसकी मार्केट चेन के बारे में कुछ जानकारी दें.</p>
<p style="text-align: justify;">इसकी शुरुआत से लेकर अंत तक, जिसे हम वैल्यू चेन मैनेजमेंट कहते हैं,  सबसे पहले किसान और हमारा संपर्क होता है. उसके बाद एक-दूसरे के बीच भरोसा  कायम होता है. किसान वास्तव में जैविक खेती करने को इच्छुक है. तीसरी कड़ी  होती है उसके सर्टिफिकेशन का, जिसका सारा रिकॉर्ड अब हम टेलीफोन के ज़रिए  रखते हैं. एक बार जब किसान सर्टिफाइड हो जाता है, जिसमें अधिकतम तीन वर्ष  लगते हैं. उसके बाद हमें पता चलता है कि कौन-कौन से किसान हैं, कहां उनका  खेत है और क्या-क्या फसलें उन्होंने बोई हैं. उसी के अनुसार हम अपनी योजना  बनाते हैं. अगर किसी एक कलस्टर के अंदर लगे कि यहां पर एक ट्रक अनाज मिल  सकता है तो हमारी टीम क्षेत्र के किसानों से उनकी उपज खरीद लेती है. इससे  किसानों को दो फायदे होते हैं. एक तो उन्हें मंडी नहीं जाना पड़ता, दूसरे  खर्च भी नहीं लगता. छोटे किसानों के लिए यह काफी फायदेमंद है. कोई आढ़त नहीं  लगती और न कोई कमीशन. मंडी में थोड़ी-बहुत लूटपाट होती है, उससे भी वे बच  जाते हैं. पहले नकदी ले जाने में ज़रूर हमें दिक्कत होती थी, लेकिन अब हम  उनके लिए आरटीजीएस खाते खोल रहे हैं. किसानों से खरीदी गई उपज हमारे  केंद्रीय गोदाम में आ जाती है. फिर हम उसकी प्रोसेसिंग करते हैं, उससे  ज़रूरत की चीजें बनाते हैं. किसानों की उपज की हम ब्रांडिंग करते हैं. इसके  लिए हमने डाउन टू अर्थ बनाया है, जहां सभी जैविक खाद्य पदार्थ उपलब्ध हैं.  इसका हमने काफी विस्तार किया है. हमारी कोशिश यही है कि उपभोक्ताओं को इसके  प्रति जागरूक किया जाए कि जैविक खाद्य पदार्थ में क्या अच्छाइयां हैं और  उसे क्यों खाना चाहिए.</p>
<p>आम लोगों के बीच एक भ्रम है कि जैविक पदार्थ महंगे होते हैं, आपका क्या कहना है?</p>
<p>यदि आप किसी भी शहर की ऐसी दुकान पर जाएं, जिसे अच्छी क्वालिटी का सामान  बेचने के लिए जाना जाता हो. अगर उसके और हमारे ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्‌स की  मार्केट प्राइस देखें तो आप पाएंगे कि हम शायद उसके म़ुकाबले काफी सस्ता  सामान बेच रहे हैं. यह अलग बात है कि कोई अगर ए ग्रेड के माल की तुलना सी  ग्रेड के माल से करे तो उसे महंगा लगेगा.</p>
<p>आपकी ग्रेडिंग प्रणाली क्या है?</p>
<p style="text-align: justify;">पहले हर शहर और हर परिवार के अंदर हमें हर प्रकार के भोजन के आइटम की  जानकारी होती थी. जब हमारे घरों में पापड़ बनता था तो कहा जाता था कि मूंग  की दाल वहीं की होनी चाहिए. उत्तर भारत के अंदर अगर किसी को अरहर की दाल  पसंद थी तो वह दुकानदार से कहता था कि मुझे कानपुर की अरहर की दाल दीजिए.  इसी तरह गेहूं किसी और क्षेत्र का है, चावल किसी और क्षेत्र का. मसलन उनकी  जो प्रसिद्धि थी, वह उनकी क्वालिटी को लेकर थी. लेकिन हमने देखा कि 1970 के  बाद जिस प्रकार कृषि वैज्ञानिकों ने हाईब्रिड को इंट्रोड्यूज किया, उसी का  परिणाम है कि अब रिटेल काउंटरों पर जो आम उपभोक्ता आते हैं, उन्हें सुंदर  दिखने वाली चीजें अच्छी लगती हैं और जो सुंदर न दिखे, वह उनके हिसाब से  खराब है. लिहाजा हम यह जागरूकता भी लोगों में पैदा कर रहे हैं कि यदि  उन्हें बाजरे की रोटी खानी है तो हाईब्रिड बाजरे की जगह वह देसी बाजरे की  रोटी खाएं तो उन्हें स्वाद भी पसंद आएगा और सेहत भी सही रहेगी. फर्ज करें,  आप किसी शहर के रेस्तरां में जाते हैं, वहां परिवार के कुल खाने का खर्च  500- 600 रुपये के बीच आता है. मुझे नहीं लगता कि 100 रुपये बचाने के लिए  कोई कम स्वाद वाला भोजन पसंद करेगा. यही बात हम उपभोक्ताओं को बताते हैं कि  आप ऊपरी चमक-दमक के बजाय गुणवत्ता देखिए.</p>
<p>शेखावाटी में अभी और कितने किसानों को आप अपने साथ जोड़ना चाहेंगे?</p>
<p style="text-align: justify;">हम पूरे देश में 270 आर्गेनिक आइटम, जो अमूमन रसोई के अंदर इस्तेमाल किए  जाते हैं, उन्हें मुहैय्या कराने की स्थिति में हैं. तकरीबन 95 से 98  फीसदी रसोई के आइटम हम देने की क्षमता रखते हैं. जैसे-जैसे बाज़ार में हम  इसका विस्तार कर रहे हैं, इसकी मांग बढ़ रही है. लिहाजा हमारा प्रयास है कि  हम उन फसलों को उन क्षेत्रों में बढ़ावा दें, जिनकी मांग बहुत अधिक है.  मसलन, शेखावाटी का गेहूं हमने सात साल पहले यहां के बाज़ार में ही लांच किया  और जानबूझ कर उसकी क़ीमत मध्य प्रदेश के गेहूं से अधिक रखी थी. शुरू में  हमें काफी परेशानी हुई. ग्राहकों ने यह कहा कि यह शेखावाटी का गेहूं क्या  चीज है. हमने तो पहली बार इसका नाम सुना है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी बनी  रोटी, बाटी, पूड़ी और पराठे जब लोगों ने खाना शुरू किया तो उन्हें अच्छा  लगा. कहने का मतलब यह कि शेखावाटी के गेहूं को हमने नई पहचान दी और इसकी  मांग बढ़ती जा रही है. शेखावाटी में हमारी योजना है कि यहां हम 10 लाख टन  गेहूं का उत्पादन करें.</p>
<p>बाज़ार में मिलने वाली हरी सब्जियों और आपके द्वारा बेची जाने वाली सब्जियों में क्या फर्क़ है?</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के संदर्भ में अगर हम खाद्य पदार्थों में मिलावट की बात करें तो  पहले हमारे यहां इसकी गुंजाइश नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान तरक्की कर  रहा है, मिलावट करने के तरीकों में नित्य बढ़ोत्तरी हो रही है. कहीं दूध की  जगह सिंथेटिक दूध मिल रहा है तो कहीं घी में तेल की मिलावट की जा रही है.  बाजार में विक्रेताओं की दलील है कि ग्राहकों को सस्ती चीजें चाहिए, इसी  वजह से मिलावटखोरी का धंधा फल-फूल रहा है. हम शुद्ध मूंग और मसाले का पापड़  बनाते हैं. हमारी लागत 180-190 रुपये प्रति किलो आती है. वहीं हम देखते हैं  कि बाज़ार में 100 रुपये प्रति किलो की दर से पापड़ बिक रहा है. आखिर क़ीमत  में इतने अंतर की वजह क्या है. करेला, तोरई, टिंडा और लौकी में  ऑक्सीटॉक्सिन का इंजेक्शन लगाकर रातोंरात उसे बड़ा कर दिया जाता है. लौकी का  जूस आप पी रहे हैं सेहत के लिए, लेकिन आपके शरीर में ऑक्सीटॉक्सिन भी जा  रहा है, जिससे न जाने कितनी बीमारियों का खतरा बना रहता है. आज बड़े पैमाने  पर किडनी, लीवर और पेट की बीमारियां हो रही हैं. उसकी वजह ऐसी दूषित  सब्जियां हैं, जिन्हें तैयार करने में बड़े पैमाने पर रासायनिक दवाओं का  इस्तेमाल किया जाता है. फूड एडेलट्रेशन रोकने के लिए हमारे देश में जो  प्रशासनिक और कानूनी तंत्र है, वह का़फी लचर है. मैं मीडिया को धन्यवाद  देना चाहूंगा कि पिछले 5-10 वर्षों में उसने लोगों के अंदर एडेलट्रेशन को  लेकर का़फी जागरूकता पैदा की. सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया है.  हालांकि हाल में खाद्य सुरक्षा अधिनियम बनाया गया है. इस एक्ट से हमें  काफी उम्मीदें हैं. अब तक किसी रिटेल स्टोर पर मिलावट पकड़े जाने पर कंपनी  पर कार्रवाई होती थी, लेकिन नए कानून के मुताबिक, मिलावटखोरी के आरोप में  अब रिटेलर भी दोषी माने जाएंगे. इसके अलावा डिस्ट्रीब्यूटर और कंपनी पर भी  कार्रवाई की जाएगी.</p>
<h3 style="text-align: justify;"><strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></h3>
<p><a class="aligncenter" title="http://www.chauthiduniya.com/2011/10/organic-farming-needs-time.html" href="http://www.chauthiduniya.com/2011/10/organic-farming-needs-time.html" target="_blank">http://www.chauthiduniya.com/2011/10/organic-farming-needs-time.html</a></p>
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		<title>लद्दाख का बदलता पर्यावरण&#8230;..!</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Sep 2011 18:17:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA["Jan Jodo Ganga Yatra"]]></category>
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<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/08/13-b.jpg"><img class="alignleft" title="लद्दाख का बदलता पर्यावरण" src="http://www.chauthiduniya.com/wp-content/uploads/2011/08/360x216x13-b-360x216.jpg.pagespeed.ic.ydEXTqKSHm.jpg" alt="" width="360" height="216" /></a>प्रदूषण  वायु, जल और धरती की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का एक ऐसा  अवांछनीय परिवर्तन है, जो जीवन को हानि पहुंचा सकता है. दुनिया भर में हो  रहे तथाकथित विकास की प्रक्रिया ने प्रकृति एवं पर्यावरण के सामंजस्य को  झकझोर दिया है. इस असंतुलन के चलते लद्दा़ख जैसे सुंदर क्षेत्र भी प्रदूषण  जैसी समस्या से प्रभावित हुए हैं. कुछ वर्ष पूर्व या कोई 25 वर्ष पहले हर  मौसम का आगमन सामयिक होता था, मगर अब ऐसा नहीं है और इसमें कुछ अनिश्चितता आ  गई है. लद्दा़ख में भीषण गर्मी के कारण हिमनद त़ेज गति से और कम समय में  पिघल रहे हैं. इस कारण फसल के समय पानी यकायक ग़ायब हो जाता है. पहाड़ों पर  ब़र्फ लंबे समय तक नहीं रह पाती है, जिससे वहां घास नहीं उग पा रही है. घास  न उगने के कारण वहां रहने वाले अनेक वन्यजीव इंसानी आबादी के निकट आ जाते  हैं, जैसा कि विगत कई वर्षों से देखा जा रहा है. यदि मौसम में ऐसी  अनियमितताएं अगले 10 वर्षों तक चलती रहीं तो आशंका इस बात की है कि ये  वन्यजीव लुप्तप्राय हो जाएंगे, क्योंकि ये गर्मी नहीं सह सकते. इसका उदाहरण  वे बकरियां हैं, जिनसे पशमीना ऊन मिलता है. प्रकृति ने उन्हें ठंडे  क्षेत्रों में पाला है, ताकि अधिकतम ऊन मिल सके, परंतु यदि इन क्षेत्रों  में गर्मी इसी तरह बढ़ती रही तो कुछ समय बाद पशमीना मिलना दुर्लभ हो जाएगा.</p>
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<p style="text-align: justify;">लद्दाख में पानी की समस्या  हमेशा से रही है. बढ़ते पर्यटन के कारण गेस्ट हाउस और होटलों की संख्या में  तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है, इससे पानी का बेतहाशा उपयोग हो रहा है. स्थानीय  नागरिक पानी बचाने के लिए सूखे शौचालयों का प्रयोग करते थे, जो अब कम होता  जा रहा है. घरों एवं होटलों आदि का कूड़ा-करकट खुले स्थानों पर फेंका जा रहा  है, जिससे पर्यावरण और भी दूषित हो रहा है.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">लद्दा़ख के अधिकतर गांव हिमनद के पानी पर निर्भर हैं. आज सर्दी में कम  हिमपात के कारण हिमनद घटते जा रहे हैं और बढ़ती गर्मी के कारण शीघ्र पिघल भी  रहे हैं. ऐसे में स्थानीय लोगों को शायद अन्य स्थानों की ओर पलायन करना  पड़े, क्योंकि अगले 20-30 वर्षों में इन गांवों में पानी उपलब्ध नहीं होगा.  पहले लेह में प्रदूषण मुख्यत: श्रीनगर जैसे विकसित पड़ोसी क्षेत्रों के कारण  होता था, मगर अब तो लद्दा़खी स्वयं इस स्थिति को बढ़ा रहे हैं. आज लेह में  मोटर गाड़ियों की संख्या बेहिसाब बढ़ गई है, क्योंकि हर व्यक्ति अपने पास कार  रखना चाहता है और निर्माण गतिविधियों के दबाव के कारण भारी गाड़ियों की  संख्या भी बढ़ी है. परोक्ष रूप से सेना भी इसमें योगदान कर रही है, क्योंकि  उसकी भी भारी संख्या में गाड़ियां हैं और डीज़ल जनरेटरों का लगातार उपयोग भी  कई कारणों से हो रहा है. बाहर से आए लोग भी प्रदूषण बढ़ाते हैं. एक तऱफ  जहां श्रमिक गर्मी पाने और खाना पकाने के लिए रबड़ के टायर, प्लास्टिक और  पुराने कपड़े आदि जलाते हैं, वहीं गर्मी में जब पर्यटन चरम सीमा पर होता है  तो पर्यटक पानी एवं अन्य पेय पदार्थों की बोतलें और खाने के सामान की  थैलियां आदि जगह-जगह फेंकते रहते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">लद्दा़ख में पानी की समस्या हमेशा से रही है. बढ़ते पर्यटन के कारण गेस्ट  हाउस और होटलों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है, इससे पानी का  बेतहाशा उपयोग हो रहा है. स्थानीय नागरिक पानी बचाने के लिए सूखे शौचालयों  का प्रयोग करते थे, जो अब कम होता जा रहा है. घरों एवं होटलों आदि का  कूड़ा-करकट खुले स्थानों पर फेंका जा रहा है, जिससे पर्यावरण और भी दूषित हो  रहा है. लद्दा़ख में स़फाई एवं कचरा प्रबंधन की पारंपरिक व्यवस्था चरमरा  रही है और आशंका है कि अनियंत्रित कचरा और मल एक दिन पानी के मुख्य स्रोतों  को भी प्रदूषित कर देगा. एक अन्य प्रकार का प्रदूषण भी लद्दा़ख के शांत  एवं रमणीय वातावरण को प्रभावित कर रहा है, बढ़ता हुआ शोर. कुछ समय पहले तक  सामाजिक अवसरों पर और त्योहारों में पारंपरिक ढोल (दमन) और बांसुरी (सुरना)  के सुरीले-मीठे स्वर ही झंकृत होते थे. यह संगीत अब खो गया है, इसके स्थान  पर अब आधुनिक तकनीक वाले साधनों द्वारा प्रसारित आवाज़ों का शोर ही सुनाई  देता है. एक पुरानी लद्दा़खी कहावत है, अमे ओमा नात मेत, गुख पे छवा गाल  मेत अर्थात जैसे मां का दूध रोग मुक्त होता है, बहता पानी भी कीटाणु रहित  होता है. लद्दा़ख के पुराने नागरिक आज बड़े दु:खी मन से अपनी लुप्त होती  सुंदरता और नैसर्गिता को देख रहे हैं और सोच रहे हैं कि आने वाली पीढ़ियों  के लिए क्या कोई इन्हें बचा पाएगा, संजो पाएगा?</p>
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<td width="540" align="left" valign="top"><strong>साभार- चौथि दुनिया</strong></p>
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