Category Archives: Vijay Mudshingikar

मेहनत रंग लाएगी, लेकिन…

जहां चाह है वहां राह है, लेकिन अपनी मंज़िल की ओर बढ़ना जितना आसान है उतना ही कठिन भी. कुछ ऐसा ही हाल है अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च (आईपी यूनिवर्सिटी, दिल्ली) के 13 छात्रों का, जिन्होंने अपने सपने को साकार करने के लिए दिन रात मेहनत की मगर हर बार निराशा ही हाथ लगी. दरअसल, पूरा माजरा यह है कि ये छात्र एक ऐसे रोबोट पर काम कर रहे हैं, जो पानी के अंदर सक्रिय होगा, जिसे एयूवी यानी एकोयूस्टिक अंडरवाटर व्हेकिल्स कहा जाता है. इस टीम में बिहार के औरंगाबाद के कमलेश कुमार (टीम लीडर), हिमांशु गुप्ता, आशीष शर्मा, हिमांशु जैन, राहुल चौहान, अभिषेक जय कुमार, हिमांशी भारद्वाज, अश्विन अग्रवाल, मानव कपूर, रोहित शर्मा, आदित्य नागर, भारत त्रिपाठी और सुमित गुप्ता शामिल हैं. उनकी टीम का नाम है, टीम समुद्र. 13 जून, 2011 को चेन्नई में एनआईओटी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में उत्तर भारत से यही एकमात्र टीम थी, जिसने प्रतियोगिता में अपनी जगह बनाई और रनर-अप भी रही. उनके इस जोश को देखकर एनआईओटी के वैज्ञानिक भी दंग रह गए, क्योंकि मुक़ाबला इतना आसान नहीं था. इस मुक़ाबले में देश भर से आए आईआईटी और एनआईटी के छात्रों को टीम समुद्र ने कड़ी टक्कर दी. अब उन्हें प्रोत्साहन के साथ-साथ ज़रूरत थी थोड़ी सी आर्थिक मदद की. ज़ाहिर सी बात है कि किसी प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए मेहनत, निष्ठा, ईमानदारी के अलावा पैसों की भी उतनी ही आवश्यकता होती है. इन छात्रों ने अपनी तऱफ से पूरी कोशिश की कि कोई उनके साथ खड़ा हो, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी. शायद इस वजह से क्योंकि उनका कॉलेज कोई नामी गिरामी कॉलेज नहीं था. फिर भी इन छात्रों ने अपना प्रयास निरंतर जारी रखा और इस रोबोट पर काम करते रहे. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस रोबोट को बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मैकेनिक्स एंड इमेज प्रोसेसिंग की गहन जानकारी होना आवश्यक है. लेकिन इनमें से किसी भी छात्र का मैकेनिक्स प्रमुख विषय नहीं है.

प्रतिभा है, निष्ठा है और ईमानदारी भी. लेकिन आर्थिक कमी की वजह से इनका सपना पूरा होते-होते रह जाता है. यह कहानी है, उन नौजवानों की जिनके पास एक सपना है. उस सपने को पूरा करने का जज़्बा भी है. ऐसा उन्होंने अपने प्रयास से साबित करके दिखाया है. लेकिन इनके सपनों को पंख लगें, इसके लिए ज़रूरत है कि कोई आगे आए और उनकी मदद करे. क्या कोई इस सपने को पूरा करने के लिए आगे आएगा?

फिर भी इन छात्रों के पास इतनी जानकारी है कि ये अपनी जानकारी की बदौलत इस रोबोट को बनाकर खड़ा कर सकते हैं. इन छात्रों का कहना है कि उन्होंने इस रोबोट को बनाने के लिए दिन रात एक कर दिया. तारी़फ तो सबने की, लेकिन मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आया. एयूवी बनाने का प्रयास हालांकि 2008 में ही शुरू हो चुका था, लेकिन राह इतनी आसान न थी. इसे बनाने के लिए होनहार छात्रों की ज़रूरत थी, जिनके क़दम किसी भी परिस्थिति में न डगमगाएं. आख़िरकार फाइनल टीम का चुनाव कर लिया गया. इन छात्रों में जोश था, उमंग थी और कुछ कर गुज़रने की चाह भी, जो इस प्रोजेक्ट के लिए बेहद ज़रूरी थी. सब मिले और उन्होंने इस पर काम करना शुरू भी कर दिया. ये अब अपने एयूवी को पानी के अंदर उतारने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, लेकिन अफ़सोस उन्हें जगह तक नहीं मिली. इतनी कठिन परिस्तिथियों से दो चार होने के बावजूद उनके हौसलों में कोई कमी नहीं आई है और अब उन्होंने सारा ज़िम्मा अपने ही कंधों पर उठा लिया है. इसे बनाने के लिए सभी ज़रूरी चीज़ों को ये खुद ही खरीदेंगे और इस रोबोट को आ़खिरी रूप देंगे. अब ये छात्र एयूवीएसआई संस्थान और ऑफिस ऑफ नेवल रिसर्च (ओएनआर) द्वारा 17 से 22 जुलाई, 2012 तक आयोजित होने वाली 15वें अंतरराष्ट्रीय रोबो सब प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगे. यह प्रतियोगिता सैन डियेगो अमेरिका में होगी. अगर इन होनहार छात्रों की मेहनत रंग लाती है तो ये न स़िर्फ विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित होगी, बल्कि पूरे देश के लिए भी गर्व की बात होगी.

साभार – चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/05/hardwork-will-work-but.html

इंडिया इन ट्रांजशिनः प्रौद्योगिकी मानव के इरादों को बुलंद करती है

अपने पर्यावरण की देशीय प्रकृति का ज्ञान संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण के प्रबंधन, भूमि संबंधी अधिकारों के आवंटन और अन्य समुदायों के साथ राजनयिक संबंधों के लिए आवश्यक है. भौगोलिक सूचनाएं प्राप्त करना और उनका अभिलेखन समुदाय को चलाने के लिए एक आवश्यक तत्व है. इन सूचनाओं की प्रोसेसिंग और उसके आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेना समुदाय के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, भले ही वह कोई घुमंतू जनजाति हो या फिर भारत के आकार का कोई देश.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं.

आज भारत संक्रमण काल से गुज़र रहा है, ऐसी कई स्वतंत्र एजेंसियां हैं, जो अलग-अलग लक्ष्यों और उद्देश्यों को सामने रखकर देश के संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में लगी हैं. पर्यावरण संबंधी विनियामक एजेंटों के बढ़ते काम के बोझ के कारण कार्यविधियों की बहुलता हो गई है, जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास की दर कम हो गई है और सरकार की पारदर्शिता भी कम हो गई है. खास तौर पर भारत के पर्यावरण और वनों के संरक्षण के लिए भारी मात्रा में भौगौलिक सूचनाओं को प्रोसेस करने और विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक अनुमोदनों की आवश्यकता होगी. निर्णय समर्थन प्रणाली को भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के साथ समन्वित करके भारत के पर्यावरण संबंधी विनियमन में सुधार लाया जा सकता है. भौगोलिक सूचनाओं के विश्लेषण के लिए विकसित भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) नामक यह सूचना प्रबंधन प्रणाली विभिन्न डेटा सेटों को समन्वित करती है और उपयोगकर्ताओं को एक ऐसी क्षमता प्रदान करती है, जिसकी सहायता से विभिन्न मूल स्थानों के साथ देशीय डेटा सेटों के आरपार की विशेषताओं को विश्लेषित किया जा सकता है.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं. सर्वेक्षक-दल भूमि के स्वामित्व की सीमाओं और भौतिक लक्षणों के परिमापन के काम में वर्षों का समय लगा सकते हैं और उच्च प्रशिक्षित मानचित्रक विस्तृत मानचित्रों के रूप में समस्त समुदायों की भौगोलिक सूचनाओं को अभिलेखित करेंगे. भौगोलिक सूचनाओं को एकत्र और अभिलेखित करने की भारत में लंबी परंपरा रही है. सबसे पहले और सबसे बड़ा भूमि सर्वेक्षण छठी सदी में शेरशाह सूरी ने भू-राजस्व के प्राक्कलन के लिए कराया था. मुगल बादशाह औरंगज़ेब और ब्रिटिश साम्राज्य ने भी सत्रहवीं सदी के अंत में लिखित अभिलेखों और क्षेत्रीय मानचित्रों की प्रणाली का उपयोग करते हुए अपनी अर्जित भूमि पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस काम को जारी रखा था. सूचनाओं के संकलन और विश्लेषण के लिए प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होती है, ताकि इस डेटा को प्रोसेस कराया जा सके और ज़्यादातर लोगों को इस विधि की जानकारी से दूर रखा जा सके, लेकिन पिछली सदी में सेटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग के आविष्कार के बाद इस स्थिति में काफ़ी बदलाव आ गया है. भौगोलिक सूचनाओं के संकलन के लिए यह अब अनिवार्य उपकरण बन गया है. रिमोट सेंसिंग सुदूर से ही निष्क्रिय और सक्रिय विद्युत चुंबकीय विकिरण द्वारा वस्तुओं के अध्ययन की विद्या है, जिसने सर्वेक्षण के  तौर-तरीक़ों को स्वचालित कर दिया है और इस प्रकार के डेटा को संकलित करने में लगने वाले समय को भी कम कर दिया है. अभिकलनात्मक (कम्यूटेशनल) शक्ति में वृद्धि होने और उन्नत सॉफ़्टवेयर के विकास के कारण सरलता से लगाई जा सकने योग्य भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के निर्माण को भी सहज बना दिया गया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा.

आज भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र में अनेक एजेंसियां हैं, जो रिमोट सेंसिंग डेटा के विभिन्न अनुप्रयोगों पर काम कर रही हैं. इन अनुप्रयोगों में सबसे प्रमुख है, प्रबंधन और संरक्षण की दृष्टि से पर्यावरण का अध्ययन. भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा देश के वन आवरण मानचित्रों का निर्माण किया जाता है और अन्य एजेंसियों द्वारा अपने हितों के संवर्धन के लिए मानचित्र बनाए या कमीशन किए जाते हैं. भौगोलिक सूचनाएं और पर्यावरणीय संरक्षण आपस में गुंथे हुए हैं. सीमाओं की पहचान और परिसीमन से उन क्षेत्रों या फिर सीमाओं पर पाबंदी लगाई जा सकती है या फिर उनमें प्रवेश मिल सकता है, जिनसे पारिस्थितिक सीमाओं या वन्य गतिविधियों को परिभाषित किया जा सकता है, जो पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए बहुत आवश्यक है. मानवीय गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव के नियंत्रण के लिए यह सूचना बहुत आवश्यक है, ताकि भारतीय पर्यावरण एवं वन (एमओईएफ) और विभिन्न राज्य वन विभाग जैसी पर्यावरणीय विनियामक एजेंसियों को इसे सुलभ कराया जा सके. इन एजेंसियों द्वारा लिए गए निर्णयों से हर रोज़ लाखों भारतीयों के जीवन और आजीविका पर असर पड़ता है. यह डेटा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जाता है और इन तमाम महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने के लिए इनका उपयोग किया जाता है, परंतु डेटाबेस बिखरा हुआ है. उच्चतम न्यायालय ने हाल में दिए गए अपने निर्णय में भारत की पर्यावरणीय सूचनाओं के डिजिटीकरण की ज़ोरदार शब्दों में वकालत की है और इस प्रकार इसकी आवश्यकता को स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा. इस जीआईएस का उपयोग भूदेशीय निर्णय समर्थन प्रणाली (जीडीएसएस) के रूप में किया जा सकेगा, ताकि विनियामक एजेंसियां पारदर्शी, सटीक, पुनरुत्पादक और नीति संबंधी मज़बूत निर्णय लेने में उनकी मदद ले सकें. इस जीडीएसएस के बिना सरकारी एजेंसियों की पहुंच उन सर्वोत्तम उपलब्ध उपकरणों तक नहीं हो सकती, जो देश के क़ानून को लागू करने के लिए आवश्यक हैं. उदाहरण के लिए गोवा राज्य की विधानसभा की लोक लेखा समिति ने अवैध खनन का पता लगाने के लिए हाल में गूगल अर्थ के  उपलब्ध सैटेलाइट बिंबों का खुलकर उपयोग किया. एक दक्ष जीआईएस की सहायता से संबंधित डेटाबेस का मात्र मिलान करके ही फ्लेग्रेंट उल्लंघनों को स्वत: फ़्लैग किया जा सकेगा. ऐसे बहुत से मामले होंगे, जो अब तक सामने नहीं आ पाए होंगे. यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा अनुरक्षित भूमि के उपयोग की निगरानी/कवर डायनेमिक्स वस्तुत: काम कर रहे जीडीएसएस का एक उदाहरण है. इस परियोजना का घोषित उद्देश्य यूरोपियन संघ की नीतियों एवं विधायिका की तैयारी, परिभाषा एवं कार्यान्वयन के समर्थन के लिए शहरी और क्षेत्रीय पर्यावरणों का मूल्यांकन, निगरानी, मॉडलिंग और विकास है. इसकी शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी. अमेरिकी वन सेवा भी जीडीएसएस के विभिन्न प्रयोजनों के लिए इसका उपयोग करती है. यह सेवा अपने इस नवीनतम उपकरण का उपयोग उन क्षेत्रों को चिन्हित करने के लिए करती है, जो सतही पेयजल की आपूर्ति करते हैं और जिन पर विकास के कारण ख़तरे मंडरा रहे हैं. जीडीएसएस से प्राप्त सूचना को उसके बाद वन कार्य योजनाओं में शामिल किया जा सकेगा या उसका उपयोग अन्य निर्णय संबंधी उपकरणों के लिए किया जा सकेगा.

इस (जीडीएसएस) का निर्माण एक तकनीकी और प्रौद्योगिकीय चुनौती होगी और इसका विकास गूगल या पैलेडिन जैसी निजी एजेंसियों द्वारा किया जा सकेगा, जो इस प्रकार के उद्यम स्तर के सॉफ़्टवेयर के डिज़ाइन और उत्पादन की प्रामाणिक तौर पर विशेषज्ञ हैं. राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईएस), राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए) जैसी भारत सरकार की एजेंसियां और विभिन्न सरकारी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) भी इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं. वैकल्पिक उत्पादन प्रक्रिया ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के विकास के द्वारा हो सकती है. बीते सितंबर माह में आयोजित अमेरिकी-रूसी सरकार का कोड-ए-थोन इस प्रक्रिया का एक उदाहरण है, जिसमें प्रोग्रामरों के दलों ने बेहतर शासन के लिए सूचना प्रणालियां निर्मित करने के लिए आपस में प्रतियोगिता की थी. व्यापक पर्यावरणीय जीडीएसएस निर्मित करने के लिए अपेक्षित प्रौद्योगिकी विद्यमान हैं, जिनके कार्यान्वयन से भारत में पर्यावरणीय विनियामक प्राधिकरणों की क्षमता बढ़ेगी और उनके इरादे बुलंद होंगे. आशा है, इससे भारत के पर्यावरण और वनों का बेहतर ढंग से संरक्षण होगा.

हिंदी अनुवाद : विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार.

(लेखक पर्यावरण के स्वतंत्र अनुसंधानकर्ता एवं मानचित्रकार हैं.) 

 

साभार- चौथिदुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/india-in-tronjshin-technology-has-elevated-human-motives.html

किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.

पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.

यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.

कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.

सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.

कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.

लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.

भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.

विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.

भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.

कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.

बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html


 

HAPPY DIWALI

Diwali…..”FESTIVAL OF LIGHTS” let us take pledge to avoid crackers, avoid Air & Noise Pollution… Gangajal nature Foundation, Mumbai

बिहारः बाढ़ का क़हर, पीडि़त भगवान भरोसे….!

लगातार बारिश और नेपाल द्वारा पानी छोड़े जाने के कारण उत्तर बिहार के लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. शहरी इलाक़ों में बाढ़ की स्थिति भयावह नहीं दिख रही है, लेकिन मधुबनी, समस्तीपुर, खगड़िया, बेगूसराय, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, अररिया, भागलपुर, कटिहार, मुंगेर एवं पूर्णियां सहित कई ज़िले बाढ़ की चपेट में हैं. प्रभावित लोग तटबंधों और अन्य ऊंची जगहों पर शरण ले रहे हैं. राज्य सरकार द्वारा समुचित राहत की कोई व्यवस्था नहीं है. शासन-प्रशासन की बेरुखी के कारण दर्जनों गांव के लोगों के समक्ष रोटी की समस्या उत्पन्न हो गई है. भूखे बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है. लोग मवेशियों के लिए चारा जुटाने के लिए कोई भी जोख़िम उठाने से नहीं हिचक रहे हैं. बावजूद इसके प्रशासन कई ज़िलों में बाढ़ की स्थिति सामान्य बता रहा है.

अररिया, भागलपुर एवं मुंगेर सहित कई अन्य जगहों पर भी बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि स्थिति सामान्य है, निश्चित रूप से जले पर नमक छिड़कने के समान है. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के परिणामस्वरूप अगर बाढ़ प्रभावित लोग उग्र रूप धारण करने को मजबूर हो जाएं तो सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के मुखिया को भी आश्चर्य में नहीं पड़ना चाहिए.

प्रभावित ज़िलों में भी कई स्थानों पर राहत सामग्री नहीं पहुंच सकी है, जिससे लोगों की परेशानी बढ़ गई है. स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका इस बार संदेह के घेरे में है, क्योंकि कुछ जगहों पर उन्होंने राहत शिविर का बैनर तो लगा दिया है, लेकिन राहत के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है. मुट्ठी भर राहत देकर स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रशासन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रभावित इलाक़ों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बाढ़ की स्थिति सामान्य बताते हुए कहा कि वहां राहत सामग्री के वितरण के साथ-साथ आवागमन के लिए पर्याप्त नौकाएं उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है. इस आदेश का अधिकारियों पर कितना असर हुआ और यह कितना कारगर होगा, यह तो व़क्त बताएगा, लेकिन जब चौथी दुनिया द्वारा प्रभावित इलाक़ों का जायज़ा लिया गया तो प्रमाणित हो गया कि लोग शासन-प्रशासन से अधिक भगवान पर भरोसा करने को मजबूर हैं. ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में पर्याप्त नौकाएं उपलब्ध कराने का दावा तो किया गया, लेकिन हक़ीक़त कुछ और है. नौकाएं न होने के कारण लोग जान जोख़िम में डालकर यहां-वहां आने-जाने के लिए मजबूर हैं. अब तक दो दर्जन से अधिक लोग इस चक्कर में डूबकर अपनी जान गंवा चुके हैं. कई इलाक़ों में नावों की व्यवस्था तो की गई है, लेकिन वे इतनी जर्जर हैं कि लोग उन पर सवारी करने से बच रहे हैं. कोसी, बागमती, काली कोसी एवं करेह सहित कई नदियों के जलस्तर में अत्यधिक वृद्वि न होने से कुछ इलाक़े पूर्ण रूप से और कुछ आंशिक रूप से प्रभावित हुए हैं,  लेकिन गंगा एवं बूढ़ी गंडक की उफनती धार ने कई नए इलाक़ों में कोहराम मचा दिया है. बाढ़ आने के पूर्व एकत्र किए गए खाद्यान्न से ही कई परिवार किसी तरह अपनी भूख मिटा रहे हैं. अब जबकि खाद्यान्न लगभग ख़त्म होने को है, इसलिए बाढ़ का जायज़ा लेने पहुंच रहे प्रशासनिक अधिकारियों को प्रभावित लोगों द्वारा खदेड़ा जा रहा है. बेगूसराय ज़िले में गंगा नदी में आई भयंकर बाढ़ के कारण मटिहानी, बलिया, शाम्हो एवं सनहा सहित कई अन्य इलाक़ों के लोग तबाही झेलने को मजबूर हैं. सनहा गोरगामा बांध के कई हिस्सों में दरार पड़ने के कारण कई इलाक़ों में दहशत का माहौल है. गंगा की दहाड़ से सहमे लोगों के साथ-साथ प्रशासन द्वारा लगातार स्थिति पर नज़र रखी जा रही है. दियारा इलाक़े में रहने वाले लोगों के लिए जान बचाना मुश्किल होता जा रहा है. कई ऐसे प्रभावित गांव हैं, जहां अभी तक राहत वितरण की बात तो दूर, प्रशासनिक अधिकारी जायज़ा लेने भी नहीं पहुंचे हैं. समस्तीपुर ज़िले के मोहिउद्दीनगर एवं मोहनपुर सहित पटोरी प्रखंड की कई पंचायतों में सैलाब ने लोगों की ज़िंदगी पटरी से उतार दी है. घरेलू सामान और मवेशियों के साथ इलाक़े से पलायन कर चुके लोग सिर छिपाने के लिए इधर-इधर भटक रहे हैं. खगड़िया ज़िले के 59 गांवों में बाढ़ का कहर जारी है. गोगरी अनुमंडल के बाढ़ प्रभावित लोगों में प्रशासन के प्रति खासी नाराज़गी देखी जा रही है. राहत से वंचित लोगों का कहना है कि राहत वितरण के नाम पर जमकर धांधली बरती जा रही है. अभी तक नाव की व्यवस्था नहीं की गई है. कटघरा निवासी विनोद राय, सुमन राय, गौतम राय एवं बिनोद महतो और भूड़िया गांव निवासी अवधेश यादव एवं सूखो यादव आदि ने बताया कि सरकारी स्तर से नाव उपलब्ध न कराए जाने के कारण लोगों को निजी नावों पर सवारी करनी पड़ रही है. अधिक कमाई की चाहत में नाविकों द्वारा क्षमता से अधिक लोगों को नाव पर लादने के कारण हर समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. खगड़िया प्रखंड के रहीमपुर नया टोला, नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 24 एवं 26 सहित अन्य इलाक़ों में भी कमोबेश यही स्थिति देखने को मिल रही है. नाव न होने के कारण लोग नाद (मवेशियों का भोजन पात्र) या अन्य साधनों का सहारा लेकर आ-जा रहे हैं. खगड़िया से होकर गुजरने वाले एनएच- 31 एवं रेलवे ब्रिज के पास बूढ़ी गंडक ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही है. नतीजतन राष्ट्रीय राजमार्ग-31 पर भी ख़तरा मंडराने लगा है. यह अलग बात है कि कार्यपालक अभियंता का कहना है कि एनएच-31 से पानी पांच फीट नीचे है. कोसी नदी भी बलतारा, बसुआ और कुरसैला में खतरे के निशान से ऊपर बह रही है. गोगरी-नगरपाड़ा तटबंध एवं बदला-नगरपाड़ा तटबंध के कई हिस्सों पर बूढ़ी गंडक नदी का दबाव बना हुआ है, जबकि नारायणपुर लिंक बांध पर भी ख़तरा उत्पन्न हो गया है. गोगरी के साथ-साथ परबत्ता प्रखंड में गंगा एवं बूढ़ी गंडक ने जनजीवन प्रभावित कर दिया है. बन्नी, बौरना एवं गोगरी पंचायत सहित कई अन्य इलाक़ों में बाढ़ की स्थिति भयावह बनी हुई है. मधुआ गांव के पास बूढ़ी गंडक नदी का पानी बाएं तटबंध को भेद चुका है. परबत्ता प्रखंड के सौढ़ उत्तरी एवं सलारपुर पंचायत के लोगों का जीना मुहाल हो गया है. सुपौल, मधेपुरा एवं कटिहार में भी बाढ़ का कहर जारी है. मधेपुरा ज़िले के पास एनएच-107 पर बना बलुआहा डायवर्सन ध्वस्त हो जाने के कारण तीन ज़िलों का पटना मुख्यालय से सड़क संपर्क भंग हो गया है. खगड़िया-बेलदौर के बीच बना डुमरी पुल पहले ही ध्वस्त होने के कारण मधेपुरा, सहरसा एवं सुपौल के लोगों को पूर्णियां होकर पटना पहुंचना पड़ता था. मधेपुरा ज़िले के चौसा प्रखंड की आधा दर्जन पंचायतें पूरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं. सुपौल ज़िले की कई पंचायतों में बाढ़ का पानी कहर बरपा रहा है. यहां के लोगों के लिए राहत की बात यह है कि अमहा के समीप नहर टूट जाने से पानी कम होने लगा है. बिहार-बंगाल सीमा के समीप बहने वाली नागर नदी के जलस्तर में वृद्वि होने के कारण कटिहार ज़िले के बारसोई एवं विघोर के कई गांव जलमग्न हो गए हैं. नजराबाड़ी, पीरासन एवं डेंगरापाड़ा में बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है, जबकि कई गांवों पर ख़तरा मंडरा रहा है. अररिया, भागलपुर एवं मुंगेर सहित कई अन्य जगहों पर भी बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि स्थिति सामान्य है, निश्चित रूप से जले पर नमक छिड़कने के समान है. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के परिणामस्वरूप अगर बाढ़ प्रभावित लोग उग्र रूप धारण करने को मजबूर हो जाएं तो सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के मुखिया को भी आश्चर्य में नहीं पड़ना चाहिए.


साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/09/bihar-torture-of-the-flood-injured-trusts-on-god.html

r

Changing Climate

Over the past few years, the scientific debate has intensified on the nature and possible causes underlying changing climate. Questions have arisen over the significance of man-made green house gases in stimulating global warming. Science progresses through such rational criticism and objective discourse, and not through consensus invoked by any authority.

The United Nation’s Inter-governmental Panel on Climate Change, was formed in 1988, to provide an assessment of global climate change.  IPCC’s Fourth Assessment Report (AR4) released in 2007 linked the warming over the past 30 yrs, about 0.7 C, to anthropogenic green house gases, particularly CO2. At he UN’s Framework Convention on Climate Change (UNFCCC), countries have been debating possible carbon emission targets to minimize future adverse impact of changing climate on human societies.

However, over the last few years, a number of errors have been identified in the AR4. Also, a number of plausible alternative theories have emerged explaining possible changes in climate. Consequently, there is a growing need to reassess the policy options and the economic impact of climate. The government of India too has taken a number of initiatives to improve understanding of the underlying science and policy options.

The Purpose

The purpose of this event is to initiate a fresh discussion on the different dimension of the debate on global warming. The aim is to build a movement, a network of scientists, economists, policymakers, elected representatives and concerned citizens who believe in sound science and economic policy options. The goal is to limit the rampant fear mongering, exaggerated claims and media hype, which are casting a shadow on rational assessment of climate and objectively shaping policy, if any, to address the possible impact of changes in climate.

Background

In 2009, the Heartland Institute, a non-profit organization in the USA, had published the “Climate Change Reconsidered”, a 800-page report put together by an independent panel of scientists, under the banner of Non-governmental International Panel on Climate Change (NIPCC).  This report is perhaps the most comprehensive response to the latest report of the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC). The next report of the NIPCC is expected to be released in 2013.

In 2010, Liberty Institute in New Delhi, in partnership with the Heartland Institute, reprinted the NIPCC report “Climate Change Reconsidered” for wider dissemination in India. In addition, the executive summary of the report has been translated in to half-dozen Indian languages. These may help contribute to a more rational discourse on climate change.

The Karnataka Environment Research Foundation (KERF),

Institution of Engineers, Karnataka state Centre (IEI-KSC)

And

Liberty Institute New Delhi

Cordially invite you to

A Panel Discussion on

Climate Change Reconsidered

&

Release of the summary in Kannada

Release of the executive summary of book Climate Change Reconsidered:

Prof. H. R. Ramakrishna Rao, Science Communicator and former professor of Physics from Christ College, Bangalore

Invited Panelists:

Dr.BP Radhakrishna,

Dr.J Srinivasan, Chairman, CAOS, IISc

Dr.RR Kelkar, Former Director IITM, Pune

Dr.M.B.Rajegowda, Professor ACIRP, Agrometereology Division, UAS

DrLVM Reddy, former Chairman, IEI, KSC

Dr.Sharat Chandra Lele, Senior Fellow, ATREE

Dr.TR Anantharamu, former Scientist GSI

Dr.MR Pranesh, former Prof. & Head Ocean Engg.Dept, IIT Chennai & VP,KERF

Sri Barun Mitra, Policy Analyst, Liberty Institute, New Delhi

Dr.A Jayaraman, Director, NMRF Facility (ISRO), Gadanki, Tirupathi

Others being invited are waited for confirmation

Mr. Edwin, Moderator of Discussions

Date: Friday, June 17, 4 pm to 7 pm

Venue: Institution of Engineers, Karnataka State Centre, Dr. Ambedkar Veedhi, Opposite Indian Express, Bangalore 560 001

RSVP.

CJ Jagadeesha, Secretary, KERF,

IEI-KSC; Convener ICCS

Mobile: 09449066052

Email: <cjagadeesha@gmail.com>

Liberty Institute, New Delhi

Tel: 011-28031309

Email: info@LibertyInstitute.org.in

info@ChallengingClimate.org

www.InDefenceofLiberty.org

www.ChallengingClimate.org

पर्यावरण साहित्य संमेलन- दापोली

या वर्षी पावसाळा बराच काळ लांबला, युरोप बरोबरच आपल्या देशातील लेह-लडाख आणि श्रीनगर सारख्या उत्तरेकडच्या भागात तुफान हिमवर्षाव होऊन उच्चांक गाठला गेला. आता आणखी पुढे काय वाढून ठेवलय? जागतिक तापमान वाढ आणि त्याचे होणारे परिणाम या बद्दल आता जनसामान्यात देखील चर्चा होताना दिसते. प्रसार माध्यमातसुद्धा आता हा चर्चेचा विषय होऊन राहिला आहे. हे सर्व मुद्दे विचारात घेऊन पर्यावरण विषयक साहित्याला वाहिलेलं असं अनोखं साहित्य संमेलन पर्यावरणतज्ज्ञ दिलीप कुलकर्णी यांच्या पुढाकाराने दापोली येथे आयोजित करण्यात आले आहे. हे संमेलन १७  व १८ डिसेंबरला जालगाव-ब्राह्मणवाडी येथील ज्ञानप्रसाद मंगल कार्यालयात होईल. संमेलनाचे उद्‌घाटन १७ डिसेंबरला दुपारी ४ वाजता होईल. कन्याकुमारी येथील विवेकानंद केंद्राच्या नैसर्गिक साधनसंपत्ती विकास प्रकल्पाचे जी. वासुदेव हे उद्‌घाटक म्हणून लाभले आहेत. याच दिवशी जैवविविधता : स्वरूप आणि महत्त्व या विषयावर डॉ. प्रकाश गोळे यांचे बीजभाषण, पर्यावरणविषयक अनुबोधपटांच्या निर्मात्यांच्या मुलाखती, नव्या पुस्तकांची प्रकाशने व रात्री प्रबोधक अनुबोधपटांचे प्रदर्शन हे कार्यक्रम होतील. १८ ला पर्यावरण साहित्याचा आढावा, पर्यावरणविषयक पुस्तके, नियतकालिके, शैक्षणिक साहित्य, अनुबोधपट वाहिन्या, संकेतस्थळे आदींचा आढावा घेण्यात येईल. वृत्तपत्रातून सातत्याने पर्यावरण विषयक लेखन करणारे लोकसत्ताचे उपसंपादक श्री. अभिजित घोरपडे, गंगाजलचे श्री. विजय मुडशिंगीकर यांचाही या संमेलनात सहभाग असणार आहे. पर्यावरण हा आता केवळ तज्ज्ञांचाच विषय राहिला नसून सामान्य माणसांमध्येही त्याबद्दल  जागृती निर्माण व्हावी असा या संमेलना मागचा उद्देश आहे.

– नरेंद्र प्रभू



कारवाईचा आदेश देणारे मुख्यमंत्री हटले, झोपडय़ा मात्र तशाच!

कोटय़वधी रुपये खर्चून मिठी नदी आणि वाकोला नाल्याचा सर्वागीण विकास करण्यात आला असला तरी आता याच नदी-नाल्यांच्या दोन्ही बाजूस पुन्हा एकदा मोठय़ा प्रमाणात अनाधिकृत झोपडय़ा उभ्या राहू लागल्या आहेत. त्यामुळे दिवसागणिक वाढणाऱ्या या झोपडय़ा मिठी आणि तिच्या उपनद्यांना गिळंकृत करण्याची भीती पर्यावरणप्रेमींकडून व्यक्त होत आहे. याची दखल घेत माजी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण यांनी नदी किनाऱ्यावर होणाऱ्या अनधिकृत झोपडय़ा त्वरित हटविण्याचे आदेश एमएमआरडीएला दिले होते. प्रत्यक्षात मात्र कारवाईचे आदेश देणारे चव्हाणच मुख्यमंत्रीपदावरून हटले तरी या नाल्यावरील झोपडय़ा तशाच उभ्या आहेत. किंबहुना त्यात वाढच होत असल्याचे दिसून येत आहे.
जुलै २००५ मध्ये झालेल्या अतिवृष्टीचा मुंबईला मोठा फटका बसला होता. त्यानंतर मिठी नदी आणि वाकोला नाल्यासह अन्य काही नाल्यांचा सर्वागिण विकास करण्याची योजना प्राधिकरणाने हाती घेतली होती. त्यासाठी कोटय़वधी रूपये खर्चून मिठी नदी आणि वाकोला नाल्याच्या दोन्ही बाजूंची अतिक्रमणे हटविण्याबरोबरच नदीच्या पात्राचे रुंदीकरण, खोलीकरण आणि संरक्षक भिंत बांधणे आदी कामे करण्यात आली. त्याचबरोबर भविष्यात नदीपात्रामध्ये अतिक्रमणे होऊ नयेत आणि नदीचा प्रवाह मोकळा रहावा यासाठी काठावर संरक्षक भिंत बांधण्याबरोबरच दोन्ही बाजूंना सहा मीटर रुंदीचा सव्‍‌र्हिस रोड निर्माण करण्यात आला. भविष्यात केव्हाही मिठी अथवा वाकोला नाल्यात काही कामे करायची झाल्यास या सव्‍‌र्हिस रोडचा वापर करता येईल अशी या मागची प्राधिकरणाची भूमिका असली तरी हा सव्‍‌र्हिस रोड नदीच्या सुरक्षिततेसाठी नव्हे तर पात्रातील आणि आसपासच्या झोपडय़ांना ‘सीआरझेड’मधून मुक्त करण्यासाठीच बांधला जात असल्याच आरोप पर्यावरणप्रेमीेंकडून केला जात आहे. तसेच नदीच्या दोन्ही किनाऱ्याला बांधण्यात आलेल्या भिंतीमुळे आसपासची खारफुटी नष्ट होईल अशी भितीही व्यक्त होत आहे. मध्यंतरी वाकोला नाल्यावरील संरक्षक भिंतीचे प्रकरण न्यायालयात गेले तेव्हाही नाल्यात बांधकामे होऊ नयेत यासाठीच भिंत आणि सव्‍‌र्हिस रोड निर्माण करण्यात येत असल्याचा, असा दावा एमएमआरडीएने केला होता.
प्राधिकरणाच्या या दाव्यानुसार मिठी नदी आणि वाकोला नाल्यात अतिक्रमणे होणार नाहीत अशी अपेक्षा केली जात होती. प्रत्यक्षात मात्र या संरक्षण भिंतीला खेटूनच सव्‍‌र्हिस रोडवर बऱ्याच झोपडय़ा उभारल्या जात आहेत. भारतनगरमध्ये अनधिकृत झोपडय़ांचा असा सुळसुळाट झालेला असतानाच समोरच्या इंदिरानगर झोपडपट्टीत उरलीसुरली खारफुटीही नष्ट करून त्यावर झोपडय़ा उभारल्या जात आहेत. अशाच प्रकारे माहीम कॉजवे ते सीएसटी पुलाच्या दरम्यान आंबेडकर नगर, महाराष्ट्र नगर, वाल्मिकी नगर, संत ज्ञानेश्वर नगर, टॅक्सीमेन कॉलनी, शिक्षक नगर आणि मच्छिमार कॉलनी या भागातही नदीच्या पात्रातील झोपडय़ा कायम असून त्यात दिवसेंदिवस वाढ होत आहे. एमएमआरडीए मुख्यालयापासून हाकेच्या अंतरावर असलेल्या या भागात राजरोस या झोपडय़ा उभारल्या जात असताना प्राधिकरण मात्र मुग गिळून गप्प बसले आहे. झोपडय़ांच्या या अतिक्रमणाबाबत तत्कालिन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण यांच्याकडे नागरिकांनी तक्रारी केल्यानंतर या झोपडय़ांवर त्वरित कारवाई करण्याचे आदेश चव्हाण यांनी एमएमआरडीला दिले होते. मात्र या आदेशाला दोन महिने लोटल्यानंतरही सदर झोपडय़ांवर अद्याप कोणतीच कारवाई झाल्याचे दिसत नाही. आता तर या झोपडय़ा हटविण्याची आमची जबाबदारी नसून ती उपनगर जिल्हाधिकाऱ्यांची असल्याचा दावाही प्राधिकरणाच्या वरिष्ठ अधिकाऱ्याने केला तर ही जमिन प्राधिकरणाचीच असून त्यांनीच त्यावर रस्ता केला आहे. त्यामुळे झोपडय़ा हटविण्याची जबाबदारी त्यांचीच असल्याचे प्रत्युत्तर जिल्हाधिकाऱ्यांनी दिले.
कारवाईबाबत जिल्हाधिकारी कार्यालय आणि एमएमआरडीए परस्परांकडे अंगुलीनिर्देश करीत असत्याने अतिक्रमणमुक्त मिठीचे स्वप्न हवेतच विरण्याची लक्षणे दिसू लागली आहेत.

साभार-लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=115174:2010-11-16-19-49-12&catid=41:2009-07-15-03-58-17&Itemid=81

गंगापुत्र

विजय मुडशिंगीकर

दिवाळी सारखे सण आले की हल्ली मुंबईत रहावत नाही. फटाक्यांचा अतिरेक आणि कानठळ्या बसवणारा आवाज याने जीव हैराण होतो. आवाज, हवा यांच्या प्रदुषणात कमालीची वाढ होते. या वर्षी ऎन दिवाळीत अमेरिकेचे राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा मुंबईत होते. त्यांची सुरक्षा व्यवस्था चोख असली तरी त्यांच्यापर्यंत हे प्रदूषित हवा नक्कीच पोहोचली असणार. आपण प्रगत राष्टाच्या दिशेने वाटचाल करत आहोत. ओबामानी तर भारत प्रगतीशील नव्हे तर प्रगत देश आहे असे म्हटले आहे. पण त्यानी तसं म्हणून काय उपयोग. ते इथल्या प्रत्येक कृतीतून दिसून आलं पाहिजे. मुंबईवरून ओबामा उडत असताना त्यानी शहराचा झालेला उकिरडा नक्कीच बघितला असणार. विमानतळाजवळची मिठी नदी ओबामांच्या नजरेस पडली असती तरी त्याना भारत अजून किती मागे आहे हे समजलं असतं. हे आपणच असं का करतोय?

ओबामांनी भाराताबाद्दल आशावादी विचार मांडले. इथली मुलं, तरूण यांना पाहून ते प्रभावीतही झाले. एकप्रकारची ताकद आणि इच्छाशक्ती इथल्या वातावरणात त्यांना दिसून आली. खरच एक दिवस भारत सामर्थ्यवान देश बनेल अशी आशा त्यांना, तुम्हा आम्हा सर्वांना आहे त्याचं कारण एक ध्येय्य घेऊन झटणारी माणसं अजून या देशात आहेत. ओबामा भारतात यायला निघाले आणि सर्वच वृत्तपत्रात त्यांच्याबद्दल लिहून यायला लागलं. लोकसत्तामध्ये याच दरम्यान मिसिसिपी ते गंगा! हा अग्रलेख आला होता. मनात आणलं तर एक सामान्य माणूस काय करू शकतो हे त्या नमूद केलं होतं. ‘गेल्या काही वर्षांत विजय मुडशिंगीकर या महाराष्ट्रातील एका एकांडय़ा शिलेदाराने गंगेच्या स्वच्छतेची मोहीम हाती घेतली आहे. निवृत्तीनंतरची पुंजी म्हणून जमा करून ठेवलेला भविष्य निर्वाह निधी त्यांनी पूर्णपणे या मोहिमेत ओतला आहे.’ असा उल्लेख त्या अग्रलेखात होता. श्री. मुडशिंगीकरानी केलेलं काम नक्कीच दाद देण्यासारखं आहे, विचार करायला लावणारं आहे.

‘आदर्श’ सारखे घोटाळे, सत्ताधिश, नोकरशहा, बिल्डर, दलाल हे सगळे देश विकून खात असताना हा देश अजू

गंगोत्री

न तगून आहे तो मुडशिंगीकरांसारख्या

प्रामाणिक लोकांमुळेच. एक सोडून दोन वेळा मणक्याची ऑपरेशन झाली तरी त्यानी त्या आजारपणात ध्यास घेतला तो गंगा शुद्धीकरणाचा. ते आपल्या या भुमिकेशी एवढे प्रामाणिक राहिले की या भ्रमणयात्रे दरम्यान काढलेल्या छायाचित्रांना चांगली किंमत येत असतानाही त्यांनी ती विकली नाहीत. सगळ्याच क्षेत्रात होणारं प्रदुषण रोखण्याच्या बाबतीत ते आग्रही असतात.

‘गंगा’ ते ‘आदर्श’ सगळीकडेच भ्रष्टाचार, प्रदुषण. सगळ्या देशाचाच चेहरामोहरा विद्रूप होत असताना अशी काही माणसं (अण्णा हजारे, पोपटराव पवार) आपलं काम निष्ठेने करत रहातात म्हणून काही अंशी आपण हे विष पचवू शकतो. मुडशिंगीकरांसारख्यांच्या प्रयत्नाला हातभार लावला तर आणि तरच ‘गंगाजल’ पुन्हा शुद्ध होईल. पवित्र होईल.

– नरेंन्द्र प्रभू
साभार- नरेंन्द्र प्रभू ब्लाँग.

http://prabhunarendra.blogspot.com/