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इंडिया इन ट्रांजशिनः प्रौद्योगिकी मानव के इरादों को बुलंद करती है

अपने पर्यावरण की देशीय प्रकृति का ज्ञान संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण के प्रबंधन, भूमि संबंधी अधिकारों के आवंटन और अन्य समुदायों के साथ राजनयिक संबंधों के लिए आवश्यक है. भौगोलिक सूचनाएं प्राप्त करना और उनका अभिलेखन समुदाय को चलाने के लिए एक आवश्यक तत्व है. इन सूचनाओं की प्रोसेसिंग और उसके आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेना समुदाय के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, भले ही वह कोई घुमंतू जनजाति हो या फिर भारत के आकार का कोई देश.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं.

आज भारत संक्रमण काल से गुज़र रहा है, ऐसी कई स्वतंत्र एजेंसियां हैं, जो अलग-अलग लक्ष्यों और उद्देश्यों को सामने रखकर देश के संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में लगी हैं. पर्यावरण संबंधी विनियामक एजेंटों के बढ़ते काम के बोझ के कारण कार्यविधियों की बहुलता हो गई है, जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास की दर कम हो गई है और सरकार की पारदर्शिता भी कम हो गई है. खास तौर पर भारत के पर्यावरण और वनों के संरक्षण के लिए भारी मात्रा में भौगौलिक सूचनाओं को प्रोसेस करने और विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक अनुमोदनों की आवश्यकता होगी. निर्णय समर्थन प्रणाली को भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के साथ समन्वित करके भारत के पर्यावरण संबंधी विनियमन में सुधार लाया जा सकता है. भौगोलिक सूचनाओं के विश्लेषण के लिए विकसित भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) नामक यह सूचना प्रबंधन प्रणाली विभिन्न डेटा सेटों को समन्वित करती है और उपयोगकर्ताओं को एक ऐसी क्षमता प्रदान करती है, जिसकी सहायता से विभिन्न मूल स्थानों के साथ देशीय डेटा सेटों के आरपार की विशेषताओं को विश्लेषित किया जा सकता है.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं. सर्वेक्षक-दल भूमि के स्वामित्व की सीमाओं और भौतिक लक्षणों के परिमापन के काम में वर्षों का समय लगा सकते हैं और उच्च प्रशिक्षित मानचित्रक विस्तृत मानचित्रों के रूप में समस्त समुदायों की भौगोलिक सूचनाओं को अभिलेखित करेंगे. भौगोलिक सूचनाओं को एकत्र और अभिलेखित करने की भारत में लंबी परंपरा रही है. सबसे पहले और सबसे बड़ा भूमि सर्वेक्षण छठी सदी में शेरशाह सूरी ने भू-राजस्व के प्राक्कलन के लिए कराया था. मुगल बादशाह औरंगज़ेब और ब्रिटिश साम्राज्य ने भी सत्रहवीं सदी के अंत में लिखित अभिलेखों और क्षेत्रीय मानचित्रों की प्रणाली का उपयोग करते हुए अपनी अर्जित भूमि पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस काम को जारी रखा था. सूचनाओं के संकलन और विश्लेषण के लिए प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होती है, ताकि इस डेटा को प्रोसेस कराया जा सके और ज़्यादातर लोगों को इस विधि की जानकारी से दूर रखा जा सके, लेकिन पिछली सदी में सेटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग के आविष्कार के बाद इस स्थिति में काफ़ी बदलाव आ गया है. भौगोलिक सूचनाओं के संकलन के लिए यह अब अनिवार्य उपकरण बन गया है. रिमोट सेंसिंग सुदूर से ही निष्क्रिय और सक्रिय विद्युत चुंबकीय विकिरण द्वारा वस्तुओं के अध्ययन की विद्या है, जिसने सर्वेक्षण के  तौर-तरीक़ों को स्वचालित कर दिया है और इस प्रकार के डेटा को संकलित करने में लगने वाले समय को भी कम कर दिया है. अभिकलनात्मक (कम्यूटेशनल) शक्ति में वृद्धि होने और उन्नत सॉफ़्टवेयर के विकास के कारण सरलता से लगाई जा सकने योग्य भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के निर्माण को भी सहज बना दिया गया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा.

आज भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र में अनेक एजेंसियां हैं, जो रिमोट सेंसिंग डेटा के विभिन्न अनुप्रयोगों पर काम कर रही हैं. इन अनुप्रयोगों में सबसे प्रमुख है, प्रबंधन और संरक्षण की दृष्टि से पर्यावरण का अध्ययन. भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा देश के वन आवरण मानचित्रों का निर्माण किया जाता है और अन्य एजेंसियों द्वारा अपने हितों के संवर्धन के लिए मानचित्र बनाए या कमीशन किए जाते हैं. भौगोलिक सूचनाएं और पर्यावरणीय संरक्षण आपस में गुंथे हुए हैं. सीमाओं की पहचान और परिसीमन से उन क्षेत्रों या फिर सीमाओं पर पाबंदी लगाई जा सकती है या फिर उनमें प्रवेश मिल सकता है, जिनसे पारिस्थितिक सीमाओं या वन्य गतिविधियों को परिभाषित किया जा सकता है, जो पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए बहुत आवश्यक है. मानवीय गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव के नियंत्रण के लिए यह सूचना बहुत आवश्यक है, ताकि भारतीय पर्यावरण एवं वन (एमओईएफ) और विभिन्न राज्य वन विभाग जैसी पर्यावरणीय विनियामक एजेंसियों को इसे सुलभ कराया जा सके. इन एजेंसियों द्वारा लिए गए निर्णयों से हर रोज़ लाखों भारतीयों के जीवन और आजीविका पर असर पड़ता है. यह डेटा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जाता है और इन तमाम महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने के लिए इनका उपयोग किया जाता है, परंतु डेटाबेस बिखरा हुआ है. उच्चतम न्यायालय ने हाल में दिए गए अपने निर्णय में भारत की पर्यावरणीय सूचनाओं के डिजिटीकरण की ज़ोरदार शब्दों में वकालत की है और इस प्रकार इसकी आवश्यकता को स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा. इस जीआईएस का उपयोग भूदेशीय निर्णय समर्थन प्रणाली (जीडीएसएस) के रूप में किया जा सकेगा, ताकि विनियामक एजेंसियां पारदर्शी, सटीक, पुनरुत्पादक और नीति संबंधी मज़बूत निर्णय लेने में उनकी मदद ले सकें. इस जीडीएसएस के बिना सरकारी एजेंसियों की पहुंच उन सर्वोत्तम उपलब्ध उपकरणों तक नहीं हो सकती, जो देश के क़ानून को लागू करने के लिए आवश्यक हैं. उदाहरण के लिए गोवा राज्य की विधानसभा की लोक लेखा समिति ने अवैध खनन का पता लगाने के लिए हाल में गूगल अर्थ के  उपलब्ध सैटेलाइट बिंबों का खुलकर उपयोग किया. एक दक्ष जीआईएस की सहायता से संबंधित डेटाबेस का मात्र मिलान करके ही फ्लेग्रेंट उल्लंघनों को स्वत: फ़्लैग किया जा सकेगा. ऐसे बहुत से मामले होंगे, जो अब तक सामने नहीं आ पाए होंगे. यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा अनुरक्षित भूमि के उपयोग की निगरानी/कवर डायनेमिक्स वस्तुत: काम कर रहे जीडीएसएस का एक उदाहरण है. इस परियोजना का घोषित उद्देश्य यूरोपियन संघ की नीतियों एवं विधायिका की तैयारी, परिभाषा एवं कार्यान्वयन के समर्थन के लिए शहरी और क्षेत्रीय पर्यावरणों का मूल्यांकन, निगरानी, मॉडलिंग और विकास है. इसकी शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी. अमेरिकी वन सेवा भी जीडीएसएस के विभिन्न प्रयोजनों के लिए इसका उपयोग करती है. यह सेवा अपने इस नवीनतम उपकरण का उपयोग उन क्षेत्रों को चिन्हित करने के लिए करती है, जो सतही पेयजल की आपूर्ति करते हैं और जिन पर विकास के कारण ख़तरे मंडरा रहे हैं. जीडीएसएस से प्राप्त सूचना को उसके बाद वन कार्य योजनाओं में शामिल किया जा सकेगा या उसका उपयोग अन्य निर्णय संबंधी उपकरणों के लिए किया जा सकेगा.

इस (जीडीएसएस) का निर्माण एक तकनीकी और प्रौद्योगिकीय चुनौती होगी और इसका विकास गूगल या पैलेडिन जैसी निजी एजेंसियों द्वारा किया जा सकेगा, जो इस प्रकार के उद्यम स्तर के सॉफ़्टवेयर के डिज़ाइन और उत्पादन की प्रामाणिक तौर पर विशेषज्ञ हैं. राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईएस), राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए) जैसी भारत सरकार की एजेंसियां और विभिन्न सरकारी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) भी इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं. वैकल्पिक उत्पादन प्रक्रिया ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के विकास के द्वारा हो सकती है. बीते सितंबर माह में आयोजित अमेरिकी-रूसी सरकार का कोड-ए-थोन इस प्रक्रिया का एक उदाहरण है, जिसमें प्रोग्रामरों के दलों ने बेहतर शासन के लिए सूचना प्रणालियां निर्मित करने के लिए आपस में प्रतियोगिता की थी. व्यापक पर्यावरणीय जीडीएसएस निर्मित करने के लिए अपेक्षित प्रौद्योगिकी विद्यमान हैं, जिनके कार्यान्वयन से भारत में पर्यावरणीय विनियामक प्राधिकरणों की क्षमता बढ़ेगी और उनके इरादे बुलंद होंगे. आशा है, इससे भारत के पर्यावरण और वनों का बेहतर ढंग से संरक्षण होगा.

हिंदी अनुवाद : विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार.

(लेखक पर्यावरण के स्वतंत्र अनुसंधानकर्ता एवं मानचित्रकार हैं.) 

 

साभार- चौथिदुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/india-in-tronjshin-technology-has-elevated-human-motives.html

वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.

समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

पृष्ठभूमि

जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.

परिवर्तन की पहली लहर

पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.

यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.

वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन

यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.

इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.

दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.

स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.

स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.

तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.

चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.

इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.

कार्यान्वयन की चुनौतियां

आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.

उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.

इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.

एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.

निष्कर्ष

वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.

आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.

– प्रांजुल भंडारी

(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html

किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.

पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.

यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.

कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.

सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.

कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.

लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.

भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.

विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.

भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.

कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.

बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html


 

शेखावाटीः चलें गांव की ओर

राजस्थान के झुंझनू का कठराथल गांव, दूर तक नज़र आते लहलहाते खेत, चरते पशु और रंग-बिरंगे पक्षी, कच्ची पगडंडियों के किनारे बने मिट्टी और घास-फूंस के छोटे-ब़डे घर, सौंधी खुशबू वाली आबोहवा और प्रकृति के प्रेम से सराबोर वातारण. इन सबके बीच सुशीला देवी और कान सिंह का घर किसी चित्रकार की कल्पना-सा प्रतीत होता है. घर की दीवारों पर सुंदर रंग-बिरंगी राजस्थानी चित्रकारी बरबस आकर्षित करती है. घर की मुंडेर पर गमलों की कतार और घर के पीछे फैले खलिहान, गांव में सैर के लिए बथान में बंधे घोड़े और सुरक्षा के लिए दो ब़डे पालतू कुत्ते. इन सबमें खास यहां का प्राकृतिक फ्रिज जिसे ज़मीन में ही गड्ढा कर ईंट की दीवार बनाकर छर्रे और मिट्टी से तैयार किया गया है. घर के कमरे जहां बाहर से मिट्टी के हैं, वहीं अंदर आराम का पूरा साजो-सामान है, सोफा, बैड, डायनिंग टेबल और ज़मीन पर बिछी क़ालीन. यहां सुकून का खास इंतज़ाम है. घर के आंगन में झूला खूबसूरती में चार चांद लगाता है. यह घर किसी पेंटिंग का सजीव चित्रण लगता है. यह घर ग्रामीण पर्यटन के लोकप्रिय ठिकानों में से है. इस क्षेत्र से पिछले चार सालों से ज़ुडी सुशीला देवी और उनके परिवार की ज़िंदगी ग्रामीण पर्यटन ने बदल दी है. पहले उनके पास खेतीबा़डी के अलावा कोई और काम नहीं था. प़ढे-लिखे उनके दोनों बेटों का खेती में जी नहीं लगता था. वे शहर जाकर काम करना चाहते थे, दुनिया देखना चाहते थे, लेकिन अब दुनिया चलकर उनके पास आती है. मोरारका फाउंडेशन ने गांव में ही रहकर नए प्रकार के काम करने का आइडिया दिया, जो बच्चों को भी पसंद आया और उन्हें भी. शुरू में घर छोटा होने, सीमित संसाधन होने की वजह से समस्या भी आई, पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया. सुशीला देवी के बच्चे अब फाउंडेशन द्वारा दी गई ट्रेनिंग की बदौलत फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और घर आए मेहमानों को इलाक़े की सैर करवाते हैं, वहां के कला-साहित्य और दूसरी लोक कृतियों से परिचित करवाते हैं. विदेशियों के साथ संचार की कोई समस्या नहीं रह गई. विदेशी पर्यटकों को और क्या चाहिए था. घर की महिला के हाथों से बना शुद्ध पारंपरिक भोजन वह भी पारंपरिक तरीक़े से. सुशीला देवी कहती हैं कि देशी पर्यटकों में ग्रामीण पर्यटन को सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है. वे ब़ुजुर्ग और नौजवान जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा है या फिर अपने गांव को छो़डकर मजबूरन शहर चले गए हैं, वे इसे ज़्यादा पसंद करते हैं. इसके अलावा हनीमून जो़डे और शहर में रहने वाले परिवार भी खूब चाव से यहां ठहरते हैं.

क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के यहां तीन दिनों के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख-समझ कर गए.

मेहमानों को अपनी संस्कृति को अधिक क़रीब से दिखाने के लिए सुशीला देवी घर पर ही मेहंदी प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, लोक नृत्य, कठपुतली का खेल और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं. सुशीला देवी को इस बात पर गर्व होता है कि विदेश से आने वाले लोग उन्हें सुपरवुमैन कहते हैं, क्योंकि वे सुशीला देवी के ब़डे परिवार का प्रबंधन देखकर आश्चर्य में प़ड जाते हैं. यही नहीं सुशीला देवी से मेहमान भारतीय मेहमान नवाज़ी, पशुओं का दूध का़ढना, चारा देना और खेतों पर काम करने जैसा सुखद अनुभव भी लेकर जाते हैं. लेकिन सुशीला देवी और उन जैसे ग्रामीण पर्यटन को ब़ढावा देने वाले किसान परिवारों के लिए यह सब आसान नहीं था. ग्रामीण पर्यटन के लिए गांव वालों के सामने कुछ खास चुनौतियां थीं, जैसे प्रशिक्षित लोगों की कमी, आर्थिक तंगी, लोगों में उत्साह की कमी, ग्रामीण परिवेश की वजह से लोगों का अल्प विकास, सहभागिता की कमी, बिजनेस प्लानिंग क्षमता की कमी, भाषाई समस्या, बुनियादी शिक्षा की कमी, संचार का माध्यम, प्रशिक्षित टूरिस्ट गाइड. लेकिन मोरारका फाउंडेशन ने स्थानीय लोगों और उनके पूरे परिवार को खास ट्रेनिंग दी, जिसकी वजह से सारी चुनौतियां खत्म हो गईं. ग्रामीण पर्यटन को राजस्थान में 500 से ज़्यादा चिन्हित परिवारों से जो़डकर मोरारका फाउंडेशन ने यहां की सभ्यता और संस्कृति को विश्व पटल पर उकेरने में ब़डी भूमिका निभाई है. पर्यावरण हित को ध्यान में रखते हुए प्रकृतिजन्य पर्यटन का विकास करवाया है. ग्रामीण समुदायों को पर्यटन का हिस्सा बनाकर उनके आर्थिक और शैक्षिक स्तर का विकास करवाया है, जिससे ग्रामीणों के शहरों की तऱफ पलायन में कमी आ सके. का़फी वक़्त से ग्रामीणों की स्थिति खराब होती जा रही थी. इसका मुख्य कारण था कृषि की उपेक्षा, इसके प्रति लापरवाही, इसे किसी अन्य व्यवसाय के मुक़ाबले कम आंकना और युवाओं का इससे न जु़डना. इसी समस्या को दूर करने का उपाय मोरारका फाउंडेशन ने खोज निकाला फार्म पर्यटन के ज़रिए. क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के तीन दिन के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख और समझ कर गए. फार्म पर्यटन पर आए फ्रांस के 21 लोगों को बिडोदी के किसान मनोज शर्मा के यहां दो दिन के लिए ठहरना भारत से विशेष लगाव का अहसास दे गया. शेखावाटी में किसानों को पर्यटकों के स्वागत के लिए खासतौर से तैयार किया गया, ताकि वे पर्यटकों के साथ अच्छी तरह संबंध बना सकें और उन्हें ठहरने के दौरान कोई परेशानी न आए. शेखावाटी क्षेत्र में मीलों का बास के हरीराम मील ने साल भर में 16 फ्रांसीसी मूल के पर्यटकों को ठहराया, तो बीदासर के किसान नेकीराम गोदारा ने कजाकिस्तान से आए दो पर्यटकों और फ्रांस से आए 16 पर्यटकों की दो दिन तक खातिरदारी की. वाहिपुरा के कृष्ण सिंह शेखावत ने 11 और कल्याणपुरा के रामअवतार बुगालिया ने 19 फ्रांसीसी पर्यटकों को दो दिन में अपनी संस्कृति से रूबरू करा दिया. वहीं वाहिदपुरा के सुरेंद्र कुमार ने 4 स्विस पर्यटकों को दो दिन में ही गांव की आबोहवा का क़ायल बना दिया. पिछले कुछ सालों में हज़ारों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को गांवों में भ्रमण कर ग्रामीण जीवनशैली को नज़दीक से जानने, समझने, परखने का मौक़ा मिला है.

मोरारका फाउंडेशन ने ग्रामीण पर्यटन द्वारा सफलता की एक नई कहानी लिखी है. इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि चूंकि केवल पर्यटन से आजीविका कमाने के अवसर ब़ढ जाते हैं जिससे किसान लगातार पर्यटन के कार्य से जु़डकर कृषि जैसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण कार्य को छो़डने की भूल कर सकते हैं. इसी वजह से यहां फार्म पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. ग्रामीण पर्यटन से न केवल विकल्प रोज़गार के अवसर विकसित होते हैं, बल्कि कई तरह के फायदे होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि गांववालों को आजीविका का साधन मिल जाता है, खासकर ग्रामीण युवा को. इससे जीवन स्तर में सुधार आता है मसलन शिक्षा, सेहत का भी स्तर बेहतर हो जाता है. गांव में ज़मीन की क़ीमत ब़ढती है, व्यापारिक वस्तुओं और पब्लिक सेवाओं के दाम भी ब़ढते हैं. स्थानीय कारोबार जैसे क्षेत्रीय कला, ट्रांसपोर्ट और दुकानदारों इत्यादि को फायदा पहुंचता है. गांव के सीधे-सादे लोग विदेशों-शहरों के समझदार लोगों से बेवकू़फ न बन जाएं या फिर ब़डे शहरों और विदेशों से आने वाले लोगों से बातचीत कर सकें, इसके लिए गांव के लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता भी ब़ढी है.

शेखावाटी के गांवों के लोग ब़डे समझदार हैं. शहर से आने वाले लोगों से न केवल आय कमा रहे हैं, बल्कि जीने का सलीक़ा भी सीख लेते हैं. गांव के लोग स्वस्थ वातावरण के साथ स़फाई व्यवस्था, स़डक, बिजली, दूरसंचार के नए माध्यम और रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वाले आधुनिक उपकरण के इस्तेमाल और जीवन को सुलभ बनाने वाली तकनीकी चीज़ों से रूबरू होते हैं. इसके अलावा शहर से आए बुद्धिजीवियों से प्राकृतिक आवास, जैव-विविधता और ऐतिहासिक स्मारकों, धरोहरों का संरक्षण करने के नए उपायों के बारे में सीखते हैं और प्राकृतिक उद्यानों को सहेजने के प्रति जागरूक होते हैं. परंपराओं को सर आंखों पर रखने वाले गांव के ब़डे बुज़ुर्गों को यह चिंता थी कि ग्रामीण पर्यटन से ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति को क्षति पहुंच सकती है और गांव की युवा पी़ढी आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी संस्कृति से दूर हो जाएगी. मगर फाउंडेशन ने इस डर को दूर किया. फाउंडेशन ने सिखाया कि दरअसल गांव का परिवेश और परंपरागत चीज़ें ही उनके काम की शान हैं और इसे ब़ढावा दे सकती हैं. इस लिहाज़ से ब़ुजुर्गों का यह डर भी खत्म हो गया कि ग्रामीण पर्यटन के विकास से गांव के परंपरागत व्यापार और उद्योग, रोज़गार और माहौल पर ग़लत असर हो सकता है. मोरारका फाउंडेशन ग्रामीण पर्यटन के प्रति इतनी अधिक रुचि और लगन से कार्य करवा रहा है कि इस क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.

गाइड ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू कराते है

मीण पर्यटन एवं ऊंची-ऊंची हवेलियों की वजह से नवलग़ढ राजस्थान में जाना पहचाना नाम है. हर साल तक़रीबन 30,000 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्यटक न नवलग़ढ की खूबसूरत हवेलियों, मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों और जैविक खेती के प्रयासों को देखने समझने आ रहे हैं. यहां के गाइड इन भ्रमणीय स्थलों से पर्यटकों का जोडते हैं. यह गाइड पहले अप्रशिक्षित थे, कम प़ढे-लिखे थे. उनके पास समुचित विषयपरख जानकारी जुटाने का न तो कोई स्त्रोत था और न ही अवसर, इसलिए  गाइड सुनी-सुनाई जानकारियों को अनगढ़ तरीक़े से पर्यटकों को पेश करते थे, और पर्यटक मजबूरन उनकी सेवाएं लेते थे. उपेक्षा और सरकारी नियमों की आ़ड में उन्हें न तो कोई प्रशिक्षण दिया गया था और न ही कोई सुविधा मुहैया कराई गई थी. ऐसे में मोरारका फाउंडेशन ने आगे ब़ढकर स्थानीय नगर पालिका से बात करके इन अप्रशिक्षित गाइडों को विधिवत शिक्षण देना प्रारंभ किया, जिसके तहत स्थानीय हैरिटेज, होटल, स्मारक पर्यटन, व्यापार से जु़डे विशेषज्ञों की मदद से 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया. इसमें नवलग़ढ के सभी अप्रशिक्षित गाइड समुदाय ने हिस्सा लेकर और शिविर से जुड़कर नवलग़ढ के बारे में पर्यटन की दृष्टि से पूरी जानकारी प्राप्त की. यही नहीं पर्यटन से जु़डे अन्य आयामों के बारे में भी जाना. ट्रेनिंग पाकर खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे गाइड आबिद खान कहते हैं कि इस प्रशिक्षण से न केवल आत्म विश्वास ब़ढा, बल्कि हम अधिकार पूर्वक पर्यटन से जु़डे विषयों पर पर्यटकों को जानकारी देने में भी सक्षम हो गए हैं. एक अन्य गाइड मनोज शर्मा का कहना है कि हैरिटेज की जानकारी तो मोरारका फाउंडेशन पहले भी हैरिटेज संरक्षण शिविर के माधयम से दे रहा है, पर पर्यटकों को ये जानकारियां किस तरह की पूरी तहज़ीब और संस्कृति के साथ दी जाएं, इसका पता इस शिविर के माध्यम से ही चला. साथ ही बहुत से अनछुए पहलुओं पर चर्चाएं भी उपयोगी सिद्ध हुई हैं. उन्हें सबसे ज़्यादा तो खुशी इस बात की हुई कि अप्रशिक्षित का लेबल अब हमेशा के लिए हट गया है और वह भी अब गर्व  के साथ पर्यटकों को नवलग़ढ की विरासत से रूबरू करवा रहे हैं.


साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/11/shekhawati-towards-village.html

 

 

How to rewrite the Durban script……..! by – Sunita Narain

It’s that time of the year again. Climate change talks are heating up, with the next conference of parties scheduled in Durban in end-November. There is heat but no light. The negotiations are stuck despite the clear signs of climate change: dangerous and potentially catastrophic extreme weather events.

Not much is expected in Durban, except the usual shadow-boxing. The European Union is leading the pack of climate champions. It wants the world to fast track negotiations for a single, legally binding treaty on cutting emissions. It does not say (loudly) that its real plan is to junk the Kyoto Protocol, which demands that industrialised countries cut emissions marginally, roughly 6 per cent below the 1990 levels by 2008-2012. The agreement in this Protocol is that rich countries, major historical and current emitters, go first, creating ecological and economic space for the developing world to grow. In time, the rest would follow. To facilitate actions in the developing and emerging world, technology and funds would be committed. All this done well would lead to a real deal. But it was not to be.

The US and its allies walked out of the Kyoto Protocol and now EU wants to dump it as well. It finds it difficult to meet its commitments to reduce emissions domestically.

At Durban, once again the stage is set for a dud act. EU will advocate climate action and its proposal for a single, legally binding treaty will get predictable responses. The US, the world’s biggest climate renegade, which pulls all strings, will oppose the proposal. Its objective is to do little at home, but most importantly, not to be made responsible for taking action based on contribution to the problem. It wants the distinction between the past and present polluters to be removed. It wants no discussion on a legal instrument. The other big polluting guns—Australia, Japan, New Zealand and Canada—will stand behind the US.

In the Durban-script the roles for the rest of the actors have also been written. The Association of Small Island States (AOSIS), which is rightfully angry over inaction, will go with the EU-designed approach. It will see no choice but to back EU’s proposal, even as it knows the stalemate will only prolong. On the other hand, China and India will side with the US and join the deniers. The rest, with small differences, will wait for the game to play out.

The host, South Africa, will want a deal in its city. What will this be? This country more than any other reflects the climate dilemma: to act or not to act? It has very high per capita emissions—almost equal to Europe’s —but it is yet to share economic benefits and energy access with its majority poor. It is dependent on coal mining and exports, which it cannot jeopardise. But it wants to play the gracious host and somehow get its basic friends—the coalition of the emerging polluters, Brazil, India and China—to dine the last supper. Brazil may play along; it hosts the next big environment summit and would want to look good. But China and India will know too much is at stake. Once they accept a single instrument, they will have to take costly action, with no resources.

The die is not even cast. But the end game is known.

So what can change the outcome? I believe there is no other way but that the developing world regroups and takes leadership. Our world is the worst hit. We do not need to be preached about the pain of climate change. We know it. This leadership will require making tough demands. It will mean demanding drastic emission reduction targets for the rich world. But it is equally important that our world does not hide behind the intransigence of the US. Our world must explain that it is already doing much to reduce emission intensity of its growth—growth of renewables in China, reduction of deforestation in Brazil and energy efficiency in India. It can and will do more. However, the high costs of transition to low-carbon growth must be paid for. This leadership must be firm on principles of climate justice and effective action.

This approach, I know, will be scoffed at and derided as being impractical. It is partly because the non-governmental groups following climate negotiations mirror the divide in the world. One half, the followers of the US and its grouping, will say this stance will jeopardise their democratic government and bring back the dreaded Republicans—Neanderthals who do not believe climate change is real. The other group, followers of EU and its grouping, will say this is good in words, but will not lead to effective action. In Durban they will want a deal, at whatever costs.

But their hedging will hide the one truth that needs to be revealed: most of the low-hanging fruit—easy options to reduce emissions—have already been picked in the climate-threatened world. This fact cannot be more inconvenient coming at a time when the rich world is faced with a double-digit recession; the euro-zone is threatened; and people are worked up against austerity measures.

The Durban deal (like its predecessors Copenhagen and Cancun) will be bad for all if not based on accepting the hard truths of climate change. It is time we grew up.

Post your comments on this editorial online at http://downtoearth.org.in/content/how-rewrite-durban-script.

To follow the buzz prior to Durban, do see our events section below.

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Courtesy-  DOWN TO EARTH

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‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्याना’साठी ११ नोव्हेंबरपासून आगळी मोहीम

 दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा
सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन
कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत
प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड

फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. यावर मात करण्यासाठी आता राष्ट्रीय उद्यानाचे संचालक व मुख्य वनसंरक्षक सुनील लिमये यांनी एक नवी शक्कल लढवली आहे. त्यासाठी पर्यटकांचीच मदत घेण्याचा निर्णय घेतला असून सायकल वरून रपेट करणाऱ्या पर्यटकांनी पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा केल्यास त्यांना सायकल भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्याचप्रमाणे येत्या ११ नोव्हेंबरपासून ‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्यान’ ही मोहीम राबविली  जाणार असून त्यात कचरा टाकणाऱ्यांविरोधात दंडाची तरतूदही              करण्यात आली आहे.
प्लास्टिकचा कचरा ही राष्ट्रीय उद्यानासाठी मोठीच डोकेदुखी ठरली आहे. दररोज उद्यानातून गोळा होणारे प्लास्टिक खूप मोठय़ा प्रमाणावर असते असे उद्यानाची सूत्रे स्वीकारल्यानंतर काही दिवसांतच लिमये यांच्या लक्षात आले. त्यानंतर त्यांनी कर्मचाऱ्यांच्या मदतीने काही महिन्यांसाठी प्लास्टिकच्या कचऱ्याचे मोजमाप करण्याचा निर्णय घेतला. त्यात समोर आलेली गेल्या पाच महिन्यांतील आकडेवारी धक्कादायक होती.
दरदिवशी उद्यानातून गोळा होणारा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल २५० किलो एवढा होता. तर सुट्टीच्या दिवशी हा आकडा तिपटीने वाढायचा. कचरा गोळा करणे आणि त्याची आकडेवारी करणे याच कालखंडात पर्यटकांना विनंती करण्याची मोहीमही पार पडली. उद्यानात प्लास्टिकविरोधात नवीन फलक जागोजागी लावण्यात आले. त्यातून प्लास्टिकच्या होणाऱ्या दुष्परिणामांची माहितीही देण्यात आली. मात्र त्याने फारसा कोणताही फरक पडला नाही.
अखेरीस हा प्लास्टिकचा भस्मासूर रोखण्यासाठी कडक धोरण अवलंबण्याचा आणि विद्यमान कायद्यातील तरतूदींचा आधार घेण्याचा निर्णय घेतला, असे सांगून संचालक सुनील लिमये म्हणाले की, वन्यजीव संरक्षण कायद्यातील कलम ३५ (६) नुसार, वन्यजीवनास धोका पोहोचवणारे कोणतेही कृत्य करणाऱ्यास तब्बल २५ हजार रुपये दंड आणि तीन महिने साध्या कैदेची तरतूद आहे. याच तरतुदीनुसार दंडात्मक कारवाईचा अधिकारही देण्यात आला आहे. तो आता वापरण्यात येणार आहे. त्यानुसार प्लास्टिक टाकताना पहिल्यांदा पकडले गेल्यास १०० रुपये आणि दुसऱ्यांदा पकडले गेल्यास ५०० रुपये दंड करण्यात येणार आहे. तिसऱ्यांदा पकडले गेल्यास त्या व्यक्तिविरुद्ध गुन्हा दाखल करून न्यायालयात खटला गुदरण्यात       येईल.  याशिवाय इतरही काही अभिनव मार्ग अवलंबण्यात येणार आहेत. गेल्या महिन्याभरापासून पर्यावरणप्रेमी उपक्रम म्हणून सायकल फेरी सुरु करण्यात आली आहे. त्यासाठीच्या सायकली वन विभागातर्फेच राष्ट्रीय उद्यानाच्या प्रवेशद्वारावर उपलब्ध करून दिल्या जातात. दोन तासांसाठी ४० रुपये भाडे आकारले जाते. या पर्यटकांना सायकल देताना ११ नोव्हेंबरपासून एक कापडी पिशवीही देण्यात येणार आहे. त्यांनी या फेरीदरम्यान पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा करून आणल्यास त्यांना भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेण्यात आला आहे. खरेतर हे उद्यान पर्यटकांसाठी आहे, त्यामुळे त्यांच्यावर कारवाई करण्याची इच्छा नव्हती. मात्र प्लास्टिकच्या भस्मासुराकडे पाहता असे लक्षात आले की, त्याला वेळीच आवर घातला नाही तर हा मानवजातीवरच उलटणार आहे. त्यामुळे अतिशय गांभीर्याने हा निर्णय घेतल्याचे लिमये यांनी सांगितले.

विनायक परब

साभार- लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=191453:2011-11-02-19-35-24&catid=73:mahatwachya-baatmyaa&Itemid=104

Gangajal Nature Foundation’s 3rd National Documentary, Photography and Essay Competition The Winners have been announced!

Gangajal Nature Foundation’s3rd National Documentary, Photography and Essay Competition

The Winners have been announced!

Photography

First Prize : Ghanshyam Kahar, Vadodara, Gujrat (Entry Name : DI IT…!) View
Second Prize : Dimple Kumar I. Pancholi, Vadodara, Gujrat (Entry Name : FARMING IS NESSASRY FOR MOTHER EARTH)View
Third Prize : Narayan D. Patel, Vadodara, Gujrat (Entry Name : SAVE TREES FOR OUR PLANNET)View

Documentary

First Consolation Price : Santosh Deodar, Kalyan, Maharashtra (Entry Name : PRESERVING DREAM)
Second Consolation Price : Hitesh Parmar, Vadodara, Gujrat (Entry Name : GREEN EARTH)

Essay

First Prize :Amol Sitaphale, Sholapur, Maharashtra (Entry Name : GREEN EARTH)
Second Prize : Bhagyshri Sontakke, Kalyan, Maharashtra (Entry Name : HAREET VASUNDHARA)

‘POSCO: take land but give life’ by- Sunita Narain

The sight on television was heartbreaking: children lying in rows in the searing sun to be human shields against the takeover of their land for Korean giant POSCO’s mega bucks project. Facing them were armed police sent by the state government to assist in the operation.

The steel plant and port project, located in a coastal district of Odisha, has been in a six-year-long eyeball-to-eyeball battle with people whose land will be acquired. Now with clearances coming through the state government wants the land acquired, at whatever cost it seems. It has put a financial offer on the table, which even pays for encroached government land. It believes this is a lifetime offer people should now accept. Move on, let the project be built and precious foreign investment come to the shores of this poor state.

The question we need to ask once again is why people who look so obviously poor are fighting this project. Why won’t they accept the financial compensation, which gives them an opportunity to start a new life and spare their children the drudgery of growing betel nut? Is it growth and development versus environment or just uninformed, illiterate people or even politically motivated agitators? Is it really as simple as that?

I am afraid not.

POSCO is about growth versus growth. People here are poor but they know that this project will make them poorer. This is the fact that we in the modern economy find difficult to comprehend. This is an area of betel farming done on mostly forestland belonging to the state. Of the 1,620 ha needed for the project 90 per cent, or 1440 ha, is this contested forestland.

When the project site was selected, government did not consider it would have to pay compensation for this land—it was encroached upon by the people, and government would simply take it back for the steel giant. But it was forestland and the people who lived there had cultivated on it for as long as they could remember. This then raised the tricky matter of the conditions under the Forest Rights Act that require people to give their consent to the project. The Union Ministry of Environment and Forests overruled its own dissenting committee to say it would have to trust the state government’s version that all procedures were followed in determining that people in these villages were not entitled to this right to decide because they were not traditional forest dwelling community.

With this sorted, environmental and forest clearance was granted. Land acquisition for the project could proceed. But people who were not asked still said no.

Why? After all, the state government says it has accommodated all demands in its offer. It has agreed to limit the acquisition of private dwellings and village land. People will still have homes; they will only lose livelihood. But even that will be compensated. It has agreed to pay for the loss of the use of forestland, even though technically people have no rights over it. The farmers will be paid, according to field reports from Odisha, some Rs 28.75 lakh for each ha of “encroached” betel farmland. Then the package includes provision for payment to wage earners, who will lose livelihood when betel farms go. The severance pay has a sweetener. The government will pay a stipend, limited to a year, for the period people look for “jobs”. In addition, the 460-odd families who lose homes will be resettled in colonies. So why is the generous offer being rejected?

Is it only because of the obduracy of a few people, namely the leaders of one gram panchayat, Dhinkia? This village has locked out the administration for the past three years. All roads to it are barricaded. It is a mutiny, fierce and determined. This village holds out alone because its gram panchayat covers some 55 per cent of the land earmarked for the steel plant, its captive power plant and its private port project. Two other gram panchayats are involved, but their loss is smaller and their leadership is not so strong. But my colleague who visited the residents of the villages waiting in a transit camp for their new houses to be built and handed over, found discontent brewing. Where is our livelihood, people asked? What will we do?

These questions are at the core of the battles raging across the country wherever land is being taken for development but people are losing livelihoods. In yet-to-be POSCO-land, betel farming earns Rs 10-17.5 lakh per ha per year. The compensation is equal to two to three years of earning. In addition, there is the earning from paddy, fish ponds and fruit trees. This land-based economy is employment-intensive. The iron and steel plant, however vital for the nation’s economic growth, cannot provide local employment. For one, local people are not “employable” in such a plant. Two, this modern state-of-the-art plant needs only a limited number of people in its operations.

POSCO is then about growth versus growth. It is just we who have discounted this economy of the land for so long in our understanding of what works and what matters. It is just we who have forgotten that development cannot be development if it takes lives of the very people for whom it is meant. The message is clear: if we want their land, we will have to give them a life.

by- Sunita Narain

Down To Earth

http://downtoearth.org.in/content/posco-take-land-give-life

लैंगिकता आणि नैतिकता


तरुण मुले ब्ल्यू फिल्मस् का पाहतात? पुरुष गर्दीत वा अंधारात स्त्रीची छेडछाड करण्याची संधी का शोधतात? स्त्रिया अंगप्रदर्शनाच्या आहारी का जातात? भारतात विवाहसंस्था मजबूत असूनही आपण कोणत्या अतृप्त इच्छेच्या मागे धावत आहोत?  एकीकडे विवाहाद्वारे लैंगिक संबंधांवर बंधने घालून घेऊन, दुसरीकडे तीच बंधने झुगारण्यासाठी नकळतपणे चोरवाटा, पळवाटांचा आधार माणूस का घेत राहतो? हे वास्तव बदलायचे कसे?
भिन्नलिंगी आकर्षण, नंतर विवाह आणि मग त्यातून स्त्री-पुरुष जोडप्याला होणारे मूल ही चाकोरी मानवी जीवनाचा एक अविभाज्य भाग बनून गेलेली आहे. कधी एकेकाळी विवाह पद्धतीचा स्वीकार केल्यानंतर फक्त त्या चौकटीतल्या शरीरसंबंधाव्यतिरिक्त दोन व्यक्तींच्या शरीरसंबंधाच्या अन्य पद्धती मानवाला अनोळखी होऊन गेल्या. विवाहाद्वारे मान्यता मिळालेल्या आणि भिन्नलिंगी असणाऱ्या व्यक्तींनीच शरीरसंबंध करायचा आणि हा शरीरसंबंध म्हणजे संभोगच! शिवाय तो मूल होऊ देण्यासाठीच करायचा, अशा जखडलेल्या आणि निसर्गविरोधी समजुती विवाहप्रथेने आपल्या डोक्यात भरवून दिल्या. पती-पत्नीने शृंगारिक (रोमँटिक) होणे, हे संभोगासाठीच आवश्यक मानले जाऊ लागले. काही संस्कृतीत तर पती-पत्नीने एरव्ही आपसातली प्रेमभावना, ओढ लपवायची, एकमेकांजवळ बसायचे नाही, हास्यविनोद, गप्पा करायच्या नाहीत आणि फक्त रात्रीपुरतेच आम्ही (संभोगासाठी) एकत्र असतो, हे जगाला दाखवायचे, इतक्या टोकापर्यंत स्त्री-पुरुष (पती-पत्नी) संबंध हे पुढेपुढे अनेक शतके हास्यास्पद आणि कृत्रिम होऊन गेले, ते विवाहाच्या वाढत्या आग्रहामुळे आणि भन्नाट नैतिक कल्पनांच्या अट्टहासामुळे!
निसर्ग, पुनरुत्पत्तीसाठी, प्राणी शरीरांत हार्मोन्स निर्माण करून नर-मादींना एकत्र आणतो, हे खरं असलं तरी प्राण्यांमधील नर-मादी मात्र, अपत्य होऊ देण्याच्या जाणिवेने जवळ येत नसतात, हा मुद्दा महत्त्वाचा आहे. माणसाने बुद्धिसामर्थ्यांने विवाहाचा वापर हेतूत: अपत्य मिळवून देण्यासाठी केलेला असला तरीही स्त्री-पुरुषसुद्धा प्रत्येक वेळेस अपत्य होऊ देण्यासाठीच शरीरसंबंध करीत नाहीत, हेसुद्धा तितकेच महत्त्वाचे आहे. प्रत्येक सजीव प्राणी ‘जगणं’ याचा अर्थ त्याने फक्त ‘श्वसन करावे’ असा नसून, त्याने शारीरिक- मानसिक तंदुरुस्त असले पाहिजे आणि तो पुनरुत्पत्ती करू शकला पाहिजे, हे महत्त्वाचे असते. त्या दृष्टीने पोटाची भूक आणि लैंगिक भूक हे सजीव तंदुरुस्तपणे जगण्याचे प्रमुख आधारस्तंभ आहेत.
तरीसुद्धा एखाद्या खाद्यपदार्थाचा तुकडा माणूस तोंडात टाकतो, म्हणजे त्याला भूक लागलेली आहे, असा त्याचा अर्थ नसतो. अन्नाचा निव्वळ आस्वाद घेण्यासाठी, कुणाला साथ-सोबत करण्यासाठी, स्वत:चा वेळ घालविण्यासाठी, मनाचा ताण, नैराश्य किंवा शीण कमी करण्यासाठी, एकटेपणा विसरण्यासाठी माणूस खात किंवा पीत असतो. म्हणजेच ‘पोटाची भूक’ या नैसर्गिक ऊर्मीचे माणूस स्वत:चे शरीर-मन स्वस्थ ठेवण्यासाठी अनेक उपयोग करून घेतो. तद्वत शरीरसंबंधातूनही लैंगिक उत्कटता (orgasm) प्राप्त झाल्यास माणूस दैनंदिन ताणातून मुक्त होतो, ताजातवाना होतो आणि पुन्हा आपल्या कामाला उत्साहाने लागतो.
स्त्रीचा जननकाळ संपल्यावरसुद्धा स्त्री व पुरुषांमध्ये आकर्षण असते आणि शरीरसंबंधाची इच्छाही असते. अर्थात या वयातील लैंगिक संबंधाचा आनंद हा मूल मिळविण्यासाठीचा नाही, हे स्पष्टच आहे. तरीही orgasm च्या परमोच्च आनंदातून शारीरिक- मानसिक ताणाचा निचरा होऊन त्यायोगे फिट राहण्यासाठी हे शरीरसंबंध उपयुक्त असतात आणि म्हणून ते होत राहतात; हे लक्षात येते. पती-पत्नीमध्ये एकमेकांना लैंगिक उत्कटता प्राप्त करून देण्याचे प्रयत्न होत असतील तर दोघांमधील कोणताही गंभीर तणाव विरून तर जातोच; परंतु दिवसेंदिवस विश्वासाचे व प्रेमाचे नाते दृढ होत जाते. कारण orgasm  च्या अनुभवाने स्त्री-पुरुष रिलॅक्स व शांत होतात. अत्यंत महत्त्वाची बाब म्हणजे या रिलॅक्सेशनसाठी संभोग क्रियेची स्त्री-पुरुष दोघांनाही गरज असत नाही. निव्वळ स्पर्शानेसुद्धा ते सुख कोणत्याही दोन व्यक्तींना देता येत असते. अनेक सेक्सॉलॉजिस्टचे म्हणणे असते की, ”Sex doesn’t always mean intercourse.”
एखाद्या स्त्री वा पुरुषाला स्वत:ला मूल नको असते किंवा पारंपरिक पती-पत्नीक संसाराच्या कल्पना मान्य नसतात. अशा वेळेला खात्रीलायकपणे मूल न होणारे संबंध म्हणजे समलैंगिक संबंध! या संबंधात संभोगापेक्षा लैंगिक उत्कटतेची गरज भागविणे महत्त्वाचे असते. समलैंगिक संबंधामागील अनेक कारणांपैकी हे एक कारण आहे.
पुरुषांनी हस्तमैथुनाद्वारे लैंगिक उत्कटतेचा अनुभव घेणे हे अलीकडे स्वाभाविक मानले जाते आणि त्यास विकृती मानणे, जगातील सेक्सॉलॉजिस्टनी चुकीचे ठरविले आहे. लैंगिक orgasm पुरुषाला स्पर्शाद्वारे आणि संभोगक्रियेतून मिळू शकते. परंतु स्त्रीला, ही उत्कटता संभोगक्रियेतून खात्रीलायक मिळत नाही आणि जास्तकरून ती स्पर्शाने मिळते. पतीला हे समजत नसेल तर असंख्य विवाहित स्त्रिया अशा परमोच्च सुखाच्या क्षणापर्यंत पोहोचतच नाहीत. त्यामुळे अंतर्यामी त्या अस्वस्थ आणि नैराश्यग्रस्त असतात. ज्या स्त्रियांना ताणमुक्तीसाठी अशा स्पर्शाची गरज समजलेली आहे, त्यासुद्धा  हस्तमैथुन करतात, असे अमेरिकन अहवाल सांगतात.
माणसाचे मन आणि शरीर ही एकमेकांना जोडलेली अवलंबित अवस्था असल्यामुळे मनावरील ताणाचा निचरा लैंगिक उत्कटपणाच्या शारीरिक क्रियेमधून होऊन जाणे, या physiology चे महत्त्व दुर्दैवाने आपण जाणलेले नाही आणि निव्वळ त्याची नैतिक-अनैतिक अशी वर्गवारी करण्यात आपण शहाणपणा मानलेला आहे. सेक्स क्रियेतून लैंगिक उत्कटतेचा येणारा प्रत्यय स्त्री-पुरुषांचे भावनिक संतुलन स्थिर राखतो आणि कुटुंबातील, समाजातील अनेक अप्रिय घटना टळतात. शिवाय अनेक मानसिक व शारीरिक व्याधी आणि विकारांपासून माणूस मुक्त राहतो.
आधी उल्लेखिल्याप्रमाणे, स्त्रियांना हा परमोच्च उत्कटतेचा (orgasm)  अनुभव कसा देता येईल, याचे ज्ञान पतीला नसल्यास आणि मग आपण नेमके कशामुळे असमाधानी आहोत, हे स्त्रियांना माहीत नसल्यामुळे, पत्नी-पत्नीच्या संसारात हे असमाधान ‘धुसफूस’ स्वरूपात पत्नीकडून बाहेर पडत राहते. काही वेळेला याबाबत मन:शांती मिळविण्यासाठी स्त्रिया देव-धर्मात स्वत:ला बुडवून टाकतात, तर अनेक स्त्रिया बुवाबाजी करणाऱ्या पुरुषांच्या नादी लागतात. काही स्त्री-पुरुष आध्यात्मिक प्रवचनांतून या असमाधानाचे, बेचैनीचे उत्तर शोधू पाहतात, पण उत्तर दुसरीकडेच असते. काही स्त्रिया उद्वेगाने पतीबरोबरच्या संभोग क्रियेलाच विरोध करतात, कारण त्यापासून फक्त पतीला सुख मिळते आणि आपण वंचित राहतो, ही जाणीव त्यांना ग्रासून टाकते. त्यामुळे पती-पत्नी संबंधातच अडचण निर्माण होते. याचे मूळ कुठे आहे, हे न समजल्यामुळे एकमेकांवर अनेक व्यक्तिगत चुकीचे आरोप होऊन, स्त्री-पुरुषांचे घटस्फोट घडून आलेले पाहावे लागतात.
मानसिक ताणसुद्धा स्त्री आणि पुरुषांचे वेगवेगळे आणि कमी-अधिक तीव्रतेचे असतात. याला माझ्या मते, स्त्री-पुरुषाची नैसर्गिक जीवनशैली आणि वृत्ती कारणीभूत आहे. जगातील बहुसंख्य प्रौढ स्त्रियांना मातृत्वामुळे नवनिर्मितीचा आनंद मिळतो. आणि त्या निर्मितीचे पुढे अनेक वर्षे संगोपन करण्यामधून स्त्रियांच्या मानसिक ताणाचा निचरा होत असतो. स्त्री जितकी आपल्या मुलांमध्ये मानसिक-भावनिक गुंतलेली असते, तितका पुरुष निसर्गत: नसतोच. म्हणून अलीकडे ‘चांगले मन:स्वास्थ्य’ राहण्याकरिता, मुलांच्या संगोपनात स्वत:ला पुरुषांनी गुंतवावे, असा त्यांना सल्ला दिला जातो. स्त्रीकडे असणाऱ्या या नैसर्गिक देणगीमुळे, तिच्या आयुष्यातील ताणतणावांचा आणि लैंगिक उत्कटतेच्या असमाधानकारक अनुभवाचा ती बऱ्यापैकी सामना करू शकते.
पुरुष व्यक्तिमत्त्वात ही त्रुटी आहे. शिवाय पुरुषाची वृत्ती ही जास्तकरून स्पर्धात्मक आणि म्हणून सूडात्मक आहे, जी कोणत्याही दोन नरांमध्ये नैसर्गिकपणे वसलेली असते. त्यामुळे घराबाहेरील सर्व क्षेत्रे, जी पुरुषांनी स्त्रियांना घरात बसवून निर्माण केलेली आहेत, ती स्वाभाविकच या स्पर्धावृत्तीने भारलेली आहेत. या बाहेरच्या जगात वावरताना, स्वत:च निर्माण करून ठेवलेल्या या क्षेत्रात स्पर्धेला तोंड देताना, सूडात्मक कारस्थानात भाग घेतल्यामुळे किंवा बळी पडल्यामुळे पुरुषाला स्त्रीच्या तुलनेत जास्त ताणाखाली जगावे लागते. बालसंगोपन वा तत्सम कौटुंबिक जबाबदाऱ्यांमध्ये पुरुषाला भाग घेता न येण्याची अनेक कारणे असल्यामुळे किंवा कुटुंबापासून दूर राहावे लागल्यामुळे सेक्स अ‍ॅक्टिव्हिटी हा एकमेव पर्याय ताणमुक्त होण्याकरिता पुरुषांसमोर राहतो. त्याकरिता पत्नीवर जबरदस्ती, विवाहबाह्य़ संबंध, बलात्कार अशा मिळेल त्या मार्गाने पुरुष जेव्हा स्वत:ला रिलॅक्स करू पाहतो, तेव्हा ‘स्त्री’ नामक माणसाला अनेकदा अन्याय, अत्याचाराचे बळी व्हावे लागते. कारण विवाहापलीकडील शरीरसंबंध हे अन्याय, अनैतिकता किंवा विकृती  अशा पद्धतीनेच व्यक्त होऊ शकतात, अशी वस्तुस्थिती आहे.
निसर्गाने आपल्याला लैंगिक भावना जशी दिलेली आहे, तशी ती घेता येणे अनैतिक आहे, असे बिंबवून, त्यासंबंधी स्त्री-पुरुषांनी व्यक्त होणे हा असंस्कृतपणा आहे, असे आपण मागील कित्येक शतके ठरवून टाकलेले आहे. पुरुषाने स्त्रीकडे पाहून वा उद्देशून लैंगिक शब्दप्रयोग केल्यास, त्या शब्दास प्रतिशब्द वापरून हास्यविनोद करणारा आणि पुरुषाचीही चेष्टा-मस्करी करणारा स्त्रीवर्ग केव्हाच काळाच्या पडद्याआड गेलेला आहे. अशा स्त्रियांची आज आपण कल्पनाही करू शकत नाही.
ज्या जंगली काळात, मधोमध अग्नी प्रज्वलित करून त्या प्रकाशात आपले ऋषिपूर्वज स्त्री-पुरुष समागम करीत होते, त्या काळात कामुक भावना उद्दीपित करण्यासाठी स्त्री व पुरुष एकमेकांना उद्देशून लैंगिक शब्दांचा वापर करीत असत; असे इतिहासाचार्य वि. का. राजवाडे ‘भारतीय विवाहसंस्थेचा इतिहास’ या पुस्तकात नोंदवितात. ते लिहितात, ‘रानटी ऋषिपूर्वज स्त्री-पुरुष यज्ञभूमीवर म्हणजे धगधगीत धुनीभोवती उबाऱ्याला जमत. लिंग व योनी यांचे वाचक शब्द एकमेकांना उद्देशून हरहमेश बोलत. ‘यज् + न’ ते जमून प्रजोत्पादन करतात, असा यज्ञ या शब्दाचा मूळ अर्थ रानटी ऋषिपूर्वजांच्या भाषेत होता’, असे राजवाडे लिहितात. तसेच ‘गर्भ, योनी, रेत, इंद्रिय, वृष, वृषण, वीर्य ज्यांचा उच्चार आपल्याला आज अश्लील वाटतो, ते सर्व शब्द यजु:संहितेत अग्नीच्या सान्निध्याने पदोपदी आढळतात,’ असे वि. का. राजवाडे नोंदवितात. भारतीय ट्राइब्सवरील अगदी अलीकडील संशोधनात कमलाबाई चट्टोपाध्याय आपल्या ‘ट्रायबॅलिझम इन इंडिया’ या पुस्तकात लिहितात, ‘या ट्राइब्समध्ये लैंगिकता ही सर्व विश्वाचीच कल्पना मानली जाते. लैंगिक संबंध हे लाज वाटण्याची, लपविण्याची आणि लैंगिक इच्छा दडपून टाकण्याची बाब ते मानीत नाहीत.’
यावरून स्पष्ट होते की, विवाहप्रथा सुचलेली नसताना नैतिकतेच्या कल्पना वेगळ्या होत्या आणि विवाहप्रथेनंतर मानवाच्या लैंगिक संबंधावर, त्यासंबंधीच्या विचारांवर आणि व्यक्त होण्यावर सर्व बाजूंनी मर्यादा घातल्या गेल्या. प्राचीन काळात स्त्री-पुरुषांनी एकमेकांवर कामुक शब्दांची मोकळेपणाने उधळण करून व्यक्त होण्यात जी एक समानता होती, ते शब्द पुरुषांनी स्त्रीला लज्जित, अपमानित करण्याकरिता आज एकतर्फी वापरावेत, यावरून आपल्या मानसिकतेत पडलेला प्रचंड फरक लक्षात यावा.
सेक्सबाबत स्त्री-पुरुषांमधील नि:संकोच भावना या नैसर्गिक आहेत. त्यात वाईट चालीचे काहीही नाही; परंतु हे सर्व विवाहाच्या पाश्र्वभूमीवर वाईट ठरवणे भाग पडलेले आहे, हे नेमके आपण लक्षात घेत नाही. विवाहाने स्त्री-पुरुषांच्या लैंगिक इच्छेचे खासगीकरण करून टाकलेले आहे. हे खासगीकरण स्वीकारताना ‘चोरून पाहणे’ किंवा ‘लपून करणे’ या (प्रति)क्रिया दाबून टाकलेल्या लैंगिक भावना व्यक्त करण्यासाठी अपरिहार्य झालेल्या दिसतात. त्यातून निर्माण होत गेलेली स्थिती आणि परंपरा नैतिक म्हणायच्या का,  हे आता एकदा ठरवावे लागेल.
म्हणजे उदाहरणार्थ, कामुक शब्दांचा वापर विवाहप्रथेमुळे निषिद्ध झाल्यावर अनेक सहस्रकांची ही पद्धत लगेच बंद पडणे शक्य नव्हते. भारतीय संस्कृतीतल्या होळी सणात अग्नी मध्यभागी पेटवून, स्त्री-पुरुषांचा समागम नाही, तरी लैंगिक शब्दोच्चारण त्या सणामध्ये करण्याची प्रथा नंतर अनेक शतके रूढ होती. नैसर्गिक मुक्ताचरणाचा गमावलेला आनंद वर्षांतून एकदा तरी प्रतिकात्मक पद्धतीने घेता यावा, म्हणून आपल्या पूर्वजांनी आणलेला हा सण!
नंतर त्या शब्दोच्चारावरही बंदी आली. तोपर्यंत लेखनकलेच्या माध्यमातून महाकाव्ये, प्राचीन वाङ्मये, कथा-कादंबऱ्या, चित्रे-शिल्पे यामधून फक्त स्त्री-शरीराची वर्णने प्रदर्शित होत राहिली. कारण विवाहामुळे व्यवस्था उत्तरोत्तर ‘पुरुषांकरिता’ होत जाणे आणि स्त्रीच्या कौमार्याचे, चारित्र्याचे नवे स्तोम माजवणे, यामुळे लैंगिक उत्कटतेचा विचार स्त्रीबाबत जगभरात कुठेच शिल्लक राहिला नाही. स्त्रीने सहजपणे कामुक शब्दोच्चार पुरुषाला उद्देशून करण्याची परंपरा बंद पडली. फक्त तमाशा, मुजरा, कोठीनृत्य, कॅब्रे, वेश्यागृहे या सभ्य समाजाने निंद्य ठरविल्या गेलेल्या माध्यमांचा आधार स्त्रियांना घ्यावा लागलेला दिसतो. स्वत:च्या लैंगिक उत्कटतेचा आनंद मारून ‘पुरुषाला लैंगिक उत्तेजित करणारी’ असा एकतर्फी शिक्का स्त्रीच्या नशिबी आला.
आपण गेल्या काही शतकांचा सामाजिक इतिहास पाहिला तर, ज्या ज्या जमातींमध्ये विवाहाद्वारे स्त्री-पुरुष संबंधाचा ताबा घेतलेला दिसतो, त्या सर्व मानवी संस्कृतींमध्ये मुक्त व सहज स्त्री-पुरुष संबंधाची जागा अनावश्यक कुतूहल, पिळवणूक, छळ, मानहानी आणि त्यातून सवंग करमणूक अशा चिंताजनक विकृतीने घेतलेली दिसते.
शिवाय पुढील कालखंडातील अनेक शोध, उदा. फोटोतंत्र, चित्रपटतंत्र, फोनतंत्र, टेलिव्हिजन, सध्याच्या सीडीज्, वेबसाइट्स, मोबाईल या सर्वाचा उपयोग आहेच, पण या सुविधांकडे खेचून घेण्यासाठी ‘सेक्स’चा वाढता वापर, हे मार्केटिंग तंत्र बनलेले आहे. अर्धनग्न फोटोज्, चित्रपटातील सेक्सी नृत्ये आणि बेड सीन्स, ब्ल्यू फिल्म्स, पोर्नोग्राफी, दूरचित्रवाणीवरील अंगप्रदर्शन, विवाहबाह्य़ संबंध, सेक्सी जाहिराती, फोन आणि एसेमेसचा स्त्रियांना लैंगिक शब्दोच्चार ऐकविण्यासाठी पुरुषांकडून वापर आणि ज्या ज्या तंत्रांमध्ये सेक्ससंबंधी काही आहे, ती तंत्रे पाहण्यासाठी आणि खरेदीसाठी प्रचंड गर्दी.. हे सर्व जर आपण लक्षात घेतले तर एक गोष्ट सरळ स्पष्ट आहे की, विवाहाने अनैतिक, अनैतिक म्हणून जी नैसर्गिक कामुक भावना बंद पाडण्याचा प्रयत्न गेले कित्येक शतके केला, ती भावना खरेतर कुठल्याच काळात बंद पडलेली नाही. उलट नवनव्या टेक्नॉलॉजीच्या आधारे नव्या वाटा शोधत ती भावना अनैसर्गिक रूप धारण करून आपल्यावर आदळते आहे.
तरुण मुले ब्ल्यू फिल्म का पाहतात? शाळकरी मुले पोर्नोग्राफीसाठी सायबर कॅफेत का गर्दी करतात? रॅगिंगमध्ये लैंगिक छळाचा आनंद का घेतला जातो? पुरुष गर्दीत वा अंधारात स्त्रीची छेडछाड करण्याची संधी का शोधतात? स्त्रिया अंगप्रदर्शनाच्या आहारी का जातात? राखी सावंतचे चुंबन किंवा रॉयल किस भारतीय स्क्रीनवर भडिमाराने का दाखवले जाते? पाश्चात्त्यांच्या तुलनेत भारतात विवाहसंस्था मजबूत असूनही, आपण मग अशा कोणत्या अतृप्त इच्छेच्या मागे धावत आहोत?
मानवी जीवनात आपण सेक्सविषयक एक स्वच्छ, सहज, आनंददायक विचारसरणी इतकी गमावून बसलो आहोत की जिथे तिथे ‘सेक्स कुतूहल’ हे आपले दैनंदिन जीवन होऊन बसलेले आहे. विवाह करून वा न करून या स्थितीत फरक पडण्याची कोणतीही आशा दिसत नाही.
थोडक्यात, निसर्गाने सरळपणाने स्त्री-पुरुषांना देऊ केलेले, शरीरसंबंधाचे सन्माननीय प्रामाणिक तत्त्व आपण भलत्याच नैतिक कल्पना उराशी बाळगून गुन्हा पातळीवर नेलेले आहे. एकीकडे विवाहाद्वारे बंधने घालून घेऊन, दुसरीकडे तीच बंधने झुगारण्यासाठी नकळतपणे चोरवाटा, पळवाटांचा आधार माणूस अनेक शतके घेत राहिला. आजच्या युगात या पळवाटासुद्धा उत्तरोत्तर विकृत आणि हिंसक होत चाललेल्या दिसतात.
हे वास्तव बदलायचे असेल तर राजकीय इच्छाशक्तीने मुलांच्या शालेय नागरिकशास्त्रात मानवी नातेसंबंधांवर भर देणारा सकारात्मक बदल आणायला हवा. तसेच मुले, पालक व विवाहेच्छु तरुणांचे गट यांच्या वेगवेगळे गट करून त्यांना  लैंगिक शिक्षण द्यायाला हवे, तेही परस्परांना समजून घेण्याच्या दृष्टीने! इतिहास विषयात केवळ राजकीय इतिहास न ठेवता निसर्गशास्त्र, मानववंशशास्त्र व उत्क्रांतीच्या इतिहासाचा अंतर्भाव असायला हवा. असे ठोस प्रयत्न झाले तरच काही हजार वर्षे कृत्रीम नैतिक मूल्यांमध्ये अडकल्याने स्त्री-पुरुषांच्या एकूणच नातेसंबंधांची जी हानी झाली आहे, त्याबद्दल मुळातून विचार करण्याच्या स्थितीत आपण येऊ शकू.
जर आपण हे करू शकलो, तर मग एक वेळ अशी येईल की, प्रसारमाध्यमांतून कोणी काहीही विकृत प्रसारीत करावे, त्याला नाकारणारा प्रगल्भ प्रेक्षक व वाचक तयार होईल. तीच खऱ्या बदलाची नांदी ठरेल.

मंगला सामंत –

mangala_samant@yahoo.com

साभार- चतुरंग, लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=166014:2011-06-24-05-21-56&catid=194:2009-08-14-02-31-30&Itemid=194

भोजन में मीठा जहर

देश की एक बड़ी आबादी धीमा ज़हर खाने को मजबूर है, क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है. हम बात कर रहे हैं भोजन के साथ लिए जा रहे उस धीमे ज़हर की, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के ज़रिए अनाज, सब्ज़ियों और फलों में शामिल हो चुका है. देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में आर्सेनिक सिंचाई जल के माध्यम से फसलों को ज़हरीला बना रहा है. यहां भू-जल से सिंचित खेतों में पैदा होने वाले धान में आर्सेनिक की इतनी मात्रा पाई गई है, जो मानव शरीर को नुक़सान पहुंचाने के लिए का़फी है. इतना ही नहीं, देश में नदियों के किनारे उगाई जाने वाली फसलों में भी ज़हरीले रसायन पाए गए हैं. यह किसी से छुपा नहीं है कि हमारे देश की नदियां कितनी प्रदूषित हैं. काऱखानों से निकलने वाले कचरे और शहरों की गंदगी को नदियों में बहा दिया जाता है, जिससे इनका पानी अत्यंत प्रदूषित हो गया है. इसी दूषित पानी से सींचे गए खेतों की फसलें कैसी होंगी, सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

फसलों में कीटनाशकों के इस्तेमाल की एक निश्चित मात्रा तय कर देनी चाहिए, जो स्वास्थ्य पर विपरीत असर न डालती हो. मगर सवाल यह भी है कि क्या किसान इस पर अमल करेंगे. 2005 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने केंद्रीय प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला के साथ मिलकर एक अध्ययन किया था. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिकी स्टैंडर्ड (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) के मुक़ाबले पंजाब में उगाई गई फसलों में कीटनाशकों की मात्रा 15 से लेकर 605 गुना ज़्यादा पाई गई.

दूर जाने की ज़रूरत नहीं, देश की राजधानी दिल्ली में यमुना की ही हालत देखिए. जिस देश में नदियों को मां या देवी कहकर पूजा जाता है, वहीं यह एक गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है. काऱखानों के रासायनिक कचरे ने इसे ज़हरीला बना दिया है. नदी के किनारे सब्ज़ियां उगाई जाती हैं, जिनमें का़फी मात्रा में विषैले तत्व पाए गए हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नदियों के किनारे उगाई गई फसलों में से 50 फीसदी में विषैले तत्व पाए जाने की आशंका रहती है. इसके अलावा कीटनाशकों और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने भी फसलों को ज़हरीला बना दिया है. अनाज ही नहीं, दलहन, फल और सब्ज़ियों में भी रसायनों के विषैले तत्व पाए गए हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं. इसके बावजूद अधिक उत्पादन के लालच में डीडीटी जैसे प्रतिबंधित कीटनाशकों का इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है. अकेले हरियाणा की कृषि भूमि हर साल एक हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा के कीटनाशक निग़ल जाती है. पेस्टिसाइड्‌स ऐसे रसायन हैं, जिनका इस्तेमाल अधिक उत्पादन और फसलों को कीटों से बचाने के लिए किया जाता है. इनका इस्तेमाल कृषि वैज्ञानिकों की स़िफारिश के मुताबिक़ सही मात्रा में किया जाए तो फायदा होता है, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति खत्म होने लगती है और इससे इंसानों के अलावा पर्यावरण को भी नुक़सान पहुंचता है. चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से कृषि भूमि पर होने वाले असर को जांचने के लिए मिट्टी के 50 नमूने लिए. ये नमूने उन इलाक़ों से लिए गए थे, जहां कपास की फसल उगाई गई थी और उन पर कीटनाशकों का कई बार छिड़काव किया गया था. इसके साथ ही उन इलाक़ों के भी नमूने लिए गए, जहां कपास उगाई गई थी, लेकिन वहां कीटनाशकों का छिड़काव नहीं किया गया था. कीटनाशकों के छिड़काव वाले कपास के खेत की मिट्टी में छह प्रकार के कीटनाशकों के तत्व पाए गए, जिनमें मेटासिस्टोक्स, एंडोसल्फान, साइपरमैथरीन, क्लोरो पाइरीफास, क्वीनलफास और ट्राइजोफास शामिल हैं. मिट्टी में इन कीटनाशकों की मात्रा 0.01 से 0.1 पीपीएम पाई गई. इन कीटनाशकों का इस्तेमाल कपास को विभिन्न प्रकार के कीटों और रोगों से बचाने के लिए किया जाता है. कीटनाशकों की लगातार बढ़ती खपत से कृषि वैज्ञानिक भी हैरान और चिंतित हैं. कीटनाशकों से जल प्रदूषण भी बढ़ रहा है. प्रदूषित जल से फल और सब्ज़ियों का उत्पादन तो बढ़ जाता है, लेकिन इनके हानिकारक तत्व फलों और सब्ज़ियों में समा जाते हैं. सब्ज़ियों में पाए जाने वाले कीटनाशकों और धातुओं पर भी कई शोध किए गए हैं. एक शोध के मुताबिक़, सब्ज़ियों में जहां एंडोसल्फान, एचसीएच एवं एल्ड्रिन जैसे कीटनाशक मौजूद हैं, वहीं केडमियम, सीसा, कॉपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं भी शामिल हैं. ये कीटनाशक और धातुएं शरीर को बहुत नुक़सान पहुंचाती हैं. सब्ज़ियां तो पाचन तंत्र के ज़रिए हजम हो जाती हैं, लेकिन कीटनाशक और धातुएं शरीर के संवेदनशील अंगों में एकत्र होते रहते हैं. यही आगे चलकर गंभीर बीमारियों की वजह बनती हैं. इस प्रकार के ज़हरीले तत्व आलू, पालक, फूल गोभी, बैंगन और टमाटर में बहुतायत में पाए गए हैं. पत्ता गोभी के 27 नमूनों का परीक्षण किया गया, जिनमें 51.85 फीसदी कीटनाशक पाया गया. इसी तरह टमाटर के 28 नमूनों में से 46.43 फीसदी में कीटनाशक मिला, जबकि भिंडी के 25 नमूनों में से 32 फीसदी, आलू के 17 में से 23.53 फीसदी, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 फीसदी नमूनों में कीटनाशक पाया गया. फसलों में कीटनाशकों के इस्तेमाल की एक निश्चित मात्रा तय कर देनी चाहिए, जो स्वास्थ्य पर विपरीत असर न डालती हो. मगर सवाल यह भी है कि क्या किसान इस पर अमल करेंगे. 2005 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने केंद्रीय प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला के साथ मिलकर एक अध्ययन किया था. इसकी रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिकी स्टैंडर्ड (सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) के मुक़ाबले पंजाब में उगाई गई फसलों में कीटनाशकों की मात्रा 15 से लेकर 605 गुना ज़्यादा पाई गई. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी में कीटनाशकों के अवशेषों का होना भविष्य में घातक सिद्ध होगा, क्योंकि मिट्टी के ज़हरीला होने से सर्वाधिक असर केंचुओं की तादाद पर पड़ेगा. इससे भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होगी और फसलों की उत्पादकता भी प्रभावित होगी. मिट्टी में कीटनाशकों के इन अवशेषों का सीधा असर फसलों की उत्पादकता पर पड़ेगा और साथ ही जैविक प्रक्रियाओं पर भी. उन्होंने बताया कि यूरिया खाद को पौधे सीधे तौर पर अवशोषित कर सकते हैं. इसके लिए यूरिया को नाइट्रेट में बदलने का कार्य विशेष प्रकार के बैक्टीरिया द्वारा किया जाता है. अगर भूमि ज़हरीली हो गई तो बैक्टीरिया की तादाद प्रभावित होगी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि रसायन अनाज, दलहन और फल-सब्ज़ियों के साथ मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं. फलों और सब्ज़ियों को अच्छी तरह से धोने से उनका ऊपरी आवरण तो स्वच्छ कर लिया जाता है, लेकिन उनमें मौजूद विषैले तत्वों को भोजन से दूर करने का कोई तरीक़ा नहीं है. इसी धीमे ज़हर से लोग कैंसर, एलर्जी, हृदय, पेट, शुगर, रक्त विकार और आंखों की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. इतना ही नहीं, पशुओं को लगाए जाने वाले ऑक्सीटॉक्सिन के इंजेक्शन से दूध भी ज़हरीला होता जा रहा है. अब तो यह इंजेक्शन फल और सब्ज़ियों के पौधों और बेलों में भी धड़ल्ले से लगाया जा रहा है. ऑक्सीटॉक्सिन के तत्व वाले दूध, फल और सब्ज़ियों से पुरुषों में नपुंसकता और महिलाओं में बांझपन जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं.

हालांकि देश में कीटनाशक की सीमा यानी मैक्सिमम ऐजिड्यू लिमिट के बारे में मानक बनाने और उनके पालन की ज़िम्मेदारी तय करने से संबंधित एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद फसलों को ज़हरीले रसायनों से बचाने के लिए कोई खास कोशिश नहीं की जाती. रसायन और उर्वरक राज्यमंत्री श्रीकांत कुमार जेना के मुताबिक़, अगर कीटनाशी अधिनियम, 1968 की धारा 5 के अधीन गठित पंजीकरण समिति द्वारा अनुमोदित दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं तो वे खाद्य सुरक्षा के लिए कोई खतरा पैदा नहीं करती हैं. कीटनाशकों का पंजीकरण उत्पादों की जैव प्रभाविकता, रसायन एवं मानव जाति के लिए सुरक्षा आदि के संबंध में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप वृहद आंकड़ों के मूल्यांकन के बाद किया जाता है. केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार स्वीकार कर चुके हैं कि कई देशों में प्रतिबंधित 67 कीटनाशकों की भारत में बिक्री होती है और इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से फसलों के लिए होता है. उन्होंने बताया कि कैल्शियम सायनायड समेत 27 कीटनाशकों के भारत में उत्पादन, आयात और इस्तेमाल पर पाबंदी है. निकोटिन सल्फेट और केप्टाफोल का भारत में इस्तेमाल तो प्रतिबंधित है, लेकिन उत्पादकों को निर्यात के लिए उत्पादन करने की अनुमति है. चार क़िस्मों के कीटनाशकों का आयात, उत्पादन और इस्तेमाल बंद है, जबकि सात कीटनाशकों को बाज़ार से हटाया गया है. इंडोसल्फान समेत 13 कीटनाशकों के इस्तेमाल की अनुमति तो है, लेकिन कई पाबंदियां भी लगी हैं. ग़ौरतलब है कि भारत में क्लोरडैन, एंड्रिन, हेप्टाक्लोर और इथाइल पैराथीओन पर प्रतिबंध है. कीटनाशकों के उत्पादन में भारत एशिया में दूसरे और विश्व में 12वें स्थान पर है. देश में 2006-07 के दौरान 74 अरब रुपये क़ीमत के कीटनाशकों का उत्पादन हुआ. इनमें से क़रीब 29 अरब रुपये के कीटनाशकों का निर्यात किया गया. खास बात यह भी है कि भारत डीडीटी और बीएचसी जैसे कई देशों में प्रतिबंधित कीटनाशकों का सबसे बड़ा उत्पादक भी है. यहां भी इनका खूब इस्तेमाल किया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, डेल्टिरन, ईपीएन और फास्वेल आदि कीटनाशक बेहद ज़हरीले और नुक़सानदेह हैं. पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में बिक रही सब्ज़ियों में प्रतिबंधित कीटनाशकों के प्रयोग को लेकर सरकार को फलों और सब्ज़ियों की जांच करने का आदेश दिया है. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से कहा कि शहर में बिक रही सब्ज़ियों की जांच अधिकृत प्रयोगशालाओं में कराई जाए. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपने आदेश में कहा कि हम जांच के ज़रिए यह जानना चाहते हैं कि सब्ज़ियों में कीटनाशकों का इस्तेमाल किस मात्रा में हो रहा है और ये सब्ज़ियां बेचने लायक़ हैं या नहीं. अदालत ने यह भी कहा कि यह जांच इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट की प्रयोगशाला या दूसरी प्रयोगशालाओं में की जाए. ये प्रयोगशालाएं नेशनल एक्रेडेशन बोर्ड फोर टेस्टिंग से अधिकृत होनी चाहिए. यह आदेश कोर्ट ने कंज्यूमर वॉयस की उस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए दिया है, जिसमें कहा गया है कि भारत में फलों और सब्ज़ियों में कीटनाशकों की मात्रा यूरोपीय मानकों के मुक़ाबले 750 गुना ज़्यादा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि क्लोरडैन के इस्तेमाल से आदमी नपुंसक हो सकता है. इसके अलावा इससे खून की कमी और ब्लड कैंसर जैसी बीमारी भी हो सकती है. यह बच्चों में कैंसर का सबब बन सकता है. एंड्रिन के इस्तेमाल से सिरदर्द, सुस्ती और उल्टी जैसी शिकायतें हो सकती हैं. हेप्टाक्लोर से लीवर खराब हो सकता है और इससे प्रजनन क्षमता पर विपरीत असर पड़ सकता है. इसी तरह इथाइल और पैराथीओन से पेट दर्द, उल्टी और डायरिया की शिकायत हो सकती है. केयर रेटिंग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कीटनाशकों के समुचित प्रयोग से उत्पादकता में सुधार आ सकता है. इससे खाद्य सुरक्षा में भी मदद मिलेगी. देश में हर साल कीटों के कारण क़रीब 18 फीसदी फसल बर्बाद हो जाती है यानी इससे हर साल क़रीब 90 हज़ार करोड़ रुपये की फसल को नुक़सान पहुंचता है. भारत में कुल 40 हज़ार कीटों की पहचान की गई है, जिनमें से एक हज़ार कीट फसलों के लिए फायदेमंद हैं, 50 कीट कभी कभार ही गंभीर नुक़सान पहुंचाते हैं, जबकि 70 कीट ऐसे हैं, जो फसलों के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि फसलों के ऩुकसान को देखते हुए कीटनाशकों का इस्तेमाल ज़रूरी हो जाता है. देश में जुलाई से नवंबर के दौरान 70 फीसदी कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इन दिनों फसलों को कीटों से ज़्यादा खतरा होता है. भारतीय खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों का अवशेष 20 फीसदी है, जबकि विश्व स्तर पर यह 2 फीसदी तक होता है. इसके अलावा देश में स़िर्फ 49 फीसदी खाद्य उत्पाद ऐसे हैं, जिनमें कीटनाशकों के अवशेष नहीं मिलते, जबकि वैश्विक औसत 80 फीसदी है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में कीटनाशकों के इस्तेमाल के तरीक़े और मात्रा के बारे में जागरूकता की कमी है.

ग़ौर करने लायक़ बात यह भी है कि पिछले तीन दशकों से कीटनाशकों के इस्तेमाल को लेकर समीक्षा तक नहीं की गई. बाज़ार में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री भी बदस्तूर जारी है. हालांकि केंद्र एवं राज्य सरकारें कीटनाशकों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करती हैं. किसानों को अनुशंसित मात्रा में कीटनाशकों की पंजीकृत गुणवत्ता के प्रयोग, अपेक्षित सावधानियां बरतने और निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जाती है. यह सच है कि मौजूदा दौर में कीटनाशकों पर पूरी तरह पाबंदी लगाना मुमकिन नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि इनका इस्तेमाल सही समय पर और सही मात्रा में किया जाए.

साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/04/bhojan-me-mitha-jahar.html