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वेदांता के लिए लाल झंडी, पास्को के लिए लाल जाजम…

केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है, उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर बॉक्साइट की खदान को खोदने की अनुमति वेदांता को नहीं दी गई। इससेचेयरमेन अनिल अग्रवाल का वह सपना चकनाचूर हो गया, जिसमें वे भारत के बड़े उद्योगपति बनना चाहते थे। एक तरफ उड़ीसा में वेदांत का प्रोजेक्ट विवादास्पद बन गया है, तो दूसरी तरफ पास्को के लिए नरमी बरत रही है।
वेदांता के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि उसके प्रोजेक्ट को रिलायंस वाले मुकेश अंबानी की कंपनी को दिया जा रहा है। बात यह है कि मुकेश अंबानी को यह अच्छी तरह से पता है कि सरकार को कैसे पटाया जाए? वैसे यह गुण उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश वेदांत कंपनी के प्रोजेक्ट की जाँच के लिए एन.सी. सक्सेना समिति को जवाबदारी सौंपी थी। सक्सेना समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि नियामगिरी पर्वत पर जहाँ वेदांत कंपनी का माइनिंग प्रोजेक्ट की योजना है, वह स्थान वहाँ बसने वाले डोगरिया कौध जाति के लिए वरदान है। नियामगिरी की पहाड़ियों में इन आदिवासियों का दिल धड़कता है। इन्हीं पहाड़ियों से उनका जीवन चलता है। इस पर्वत को वे साक्षात ईश्वर का दर्जा देते हैं। इसे वे ‘नियाम राजा’ के नाम से पुकारते हैं। इस पर्वत के साथ उनकी धार्मिक भावनाएँ भी जुड़ी हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उड़ीसा सरकार ने संयंत्र के लिए भू-अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की मंजूरी लेने की आवश्यक औपचारिकता पूरी नहीं की। वेदांता रिसोर्सेस को उड़ीसा की नियामगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट की खुदाई के लिए पहले पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई थी. लेकिन जांच की रिपोर्ट के अनुसार वेदांता द्वारा किए जाने वाले खनन से लगभग 70 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद हो जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार इस तबाही से स्थानीय डोंगरिया कौंध जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। समिति के अनुसार यदि इस जंगल में बाक्साइट के खनन की अनुमति दी जाती है, तो करीब 125 लाख पेड़ों को काटना होगा। इतने वृक्षों का संहार करके वेदांता जितना खनिज निकालेगी, उसकी आयु मात्र 4 वर्ष ही होगी। जंगल अधिकार कानून के अनुसार यदि किसी जंगल की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है, तो उस जमीन पर रहने वालों की अनुमति लेना आवश्यक है। कौंध जाति के लोग अपनी जमीन वेदांता को देने के लिए तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने खनन के लिए आदिवासियों की अनुमति मिल गई है, इसके झूठे दस्तावेज तैयार किए गए। यह बात सक्सेना समिति की जाँच में सामने आई।
वेदांता कंपनी उड़ीसा में जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसमें कुल 17 अरब डॉलर यानी करीब 7650 करोड़ रुपए के जंगी निवेश की योजना थी। केवल पर्यावरण नियमों का पालन न करने के कारण प्रोजेक्ट को कैंसल कर देने का देश में यह पहला मामला है। केंद्रीय वन एव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश भर के 64 प्रोजेक्ट को इसी तरह पर्यावरण विभाग की अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसमें मुम्बई में वैकल्पिक एयरपोर्ट का मामला भी शामिल है।
वेदांता से सात गुना अधिक निवेश करने वाली पॉस्को कंपनी द्वारा लोहे का कारखाना स्थापित करने का प्रोजेक्ट भी पर्यावरणीय विवाद का शिकार हुआ है। दक्षिण कोरिया की पास्को कंपनी उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में लोहे का कारखाना स्थापित करना चाहती है। इसके माध्यम से करीब 52 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश भारत आएगा। अब तक का यह सबसे बड़ा विदेश निवेश है। पास्को कंपनी के खिलाफ भी पर्यावरण और जंगल अधिकार मामलों में नियम कायदों का उल्लंधन करने की जानकारी केंद्र सरकार को है। इसके बाद भी वेदांता कंपनी को काम बंद करने का आदेश देने वाली केंद्र सरकार पास्को के खिलाफ सख्त नहीं हो पाई है। सरकार वेदांता के बजाए पास्को कंपनी को प्राथमिकता दे रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पास्को का केंद्र और उड़ीसा सरकार के बीच समझौता हो चुका है। उड़ीसा सरकार ने 2005 में पास्को के साथ जगतसिंहपुर जिले के फुजंगा में 1.20 करोड टन स्टील के उत्पादन की क्षमता वाले कारखाना स्थापित करने का समझौता किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए पास्का को 4000 एकड़ उपजाऊ जमीन देने का वचन उड़ीसा सरकार ने दिया था। इसमें से 3500 एकड़ जमीन पर सरकार का ही अधिकार है। शेष 500 एकड़ जमीन निजी है। जिनकी निजी जमीन है, वे अपनी जमीन पास्को को किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार नहीं है। जमीन हस्तगत करने के लिए सरकार ने जमीन मालिकों पर बल का प्रयोग किया, किसानों पर कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। लाशें भी बिछ गई। पास्को को जो जमीन देनी है, उसमें 284 एकड़ जमीन धीकिया नामक गाँव की है। इस गाँव की पंचायत ने बैठक में सर्वसम्मति से पास्को को अपनी जमीन न देने का प्रस्ताव पारित किया था। बाजू के गाँव गोविंदपुर में भी इस तरह का प्रस्ताव पारित किया गया था। ये गाँव पूरी तरह से पास्को के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि पास्को के किसी भी अधिकारी के इन गाँवों में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। उड़ीसा सरकार पास्को पर पूरी तरह से मेहरबान है। उस कंपनी के लिए सुंदरगढ़ की खान भी उसे समर्पित कर दी है। यही नहीं महानदी और ब्राrाणी नदी का पानी भी उसे देने का वचन सरकार दे चुकी है। उड़ीसा सरकार ने पारादीप बंदरगाह के बाजू में स्थित जटाधारी नामक निजी बंदरगाह भी पास्को को देने की अनुमति दे चुकी है। इस बंदरगाह का उपयोग पास्को उच्च गुणवत्ता का स्टील निर्यात करने और हल्की गुणवत्ता का खनिज आयात करने के लिए करेगा।
पास्को प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों पर सरकार बुरी तरह से पेश आई। पास्को के सामने उड़ीसा सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। लेकिन वेदांता के लिए कठोर। आखिर ऐसा क्यों? यह समझ से परे है। पास्को ने भी वही सब किया है, जिसके आधार पर वेदांता को उड़ीसा से खारिज कर दिया गया है। वहाँ की जनता भी वेदांता के उतनी ही खिलाफ है, जितनी पास्को के। लेकिन सरकार पास्को की तरफदारी कर रही है। पास्को के खिलाफ पर्यावरण मंत्री न तो कुछ सुनना चाहते हैं और न ही कुछ बोलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि पास्को कंपनी के प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करेंगे। यदि पास्को से भी पर्यावरण की हानि हो रही है, तो फिर उस पर सरकार कठोर क्यों नहीं हो रही है? आखिर पास्को से ऐसा क्या मिला, जो वेदांता से नहीं मिल पाया?
डॉ. महेश परिमल

साभार – संवेदनाआँ के पंख

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/

गंगेच्या नावानं चांगभलं !

हवामानबदल आणि महाराष्ट्र !

‘ग्लोबल वॉर्मिग आणि हवामानबदला’ च्या जगातील प्रभावाबद्दल नेहमीच बोलले जाते. पण त्याचे आपल्या महाराष्ट्रावर नेमके काय परिणाम होत आहेत आणि त्यांचा सामना करण्यासाठी कोणत्या उपाययोजना करायला हव्या, याबाबत या विषयातील अभ्यासकांनी मुंबईतील ‘यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान’ च्या व्यासपीठांतर्गत एक आराखडा तयार केला. त्याचे सादरीकरण केंद्रीय वन व पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश, मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, इतर संबंधित मंत्री व पर्यावरणाच्या क्षेत्रात कार्यरत असलेल्या कार्यकर्त्यांसमोर मुंबईत गेल्या शनिवारी (६ मार्च) करण्यात आले. खासदार सुप्रिया सुळे यांच्या पुढाकाराने हा अभ्यास करण्यात आला. त्यात ज्येष्ठ पर्यावरण शास्त्रज्ञ डॉ. माधव गाडगीळ, डॉ. प्रकाश गोळे, डॉ. मुकुंद घारे, ज्येष्ठ पत्रकार सदा डुंबरे, विजय परांजपे, विजय दिवाण, डॉ. तारक काटे, संजय पाटील, अ‍ॅड. वंदना चव्हाण, डॉ. एरिक भरुचा, अजित साळुंके यांच्यासह अनेक तज्ज्ञ, महाराष्ट्र ज्ञान आयोगाच्या ‘निर्माण’ तसेच, भारत ज्ञान विज्ञान समुदाय या संघटनेचे कार्यकर्ते सक्रिय सहभागी होते. या आराखडय़ाद्वारे चर्चा करण्यात आलेल्या पाणी, शेती, जैवविविधता, नागरी प्रश्न आणि लोकशिक्षण व जनजागृती या पाच विषयांमधील ठळक मुद्दे..

शेती-

तापमानवाढीमुळे शेतीवर बरेच विपरीत परिणाम होणार आहेत. इंटरगव्हर्न्मेंटल पॅनेल ऑन क्लायमेट चेंज (आयपीसीसी) या संघटनेच्या भाकितानुसार, सरासरी तापमानात ०.५ अंशांची वाढ झाली, तरी भारतासारख्या देशात प्रतिहेक्टर साडेचार क्विंटलने घट होण्याची भीती आहे. नवी दिल्ली येथील ‘स्कूल ऑफ एन्व्हायर्न्मेंट सायन्सेस’ च्या अभ्यासानुसार २१०० सालापर्यंत भारतातील शेतीउत्पादनाचे १० ते ४० टक्क्य़ांनी नुकसान होण्याचा धोका आहे. पुरांची तीव्रता व वारंवारता वाढून शेतातच पाणी साठण्याचे प्रमाण वाढेल. काही ठिकाणी पावसाचे प्रमाण कमी होऊन दुष्काळात वाढ होईल.
तापमानात बदल झाल्याने पिकांचा फुलोऱ्याचा काळ, फलधारणेचे चक्र व किडींचे प्रकार बदलू शकतील. किनारी भागात शेतजमिनीवर समुद्राचे अतिक्रमण वाढेल आणि वादळी हवामान व जोरदार वाऱ्यामुळे पिके तसेच, जमिनीच्या वरच्या थराचे नुकसान होईल.
काय करावे- १. कार्बन वायूंचे प्रमाण कमी करण्यासाठी उपाययोजना. २. या वायूंचे इतर अवस्थेत रूपांतर (कार्बन सिव्किस्ट्रेशन) करण्यात वाढ. ३. हवामानबदलाच्या काळात टिकून राहू शकतील, अशा पिकांच्या व जनावरांच्या जाती वाढविण्यास प्रोत्साहन द्यावे. ४. या बदलांशी सामना करण्यासाठी आवश्यक व्यवस्था शेतकऱ्यांसाठी उपलब्ध करून देणे. ५. हवामानबदलाच्या भविष्यातील बदलांशी जुळवून घेण्यासाठी सज्ज राहावे.
या मुद्दय़ांचा विस्ताराने विचार करायचा झाल्यास पुढील उपाय प्रत्यक्षात करता येतील-
– आंतरपिके, पिकांमध्ये बदल, शेतातील घटकांचा विचार करून पिकांची पद्धती अशा पर्यावरण-सुसंगत शेती करावी, जेणेकरून शेतात वापर होणारी रासायनिक खते व कीटकनाशकांचे प्रमाण कमी होईल. त्याचप्रमाणे नैसर्गिक खतांचा वापर करावा.
– जैविक खते, जैविक कीटकनाशके, स्थानिक बियाणे, स्थानिक चारा, स्थानिक इंधन, स्थानिक उपकरणे तसेच, शेतमजूर व कामासाठी प्राणिसंपदेचा शेतीतील वापर वाढवावा.
– शेतीमालाची दूरवर वाहतूक करण्याऐवजी जास्तीत जास्त प्रमाणात स्थानिक मालाचा वापर करावा.
– स्थानिक, परंपरागत व चिवट जाती वापराव्यात.
– फळझाडे व झुडपी पिके अशा संपूर्ण वर्षभर उभ्या असणाऱ्या पिकांचा जास्तीत जास्त वापर व्हावा.
– स्थानिक बियाण्यांची बँक व बियाण्यांची देवाण-घेवाणीचा उपक्रम हाती घ्यावा.
– पाणी व जमिनीसारख्या स्रोतांचे स्थानिक व्यवस्थापन करावे.
कृषी धोरणातील काही अपेक्षित बदल-
पिकांच्या प्राधान्यक्रमात बदल करावा-
– अन्नधान्य पिकांना (इतर पिकांपेक्षा) प्राधान्य असावे.
– स्थानिक पिकांना, परंपरागत पिकांना व स्थानिक अन्नपदार्थाना इतरांच्या तुलनेत प्राधान्य हवे.
काही धोरणे आमूलाग्र बदलावी लागतील व काही प्राधान्यक्रम उलट करावे लागतील-
– रासायनिक शेतीपेक्षा नैसर्गिक शेतीला अनुदाय द्यावे.
– संकरित वाणांपेक्षा स्थानिक वाणांसाठी कर्ज द्यावे.
– निर्यातयोग्य मालापेक्षा स्थानिक वापराच्या उत्पादनासाठी प्रोत्साहन.
– खासगी गुंतवणुकीपेक्षा स्थानिक शेतकरीआधारित जाळे उभे करण्यास मदत.
– पिकांच्या उत्पादनवाढीच्या संशोधनाऐवजी शाश्वत पर्यावरणीय उत्पादनाच्या संशोधनावर भर.
– पैसे कमावण्यासाठी शेती या ऐवजी अन्नधान्याच्या सुरक्षिततेसाठी शेती.
याशिवाय,
– सर्व शेतीयोग्य जमीन केवळ लागवडीसाठी राखून ठेवावी.
– शेतीच्या परिसरातील उतार व डोंगरांचे प्रदूषण करणाऱ्या गोष्टींपासून रक्षण करावे.
– स्थानिक जंगले, कुरणे, जलस्रोत, यांचे संरक्षण करून त्यांचा स्थानिक शेतीसाठी उपयोग करून घ्यावा.
– शेतीशी संबंधित स्रोतांवर व शेतीपद्धतींवर समाजाची मालकी प्रस्थापित करावी.
– शेतीच्या नुकसानीसंबंधी शेतकऱ्यांना विमासंरक्षण द्यावे.

जैवविविधता-

हवामानबदलामुळे महाराष्ट्रात जैवविविधतेशी संबंधित चार प्रभाव पाहायला मिळतील- समुद्राची पातळी वाढणे, अतिवृष्टी व अवर्षणाच्या घटनांमध्ये वाढ, जीवजातींच्या भौगोलिक विस्तारावर मर्यादा, उष्णतेला विशेष संवेदनशील असलेल्या जीवजाती, पिके व पशूंचे वाण यांचे नुकसान. त्यामुळे सहा परिसंस्थांचा विचार प्राधान्याने करावा लागेल. त्यासाठीच्या काही उपाययोजना.
समुद्रकिनारा- समुद्राची पातळी वाढून पुळण, खडकाळ किनारा, खारफुटी यांच्यावर विपरीत परिणाम होतील. या व इतर कारणांमुळे मत्स्योत्पादनावर मोठा परिणाम होईल.
– यातून मार्ग काढण्यासाठी कोकणपट्टीच्या एकूण धारणाशक्तीचा आढावा घेऊन एक कार्ययोजना आखावी लागेल.
– कोकण किनाऱ्यावरील मुरुड-जंजिरा, सुवर्णगड-जयगड, रत्नागिरी-पूर्णगड, विजयदुर्ग-देवगड, आचरा-मालवण या पाच टापूंना ‘बायोस्फियर रिझव्‍‌र्ह कार्यक्रमां’तर्गत संरक्षण द्यावे. मुंबईतील शेवडीप्रमाणे कोकणातील १२ टापू वैज्ञानिक महत्त्वाची स्थळे म्हणून संरक्षित करावीत. विशेषत: परकीय व परप्रांतीय जहाजांकडून होणाऱ्या अतिरेकी मासेमारीला आळा घालावा. मासेमारी जाळ्यात कासवे पकडली जाणार नाहीत याचा व्यवस्था करावी.
कृषिभूमी- पावसातील तीव्र प्रसंगांची वारंवारता वाढून व तापमानवाढीमुळे पिकांवर वाईट परिणाम होईल.नवी तणे, रोग वाढतील.
– पिकांच्या गावरान वाणांचे जतन करावे, विविधता टिकविण्यासाठी एकाच वाणाला प्रोत्साहन देण्याच्या योजनांचा (उदा. कोकणातील हापूस लागवड) पुनर्विचार व्हावा.
– शेतजमिनीत सेंद्रिय अंश वाढविण्यासाठी सुयोग्य मशागतीला उत्तेजन द्यावे.  सेंद्रिय शेतीससाठी शेतक ऱ्यांना प्रोत्साहन द्यावे.
– पशुधनासाठी प्रोत्साहन द्यावे, सुकी पाने न जाळता व ओला कचरा वाया न घालविता त्याचे कंपोस्ट करावे.
माळराने- महाराष्ट्रात गवताळ राने भरपूर आहेत व त्यांच्यावर पाळीव जनावरांचा चारा व काळवीट, नीलगाय, तणमोर, माळढोक अशा वैशिष्टय़पूर्ण प्राणी-पक्ष्यांचा अधिवास अवलंबून आहे.
– त्यांच्याकडे खराब जमीन म्हणून पाहू नये.
– या अधिवासांशी संबंध असलेल्या धनगर, फासेपारधी या समाजांच्या सहभागाने त्यांचे सुव्यवस्थापन करावे.
– नियंत्रित चराई, वणव्यांवर नियंत्रण, चाऱ्याचे उत्पादन वाढविण्याचे प्रयत्न, वन्य जिवांच्या अधिवासांचे संरक्षण असे कृतिकार्यक्रम आखून त्यांची अंमलबजावणी करणे.
पशुधन- तापमानात वाढ झाल्यास परदेशातील (मुख्यत: थंड प्रदेशातून आणलेल्या) संकरित जाती तग धरू शकणार नाहीत. त्यामुळे आपल्या स्थानिक जाती टिकविण्याची आवश्यकता.
– त्यासाठी देवणी गाय संगोपन संघ, उस्मानाबाद शेळी संगोपन संघ, बेरड कोंबडा संगोपन संघ अशा संस्था प्रस्थापित करून देशी जातींचे संगोपन व्हावे.
वनभूमी- तापमानवाढीने बाष्पीभवन वाढून नैसर्गिक अधिवास धोक्यात येतील. वनप्रदेश तुकडय़ा-तुकडय़ांत तोडला गेल्याने अनेक जाती नामशेष होतील व तणे माजतील.
– वनभूमीत ढवळाढवळ होऊ नये. ताडोबा राष्ट्रीय उद्यानाजवळच्या खाणींना घातलेली बंदी स्वागतार्ह आहे.
– वन विभागाने वनभूमीत पर्यटनाला प्रोत्साहन देऊ नये.
– वनभूमीत नैसर्गिक व स्थानिक प्रजातींची लागवड व्हावी, जेट्रोबासारखी ऊर्जा उत्पादने होऊ नयेत.
– वनसंपदेच्या दृष्टीने १ जानेवारी २००८ पासून अस्तित्वात आलेला वनाधिकार कायदा हे मोठे आव्हान तसेच, संधीसुद्धा आहे. या कायद्यानुसार राज्याची बरीचशी वनजमीन सामूहिक वनसंपत्ती म्हणून स्थानिक समाजांना त्यावरील गौण वनोपचार, बांबू-वेतासहित पूर्ण हक्का मिळून व्यवस्थापन त्यांच्या हाती येईल. त्याचा वापर कोण व कसा करणार हे त्यांना ठरवायचे आहे.
नदी-ओढे / तलाव- पर्जन्यमानातील तीव्र घटनांची वारंवारता वाढल्याने व तापमानातील वाढीमुळे नद्या-ओढय़ांवर दुष्परिणाम होतील; तसेच स्थानिक जलचरांच्या विविधतेचा ऱ्हास होईल.
– सर्व नद्या, ओढे, नाले, तलाव शोधून त्यांना संरक्षण द्यावे; तसेच त्यांच्या काठची वनराजी टिकवावी.
– पावसाळ्यात प्रवाहाविरुद्ध प्रवास करणाऱ्या माशांसाठी बंधाऱ्यांजवळ सोपान-मार्ग तयार करावेत.
– नव्या जैवविविधता कायद्यांतर्गत ग्रामपंचायतींच्या पातळीवर जैवविविधता व्यवस्थापन समित्या स्थापून ओढय़ा-नाल्यांना संरक्षण द्यावे आणि स्थानिक जलचरसृष्टीचे पुनरुज्जीवन करावे.
नगरप्रदेश- नागरी भागातील डोंगर, जुन्या खाणी, ओढे-नाले, तलाव यांना संरक्षण द्यावे.
– घरांच्या छपरावर बागा फुलवाव्यात.
– मोठय़ा इमारतींच्या आवारात गवत, झाडे लावताना मुद्दाम स्थानिक प्रजाती व फुलझाडे लावावीत जी स्थानिक पक्षी, फुलपाखरे, वटवाघळांना आकर्षित करतील.

नागरीकरण-

महाराष्ट्र हे भारतातील सर्वाधिक नागरीकरण असलेले एक राज्य आहे. आता शहरांचा विकास करताना त्यांची विकास सामावून घेण्याची क्षमता (कॅरिंग क पॅसिटी) ध्यानात घ्यावी लागेल. त्यामुळेच हवामानबदलाच्या काळात शहरांचा विचार करताना शहरांचा विकास आराखडा, पर्यावरणाची दखल, हरितक्षेत्रे व जैवविविधता, पर्यावरणसुसंगत इमारतींची संहिता, पाणी, दूषित पाणी, कचरा, वाहतूक व्यवस्था, दारिद्र्य व नुकसानकारकता कमी करणे, औद्योगिक प्रदूषणावर नियंत्रण या गोष्टींची दखल घ्यावी लागेल.
– शहराचा विकास आराखडा तंतोतंत लागू करावा, कारण त्यात पर्यावरणासह सर्वच घटकांचा विचार केलेला असतो.
– शहराचे पर्यावरण स्थितीदर्शक अहवाल प्रसिद्ध केले जातात, पण ते र्सवकष होऊन त्यात ग्लोबल वॉर्मिग व हवामानबदलाच्या परिणामांचा समावेश व्हावा.
– सर्व नवीन इमारतींना राज्य पातळीवरील पर्यावरणसुसंगत इमारतींची संहिता सक्तीची करावी. जुन्या इमारतींमध्येही ती लागू करण्यासाठी नियोजन करावे.
– जैवविविधता ही शहरांच्या पर्यावरणासाठी उपयुक्त आहेच; शिवाय त्यामुळे पूरनियंत्रण, प्रदूषण कमी होणे व वातावरण चांगले राहण्यास मदत होते. शिवाय गरिबांना रोजगारासाठी मदतही मिळते. त्यामुळे हरित क्षेत्रे राखून ठेवणे व त्यांच्यावर कोणतेही विकास प्रकल्प न करणे आवश्यक आहे. – खोलवरून भूजल उपसण्यावर मर्यादा आणून शहरातील एकूण पाण्याचे शाश्वत नियोजन करावे. – शहरातील सांडपाण्यामुळे नद्या व इतर जलस्रोत प्रचंड प्रमाणात प्रदूषित आहेत. हे रोखण्यासाठी जलशुद्धीकरण प्रकल्प व त्यासंबंधीचे कायदे आहेत. पण त्यांची योग्य पद्धतीने अंमलबजावणी होत नाही. हे प्रकल्प राज्यात प्राधान्याने हाती घ्यावेत. – घनकचऱ्याच्या व्यवस्थापनापेक्षा त्याची ओला-सुका व इतर प्रकारे विभागणी, तसेच पुनप्र्रक्रिया यावर भर द्यावा. – प्रत्येक शहराला र्सवकष वाहतूक योजना तयार करून ती लागू करण्याबाबत सक्तीची करावी. त्याद्वारे ऊर्जावापर कमी करण्याचे उद्दिष्ट असावे. – गरिबांना केंद्रस्थानी धरून धोरणे व कार्यक्रम राबवावेत. घरे नसणे, शौचालयाच्या व आरोग्याच्या सुविधांचा अभाव या गोष्टी दूर करता येतील अशी ही धोरणे असावीत. – औद्योगिक प्रदूषण कमी करण्यासाटी प्रक्रिया प्रकल्पांची उभारणी, रहिवासी व औद्योगिक क्षेत्रांमध्ये बफर क्षेत्र, पर्यावरणाची तपासणी व नियंत्रण सक्तीचे, संयुक्त औद्योगिक वसाहती विकासाला प्रोत्साहन देणे.

पाणी –

ग्लोबल वॉर्मिग व हवामानबदल घडवून आणण्यात पाण्याची फारशी भूमिका नाही, पण हवामानातील बदलांचा मात्र जलस्रोतावर खूपच विपरीत परिणाम होणार आहेत. त्यामुळेच पाण्याबाबत बोलायचे तर बदलत्या परिस्थितीत जुळवून कसे घ्यायचे, यावरच भर द्यावा लागणार आहे.
पाण्याबाबत शिफारशी करताना काही मूलभूत तत्त्वांचा आधार घ्यावा लागेल-
– पाणी हा सामयिक (व सामाजिक) स्रोत आहे.
– पाण्याचे समन्यायी वाटप करताना त्याची खोरेनिहाय उपलब्धता, त्या खोऱ्यातील आताची व संभाव्य लोकसंख्या, जमिनीचा वापर तसेच, स्थानिक नागरी व औद्योगिक वापराचा विचार होणे आवश्यक आहे.
– पाणी, जमीन व जैविक स्रोतांचा विकास व व्यवस्थापन करताना त्या-त्या खोरेनिहाय विचार आवश्यक.
– कोणत्याही भागाची उत्पादकता, तेथील गुंतवणुकीचा वाव या गोष्टींचे नियोजन करताना जमीन किंवा इतर कोणतेही घटक आधार न मानता, पाणी हाच घटक आधारभूत धरणे.
– पाण्याच्या शाश्वत उपयोगासाठी त्याच्या प्रतिमाणसी वापराचे (पिण्यासाठी, घरगुती वापरासाठी, जगण्यासाठी आदी.) तातडीने तपासणे.
– पाण्याचा पुनर्वापर, पुनप्र्रक्रिया यावरील भर तातडीने वाढविणे.
– पाण्याचा वास्तववादी वापर वाढीस लागावा म्हणून निरंतर स्थित्यंतर व्यवस्थापन हाती घेणे.
प्रमुख शिफारशी-
राज्याच्या जलधोरणातील प्राधान्यक्रम बदलून पुढीलप्रमाणे करावेत-
१. पिण्याचे व घरगुती वापराचे पाणी
२. शेती व जगण्यासाठीचे पाणी
३. शाश्वत भविष्यासाठी पर्यावरणीय गरजांसाठीचे पाणी
४. जलविद्युत
५. उद्योग
६. पर्यटन व करमणूक
– आताच्या पाणलोट विकासाच्या दृष्टिकोनात व पद्धतीत बदल करून त्याचे नियोजन पर्यावरण, भूशास्त्र, जलशास्त्र, शेती, वनविज्ञान व समाजशास्त्र अशा विविध शाखांचा विचार करून व्हावे.
– जमिनीची उत्पादकता वाढविण्यासाठी व जास्तीत जास्त प्रदेशावर वनस्पती आवरण वाढविण्यासाठी केवळ खरीप व रब्बी या दोन हंगामांसाठीच सिंचन मर्यादित करावे.
– पाऊस व नदीप्रवाहाच्या भाकितासाठी विसाव्या शतकातील नोंदी वापरल्या जातात, त्यामुळे ही भाकितांमधील त्रुटी वाढतात. त्यासाठी नव्या नोंदींची निर्मिती करण्याची व्यवस्था निर्माण करावी.
– महाराष्ट्र सरकारने पाणलोट विकास क्षेत्रात केलेले बदल वरवरचे आहेत. त्यात आमूलाग्र व मूलभूत बदल आवश्यक आहेत.
– २००० सालच्या दुसऱ्या जलसंपत्ती व सिंचन आयोगाने पाणलोट विकासासाठी १९,००० रुपये असा प्रतिहेक्टरी खर्च गृहीत धरला होता. त्यात बदल व्हावेत.
– पाण्याचे खासगीकरण व त्यावर मालकी प्रस्थापित होऊ नये.
– पश्चिम घाट, सातपुडा यांसारखे सर्व जलस्रोत संरक्षित करावेत.
– किनारी प्रदेशाचे संरक्षण करावे.
– सर्व धरणप्रकल्पांच्या कालव्यांचे जाळे नियोजित वेळापत्रकानुसार पूर्ण व्हावे व पाणी गरजूंपर्यंत पोहोचावे.
– ‘प्रदूषण करेल तो भरेल’ (पोल्यूटर वुईल पे) या तत्त्वानुसार, जलप्रदूषण करणाऱ्यांकडून केवळ दंड वसूल करू नये, तर पाणी घेतले त्याच दर्जाचे पुन्हा जलस्रोतात पाठविणे सक्तीचे करावे.
याशिवाय या गटातर्फे बदलत्या काळात पुराची तीव्रता कमी करण्यासाठी विविध शिफारशी करण्यात आल्या आहेत. सर्व नियोजन करताना ते खोरेनिहाय व्हावे, यासारख्या अनेक शिफारशींचा त्यात समावेश आहे.

अभिजित घोरपडे

साभार लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=53197:2010-03-08-15-26-43&catid=96:2009-08-04-04-30-04&Itemid=108


‘Discovery Dust-on-Snow’ – On Spring Winds, Something Wicked This Way Comes.

Earlier snow melt, altered water supplies, result

April 2, 2010

snowmelt

On spring winds, something wicked this way comes.

At least for the Colorado Rocky Mountains and their ecosystems, as well as people who depend on snowmelt from these mountains as a regional source of water.

“More than 80 percent of sunlight falling on fresh snow is reflected back to space,” says Tom Painter, Director of the University of Utah’s Snow Optics Laboratory. “But sprinkle some dark particles on the snow and that number drops dramatically.”

That’s exactly what’s happening in Colorado’s high peaks.

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When the winds are right and the desert is dry, dust blows eastward from the semi-arid regions of the U.S. Southwest. In a dust-up, Western style, small dark particles of the dust fall on Colorado’s pristine white snowfields.

“The darker dust absorbs sunlight, reducing the amount of reflected light and in turn warming the now ‘dirty’ snow surface,” says scientist Chris Landry, Director of the Center for Snow and Avalanche Studies (CSAS) in Silverton, Colo.

Painter’s and Landry’s research on dust-on-snow events, as they’re called, is supported by the National Science Foundation’s (NSF) division of Atmospheric and Geospace Sciences, which is part of the directorate for geosciences.

Dust-on-snow events, long recognized as a phenomenon, were little understood despite frequent and regionally extensive dust deposition, says Painter.

Although scientists knew from theory and modeling studies that this dust changed the albedo–the solar energy

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absorption properties–of snowfields, no one had made measurements of its full impact on snowmelt rates.

Then during the winter/spring of 2004, Painter and Landry began their project.

They were the first to make systematic measurements of dust-on-snow events along with complementary climate and hydrologic data.

“Painter’s and Landry’s observations have confirmed–and most importantly quantified–what many snow and climate scientists had hypothesized but only tested in models,” says Jay Fein, program director in NSF’s Division of Atmospheric and Geospace Sciences.

Spring snowmelt from the Rocky Mountains provides much of the American West’s water supplies. As a result of Painter’s and Landry’s research, water managers have gained new insights into the snowmelt process, and are applying

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those findings through the Colorado Dust-on-Snow (CODOS) program.

CODOS is based at the Center for Snow and Avalanche Studies.

Landry’s discussions with water managers led to the development of CODOS, now funded by local, regional, state and federal water management agencies.

CODOS monitors the statewide distribution of dust in mountain snow cover and reports on that distribution in biweekly advisories.

It provides timely analyses of how the dust affects snowmelt timing and rates, and is continuing research driven, in part, by stakeholder questions.

Twelve dust-on-snow events during the winter of 2008/2009 led to a 40 to 50 day earlier snowmelt–which occurred 20 days earlier than normal–with record streamflow rates.

CODOS’s monitoring and forecasting services made all the difference, says Fein, enabling water managers to anticipate these events and still provide reliable water supplies.

Wicked, dust-laden winds, already moving westward this spring, no longer blow unfettered. The work of Tom Painter and Chris Landry stands in their way.

Cheryl Dybas, NSF (703) 292-7734 cdybas@nsf.gov

Related Websites
Center for Snow and Avalanche Studies: http://www.snowstudies.org/

Courtesy – http://www.nsf.gov/discoveries/disc_summ.jsp?cntn_id=116707&org=NSF

बहुमोल : वणवा विझवा रे.. !

वणवा

डोंगरावर कुठेतरी वणवा लागतो. तो दिसताच गावाच्या मुख्य कार्यालयात फोन जातो. लगेचच मोबाईल असलेल्या सर्वाना ‘मेसेज’ जातो. गावकरी जमतात, कार्यालयातली रिकामी पोती घेतात आणि जमेल त्या वाहनाने तिथे पोहोचतात. सर्वाचे प्रयत्न सुरू होतात आणि बघता बघता वणवा होत्याचा नव्हता होतो.. नगर जिल्ह्य़ातील हिवरे बाजार या गावात वणवा लागला की, तो लांबवर पसरत नाही, कारण तो जागच्या जागीच विझविण्याची यंत्रणा गावात सज्ज आहे. अर्थातच संपूर्ण गावाच्या सतर्कतेमुळे! अगदी सतरा-अठरा वर्षांपूर्वी व्यसनाधीन, भांडणे-मारामाऱ्या, राजकारणातील टोकाचे गट-तट यासाठी कुप्रसिद्ध असलेल्या आमच्या गावाने कात टाकली आणि त्याला वेगळीच झळाळी प्राप्त झाली. त्यातून आता जलसंधारण, व्यसनमुक्ती, शिक्षण, आरोग्य-स्वच्छता, शेतीतील अनेक प्रयोग या दृष्टीने ते राज्यातील एक आघाडीचे गाव बनले. गावातील एक प्रमुख उपक्रम म्हणजे ‘ग्रामसहभागातून वनव्यवस्थापन’! हा उपक्रम तसा सर्वत्रच पाहायला मिळतो, पण हिवरे बाजारने तो अभिनव पद्धतीने राबविल्याने त्याला मिळालेले यश समाधान देणारे तर आहेच, शिवाय लोकांना समृद्धीच्या मार्गावर नेणारेसुद्धा! म्हणूनच वणवे विझविण्यासाठी मुद्दाम कोणाच्या मागे लागावे लागत नाही, गावकरी स्वत: त्यासाठी धावतात.
गावाच्या आसपासची कुरणे, डोंगर व वनांची पूर्वीची स्थिती वेगळी होती. आमचा भागच कमी पावसाचा असल्याने येथे घनदाट जंगल कधीच नव्हते, पण पुरेशी झाडी आणि समृद्ध गवताळ प्रदेश नक्कीच होता. गेल्या काही दशकांमध्ये विविध कारणांमुळे या वनांवरील ‘बोजा’ वाढला व त्यांचा ऱ्हास सुरू झाला. वनात गुरे सोडायची, अर्निबध चराईमुळे गवत राहायचे तर नाहीच, शिवाय जनावरांच्या खुरांमुळे ते उगवायचेही नाही. जमिनीची धूप सुरू व्हायची. गुरांसोबत गुराखी जायचे, मग झाडांची तोड व्हायची. कसलीच शिस्त नसल्याने वनांची उजाड माळराने झाली. कोणी काही सांगायचे म्हटले तर त्याचाही उपयोग नव्हता. पण आता लोकांना वनांचे महत्त्व समजून दिल्याने गवत हे उत्पन्नाचे साधन झाले. त्यामुळे परिस्थिती पालटली. इतकी की, पूर्वी सप्टेंबर-ऑक्टोबपर्यंत संपणारे गवत आता वर्षभर शिल्लक राहू लागले आणि आमच्या गावाबरोबरच शेजारच्या गावांचाही फायदा झाला. ग्रामसहभागातून वनव्यवस्थापनाचाच हा परिणाम. पूर्वी जंगलाबाबत बेफिकीर गुराखीच आता गवताचे, वनांचे व्यवस्थापन करतात. त्यांची ‘गुराखी संघटना’ उभी केली. त्यांनीच नियम बनविले. गवत चरायला गुरे सोडायची नाहीत. पावसाळ्यात उगवणारे गवत दसऱ्यापासून कापायला सुरुवात होते. ज्याला गवत पाहिजे, त्याने शंभर रुपये भरून एकटय़ाला कापून नेता येईल तितके गवत न्यावे. त्यातून चराईबंदीचा फंड जमा झाला. विशेषत: गुराख्यांना व एखादी शेळी-गाय असणाऱ्या भूमिहीनांना त्याचा फायदा झाला. गुरे गवतात न शिरल्याने शिस्त राहिली, जमिनीची धूप थांबली, जंगलतोडही बंद झाली.. पूर्वीसारखे वन अस्तित्वात आले. हीच गुराखी संघटना आता जंगलाचे रक्षणही करते. कोणाची गुरे आत शिरली तर समज देणे, पुन्हा-पुन्हा तसे घडले तर दंड करणे असे नियमही आले. विशेष म्हणजे काहींची घरं या गवतावर चालतात. भूमिहीनांना कर्ज देऊन म्हशी घ्यायला लावल्या. त्या वाढवून दूध व पैसा आला. आता त्यांच्या बँक खात्यात बऱ्यापैकी शिल्लक जमा आहे. चराईबंदीचा फंडसुद्धा वाढून वर्षांला ३० हजार ते ४० हजार रुपयांच्या घरात गेला. या फंडातून गावातील क्रिकेट-व्हॉलीबॉल स्पर्धा भरविण्यासाठी, तसेच गणपती व इतर सांस्कृतिक कार्यक्रमांसाठी रक्कम दिली जाते.
जंगल राखण्याचा गावाला असा फायदा होत असेल तर वणवे थांबवा म्हणून मुद्दाम सांगण्याची आवश्यकताच पडत नाही. त्यातूनच गेल्या वर्षांपासून ‘एम-व्हिलेज’ची (मोबाईल व्हिलेज) वेगळी यंत्रणा सुरू केली. त्यानुसार गावात सर्व महत्त्वाने निरोप मोबाईलवर पाठविले जाऊ लागले. त्याचाच उपयोग वणवे रोखण्यासाठीही होतो. गावाच्या आसपास लहानसा वणवा लागला तरी तो कोणाच्या तरी निदर्शनास येतो. त्याची माहिती गावातील कार्यालयात दिली जाते. तिथे दीपक पवार हा ‘मोबाईल रिपोर्टर’ आहे. तो पुढे ही माहिती गावातील सर्व मोबाईल असलेल्यांना पाठवतो. (गावातील व आसपासचे मिळून असे ४०० हून अधिक मोबाईल सदस्य आहेत.) काही मिनिटांतच शक्य असेल ते सर्वजण जमतात. वणवे विझविण्यासाठी रिकामी पोती उपयोगी पडतात. ही पोती व जमलेले गावकरी मिळून वणव्याची ठिकाणी पोहोचतात आणि पोती आपटून वणवा विझविण्याचे काम सुरू होते. एकीचे बळ आणि स्वयंप्रेरणा या गोष्टींमुळे वणव्याचा काय निभाव लागणार? गेल्या वर्षी वनदिनानिमित्त सुरू झालेल्या या उपक्रमाला दोनच दिवसांपूर्वी एक वर्ष पूर्ण झाले. या काळात दोनदा असे वणवे पसरण्यापासून रोखण्यात आले. म्हणूनच परिसरातील २००-२५० हेक्टरवरील गवत व वन टिकून आहे आणि आमच्या गावाला समृद्धसुद्धा करत आहे. हीच समृद्धी राज्याच्या प्रत्येक गावापर्यंत जावी, ही इच्छा आहे. त्याचा मार्ग अतिशय साधा आहे आणि तो दाखवण्यासाठी आमचा गाव सदैव तयार आहे.

पोपटराव पवार

साभार- लोकसत्ता,

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=56616:2010-03-22-15-54-11&catid=96:2009-08-04-04-30-04&Itemid=108

‘जन जोडो गंगा यात्रा – मार्च २०१०’ ‘Awareness Campaign Drive’ (Connecting people to the River Ganga)

Jan Jodo Ganga Yatra 2010

Awareness Campaign Drive, (Connecting people to the River Ganga)

The most serious problem today is the destruction of our environment. General population is ignorant about it. Pollution, draught, flood, soil and water problems are not natural but they are consequences of uncaring and selfish attitude of mankind. Not only present but future generations too will suffer due to the ill-effects of this. Gangajal Nature Foundation was making an effort to awaken people from their deep slumber.

We appreciated the work done by Hon. Shri Rajiv Ji Gandhi on the Dying Ganga. River Ganga has been declared as a National River of India by Prime Minister Mr. Manmohan Singh in 2008 which was ‘International Year of Rivers’

Gangajal Nature Foundation is working hard for last five years towards awakening and educating people about upkeep of rivers and lakes by organizing photo exhibitions, screening of the documentary, by holding national level competitions in essay-writing, photography and documentaries.

Gangajal Nature Foundation has organized awareness campaign for people at the bank of the river Ganga from Gangotri – the source of Ganga to Gangasagar near Bay of Bengal. This awareness campaign called “Jan Jodo Ganga Yatra” (Connecting people to Ganga) had been organized from 3rd March to 18th March 2010.

During this campaign, Gangajal Nature Foundation has organized “Gangajal” photo exhibitions, It also tried to increase public awareness screening of documentary in different towns and Villages (2525 K.M.) along the banks of Ganga.

We have sailed through country boat from Hardwar to Diamond Harbour different location. Through this sailing in Ganga, we have collected meaningful data like pollution, ill-effects on people’s lives, video records of the discharge of sewerage water into Ganga by factories and townships.

The Foundation is going to submit this collected data, suggestions and memoranda by ordinary people to Prime Minister’s Office through the hands of Mr. Kumarji Ketkar, (Chief Editor, Loksatta, Indian Express Group, Mumbai). Through this campaign we have reconnected the soul of at least one crores (ten million) people with the river Ganga.  It has definitely helped in reducing the pollution load on the river Ganga. This is Gangajal Nature Foundation’s first step towards ‘Save Ganga Movement’.

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कथा जणांच्या गंगा अभियानाची….

गंगाजल नेचर फौंडेशन ही मुंबईतील संस्था गेली  अनेक वर्षे, छायाचित्र प्रदर्शने व माहितीपट सादरीकरणाच्या तसेच राष्ट्रीय पातळीवरील छायाचित्र  आणि माहितीपट व निबंध स्पर्धांच्या माध्यमातून नद्यांच्या, तलावांच्या संवर्धना विषयी समाज प्रबोधन व जनजागृतीचे कार्य करीत आहे. गंगानदीच्या संवर्धनासाठी व्यापक जनजागरण व्हावे म्हणुन, ५ मार्च २०१० पासून जनजागरण  अभियानाचे  आयोजन केले होते. १५ दिवसांच्या जन जोडो गंगा जनजागरण  अभियानात, हिमालयातील गंगानदीचे उगमस्थळ गंगोत्री ते गंगासागर, बंगालच्या उपसागरापर्यंत. २५२५ कि.मी.  अंतराच्या गंगाकिनायावरील १० ठिकाणी धार्मिक स्थळांबरोबरच  अनेक शहरातं  गंगाजल छायाचित्र प्रदर्शनाच्या माध्यमातून जनजागरणाचा तसेच गंगा किनायावरील सर्वसामान्यांशी संवाद साधुन त्यांना गंगानदीशी जोडण्याचा प्रयत्न केला.

तीन मार्चला सकाळी अकरा वाजता पश्चिम एक्सप्रेसने मुंबई सोडली आणि आमच्या जन जोडो गंगा  अभियानाची सुरवात झाली. चार मार्चला सकाळी  आकरा वाजता  आम्ही नवी दिल्लीला पोहचलो. येथे टवेरा गाडी घेवून कानपूरचे उमाशंकर दिक्षीत हे आमचे सहकारी आमची वाट पहात होते. याच गाडीने दिल्लीहून गंगोत्री ते गंगासागर पर्यंतचा साडेतीन हजार कि.मी. प्रवास होणार होता. मुंबईहून माझ्या सोबत सूरेंद्र मिश्रा, मछिंद्र पाटिल, संतोष मरगज, उन्मेश  अमृते, केवल नागवेकर हे गंगाजल चे सदस्य होते. गंगाजलचे कायदे विषयक सल्लागार प्रदिप अगरवाल हे दिल्लीतलेच त्यांच्या हस्ते या अभियानाच्या शुभारंभाचा नारळ फोडून आम्ही गंगोत्रीकडे रवाना झालो. रात्रभर प्रवास करून पाच मार्चला दूपारी १२ वाजता आम्ही उत्तरकाशीच्या हॉटेल भंडारीमधे दाखल झालो. मनोज सेमवाल हा उत्तराखंडचा  आणखी एक साथीदार आमच्यात सामावला.

मुंबईहून निघाल्याला जवळपास चाळीस तास झाले होते. प्रवासाने शरीर अगदी थकलं होतं पण ही तर सुरवात होती. गंगासागर पर्यंतच्या या अभियानात दिवसा प्रदर्शन व जनजागरणाचा कार्यक्रम तर पुढचा टप्पा गाठण्यासाठी रात्रीचा प्रवास या मुळे थकायला होणार हे स्पष्ट होतं. गंगोत्रीमध्ये खुपच बर्फवृष्टी झाल्याने गंगोत्रीपर्यंत पोहचणे शक्य  नसल्याचे मनोजने सांगितले. शितकालात गंगामाईची मुर्ती मुखवा येथे सहा महिने असते. मुखवा ते गंगोत्री  हे १८ कि.मी. अतंर आहे. दुपारी २ वाजता  आम्ही मुखव्याला निघालो. संध्याकाळी ५ वाजता मुखव्याच्या गंगामंदिराच्या प्रांगणात पोहचलो. शितकाल असल्याने इथलेही बरेचसे रहिवासी उत्तरकाशीला राहतात. मंदिराचे पुजारीही हजर झाले त्याच्यां सोबत बरेचसे ग्रामस्त जमा झाले.  आम्ही  गंगाजल प्रदर्शन  अवघ्या दहा मिनीटात उभे केले. गढवाली लोकांना गंगादर्शन नेहमी मनोहरी होतं  असत. प्रदर्शनात कानपूरच्या पुढची गंगा पाहून बरेचजण व्यथीत झाले. लोकवस्ती कमी  असूनही या  अभियानाची सुरवात येथूनच केली. भारतीय हिंदू संस्कृतीने गंगेला नेहमीच देवीच्या रूपात बंदिस्त करून ठेवल आहे. पण  आता मात्र देवत्वाच्या पलीकडे जावून ती एक नदी असून तीचही स्व:ताचं अस जीवन  आहे. आणि  तीच्यावर करोडो भारतीयांच जीवन अवलंबून आहे हे वास्तव स्विकारने गरजेच झालं आहे.

ग्रामस्तांनी या अभिायानाची खुपच स्तुती केली व पुढील वाटचालीस शुभेच्छा दिल्या. रात्री उशिरा पुन्हा उत्तरकाशीच्या हॉटेल भंडारीमधे मुक्कामाला पोहचलो. ६ मार्चला सकाळी ८ वाजता काशीविह्णानाथाच्या मंदिराच्या आवारात गंगाजल प्रदर्शन उभ झाल. मंदिराचे महंत  अजय पुरी यांनी प्रदर्शनाच उद्‌घाटन केलं. हळूहळू गर्दी जमू लागली. शाळेला जाणारे विद्यार्थी इकडे वळू लागले तसेच सर्वसामान्य ही प्रदर्शनाकडे वळाले. ‘गंगे तव दर्शनात मुक्ती’ अस मानणारा वर्गही गंगेच हे प्रदुषीत रूप पाहुन भांबावला. तर महाविद्यालयातील काही तरूण शंकीत चेहयाने  आम्हाला भेटले. त्यांच्यापैकी काहीनी हे  अभियान गरजेच  सल्याच मत व्यक्त केलं पण गंगेवर बांधलेल्या धरणामुळे आम्हाला नोकया मिळणार आहेत. तुमची संस्था धरणंच्या विरोधात असेल तर आम्ही या अभियानात सहभागी होऊ शकणार नसल्याची खंत व्यक्त केली. आमच्या परिसरात गंगाप्रदुषण तितकस नाही. कानपूर, बनारस तसेच कोलकात्याला कडक कायदे करून गंगाप्रदुषणावर नियंत्रण आणता येईल का अशी सुचना केली.

सुरवात तर चांगलीच झाली होती. प्रदर्शनाला लोक येत होते तर शंकानिरसनातून संवाद साधला जात होता. दुपारी १ वाजता जेवणानंतर ऋषीकेशला जाण्याकरीता आम्ही निघालो. आता पर्यंतचा प्रवास रात्रीचा झाला होता. पण उत्तरकाशी ते ऋषीकेश हा चार तासाचा प्रवास दिवसा झाला. लोहारी नाग पाला जल बिजली प्रकल्पामुळे गंगानदीच्या पात्रात पाण्याच प्रमाण खुपच कमी दिसत होते. पुढे ३९ कि.मी. लांबीच्या टनेलमधुन प्रकल्पासाठी वापरलेलं गंगाजल धरासु जवळ पुन्हा गंगेला  र्पण केलेलं दिसलं. गंगानदीवर  अनेक प्रकल्प असुनही पुढेही काही नविन प्रकल्प उभारले जातील. कारण  आपली वाढती वीजेची मागणी. हिमालयाच्या कुशीत नागमोडी वळणाने जाणारा रस्ता तसेच जागोजागी एन टी पी सी ने लावलेले बोर्ड ‘टिहरी धरण भारताची शान’ जगातील सगळयात उचांवरील धरण अशी त्याची ख्याती आहे. हेच धरण फुटल तर हरिद्वार आणि ऋषीकेशला कायमच ‘गंगा’जलसमाधी देऊन गंगेच पाणी दिल्लीला धडकेल. हे सगळ किती मिनीटात कस आणि काय होईल यांचा एक तक्ता राष्ट्रीय नदी निदेशालयाच्या दस्तावेजात आहे. त्याचे छायाचित्र गंगाजल प्रदर्शनात आहे जे पाहून अनेकांचे डोळे विस्परतात. कधी डाव्या बाजूला तर कधी उजव्या बाजूला वाहत जाणारी गंगानदी.  आणि तीच ते निळशार पाणी पुढे कानपूर, बनारस नंतर काळभोर दिसणार आहे. तसंच डोंगरांच्या  आंगाखांदयांवर दिमाखाने डोलणारे चिड व देवदार वृक्षांची गर्दी जी हरिद्वारच्यापुढे तुरळक होऊन कानपूर नंतर गंगेच्या काठावर एकही वृक्ष दिसणार नाही. गंगेच्या काठावर मोठया प्रमाणात वृक्षारोपण करण्याची गरज  आहे.

आमचा गाडीचालक  आशोक सफाईदारपणे गाडी चालवत होता. सहा तासाचा प्रवास अवघ्या पाच तासात त्याने  आम्हाला ऋषीकेशला पोहचवले. सहा वाजता त्रिवेणी घाटावर गंगाजल प्रदर्शन उभ झालं. महाकुंभमेळयामुळे ऋषीकेशलाही बरीच गर्दी होती. विदेशी पर्यटकही प्रदर्शन पाहयला जमा होत होते. अनेकजण स्वःताहून आमच्याशी संवाद साधत होते. तर काही लोकांशी आम्ही संवाद साधत होतो. चर्चा घडत होती. पण कुभमेळयात पवित्रस्नान करण्यास आलेला भाविकवर्ग गंगेच्या प्रदुषणाकडे लक्ष देत नसल्याच आमच्या नजरेत आलं. गंगामैया कितीही प्रदुषित झाली तरीही ती या भाविकासाठी पवित्रच आहे. प्रदर्शन पाहिल्यावर गंगापरिक्रमा घडवल्याबद्‌ल आवर्जुन आभार माननारे गंगाभक्त गंगा प्रदुषणावर बोलण्यास मात्र उत्सुक नसल्याच जाणवलं. तसंच या गंभीर समस्येची जाण  सेणारेही भेटले. पण त्यांच प्रमाण तुलनेन कमी होतं. आमच्या या मराठी प्रयत्नाची दखल ‘सहारा राष्ट्रीय’ या वर्तमानपत्राने घेतली तसेच ऋषीकेश येथील एका गंगाप्रेमीने रात्री निलकंठधाममधे  आमची राहण्याची व्यवस्था केली. व भविष्यात या उपक्रमाला मदत करण्याचे  आश्वासन दिले.

दुसया दिवसी सकाळी ८ वाजता आम्ही हर की पौडीवर हजर झालो. महाकुंभमेळा असल्याने सुरक्षाव्यवस्था  अगदी कडक होती. हर की पौडीवर गंगाजल प्रदर्शन लावण्यासाठी परवानगी घेणं गरजेच होतं म्हणुन मी व सुरेंद्र मेळा धिकायाच्या कार्यालयात गेलो. ८ मार्च रविवार असल्याने ते कार्यालयात नसल्याचे कळले. त्यामुळे  आम्ही  हर की पौडी पोलीस चौकीतील पोलीस अधिक्षकांना भेटून परवानगीसाठी विचारणा केली. रविवार असल्याने गंगास्नानासाठी  गर्दी होण्याची शक्यता असल्याने हर की पौडी ऐवजी सुभाषघाटावर प्रदर्शन लावण्याची परवानगी मिळाली. थोडयावेळातच सुभाषघाटावर प्रदर्शन उभ झालं. कुंभमेळयामुळे गंगास्नासाठी गर्दी खुपच होती. दरम्यान पोलीसांनी  आम्हाला खूप सहकार्य केलं. गंगाजल प्रदर्शनाचं माहितीपत्रक वाटण्याच काम उत्तराखंड पोलीसांनी केलं हे जागरूतेच लक्षण होतं. इथही ऋषीकेश सारखाच  नुभव आला जी काही लोक प्रदर्शन पाहायला गर्दी करत होते ते  कुंभमेळयाच्या गंगास्नासाठी  आले होते. त्यांना गंगाप्रदुषणाची काहीही खंत वाटल्याच जाणवत नव्हतं. उलट काही गंगाभक्तांनी गंगापरिक्रमा घडविल्या बद्‌दल साष्टांग दंडवत घातला. या प्रकाराने  आम्ही निराश न होता गंगानदीच  स्तित्व धोक्यात  आल्याच त्यांच्या निदर्शनास पुन्हा पुन्हा आणत होतो. गंगानदीच्या संवर्धनासाठी काय करता येईल ? हे त्यांना विचारत होतो. कुंभमेळयात गंगास्नान करून पुण्य मिळवण्याच्या भानगडीत गंगेच्या संवर्धनासाठी त्यांच्याकडे वेळच नव्हता. आम्ही मात्र  आमच काम करत होतो. गंगाप्रदुषणाची माहिती देत होतो. झोपेचं सोंग घेतलेल्या समाजाला जाग करण्याच काम मनापासून करत होतो.

सहकार्या बद्‌दल पोलीसांचे आभार मानुन आम्ही दुपारी १ वाजता कानपूरकडे रवाना झालो. बिजनोर, रामपूर, लखनऊ करीत ८ मार्चला पहाटे चार वाजता कानपूरला पोहचलो. १६ तासाच्या प्रवासाने सगळेच थकले होते. पुन्हा दिवसभर प्रदर्शनासाठी उभ राहयच होतं. उमाशंकर दीक्षित हे कानपूचे त्यांनी हॉटेल हिमालयन मधे  आमची व्यवस्था केली व ते त्यांच्या घरी गेले. सकाळी  आठ वाजता येतो म्हणाले. आम्ही सात वाजेपर्यंत झोप काढली. त्या तीन तासाच्या झोपेमुळे  आम्ही पुन्हा ताजेतवाने झालो. ९ वाजता परमटघाटावर गंगाजल प्रदर्शन लावले. सोमवार  सल्याने जवळपास  आठ हजार लोक शंकराच्या मंदीरात येतात  अस दीक्षितांच मत होत. त्यातील  आर्ध्या लोकांनी जरी हे   प्रदर्शन पाहिल तर सा-या कानपूरमध्ये गंगासंवर्धनाचा संदेश पोहचणार होता. आणि झालंही तसचं मंदीराच्या दर्शनी  भागातच प्रदर्शन लावल होत. त्या मूळे देवदर्शना नंतर प्रदर्शनाला गर्दी वाढू लागली. काळीभोर गंगा पाहायची सवय झालेल्या कानपूरकरांना हिमालयातील निळीशार गंगा बघून संकोच वाटूलागला. काही लोक तसं बोललेही. “तुम्ही मुंबईहून येवून प्रदर्शनाच्या माध्यमातून आमच प्रबोधन करताय आणि आम्ही मात्र गंगाप्रदुषण करतोय.” काही लोक आपले  अभिप्राय लिहू लागले. श्रीवास्तव नावाच्या निसर्गप्रेमीने आपल्या अभिप्रायात ‘जल नही तो कल नही’  असा संदेश लिहून जल संवर्धनाच तहत्व प्रगट केलं. काहींनी हा उपक्रम किमान आठवडाभर तरी कानपूरमध्ये सुरू ठेवला पाहिजे अस सुचवलं. हा उपक्रम इथल्या सगळया शाळेंमध्ये तसेच महाविद्यालयातही केला तर इथला तरुणवर्ग या चळवळीत    ओढला जाईल त्यामुळे जागृती होऊन गंगाप्रदुषणावर आळा बसण्यास मदत होईल. त्यांची सुचना तर चांगली होती पण पुरेसा निधी नसल्याच तसेच आमच्या या उपक्रमाला कोणी प्रायोजक मिळाला नसल्याच सागिंतले. महाराष्ट्रातातुन गंगानदी वाहत नसल्याने कोणी मराठी प्रायोजक मदत करण्यास तयार नव्हते तर कानपूर, बनारस,  कोलकात्यातून या उपक्रमाला मदत न मिळण्याच कारण हा प्रयत्न परराज्यातून म्हणजे महाराष्ट्रातातुन आलेली मंडळी करताहेत. असा प्रांतवादाचा दुहेरी फटका आम्हाला बसल्यानेच पुरेसा निधी जमला नाही. ‘लोकसत्ताच्या’ सहकार्यातून आणि गंगाजलचे सभासद तसेच हितचितंकाच्या मदतीनेच कमीतकमी दिवसात हा उपक्रम पुर्ण करित असल्याच सांगाव लागत होतं.

दुपारी बारा वाजता मी व सूरेंद्र आणि उन्मेश सरसय्याघाटाकडे आलो. दीक्षितांनी एका बोटीची व्यवस्था केली होती. सरसय्याघाट ते जाजमाऊ पर्यंतचा १५ कि.मी. परिसर गंगेच्या पात्रातून बोटीने प्रवास करून गंगेला प्रदुषीत करणा-या लेदरटेनरीतून आलेल्या ‘रासायनीक जहर गंगानदीत’ सोडणाया नाल्यांच छायाचित्रण करणार होतो. दीक्षित गाडीने  अशोक सोबत जाजमाऊ कडे गेले. मी व सूरेंद्र  आणि उन्मेश बोटीने जाजमाऊ पर्यंत गंगानदीच्या खो-याचा ‘सर्वे’ करण्यास निघालो. सोमवार  सल्याने गंगास्नानासाठी  अनेक घाटांवर लोकांची गर्दी दिसत होती. गंगास्नाना आधी घरून  आणलेलं निर्माल्य गंगार्पण केलं जात होतं. दुधाचे  अभिषेक केले जात होते. काही ठिकाणी धार्मिक चालू होते. एकंदरीत गंगानदीचं देवत्व सकाळी सकाळी भराला आले होतं. त्याच बरोबर  अनेक घाटांच्या शेजारीच  नागरीवस्त्यांतून आलेले सांडपाण्याचे नाले बिनदिक्कत गंगानदीच्या पात्रात आदळत होते. काहीजण तर तिथेच गंगास्ननाचं पवित्र कर्म आवरत होते तर काहीजण पैल तिरावर जाऊन कमी प्रदुषीत गंगेत स्नान उरकत होते. हे सगळ आम्ही छायाचित्रीत करत होतो. त्यातल्या काहीनां आमच्या विषयी उत्सुकता वाटल्याने संवाद साधत होते तेव्हा परमटघाटावर ‘गंगाजल प्रदर्शन’ असुन ते पाहण्याच निमंत्रण आम्ही देत होतो.

काही ठिकाणी नाले पुर्णपणे बंद केल्याच आमच्या पाहण्यात आलं. तर काही ठिकाणी जसच्यातस असल्याचही जाणवल. उन्हाचा तडका वाढत होता. सोबत  आणलेल्या थंड पाण्याच्या बाटल्या तापत होत्या. गोलाघाटाजवळचा नाला तुडूंब वाहत गंगेच्या पात्रात कोसळत होता. दोन वाजले होते. आम्ही जाजमाऊ परिसरात येऊन पोहचलो. येथे  सलेल्या जुन्या पुला शेजारीच नविन पुल बाधला जातोय. या मार्गे लखनऊ ला जाता येते. जाजमाऊ  परिसरात  नेक लहानमोठे चामडयाचे उद्योग आहेत. त्याना ‘लेदर टेनरी’ असही म्हणतात. कानपूरात गंगानदीला प्रदुषणाचा शाप  सल्याच पदोपदी जाणवत. या कारखान्यांचे रासायनीक जहर  अगदी जसच्यातस गंगानदीत सोडल जात. बहुतेक कारखाण्यांचे सांडपाणी जलशुध्दीकरण प्रकल्प आहेत पण २४ तासापैकी १८ तासावर लोशेडींग असल्याने त्या दरम्यान रासायनीक जहर तसेच गंगेत जातं. मग उरलेल्या सहा तासात जलशुध्दीकरण प्रकल्प चालऊन काय हसिल होणार म्हणुन बहूदा त्या वेळेसही हे प्रकल्प बंदच  असावेत असच वाटू लागत. या कारखान्यात लेदरप्रोसेसिंगसाठी क्रामियम हा जडधातू वापरावा लागतो. तो खूप महागडा असून सांडपाण्यावर प्रक्रिया करून हा क्रोमियम बाजूला केल्यास मालकांचाच फायदा होतो. अस असूनही क्रोमियम मिसळलेलं जहर गंगेत का सोडल जातं ? या मुळे जलचर तसेच मानवी जीवनही धोक्यात आलं आहे. आमचे दीक्षितही नियमित गंगानदीत स्नान करतात. जाजमाऊ  परिसरातील सगळयात मोठया नाल्याजवळ आमची बोट आली. क्रोमियमचं जहर घेऊन तो नाला गंगेच्या पात्रात ऊसळी घेत होता. तो नाला गेल्या दहा वर्षांत अनेकवेळा पाहिला आहे. जेव्हा जेव्हा हा नाला पाहतो तेव्हा माझे डोळे भरून येतात. आजही तसचं झालं आवरूनही आवरता येईना. उन्मेषने सांगितल्यावरच बोट किनाया घेतली त्याला हव तेवढे फुटेज मिळाले होते तर माझ्या संग्रहात छायाचित्राची भर झाली होती.

प्रदर्शनाला खुपच चांगला प्रतिसाद मिळत होता. आमच सगळयांच रात्री प्रवासामुळे जागरण झालेलं. कामाच्या व्यापात कोणलाही जेवण घेता आल नव्हतं. संध्याकाळीही लोकांची गर्दी केली विद्यार्थ्याशीं संवाद साधता आला. अनेकानी  आपले संपर्क क्रमांक व पत्ते नोंदवले होते. कानपूरात रामजी त्रिपाठी हे गंगाप्रदुषणावर काम करीत आहेत. सभा, संमेलनं तसेच गंगेच्या पात्रातील बेवारस मानवी प्रेतं बाहेर काढून त्यांची विल्हेवाट लावणे. अशा अनेक प्रयत्नातून जनजागरण करित आहेत. ते दर सोमवारी परमट घाटावर गंगाप्रदुषणा बाबत पत्रकार परिषद घेतात. एकाप्रकारे दबावगटाच काम करतात. त्यांनी ‘गंगाजल’ची माहिती पत्रकारानां सागिंतली. रामजी त्रिपाठीनीं छायाचित्रणाच्या माध्यमातुन जनजागरण हि कल्पना मनापासून आवडल्याच सांगितले. कानपुरातून दहा जागरूक नागरीकांनी गंगाजलचे सभासदत्व घेण्यास उत्सुकता दाखवली त्यांचासी दीक्षितांच्या  मध्यस्थिने संपर्क ठेऊन ‘गंगाजल’ चा एक दबावगट तयार करण्यात येईल. याच वेळी आमचे सहकारी उमाशंकर दीक्षित यांचा ‘गंगाजल’ च्या वतीने सत्कार करून  आभार मानले. रात्री आठ वाजता दीक्षितांच्या घरी थोडासा  अल्पोउपहार करून  आम्ही अलाहाबादकडे रवाना झालो. रात्रीच जेवण धाब्यावर झाले.

तिन्ही त्रिकाळ नेहमीच प्रयागला यात्रेकरूंचा मेळा जमलेला असतो. दरवर्षी होणारा माघमेळा, दर सहा वर्षांनी येणारा अर्धकुंभमेळा आणि बारा वर्षांनी होणारा महाकुंभमेळा हे इथलं आणखी एक वैशिष्टय. कुंभमेळा या एकाच कार्यक्रमासाठी सर्वाधिक लोकांची गर्दी होणारं हे जगातलं एकमेव ठिकाण आहे. कुंभमेळ्यादरम्यान प्रयागला सात ते आठ कोटी एवढे लोक येतात असा अंदाज आहे. देव आणि दानवांनी समुद्रमंथन केलं आणि त्यातून अमृतकलश बाहेर आला. त्या अमृतकुंभावर ताबा मिळवण्यासाठी झालेल्या युद्घाच्या वेळी अमृताचे काही थेंब पृथ्वीलोकात पडले ते प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन आणि नाशिक या ठिकाणी. देवदानवांच हे युद्घ बारा दिवस चाललं. देवांचे बारा दिवस म्हणजे मानवाची बारा वर्षं, म्हणून कुंभमेळा बारा वर्षांनी एकदा येतो. या कुंभमेळ्याच्या वेळी इलाहाबाद श्रद्घाळूंनी भरून वाहत असतं.

९ मार्चच्या पहाटे दोन वाजता अलाहाबादच्या दारागंज परिसरातील काशीमठात पोहचलो. सकाळी सहावाजे पर्यंत सगळयानी ब-यापैकी झोप काढली. सकाळी मी व सुरेंद्र महाराष्ट्र मंडळाच्या पित्रे गुरूजीनां भेटलो. काशीमठात त्यांनीच आमची व्यवस्था केली होती. आता पर्यंतचा अनुभव तसेच पुढील कार्यक्रमाची रूपरेखा त्यानां सागिंतली. संगमावर लागणाया नावेची सोयही त्यांनी केली तसेच त्या सहकारी ननका याला आमच्या सोबत दिले. पुण्यात जसं मारूतीचं प्रस्त आहे तसच लाहाबादला गंगा यमुना व सरस्वती या नद्यांच्या संगम स्थळाजवळच झोपलेला मारूतीच मंदिर आहे. आज ९ मार्च त्यात मंगळवार सल्याने मारूती भक्तांची लोट गर्दी होणार यात काही शंकाच नव्हती. ८ वाजता ‘लेटा मारूती’ मंदिराच्या प्रागंणात ‘गंगाजल’ प्रदर्शन उभे झाले. बजरंगबलीच्या दर्शनानंतर ‘गंगाजल’ प्रदर्शनाकडे गर्दी होऊ लागली. आता पर्यंत नघडलेली गोष्ट इथे घडली. ती म्हणजे प्रश्नउत्तरे झडू लागली. इथे अनेक प्रश्न  अनेक शंका समोरून येऊ लागल्या. ज्यांची आम्ही आतुरतेने वाट पाहत होतो ते इथे होऊ लागलं. तुम्हाला या उपक्रमासाठी निधी कोणी दिला इथ पासून ते कानपूरच्या टेनरींच काय करायचं ? इलाहाबादला गेल्या दहा वर्षापुर्वी जसा पूर येत होता तस पुन्हा घडण्याची शक्यता आहे काय ? टेहरी धरण खरोख्ररच फुटेल काय ? फरक्का बांध मोडीत कधी निघणार काय ?  अशा  अनेक प्रश्नांतुन संवाद घडत होता. चर्चा झडत होती. इलाहाबादला गंगा यमुना आणि सरस्वती या तीन नद्यांचा संगम होतो. गंगा आणि यमुना या दोन नद्यां दिसतात तर सरस्वती गुप्त सल्याच म्हणतात मात्र इथल्या जागरूक लोकांबरोबर झालेल्या चर्चे दरम्यान साक्षात सरस्वतीच दर्शन झाल्यासारखं वाटले. कानपूर प्रमाणेच दबावगट निर्माण करण्यास मदत होणार होती.

अभिप्राय तसेच संपर्कासाठी दुरध्वनी क्रमांकाची नोंद होत होती. लोक गंगानदी सोबत जोडली जात होती.  अभियानाची वाटचाल उदिद्‌ष्ठांच्या दिशेने होत होती. दुपारी  आमची  आर्धी टिम ननका सोबत बोटीतून गंगा, यमुना संगमस्थळ पाहून  आले. मग मी, सुरेंद्र व उन्मेष छायाचित्रणासाठी ननका सोबत निघालो. आतापर्यंत गंगाप्रदुषणाची बरीच माहिती व छायाचित्रणाच संकलन केल होत. आता यमुना नदी विषयी बरच काही संकलन होईल याची आशा वाटत होती. आमची बोट यमुनेच्या पात्रातुन चालली होती. किल्याच्या पाठीमागे एका साधूच बेवारस प्रेत तंरगताना दिसलं. पुढे यमुनेच्या पात्रातून होणारी बेसुमार वाळूउपसा पाहीला. संगमस्थळावर गंगा आणि यमुनेच्या पाण्याचा पाठशिवनीचा खेळ पाहीला. मातकट रंगाची गंगा तर हिरवट निळया रंगाची यमुना यांचा संगम होऊ न पुढे विशाल रुपात वाहणारी गंगा! खरतर कानपूरच्यापुढे गंगा मरणासन्न झाल्याच दिसतं. इलाहाबादला यमुना गंगेला मिळते म्हणुन गंगा पुन्हा जीवन धारन करते. दोघींच्याही जल साठयाचा विचार केला तर इथून पुढे वाहणाया प्रवाहाला यमुनाच म्हणयला पाहिजे. पण धर्माच्या तराजूत गंगेच महत्व जास्त असल्याने इलाहाबादच्या पुढे गंगाच वाहत राहिली. संगम स्थळावर यात्रेकरूची गर्दी झाली होती. गंगा यमुना संगमात स्नान करता यावे म्हणून अनेक बोटीनां बांधुन कायम स्वरूपी एक प्लाटफार्म तयार केला आहे. गंगास्नान होत होती. कर्मकांड झडत होती. सोबत आलेल्या आपल्या मृत झालेल्या आप्तांची रक्षा गंगार्पण केली जात होती. दिल्लीला ताजच्या मागचं यमुनेच झालेल गटार मला आठवल. तर कानपूरात क्रोमियम सारखं जहर ओतणारा तो प्रचंड नालाही आठवला. श्रध्दा ही भारतीय संस्कृतीचा गाभा आहे. या श्रध्देत प्रचंड ताकद असते. जळत्या निखायावरून चालणे, अनवानी चारधामची यात्रा करणे, पाठीमध्ये लोखंडी हूक खुपसने या मध्ये कदाचित मनःशक्ती साथ देत असावी. पण अतिशय घातक अशा रसायनाने दुषित झालेल्या या पाण्यात स्नान केल्याने होणारे दुष्परिणाम टाळण्याची प्रतीकार शक्ती कशी मिळणार ?

दुपार झाली होती. आम्ही प्रदर्शनाकडे परतलो. थोड्याच वेळात अवरा आवर करून तसेच पित्रेगुरूजींच्या घरी जऊन त्यांचे  आभार मानले. दुपारचं जेवण धाब्यावर झालं. रात्रीचा मुक्काम वाराणसीच्या जवळ सीतामढीला सुरेंद्र मिश्राच्या घरी झाला. मुंबईहून निघाल्या पासून घरच जेवण नव्हतं पण मिश्रांच्या घरी मनासारख जेवण झाल. इतक्या दिवसात प्रथमच रात्रभर झोप मिळाली आणि आम्ही सगळेच पुन्हा ‘रिचार्ज’ झालो उर्वरीत अभियानासाठी. येथूनच मछिंद्र पाटील, संतोष मरगज आणि केवल नागवेकर हे त्यानां व्यवसाईक रजा नसल्याने मुंबईला परतले.

१० मार्चला सकाळी ९ वाजता वाराणसीच्या दशाश्वमेधघाटवर गंगाजल प्रदर्शन लावले. आता आम्ही पाचजणच त्या त्या ठिकाणच्या आमच्या सभासदाच्या सहकार्याने या अभियानाची पुर्तता करणार होतो. गंगाघाटावर लोकांची वर्दळ  असतेच. प्रदर्शन पाहयला लोक अपसूकच जमू लागली. सुरेंद्रच हिंदी बयापैकी असल्यानं तो संवाद साधायला सुरवात करायचा मग मी त्याच चर्चेत रूपातंर करायचो. सुचना यायच्या अभिप्राय लिहले जायचे. संस्थेच्या सभासदत्वासाठी  विचारणा व्हायची. बेल्जियमहून आलेली एक तरूणी ‘चारलोट नेल’ हे तीचं नाव. गंगाप्रदुषणावर प्रोजेक्ट करण्यासाठी वाराणसीत ठिय्या मारून राहीलेली. गंगेबाबत भरभरून बोलत होती. गंगेपासून दूर असलेल्या मुंबईतील एक संस्था गंगाप्रदुषणाबाबत जनजागरणाच काम करते याचं तीला कौतूक वाटत होत. तीने आपला  अभिप्रायही लिहिला. आमच्या या चर्चेत वाराणसीचा एक तरूण सहभागी झाला होता. बाबू त्याच नाव. त्याची स्वःताची मोटरबोट  आहे. गंगेच्या पात्रातुन छायाचित्रण आणि निरीक्षण करण्यासाठी ती मोटरबोट विनामुल्य देण्यास तयार झाला. आता आमचं मनुष्यबळ कमी होत त्यामुळे थोडी धावपळ होत होती. त्यात बाबूची भर पडली. दीक्षित त्याच्यां क्षमते पेक्षा जास्त धावपळ करत होते. सुरेंद्र, दीक्षित आणि शोक प्रदर्शनाजवळ थांबले. अशोक रात्रभर गाडी चालवायचा तेव्हा  आम्हा सगळयांना थोडीतरी विश्रांती मिळायची. पण अशोक दिवसभरही प्रदर्शनात श्रमदान करायचा. अशोक गंगाजलचा सभासद नव्हता तर त्याची गाडी आम्ही दिल्लीतून भाडयाने घेतली होती. जन जोडो होत होतं ते असं.

बाबू त्याच्या मोटरबोटवर आम्हाला घेऊन गेला. वारणा आणि अस्सी या दोन्ही नद्यां वाराणसीच्या दोन टोकाला  आहेत. आता मोटरबोट  असल्याने कानपुर सारखा त्रास होणार नव्हता की फार वेळही लागणार नव्हता. बाबू  आम्हाला  अस्सीघाटावर घेऊन गेला. कधीकाळी स्वच्छ  असलेली  अस्सीनदी  आज नाल्याच्या रूपात गंगेत सामावत होती. वाराणसीत जवळपास ६० ते ७० नाले गंगेत सोडलेले आढळतात. त्यात अस्सी आणि वारणा हे मोठे नाले ठरावेत. येथे  बाबूची मुलाखत चित्रीत केली. त्याने वाराणसीतल्या गंगाप्रदुषणाबाबत तळागळातील लोकही जागृत  सल्याच दाखऊ न दिले. हरिश्चंद्रघाट आणि मणीकर्णिकाघाट तसेच जवळपास सगळेच घाट  आम्ही पालथे घातले. वारणानदी, नदी कसली नालाच तो गंगेत मिसळतो तिथेच वळवळणारे लालसर कीडेही दिसले. बाजूलाच एक बेवारस प्रेत तरंगत होतं. ते खाण्यासाठी काही कुत्रे टपून बसले होते. हे सगळ चित्रीत झाल होत. संध्याकाळच्या आरती पर्यंत प्रदर्शन सुरू होतं. इथेही नविन लोकं जोडली होती. गंगानदी  आणि सर्वसामान्यातील  अतर कमी करण्याचा  आमचा प्रयत्न सफल होताना दिसत होता. या चळवळीतलं ‘जन जोडो गंगा अभियान’  हे पहिल पाऊल ठराव हीच एक इच्छा  आहे. रात्री ८ वाजता   आम्ही वाराणसी सोडली पटण्याकडे जाण्यासाठी. बिहारमध्ये रात्रीचा प्रवास धोक्याचा  सल्याचं सगळेच म्हणतात पण मी एकटाच अनेकवेळा रात्री अपरात्री बिहारमध्ये भटकलो आहे. आणि आताही आम्ही पटण्याकडे जाण्यासाठी रात्रीच निघालो.

आरा, बक्सार मार्गे ११ मार्चला सकाळी ७ वाजता पटण्याच्या हॉटेल स्वागतम्‌ मध्ये दाखल झालो. पाटणा, गंगा नदी इथे नदी न राहता तिचं रूप सागरासारखं विराट होतं. हिमशिखरांतून वाहत येणारी अवखळ गंगा सुमारे पावणे दोन हजार किलोमीटर एवढा प्रवास करून इथे येते, तेव्हा पार बदलून गेलेली  असते. या तराई क्षेत्रात येते तेव्हा गंगा जरा थकलेलीच असते. गंगेचा संथ आणि अथांग पसरलेला प्रवाह या मैदानी प्रदेशाला दरवर्षी संपन्न करत असतो. उन्हाळ्यात हिमालयात वितळणारं बर्फ  आणि त्यानंतर येणारा वर्षा ऋतू यामुळे प्रत्येक वर्षी गंगेला जो पूर येतो त्याचं पाणी गंगेचं पात्र सोडून बिहारच्या मैदानी प्रदेशात पसरतं. त्यामुळे नुकसान होतं. पण जवळजवळ दोन अब्ज टन सुपीक गाळ संपूर्ण गंगेच्या खोर्‍यात पसरवला जातो. गंगा खरोखरच जीवनदायिनी आहे. एकटीच्या ताकदीवर पन्नास कोटी जनतेचं पालनपोषण करते. हीच गंगा जर लुप्त पावली, सरस्वतीच्या मार्गाने गेली तर तो विचारही करवत नाही.

आता इथे  आराम करायला सवड नव्हती. तासाभरात आम्ही तयार झालो. ९ वाजता गोलघराला खेटून गंगाजल प्रदर्शन उभ राहील होतं. हे गोलघर उलटया करवंटीच्या  आकारासारखं आहे. अगदी वरपर्यंत चढून जाण्यासाठी पायर्‍या बांधल्या  आहेत. वरून पाटणा शहर आणि गंगा नदी यांचा नजारा पाहायला मिळतो. आतमध्ये धान्याचं गोदाम  आहे. ऐतिहासीक वास्तू असल्याने शालेय सहली नेहमी येत असतात. शालेय विध्यार्थी तसेच महाविद्यालयीन तरूणांची वर्दळ प्रदर्शनाकडे वाढली. गंगेच्या संवर्धनासाठी काम करणाया काही संस्थांचे सभासद असलेले काही तरूण मंडळी भेटली. हे प्रदर्शन इथल्या शाळा व महाविवद्यालयात लावण्याची इच्छा प्रगट केली. त्यानी त्यांचे संपर्क तसेच अभिप्राय नोंदवले. ‘अभियान इंडिया’ या संस्थेचे संजय कुमार हे म्हणाले “गंगानदी  आपल्या संस्कृतीच प्रतीक आहे. गंगानदीच राहीली नाही तर आपली संस्कृती  आपला देश तरी राहील काय?”  दूपारी २ च्या दरम्यान प्रदर्शन बंद करून  आम्ही सगळेच कलेक्ट्रीघाटाकडे गेलो. एक मोटरबोट भाडयाने ठरवून गंगेच्या पात्रातून प्रवास करीत छायाचित्रणाच संकलन केल. बासघाटाजवळचा मोठा नाला सगळया पटण्याची घाण गंगानदीत सोडताना दिसला. लहानमोठे अनेक नाले पात्रात  वाहताना दिसत होते. स्मसानाची राख गंगेतच ठाकली जाते असल्याच बोटवाल्याने सांगितले. एके ठिकाणी मोठा स्टिमर उभा असलेला दिसला. ‘गंगा विहार’ असा मोठा फलक त्यावर लावलेला होता. ‘गंगा’ जलपर्यटनाकडे विदेशी पर्यटकानां खेचण्याचा सरकारी प्रयत्न दिसला. इथेच गंगानदीवर महात्मा गांधी सेतू  आहे. अशियाखंडातील सर्वात लांब सेतू म्हणुन त्याची गणना होते.

संध्याकाळी ५ वाजता गाधी मैदानात गंगाजल प्रदर्शन लावलं. मुंबईच्या शिवजीपार्क पेक्षाही मोठ असलेल्या मैदानात शिवजीपार्क इतकीच लोकांची गर्दी सध्याकाळी होते. प्रदर्शनाला अपसूकच गर्दी झाली. जलपर्यटन विभागात काम करणा-या एक तरूणाने आमच्याशी संवाद साधला. विवेक कुमार हे त्याच नाव. आता प्रक्रिया उलट होत होती. आता पर्यंत आम्ही लोकांशी संवाद साधत होतो. लोक आमच्याशी संवाद साधत होते. जल पर्यटन विभागातील  प्रमुखा पर्यंत या अभियानाची माहिती पोहचवण्यासाठी  माहितीपत्रक तसेच ब्रोशर विवेकने घेतले. अनेकांनी अभिप्राय देऊन आमचा उत्साह वाढवत या चळवळीत सहभागी होण्याची हमी दिली. गांधी मैदानात  आम्हाला कमी वेळ मिळाला. हा परिसर भारताच्या पुर्व भागात सल्याने मुंबईच्या मानाने सुर्यास्त लवकर होतो. सहा वाजताच अंधार वाटूलागला. तशा संधी प्रकाशातही लोक प्रदर्शन पाहत होते. पाटण्यातही लोक जोडली गेली होती. आता पुढचा टप्पा कोलकाता.

१२ मार्चला सकाळी ६ वाजता अम्ही पाटणा सोडलं. गया मार्गे कोलकात्याला निघालो. गयेतील गंगाजलचे सभासद अच्युत मराठे यांच्या घरी गेलो. त्यांनी दूपारच्या जेवणाची व्यवस्था केली होती. पुढे झारखंड मार्गे पश्चिम बंगाल मध्ये प्रवेश केला. हा दिवसभर केलेला प्रवास खुपच कंटाळवाना वाटला. आळस जाण्यासाठी मध्येच चहापाण होत  होते. दुसया दिवसी पहाटे ३ वाजता कोलकात्याला पोहचलो. हाजरा रोडवर असलेलं महाराष्ट्र निवास शोधयला थोडा त्रास झाला. कोलकात्यातील गंगाजलचे सभासद यशवंत सागडयांशी आधीच बोलण झालं होतं. ते महाराष्ट्र निवासात व्यवस्थापक म्हणुन काम करतात. केवळ महाराष्ट्रातच परप्रांतीय येतात अस नाही तर ब-याच परप्रांतात मराठी माणूस सूध्दा पिढयानं पिढया राहतोय. एवढया पहाटे सागडे आमची वाट पहात होते. महाराष्ट्र निवासात आमची व्यवस्था झाली. दिवसभराच्या प्रवासाने थकवा आला होता. कधी झोप लागली कळलसुध्दा नाही.

१३ मार्चला ८ वाजता गजरामुळे जाग आली. एका तासाभरात आमची तयारी झाली. सागडे डयुटीवर हजर होते. आमच्या चहा फराळाची व्यवस्था केली होती. बंगाली बांधवाचे श्रध्दास्थान म्हणजे कालीमाता, तीच्या मंदिरा जवळच  प्रदर्शन लावायच होतं म्हणजे जास्तीजास्त लोकां पर्यंत गंगासंवर्धनाचा सेदेश पोहचणार होता. एक प्रदर्शन कालीघाटावर लावयचं तर दुसर दक्षिणेह्णार घाटावर. आतापर्यंतची सकाळी ९ वाजता लागायचीच इथही तसच झाल. अभियानाच्या शेवटी  आळसामुळे ढिलाई येऊ द्यायची नाही असा आमचा कटाक्ष होता. कालीघाटावर मंदिराच्या सुरक्षेसाठी पोलीसांच कवच आहे. त्यांच्या परवानगीने मंदिराच्या जवळ प्रदर्शन लावलं. कालीच्या दर्शनासाठी झालेली गर्दी दर्शनानंतर प्रदर्शनाकडे वळली. पोलीसानीही  प्रदर्शनाला भेट दिली. प्रदर्शन पाहिल्यावर विचारपूस होत होती. अभिप्राय लिहले जात होते. शंका विवचारल्या जात होत्या त्यांच निरसनही केले जात होत. उन्मेश अशोकला घेवून कालीघाटाच चित्रीकरण करून आला. आम्ही सगळयानी मनोभावे कालीमातेच दर्शन घेतल. दुपारच्या जेवणानंतर दक्षिणेह्णार घाटावर पोहचलो.

कालीघाटा पेक्षा खुपच स्वच्छ असा हा परिसर तितकाच वर्दळीचाही वाटला. प्रदर्शन लावतानाच गर्दी होऊ  लागली. कालीघाटावर तळागळातील लोकांचा जास्त प्रतीसाद होता. मात्र येथे उच्चप्रभू आणि शिक्षीत लोकांची चहलपहल जास्त होती. कोलकात्यात गंगेला हुगळी म्हणतात. दक्षिणेह्णारच्या स्वच्छ, सुंदर वातावरणात स्वामी रामकृष्ण परमहंस   भरून राहिले आहेत असं वाटत राहिलं. इथेच कालीमातेनं रामकृष्णानां दर्शन दिल्याचं सांगितलं जातं. बारावीची परिक्षा देऊन कालीच दर्शन घेण्यासाठी आलेले काही महाविद्यालयीन तरूण भेटले. त्यानी गंगाजलचे सभासद होण्याची  तयारी दाखवली. या माध्यमाने जलसंवर्धनासाठी काम करण्याचा संकल्प सोडला. अनेक अभिप्राय तसेच सुचना यानी दक्षिणेह्णार घाटावरचं गंगाजल प्रदर्शन भरगच्च झालं. दरम्यान इथल्या एका फुलाच्या दुकानदाराशी चर्चा केली. हुगळीत  गाळाच प्रचंड वाढल्याच सांगत कारखदारांनाही तो शिव्या देऊ लागला. कारखाण्याचं रासायनिक सांडपाणी हुगळीच प्रदुषण वाढवतं  तसेच शहराच सांडपाणीसुध्दा प्रदुषणात भर घालते आहे. आम्ही काहीही करू शकत नसल्याची खंत वाटते. मात्र तुमचं हे प्रदर्शन पाहिल्यावर वाटतं हळुहळू का असेना पण बदल संभव  आहे.  आपल्या  अनेक मित्रांच्या सहकार्यने दबागट निर्माण करण्याच आश्वासन त्याने दिलं. कोलकाता पुर्वेला असल्याने सुर्यास्त लवकरच होतो. ६ वाजताच  अंधार पडायला लागला. त्या  अंधुक प्रकाशातही प्रदर्शन पाहणारे होते. हे किती दिवस राहणार अंसल्याची विचारणा होत होती. एकच दिवस असल्याच ऐकून चरचरत होते. काहीजण एक दिवस वाढवण्याचा अग्रह करीत होते. आमची अडचण त्यानां सागांवी लागत होती.

महाराष्ट्र निवासात साडेनऊ पर्यंतच जेवणाची व्यवस्था असते त्या मुळे आम्ही निवासात परतलो. उद्या गंगासागर या अभियानाचा शेवटचा पडाव. तिथे फक्त १४ जानेवारीस मकर संक्रातीला होणा-या गंगासागर यात्रेलाच लोक जातात. इतर वेळेस तुरळक गर्दी  असते. पण ‘जन जोडो गंगा भियानाची’ सांगता गंगासागरला होणार होती. कोलकाता ते ‘हाडहूड पाँइट’ (२४ परगना) इथ पर्यंत आमची टवेरा गाडी जाऊ शकली हे अंतर ७५ कि. मी. होतं. लॉट- ८ वरून स्टिमरने कुच्चुबेरीया फेरी घाटावर पोहचायला अर्धा तास लागला. हे अंतर सागरी ८ मैल होत. दिल्लीहून निघाल्या पासून एकाच गाडीने आमचा प्रवास झाला होता. इथे मात्र आम्हाला दुसरी सुमोगाडी घ्यावी लागली. कुच्चुबेरीया फेरी घाट ते कपिलमुनी  आश्रम हे ३५ कि.मी. अंतर होत. एक तासाभरात आम्ही कपिलमुनी आश्रमा समोर हजर होतो तेव्हा दुपारचे २ वाजले होते. आता अशोक चक्रधर म्हणुन नव्हे तर गंगाजलचा सभासद म्हणुन काम करीत होता.   अगदीच तुरळक लोकाची गर्दी होती. आम्ही प्रदर्शन उभा करत सतानाच जे काही लोक होती ती जमा झाली. त्यातल्या   अनेकाना गंगाप्रदुषणाची ओळख आधी करून द्यावी लागत होती. काही लोक समझत असूनही आम्ही यात्रेकरू आहोत  आम्ही काय करणार ?  असा प्रश्न आम्हालाच विचारत होते. एक मोठा ग्रुप आला. बहुदा दाक्षिनात्य असावा. कोरडया नजरेन चालता झाला. कुठलाही अभिप्राय नाही. चर्चा नाही. पण अभियानाची सांगता कपिलमुनिच्या साक्षिने करायची होती. त्याच्यां एका शापामुळेच तर राजा भगिरथाने स्वर्गीय गंगेला पृथ्वीवर आणुन प्रदुषणाच्या खाईत लोटले होते. प्रदर्शन तसेच ठेऊन आम्ही गंगा आणि सागर यांच्या संगमस्थळाकडे गेलो. समोर अथांग सागर पसरलेला गंगासाग बेटाला आपल्या कवेत घेऊन गंगामाई सागरात विलीन होत होती. अनेक मंडळी या संगमात स्नान करीत होती. पुण्य पदरात पाडुन घेत होती. सुरेंद्र, अशोक आणि दीक्षितांनी गंगासागरात स्नान केल. उन्मेश आणि मी चित्रीकरणात व्यस्त होतो. गोमुखातील शुघ्द प्रदुषण विरहित गंगाजल सोबत आणले होते. मी दीक्षितानां बरोबर घेऊन गंगाजलाने भरलेलं पात्र बंगालच्या  अथांग सागरात मनोभावे  अर्पण केले. त्याच्या मागे भावना अशी होती की, आमच्या या खारीच्या प्रयत्नाने गंगा शुध्द होईलच असा आमचा दावा नाही की गंगा काठावरच्या लोकानां जागृत केल्याचा हमगंडही नाही. जी आमची जबाबदारी होती ती आम्ही पार पाडण्याचा प्रामाणिक प्रयत्न केला इतकच. भविष्यात कधीतरी कोणाच्यातरी प्रयत्नाने गोमुख येथील शुध्द, प्रदुषण विरहित गंगानदी या अथांग सागरा पर्यंत प्रवाहित राहो अशी आशा करून आमच्या ‘जन जोडो गंगा अभियानाची’ सांगता केली.

विजय मुडशिंगीकर

अध्यक्ष,

गंगाजल नेचर फाऊंडेशन, मुंबई

भ्रमणध्वनी ०९८६९०८६४१९

संकेतस्थळ-  http://www.gangajal.org.in/

ईमेल – admin@gangajal.org.in

Route of the Mission 'Jan Jodo Ganga Yatra - 201', 'Connecting people to the River Ganga'

Mission inaugurated by our legal advisor Shri Pradeepji Aggarwal at New Delhi

Mukhava

(Ganga Temple)

Mukhava - 1
Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Mukhava

Mukhava – 2

Mukhava – 3

River Ganga worrier team from Gangajal Nature Foundation, Mumbai.

Uttarakashi

(Kashiviswanath Temple)

Uttarakashi -
Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Uttarkashi

Our team stand up the exhibition.

Uttarkashi

Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Uttarkashi.

Students viewing the Gangajal Photo Exhibition, Uttarkashi

Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Uttarkashi

Students viewing the Gangajal Photo Exhibition, Uttarkashi.

Visitor’s feedback, Uttarkashi

Visitor’s feedback!

Hrishikesh

(Triveni Ghat)

Hrishikesh – 1

Hrishikesh – 2

Hrishikesh – 3

Hrishikesh – 4

Hrishikesh – 5

Hrushikesh - 6
Hrishikesh – 6

Media News about Mission !

Haridwar

(Subhash Ghat)

Haridwar – 1

Haridwar - 2
Haridwar – 2

Haridwar

Haridwar

Haridwar

Haridwar

Haridwar – 3

Haridwar – 4

Haridwar – 5

Haridwar – 6

Haridwar – 7

Gangajal Team

Gangajal Team

Kanpur

(Parmat Ghat)

Kanpur – 1

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Kanpur – 3

Kanpur – 4

Visitor’s feedback at Kanpur !

Drainage in the Ganga near Powar House at Kanpur.

Kanpur – 5

Kanpur – 6

Visitor’s feedback at Kanpur !

Kanpur – 7

Kanpur – 8

Kanpur – 9

River basin or dust bin ?

Drainage in the Ganga near Jajmou, Kanpur

Drainage in the Ganga near Jajmou, Kanpur

Near Golaghat, Kanpur

Lather Factory, Kanpur

Lather Factory, Kanpur

Lather transport, Kanpur

Lather transport, Kanpur

Lather dust bin, Kanpur

Local Ganga worriers with us.

Our appreciation Shri Umasankar Dixit from Kanpur.

Allahabad

(Leta Maruti Temple)

Allahabad – 1

Allahabad – 2

River basin or dust bin ?

Allahabad – 3

Allahabad – 4

Visitor’s feedback at Allahabad !

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Allahabad – 7

Allahabad – 8

Allahabad – 9

Visitor’s feed back at Allahabad.

Banaras

Dashaswamedhghat

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Banaras – 4

Visitors feed back at Banaras.

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River Assi or drainage flow in the Ganga at Varanasi.

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River Varana like drainage in the Ganga at Varanasi.

Patna

Golghar

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Visaitor’s feed back at patna.

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'Mahatma Gandhi Setu' Asia's longestu Bridge.
‘Mahatma Gandhi Setu’ Longest bridge in Asia, Patna, Bihar.

Old Patliputra

Old Patliputra

Old Patliputra

Patna – 31

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Gandhi Ground.

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Kolkata

Kalli ghat

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Dakshineswar Ghat

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Visitor’s feed back from Kolkata.

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Visitor’s feed back from Kolkata.

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Visitor’s feed back from Kolkata.

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Lacky Ghat, Titaghar, Kolkata.

Lacky Ghat, Titaghar, Kolkata.

Back yard of Bellur Math.

Back yard of Bellur Math.

Kali Ghat

Ganga Bath, Kali Ghat

Ramchandra Goenka Ghat

Ramchandra Goenka Ghat.

Ganga Sagar

Journey by Car to Gangasagar.

Journey by Steamer to Gangasagar.

Journey by Steamer to Gangasagar.

Journey !

Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Kapilmuni Ashram, Gangasagar

Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Kapilmuni Ashram, Gangasagar

Visitors viewing the Gangajal Photo Exhibition, Kapilmuni Ashram, Gangasagar

Kapilmuni Ashram, Gangasagar, West Bengal.

Sacred Confluence of the river Ganga and Bay of Bengal, Ganga Sagar.

Sacred Confluence of the river Ganga and Bay of Benga, Ganga Sagar.

Sacred Confluence of the river Ganga and Bay of Benga, Ganga Sagar.

We carried pollution free Gangajal (water of the river Ganga) from  starting point of Ganga ‘Gomukh’, poured in the Bay of Bengal as a wish that one day mother Ganga will come at Gangasagar as pollution free River.

Head of the Mission Vijay Mudshingikar

Mission Coordinator Surendra Mishra

The Ganga Worrier Team from Gangajal Nature Foundation, Mumbai

The Ganga Worrier Team from Gangajal Nature Foundation, Mumbai

जल नही तो कल नही !

Save Ganga Save India !

हमे चाहीये निर्मल धारा !

नही चाहीये गंदा नाला !

जलच् जीवनम् !

Water is Life !

‘Gangajal’ Photo Exhibition on River Pollution, Photography By our president Mr. Vijay Mudshingikar.

The most serious problem today is the destruction of our environment. General population is ignorant about it. Pollution, drought, flood, soil and water problems are not natural but they are consequences of uncaring and selfish attitude of mankind. Not only present but future generations too will suffer due to the ill-effects of this. Gangajal Nature Foundation is making an effort to awaken people from their deep slumber.

We appreciated the work done by Hon. Shri Rajiv Ji Gandhi on the Dying Ganga. River Ganga is declared as a National River of India by Prime Minister Mr. Manmohan Singh in 2008 which was ‘International Year of Rivers’

Gangajal Nature Foundation is working hard for last four years towards awakening and educating people about upkeep of rivers and lakes by organizing photo exhibitions, screening of the documentary, by holding national level competitions in essay-writing, photography and documentaries. So far around seventy thousand sensible citizens have visited the eleven exhibitions.

We are trying to spread awareness about water pollution, through the medium of ‘Gangajal photo exhibition’  since last four years. We are exhibiting Photographs of  India’s National River The Ganga clicked by our Founder President Mr. Vijay Mudshingikar from the year 2001 to 2006. Our  ‘Gangajal’  documentary film based on these photographs  as tools to spread awareness.

Gangajal Photo Echibition

Gangajal Photo Exhibition

“Jan Jodo Ganga Yatra” (Connecting people to Ganga)

“Jan Jodo Ganga Yatra” (Connecting people to Ganga)

My few Worlds - Vijay Mudshingikar

My few Worlds - Vijay Mudshingikar

Gomukha (Cow’s Mouth),elevation 12,700 feet, where the Bhagirathi Ganga emerges from the Gangotri Glacier. Uttarakhand.

Gomukha, Pilgrims in late winter at Gomukha, Gangotri, Uttarakhand.

Bhojvasa, Bhagitrathi peaks (21,364 feet, 21,176 feet and 22,496 feet), Shivaling peak (21,466feet), Uttarakhand.

Chirbasa, Hard root to Gomukha and pilgrims, Gangotri, Uttarakhand.

Uttarakhand govt sounds red alert on the Gomukha, Gangotri, Uttarakhand.

Gangotri temple in mid winter, elevation 10,000 feet, Gangotri, Uttarakhand.

Doli Yatra, Festival of Door opening on Akshay Tritiya in the month of April-May, Gangotri, Uttarakhand.

Suryakund, water fall of the River Ganga, Gangotri, Uttarakhnd.

Bhairavghati, Gangotri, Uttarakhand.

River Alaknanda, Badrinath, Valley of Flowers, Himkund, Uttarakhand.

Devprayag, sacred confluence of the Bhagirath Ganga, left, and the Alaknanda, right, Devprayag, Uttarakhand.

Doli Yatra festival, Mukhava, Uttarakhand.

Uttarkashi, Uttarakhand.

Dharasu Bend, Uttarakhand,

Dharasu Bend, Uttarakhand,

 Laxman Zula, Hrishikesh, Uttarakhand.

Laxman Zula, Hrishikesh, Uttarakhand.

Haridwar, View from Mansadevi Temple, Haridwar, Uttarakhand.

Haridwar, View from Mansadevi Temple, Haridwar, Uttarakhand.

 Kawar Yatra, Hari Ki Pouri, Haridwar, Uttarakhand.

Kawar Yatra, Hari Ki Pouri, Haridwar, Uttarakhand.

Save Ganga Movement, Jagjeetpur water treatment plant, Haridwar, Uttarakhand.

Save Ganga Movement, Jagjeetpur water treatment plant, Haridwar, Uttarakhand.

Brajghat, Gadhmukteswar, Uttar Pradesh.

Brajghat, Gadhmukteswar, Uttar Pradesh.

Brhmavartghat, Bitur, Kanpur, Uttar Pradesh.

Brhmavartghat, Bitur, Kanpur, Uttar Pradesh.

Crores liters of Sewage water and tannery’s waste chemical in the Ganga, Jajmaou, Kanpur, Uttar Pradesh.

Crores liters of Sewage water and tannery’s waste chemical in the Ganga, Jajmaou, Kanpur, Uttar Pradesh.

 Maghmela, Triveni Sangam, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Maghmela, Triveni Sangam, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Bone ash Abandonment, Teiveni Sangam, prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Bone ash Abandonment, Teiveni Sangam, prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

 Sacred Confluence of the River Ganga, Yamuna and Sarswati, Maghmela, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Sacred Confluence of the River Ganga, Yamuna and Sarswati, Maghmela, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Seagulls, Sacred Confluence of the River Ganga, Yamuna and Sarswati, Maghmela, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Seagulls, Sacred Confluence of the River Ganga, Yamuna and Sarswati, Maghmela, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh.

Biggest Solar eclipse of the 21st century at Banaras. Prayag ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Biggest Solar eclipse of the 21st century at Banaras. Prayag ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Ganga Arti, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Ganga Arti, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Secular Ganga, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Secular Ganga, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Durga Festival, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Durga Festival, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Kartik Ganga Bath, Light Festival, Banaras, Uttar Pradesh.

Kartik Ganga Bath, Light Festival, Banaras, Uttar Pradesh.

Light festival, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Light festival, Prayag Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

 Gangajal, Crores liters of Sewage water and chemical waste in the Ganga Dally, Banaras, Uttar Pradesh.

Gangajal, Crores liters of Sewage water and chemical waste in the Ganga Dally, Banaras, Uttar Pradesh.

  Manikarnika Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Manikarnika Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Harishchandra Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Harishchandra Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Sunrise, Narad Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Sunrise, Narad Ghat, Banaras, Uttar Pradesh.

Chat Festival, Golghar, Patna, Bihar.

Chat Festival, Golghar, Patna, Bihar.

Chat Festival, Bass Ghat, Patna, Bihar.

Chat Festival, Bass Ghat, Patna, Bihar.

Chat Festival, Collectori Ghat, Patna, Bihar.

Chat Festival, Collectori Ghat, Patna, Bihar.

Drainage in the Ganga at Bass Ghat, Patna, Bihar.

Drainage in the Ganga at Bass Ghat, Patna, Bihar.

Howrah Bridge, Kolkata, West Bengal.

Howrah Bridge, Kolkata, West Bengal.

Kali Mata Temple, Kalighat, Kolkata, West Bengal.

Kali Mata Temple, Kalighat, Kolkata, West Bengal.

Durga Festival, Kolkata, West Bengal.

Durga Festival, Kolkata, West Bengal.

Durga Visrjan, Babu Ghat, Kolkata, West Bengal.

Durga Visrjan, Babu Ghat, Kolkata, West Bengal.

Dakshineswari Temple, Bellur Math, Kolkata, West Bengal.

Dakshineswari Temple, Bellur Math, Kolkata, West Bengal.

Gangajal, Backyard of Bellur Math, Kolkata, West Bengal.

Drainage in the Ganga (Hugely River), Backyard of Bellur Math, Kolkata, West Bengal.

Industrial waste chemical in the Ganga (Hugely River), Titagadh, West Bengal.

Industrial waste chemical in the Ganga (Hugely River), Titagadh, West Bengal.

Journey To Gangasagar,  24 Paragana, West Bengal.

Journey To Gangasagar, 24 Paragana, West Bengal.

Kapilmuni Ashram, Gangasar Mela,  West Bengal.

Kapilmuni Ashram, Gangasar Mela, West Bengal.

Naga Sadhus, Gangasagar Mela, West Bengal.

Naga Sadhus, Gangasagar Mela, West Bengal.

 Son of Ganga Maiyya, Gangasagar Mela, West Bengal.

Son of Ganga Maiyya, Gangasagar Mela, West Bengal.

 Sacred confluence of the River Ganga and Sagar (Bay of Bengal), Gangasagar, West Bengal.

Sacred confluence of the River Ganga and Sagar (Bay of Bengal), Gangasagar, West Bengal.

Together we can make Difference.....Let's do it ! Save Water Save Nature !

Together we can make Difference.....Let's do it ! Save Water Save Nature !

  Save River Ganga movemunt by ‘Gangajal Nature Foundation, Mumbai’. We need your Co-Operation.

Save River Ganga movement by ‘Gangajal Nature Foundation, Mumbai’. We need your Co-Operation.

Save Ganga ! Save India !

मान्सूनची गुगली! – अभिजित घोरपडे


सध्या मान्सूनच्या लांबण्याने आपल्या नियोजनाचे पितळ मात्र उघडे पडले. पाऊस आठ-दहा दिवसांनी लांबल्यामुळे इतकी अस्वस्थता पसरावी आणि या परिस्थितीतून मार्ग काढण्याचे सक्षम पर्यायही आपल्याकडे नसावेत, ही बाबच अस्वस्थ करणारी आहे. मागे अनेकदा अशी परिस्थिती येऊनही आपण हे धडे घेतले का, याचे उत्तर आताच्या अस्वस्थतेतून मिळते.

अकोला ४१.४ अंश सेल्सिअस, नागपूर ४३, पुणे ३६.६, मुंबई ३४.५, औरंगाबाद ३९.४, कोल्हापूर ३४, सांगली ३४.८, महाबळेश्वर २९.२ अंश.. गेल्याच मंगळवारचे कमाल तापमानाचे हे आकडे! ही नोंद पाहून सध्या उन्हाळा सुरू आहे की काय अशीच शंका येईल. प्रत्यक्षात जूनच्या उत्तरार्धातही इतका उकाडा, हा मान्सूनचे आगमन लांबल्याचाच परिणाम! पाऊस लांबला असला तरी यामुळे एक बरे झाले. आपला पावसाळा हा स्वतंत्र ऋतू नसून तो उन्हाळ्याचाच एक भाग आहे, हे वास्तव लोकांनी अनुभवले. जूनच्या मध्यापर्यंत राज्यभर पाऊस पडत असल्याने तापमानात घट होते, त्यामुळे उन्हाळा जाणवत नाही. पण आता पावसानेच दडी मारल्याने, एरवी लपून राहणारा उन्हाळा राज्यात अवतरला आहे!
जूनच्या मध्यावर राज्यभर सक्रिय असणाऱ्या मान्सूनने यंदा दडी मारली आहे. या वर्षी तो केरळात वेळेआधी आठवडाभर म्हणजे २३ मे रोजी दाखल झाल्यानंतर ७ जून रोजी रत्नागिरीत दाखल होऊन त्याने महाराष्ट्रातील आगमनाची वेळही पाळली. नंतर मात्र तो तिथेच थबकला. अजूनही किमान दोन-तीन दिवस तो पुढे सरकण्याची चिन्हे नाहीत. केरळात लवकर दाखल होऊनही त्याने महाराष्ट्राला अजूनपर्यंत तरी चकविले आहे. मान्सूनच्या बेभरवशी आगमनाचा अनुभवही या निमित्ताने आला. त्याचे आगमन लांबल्याने राज्यभर अस्वस्थता निर्माण झाली. अनेक ठिकाणी खरिपाच्या पेरण्या खोळंबल्या, पिण्याच्या पाण्यामध्ये कपात करण्याचीही वेळ आली आहे. त्यातच प्रसिद्धीमाध्यमांमधून सनसनाटी बातम्या प्रसिद्ध झाल्यामुळे तो जूनमध्ये तरी दाखल होणार का, याबाबत चिंता व्यक्त केली जात आहे. या निमित्ताने मान्सूनच्या लहरीपणाची चर्चासुद्धा होऊ लागली आहे.
पण मान्सून खरंच लहरी किंवा बेभरवशी आहे का? तो केरळात लवकर दाखल झाल्यामुळे पुढेसुद्धा वेळेआधी किंवा वेळेवर येईल अशी अपेक्षा होती, ती त्याने फोल ठरविली, पण त्याच्या आगमनाला असा कितीसा उशीर झाला आहे? सरासरी तारखांनुसार तो ७ जून रोजी पुण्यात दाखल होतो, १० जून रोजी मुंबईत पोहोचतो आणि १२-१३ जूनच्या आसपास संपूर्ण महाराष्ट्र व्यापतो. या वेळी त्याचे आगमन साधारणत: दहा ते बारा दिवसांनी लांबले आहे. हेच अस्वस्थतेचे कारण आहे. पण हे पहिल्यांदाच घडत आहे का? मान्सूनचे वर्तन समजून घेतले तर आजची परिस्थिती अपवादात्मक नाही, हे लक्षात येते. त्याच्या आगमनाच्या तारखा नेहमीच पुढे-मागे होतात. त्याची केरळात पोहोचण्याची तारीख १ जून मानली जाते, पण तो दरवर्षी याच तारखेला तिथे पोहोचतो असे नाही. किंबहुना गेल्या ५० वर्षांत तो केवळ तीन वेळा १ जूनला केरळात दाखल झाला. एरवी त्याचे केरळातील आगमन लवकरात लवकर १४ मे रोजी आणि उशिरात उशिरा १९ जून रोजी झाले आहे. त्याच्या महाराष्ट्रातील प्रवासाबाबतही असेच घडले आहे. तो केरळात लवकर आला तरी मध्य महाराष्ट्रात पुणे आणि कोकणात मुंबई येथे लवकर पोहोचतोच असे नाही. १९६० साली तो केरळात १४ मे रोजी दाखल झाला, पण त्याने पुण्यात व मुंबईत पोहोचण्यासाठी तब्बल एक महिना घेतला. या दोन्ही ठिकाणी तो १३ जून रोजी दाखल झाला. १९७४ सालीसुद्धा काहीशी अशीच स्थिती होती. तेव्हा तो २३ मे रोजी केरळात दाखल झाला. पण त्याच्या पुणे व मुंबईतील मुक्कामासाठी २८ जून ही तारीख उजाडावी लागली. असेच काहीसे १९७३, १९७७, १९८१ या सालीही घडले. याउलट काही वर्षी तो अगदी वेळेवर पुढे सरकला. १९८०, १९८४ आणि गेल्या वर्षीसुद्धा त्याचे आगमन वेळेवर झाले. गतवर्षी तो ३१ मे रोजी तो केरळात दाखल झाला. पुढे ७ जून रोजी पुणे व मुंबईत पोहोचला.
मान्सून संपूर्ण भारतभर पसरण्याचा काळही बराच मागे-पुढे होतो. तो सामान्यत: १५ जुलै रोजी देशाचा संपूर्ण भाग व्यापतो. पण १९६१ साली तो २१ जून रोजीच देशभर पोहोचला, तर २००२ सालच्या दुष्काळी वर्षांत त्यासाठी १५ ऑगस्ट ही तारीख उजाडली. याचा अर्थ मान्सूनच्या आगमनाच्या तारखा मागे-पुढे होतातच. त्यात विशेष असे काही नाही. त्याच्यावर हवामानाच्या असंख्य घटकांचा प्रभाव पडत असल्याने ते अपेक्षितच आहे. मान्सूनचा हा इतिहास विसरल्यावर मात्र सर्वच गोष्टी नव्या वाटतात, तेच या वर्षी पाहायला मिळत आहे. प्रत्यक्षात मात्र मान्सूनइतका भरवशाचा क्वचितच दुसरा हवामानाचा घटक सापडेल. कारण त्याचे जून महिन्यातील आगमन कधीही चुकलेले नाही. त्याला काही आठवडय़ांचा विलंब झाला तरी तो येतो आणि सरासरीच्या किमान तीन चतुर्थाश इतका पाऊस देतो, हे निश्चित! मग तो बेभरवशी कसा?
या वर्षी मान्सूनची लहर काही दिवसांसाठी फिरली हे खरे. त्याला जूनच्या सुरुवातीला आलेले ‘एला’ चक्रीवादळही कारणीभूत ठरले. हे वादळ २३ मे रोजी बंगालच्या उपसागरात निर्माण झाले आणि दोनच दिवसांत बंगालच्या किनाऱ्यावर आदळले. त्याच्यामुळे मान्सून ईशान्य भारतात लवकर पुढे सरकला, पण वादळाने समुद्रावरील जास्तीत जास्त बाष्प वापरले आणि मान्सूनच्या पुढील प्रगतीत खंड पाडला. मान्सून वेळेआधी दाखल होण्यामुळे लवकर येणाऱ्या पावसाचा फायदा असतो, तसाच धोकासुद्धा! मान्सून स्थिर होण्यासाठी आवश्यक असलेला वेळ न मिळताच पुढे सरकला, तर चक्रीवादळासारख्या एखाद्या अडथळ्यामुळे त्याची पुढील प्रगती खंडित होऊ शकते. हाच अनुभव या वर्षी आला.
याचबरोबर सध्या मान्सूनचे वारे प्रभावी नसल्याने उत्तर भारतात पश्चिमेकडून येणारे वारे सक्रिय बनले. त्यांच्यामुळे मान्सून वाऱ्यांना पुन्हा स्थिरस्थावर व्हायला वेळ लागत आहे. याशिवाय मान्सूनला पुढे ढकलणारे, विषुववृत्तापलीकडून येणारे वारे क्षीण बनले आहेत. त्यांनीसुद्धा मान्सूनला विश्रांती घ्यायला भाग पाडले आहे. आता या आठवडय़ाच्या अखेरीस बंगालच्या उपसागरात हवेच्या कमी दाबाचे क्षेत्र निर्माण होण्याची शक्यता वर्तविण्यात आली आहे. सध्याच्या परिस्थितीत तोच काय तो दिलासा ठरेल. या कमी दाबानेही फसवणूक केली तर जूनच्या अखेरीस किंवा जुलै महिन्यात चांगल्या पावसाची अपेक्षा आहे.
सध्या मान्सूनच्या लांबण्याने मात्र आपल्या नियोजनाचे पितळ उघडे पडले. पाऊस आठ-दहा दिवसांनी लांबल्यामुळे इतकी अस्वस्थता पसरावी आणि या परिस्थितीतून मार्ग काढण्याचे सक्षम पर्यायही आपल्याकडे नसावेत, ही बाबच अस्वस्थ करणारी आहे. सध्या मुंबई, पुण्यासारख्या शहरांसह अनेक ठिकाणी पिण्याच्या पाण्यात कपात करावी लागते, याचा अर्थ काय? दुष्काळ किंवा नाजूक परिस्थितीतून पुढच्या नियोजनासाठी धडे घेणे अपेक्षित असते. मागे अनेकदा अशी परिस्थिती येऊनही आपण हे धडे घेतले का, याचे उत्तर आताच्या अस्वस्थतेतून मिळते. वर्तनातील चढउतार हे मान्सूनचे लक्षणच असल्याने भविष्यातही तो आपली फिरकी घेणारच. त्याच्या ‘गुगली’मुळे पुढील काळातही आपले नियोजन बाद झाले, तर त्याचे दोषी आपण असू. त्याचे खापर मान्सूनवर फोडता येणार नाही!

साभार लोकसत्ता,

अभिजित घोरपडे
abhighorpade@rediffmail.com

सावित्री म्हणजे उष:काल. काळोखातून वाटचाल करून उष:कालाकडे जाणारी सावित्री आपल्यालाही हाच संदेश देते. या सावित्री कथेमध्ये त्या व्रताचेच नाव ‘वटसावित्री’ ठेवून वडाच्या झाडाचेही माहात्म्य वाढवले आहे- वैशाली कुलकर्णी

व्रतांचा संबंध हा कुटुंबाबरोबरच समाजाशी व संस्कृतीशीही असतो. (५ जून हा पर्यावरण दिवस आहे). वेगवेगळ्या ऋतूंमध्ये वेगवेगळे सण-व्रते येतात. आपल्या पूर्वजांनी धर्मसंकल्पना व आरोग्य यांचा योग्य समन्वय साधूनच रूढी बनवल्या होत्या. त्यांनाच त्यांनी धार्मिकतेची डूब दिली.
या व्रतांचा संबंध पशुपक्षी, प्राणी व वनस्पतींशीही जोडलेला दिसतो. पोळ्याच्या सणाला बैलांचे महत्त्व, वसुबारसला गायवासरू, आषाढ अधिक मासात कोकिळा, पितृ पंधरवडय़ात कावळे, हे पक्षी-प्राण्याविषयी तसेच चैत्री पाडव्याला कडुलिंब, दसऱ्याला आपटय़ाची पाने, मंगलागौरीला पत्री, श्रावणात केळीची पान- हळदीची ओली पाने, गणेशपूजनासाठी दुर्वा- बेल-तुळस-शमी, शंकराला बेल. अशा वेगवेगळ्या झाडांची पाने, पूजेसाठी वापरली जातात. तसेच वटवृक्षाचे महत्त्व वटपौर्णिमेला आहे.
पाँडिचेरीच्या अरविंदांनी ‘सावित्री’ हे महाकाव्य, महाभारत- वनपर्वात आलेल्या ‘सावित्री’ उपआख्यानावरून रचलेले आहे. महाभारतातल्या ७०० ओळींमधल्या कथेचे २४००० ओळीतले महाकाव्य कवी अरविंदांनी पौराणिक कथेचे रूपकात्मक कथेत रूपांतर केले.
‘‘जीवनाचे- जगण्याचे व मृत्यूचे कोडे कोणालाच उलगडता आलेले नाही. ते गूढच राहिलेले आहे. ते शोधण्याचे प्रयत्न मानवाने अखंडपणे चालूच ठेवलेले आहेत. मृत्यूमुळे गुंता वाढतो. एका गुंत्यातून दुसरा गुंता तयार होतो. मृत्यू म्हणजे जीवनाचा अभाव, मृत्यू म्हणजे सगळ्या अस्तित्वाचा शेवट जिवंतपणी मृत्यूला न ओळखणारे त्यांना मृत्यू परकाच वाटतो.’’ सावित्रीही सूर्योपासनेपासून तिच्या पित्याला मिळालेले वरदान होती. तिला आपल्या पतीचा मृत्यूचा दिवस ठावूक होता. वर्षभर ती मृत्यूविरुद्ध लढण्याची तयारी करत होती. तिने मृत्यूची कधीच विनवणी केली नाही. देवाकडे प्रार्थना करून रदबदलीही केली नाही आणि परिस्थितीपासून पळही काढला नाही की शरण गेली नाही. एकटीने, एकाकीपणाने कोणालाही काहीही कळू न देता तिने त्या दिवसाची जय्यत तयारी केलेली होती.
कठोपनिषदामध्ये यमराजांना सावित्रीप्रमाणे भेटलेली दुसरी व्यक्ती म्हणजे नचिकेत. त्याला मृत्यूकडूनच आत्मरहस्य समजावून घ्यायचे असते. यमराज नचिकेताला समजावतात. ‘‘जो जिवंतपणी मला ओळखत नाही तो परत परत माझ्यापासून दूर पळण्याचा प्रयत्न करतो पण जिवंतपणी मला ओळखता आले तर जगावं कसं हे माणसाला समजेल.’’
सावित्रीला ते पूर्णपणे समजलेलं होतं. मृत्यूविषयी तिला कधीच भीती वाटली नाही. आपल्या मनावर विचारांचा पगडा असतो. तेव्हा विचारांनीच तयार झालेली अंतर्मनातली चित्रे आपण पाहतो. जेव्हा विचाररहित स्थिती प्राप्त होते तेव्हाच अंतर्मनातील शक्ती जागृत होतात. कारण आपल्या अंतर्मनामध्ये प्रचंड शक्तीचा साठा साठवलेला आहे.
‘‘जेव्हा एखादी घटना घडते तेव्हा ती घडते तशीच घडू द्या. त्या घटनेचे कर्तेपद वा त्या विषयीचा विचार करू नये. फक्त अनुभव घेत राहावा. समर्पणाची भूमिका स्वीकारावी. तेव्हाच अंतरंगामधली ती सुप्त शक्ती जागृत होते व कार्य करू लागते.’’
सावित्रीचे मन स्वच्छ होते. त्यामुळेच ती मृत्यूला पाहू शकली. त्याच्याशी बोलू शकली. शेवटी मृत्यूलाही तिने आपला सुहृद बनवले. त्याला तिचा विचार करायला भाग पाडले. सावित्रीने यमाबरोबर सामना करताना केवळ प्रेम हेच शस्त्र वापरले खरे प्रेम सर्वानाच जिंकते, त्यामुळे यमाला-प्रत्यक्ष मृत्युलाही सावित्रीपुढे शरणागती पत्करावी लागली.
खरे आदर्श मानवी अंत:करणामध्येच वसलेले आहेत. ते हृदयाच्या प्रेरणेतून निर्माण होतात. कारण प्रेम ही दैवी शक्ती आहे शाश्वतऽ आहे.
आज क्षुल्लक कारणांनी घटस्फोट घेतले जातात. एकमेकांचे गुण पाहण्याऐवजी केवळ दोष शोधून स्वत:ची कीव केली जाते. ‘मी महान’ हे असतेच.
सावित्री आख्यानामध्ये प्रेमाची महती सांगितलेली आहे. प्रेमाचा अंकूर संसारामध्ये स्त्री पुरुषांच्या चांगल्या संबंधांनी फुलतो. अमरप्रेम पृथ्वीवरून आटून जाऊ नये. जो मानवतेवर प्रेम करतो तोच देवावर प्रेम करू शकतो.
मनाला मर्यादित अवस्थेमध्ये न राहता त्यापासून मुक्त करून महामानव बनवणे हे सावित्रीचे खरे कार्य आहे.
सावित्री म्हणजे उष:काल . काळोखातून वाटचाल करून उष:कालकडे जाणारी सावित्री आपल्यालाही हाच संदेश देते.
या सावित्रीकथेमध्ये त्या व्रताचेच नाव ‘वटसावित्री’ ठेवून वडाच्या झाडाचेही माहात्म्य वाढवलेले आहे.
असं म्हणतात की, वड अथवा पिंपळाचे झाड तोडण्याचा अधिकार केवळ ‘संन्याशाला किंवा ज्याचा संसार संपला आहे, वानप्रस्थाश्रमात ज्याने प्रवेश केलेला आहे’ अशांनाच आहे.
यामागचे कारण असे आहे की, अपरिहार्य झाल्याशिवाय तो झाड तोडणार नाही. कारण आतापर्यंत जगलेल्या आयुष्यामध्ये वडाच्या झाडाचे महत्त्व त्याला कळलेले असते.
या झाडाला अध्यात्मिक रूपही दिलेले आहे. वडाच्या झाडाच्या मुळाशी ब्रह्मा, मध्यावर जनार्दन (विष्णू) आणि अग्रावर शिवशंकर या देवता वास करतात. असा हा वटवृक्ष चिरंजीव वृक्षांपैकी मानला जातो. याच्या सहवासात जास्तीत जास्त काळ घालवला तर निरोगी दीर्घायुष्य लाभते.
वड-पिंपळ व कडुलिंब या वृक्षांना अनन्यसाधारण महत्त्व आहे. यांना ‘त्रिवेणी’ म्हटलं जातं. वडाच्या वंशविस्तारामुळे, टिकावू व मजबूत अस्तित्वामुळे पार बांधून तेथे संध्याकाळी गप्पांचे फड बसायचे. ऋषीमुनी तपश्चर्यासाठी वटवृक्षाखालीच बसायचे. वडाचे झाड भरपूर ऑक्सिजन निर्मिती करते. जितकी पाने जास्त तेवढी ऑेक्सिजन निर्मिती जास्त होते.
वडाची लाल फुले हे माकडांचं खाद्य आहे. पक्ष्यांनाही ती आवडतात. त्यातल्या बिया खाल्ल्याने इतरत्रही उडून नवे वटवृक्ष उत्पन्न होतात. अनेक पक्षी या

वटपोणिमा

वटपोणिमा

वृक्षावर आपली घरटी बांधतात. या पक्ष्यांची विष्ठा, वडाची पाने यांचे जमिनीवर उत्तम खत तयार होते. वडाखाली गांडुळेही असतात. त्यामुळे वडाखालची जमीन अत्यंत सुपीक बनते. खेडय़ात राहणारे शतकरी वडाच्या आसपासची माती आपल्या शेतात नेऊन मिसळतात.
वटवृक्ष हा ‘मोरेसी’ कुळातला वृक्ष. याची वेगवेगळ्या भाषेतील नावे- संस्कृतमध्ये वट, व्यग्रोध, कन्नडमध्ये आला, गुजराथीत वड, इंग्रजीत बनीयन ट्री, लॅटीनमध्ये फायकस बेंगालेन्सिस, हिंदीत बड.
वटवृक्षाची प्रत्येक पारंबी जमिनीपर्यंत जाऊन मूळ वृक्षाला आधार देते. वृक्षाचा विस्तार करते. वटवृक्ष वादळामध्ये कधीच उन्मळून पडत नाहीत.
अडय़ार नदीच्या काठचा वटवृक्ष ५०० वर्षांपेक्षा जास्त वयाचा आहे. त्याचा परिसरही भरपूर व्यापलेला आहे. वटवृक्षाची फळे मार्च ते जून या काळात येतात.
बाह्य़ परिस्थिती कितीही प्रतिकूल असली तरी वटवृक्ष आपले अस्तित्व टिकवतो. वाढतो. बहरतो. हा गुण माणसाने घ्यायला हवा.
वटवृक्षाच्या पानापासून पत्रावळी-द्रोण बनवले जातात. याचे लाकूड चिवट व बळकट असते. सालीपासून व पारंब्यापासून दोर बनवले जातात. चिकापासून गोंद तयार होतो. याचा रस पौष्टिक व स्तंभक असतो. सालींचा काढा मधुमेहावर उपयुक्त आहे. पानांचे पोटीस बनवून गळवांवर लावले तर गळू लवकर पिकून फुटते. औषधी रूपांमध्ये वडाचा चीक दातदुखी, संधीवात, कंबरदुखी, तळपायांवर पडणाऱ्या भेगांवर उपयुक्त आहे.
अशा या बहुमूल्य असणाऱ्या वटवृक्षाच्या फांद्या तोडून ७ जूनला रविवारी येणाऱ्या वटपौर्णिमेला वापरायच्या का? आपण स्त्रियांनीच या फांद्याची- डहाळ्यांची पूजा करायचे थांबवले तर वटवृक्षाचा संहार थांबेल. दर वर्षी या काळात होणारी वृक्षतोड बंद होईल.

साभार – लोकप्रभा

वैशाली कुलकर्णी

lokprabha.magazine@gmail.com

आता पर्यावरणाच्या रक्षणासाठी जाहीरनामा…

save-waterएकीकडे मूठभर लोकांचा शायनिंग इंडिया; तर दुसरीकडे दिवसेंदिवस काळवंडत चाललेला बहुसंख्यांचा ग्रामीण भारत.. विकसनशील देशात अशी विषमता असतेच, देशाच्या विकासासाठी किंमत मोजावी लागतेच, या सबबी जरी मान्य केल्या; तरीही किंमत आणखी किती काळ प्रामुख्याने ग्रामीण भारतानेच मोजावी. स्वातंत्र्यप्राप्तीनंतरच्या विकासनीतीमुळे आजवर ६० दशलक्ष नागरिक विस्थापित झाले; त्यांच्या समस्या ना शायनिंग इंडियाला सोडविता आल्या ना वाढत्या जीडीपीचा आकडा जनतेसमोर फेकणाऱ्यांना. ग्रामीण भारताने किंमत मोजली म्हणून शहरांच्या समस्या संपुष्टात आल्या आहेत का; तर तसेही नाही, उलट त्यांची तीव्रता वाढतेच आहे. आंतरराष्ट्रीय वित्तसंस्थांकडून वारेमाप कर्ज घेऊनही समस्या कायम. मग चुकते कुठे? भारतासारख्या जैविक, सांस्कृतिक वैविध्यपूर्ण देशाला विकासाचे सरसकट एकच परिमाण लावावे; का ते देशातील वैविध्यतेनुसार लागू करता येईल, असे ‘लवचिक’ असावे, म्हणजे नेमके ते कसे असावे, या बाबींवर विचारविनिमय करण्यासाठी पुण्यात ‘इकॉलॉजिकल सोसायटी’ व ‘संत तुकाराम व्यासपीठ’ यांच्या सहयोगाने १८ व १९ एप्रिल रोजी पर्यावरण परिषदेचे आयोजन करण्यात आले होते. परिषदेचे उद्घाटन राळेगणसिद्धी गावाचा पर्यायी विकासनीतीच्या आधारे कायापालट करणारे ज्येष्ठ समाजसेवक अण्णा हजारे यांच्या हस्ते झाले. पर्यावरणीय अर्थशास्त्रात मोलाचे योगदान देणारे प्रा. प्रकाश गोळे यांचे मार्गदर्शन परिषदेला लाभले. परिषदेत विविध क्षेत्रांतील व्यक्ती, निवृत्त प्रशासकीय अधिकारी, शासकीय समित्यांचे सल्लागार, कायदेतज्ज्ञ, अर्थतज्ज्ञ व पर्यावरणीय विषयाशी संबंधित विविध शाखांतील तज्ज्ञ, महाराष्ट्रातील स्वयंसेवी संस्था आणि विद्यार्थ्यांचाही सहभाग होता.
परिषदेमध्ये ‘नैसर्गिक स्रोतांचे व्यवस्थापन व ऊर्जेचा वापर’, ‘नागरी समस्या आणि आरोग्य’, ‘शेती, पाणलोटक्षेत्र विकास व पर्यावरण’, ‘मानव व वन्यजीव संरक्षण’, ‘पर्यावरण, नीती आणि शिक्षण’, ‘अर्थविचार व अर्थक्रांती’ असे सहा गट त्या त्या विषयांतील तज्ज्ञ आणि समन्वयकांच्या नेतृत्त्वाखाली नेमण्यात आले होते. त्यांच्या सहाय्याने सुरुवातीला प्रत्येक गटात नैसर्गिक स्रोतांची सद्यस्थिती व त्यातून उद्भवलेल्या सामाजिक समस्यांवर चर्चा झाली. त्यात पुढे आलेल्या योग्यायोग्य बाबींचा सर्वागीण विचार करून विभागवार कृती कार्यक्रम सुचविण्यात आला. दुसऱ्या दिवशी सर्व गटांचे कृती कार्यक्रम सहभागींसमोर मांडण्यात आले. त्यानंतर एकमताने मान्य झालेल्या कृती कार्यक्रमातून अंतिम जाहीरनामा आता ‘इकॉलॉजिकल सोसायटी’ तयार करीत आहे.
ही नीती राबविण्यासाठी राजकिय इच्छाशक्ती आवश्यक असल्याने हा जाहीरनामा महाराष्ट्रातील सर्व राजकीय पक्षांना दिला जाणार आहे.
सर्वसामान्यांच्या हितासाठी असलेला हा जाहीरनामा व त्याची पाश्र्वभूमी तपशीलवार ‘इकॉलॉजिकल सोसायटी’कडून जाणून घेता येईल. त्याबाबत अधिक माहितीसाठी संपर्क : इकॉलॉजिकल सोसायटी ०२०-२५६७७३१२.
मानवी हस्तक्षेपामुळे उद्भवलेल्या पर्यावरणीय समस्यांवर उपाययोजना करण्यासाठी लहान-मोठय़ा व्यक्ती-संस्था कार्यरत आहेत. त्यामध्ये लोकसभा निवडणुकीत पर्यावरणीय अजेंडा घेऊन पुढे आलेले उमेदवार आहेत; जागरूकता निर्माण करणारे एकांडे शिलेदार-संस्था आहेत; सरकारी अधिकारी, कर्मचारीही आहेत. या सगळ्यांचे प्रतिनिधीत्व करणारी ‘पर्यावरण परिषद’ नुकतीच पार पडली. ‘देशाच्या जैविक, सांस्कृतिक विविधतेचा आदर करून त्यातून बहुसंख्यांचा विचार करणारी विकासनीती हवी’, असा या परिषदेचा सूर होता.

साभार लोकसत्ता,

रेश्मा जठार

http://www.loksatta.com/daily/20090422/mv06.htm