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गंगे ‘हरी हरी…’

गंगा म्हणजे या महान देशाच्या संस्कृतीचे खळाळते, वाहते, पवित्र असे प्रतीक. अशा या नदीची सध्याची अवस्था काही फार चांगली नाही. ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई…’ असं राज कपूरनं त्याच्या सिनेमातून सांगण्याच्या आधीपासून भारतीय जनतेला हे सत्य माहिती आहे. नुकताच या नदीला राष्ट्रीय नदीचा दर्जाही देण्यात आला. तरीही परिस्थितीत फार फरक पडला नाही.

भारतातील एकूण लोकसंख्येच्या सुमारे ४० टक्के जनतेला गंगा पाणी पुरवते. एकूण ११ राज्ये तिचा लाभ घेतात. गंगेच्या किना-यांवर वसलेल्या शहरांतून सध्या रोज तब्बल २९० कोटी लिटर सांडपाणी सोडले जाते. त्यापैकी केवळ ११० कोटी लिटर पाण्यावर शुद्धीकरण प्रक्रिया होऊ शकते. मग ती ‘मैली’ होणार नाही तर काय! प्रथम इंदिरा गांधी आणि नंतर राजीव गांधींच्या कार्यकाळात गंगेच्या स्वच्छतेसाठी काही ठोस पावले उचलण्यात आली. ‘गंगा अॅक्शन प्लॅन’ बनविण्यात आला. मात्र, या योजना आरंभशूरच ठरल्या. गंगेच्या स्थितीविषयी पर्यावरणवाद्यांनी आणि माध्यमांनी आरडाओरडा केल्यानंतर तीन वर्षांपूर्वी ‘राष्ट्रीय गंगा नदी खोरे प्राधिकरणा’ची (एनजीआरबीए) स्थापना करण्यात आली. त्यात अनेक तज्ज्ञांचा समावेश करण्यात आला; परंतु सरकारला गंगेची स्वच्छता हा प्राधान्याचा विषय वाटत नसल्याचेच गेल्या तीन वर्षांत स्पष्ट झाले.

या काळात या प्राधिकरणाच्या केवळ तीन बैठका झाल्या. त्यातील तिसरी व शेवटची परवा १७ एप्रिलला दिल्लीत झाली. ही बैठकही सरकारने घाईघाईने घेतली; कारण जी. डी. आगरवाल या ८० वर्षांच्या वयोवृद्ध पर्यावरण तज्ज्ञांनी उपोषण केले आणि प्राधिकरणावरील तीन सदस्यांनी राजीनामे दिले, म्हणून! पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंगही या बैठकीला उपस्थित होते. त्यांनी गंगेच्या स्वच्छता मोहिमेला उशीर झाल्याचे मान्य करून, यापुढे सर्व संबंधित राज्यांनी याबाबत तातडीने हालचाली कराव्यात, असे सांगितले. पंतप्रधानांची तळमळ खरी असली, तरी प्रत्यक्षात सरकारला गंगेसाठी काहीही करण्याची इच्छा नाही, यावर अनेक तज्ज्ञांचे एकमत झाले आहे. प्राधिकरणाचे एक सदस्य रशीद हयात सिद्दिकी यांनी तर पद सोडण्याची इच्छा व्यक्त केली आहे. या प्रश्नात राजकारण आणले जात आहे, असे त्यांना वाटते. उत्तराखंडचे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा यांनी त्यांच्या राज्यात गंगेवर बांधल्या जाणा-या धरणांचे समर्थन केले आहे.

प्राधिकरण कुठलेच निर्णय घेत नाही. जे काही निर्णय घेतले जातात, ते राष्ट्रीय नदी संवर्धन महासंचालनालयामार्फत घेतले जातात. हे महासंचालनालय केंद्रीय वने व पर्यावरण खात्याच्या अखत्यारित येते. आता इंडो-तिबेट बॉर्डर पोलिसच्या २१ जवानांनी गंगोत्री ते गंगासागर असा प्रवास राफ्टिंगद्वारे करून गंगेच्या स्वच्छतेचा संदेश सर्वत्र पोचविण्याचा निर्णय घेतला आहे. बुधवारी या जवानांची मोहीम सुरू झाली. एकूणच गंगेच्या स्वच्छतेसाठी आता इंग्रजीतील ‘हरी हरी’ (घाई करा) म्हणायची वेळ आली आहे, हे खरे!

सौजन्य- महाराष्ट्र टाईम्स

http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/12739868.cms

पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर टकराव….

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

एक दिलचस्प बात यह है कि समय के साथ निर्णय लेने की इस प्रक्रिया का इस्तेमाल नीति-निर्धारण के मुद्दों से आगे बढ़कर क़ानून निर्माण के क्षेत्र में भी होने लगा है. हाल के वर्षों में रेगूलेटरी इंफोर्समेंट के बढ़ते चलन का परिणाम यह हुआ है कि पेशेवर संस्थाओं को भी स़िफारिशी कार्य सौंपे जा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वैज्ञानिक एवं पेशेवर संस्थाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी, जिन्हें पर्यावरण से जुड़े तमाम क़ानूनों को कार्यान्वित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. इनके गठन का प्रमुख उद्देश्य निर्णय प्रकिया में निष्पक्षता और कुशलता सुनिश्चित करना है. हालांकि इस काम में भी पर्यावरण की रक्षा उनका प्राथमिक उद्देश्य होगा.

यहां तक कि हम यह भी कहते हैं कि मौजूदा पर्यावरण नियम इकोलॉजिकल सिद्धांत के मुताबिक़ बनाए गए हैं, लेकिन इनके बीच दरार आनी शुरू हो चुकी है. वे अपरिपक्व मान्यताओं को चुनौती देते हैं. वे इस मान्यता को चुनौती देते नज़र आते हैं कि संस्थाएं और उन्हें चलाने वाले लोग अपने सामाजिक एवं राजनीतिक हित को किनारे रखकर काम करेंगे. यह कैसे मुमकिन है कि ऊर्जा मंत्रालय का कोई पूर्व सचिव, जो हाइड्रो पावर डेवलपर्स की गवर्निंग बॉडी में शामिल है, पर्यावरण क़ानूनों पर फैसले से संबंधित किसी मीटिंग में शामिल हो और अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित न हो? जब एक ग़ैर सरकारी संस्था का प्रमुख, जो किसी औद्योगिक संगठन का प्रतिनिधित्व भी करता है और पर्यावरण से संबंधित किसी कमेटी का सदस्य हो तो उसका कौन सा हित सबसे पहले आता है?

पिछले कुछ वर्षों में फैसले लेने वाली कमेटी के सामने हितों में टकराव कई बार देखने को मिला. भारत के बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट 2002 के तहत नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी के ज़रिये एक कमेटी का गठन किया गया, जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बायोलॉजिकल संसाधनों के इस्तेमाल के लिए आने वाले आवेदनों की जांच करता है. जबसे इस कमेटी का गठन हुआ है, तबसे अब तक इसकी पांच बार बैठक हो चुकी है. इस दौरान सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थाओं मसलन, नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज़, एनआरसी ऑन मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट आदि के आवेदनों को भी मंज़ूरी दी गई, जबकि इनके प्रतिनिधि भी इस कमेटी के सदस्य हैं. बैठक में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) का एक वैज्ञानिक भी शामिल था. इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्‌स (आईपीआर) के लिए सीएसआईआर के 126 आवेदनों पर विचार किया गया और उसे म़ंजूरी भी दी गई. 26 जुलाई, 2007 को सेवानिवृत आईएएस अधिकारी एमएल मज़ूमदार की अध्यक्षता में गठित एक्सपर्ट अपराइज़ल कमेटी यानी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) द्वारा पांडुरंगा टिंबलो इंडस्ट्रीज़ को म़ंजूरी दी गई. मंज़ूरी देने के समय मज़ूमदार ख़ुद चार कंपनियों यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, आरबीजी मिनरल्स इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, हिंदुस्तान डॉर-ऑलिवर लिमिटेड और आधुनिक मेटालिक्स लिमिटेड के निदेशक थे. प्रत्यक्ष तौर पर इन माइंस का पांडुरंगा टिंबलो से कुछ खास लेना-देना नहीं है, लेकिन निश्चित तौर पर अध्यक्ष की नियुक्ति में निष्पक्षता नहीं बरती गई.

अक्टूबर 2009 में जेनेटिकली इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने भारत में पहले जेनेटिकली मोडिफाइड फसल बीटी बैंगन को म़ंजूरी दी. फैसला लेने से पहले मामले पर विचार करने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया गया. जीईएसी का अंतिम फैसला व्यापक तौर पर इसी कमेटी के सुझावों पर आधारित था. इस विशेषज्ञ समिति में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ वेजीटेबल रिसर्च (आईआईवीआर) के निदेशक डॉ. मथुरा राय शामिल थे. आईआईवीआर यूएस-एड के एबीएसपी-टू प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जिसके तहत बीटी बैंगन को विकसित किया गया. ज़ाहिर है, बीटी बैंगन की मंज़ूरी में किसी तरह का कोई संदेह नहीं था. समिति में शामिल अन्य लोगों में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के डॉ. आनंद कुमार भी थे, जो ख़ुद बीटी बैंगन को विकसित करने के काम से जुड़े हैं. ध्यान रहे कि इस कमेटी का प्रमुख काम जैविक सुरक्षा और प्रायोगिक परीक्षणों से मिलने वाले आंकड़ों का आकलन करना था. उक्त सभी टकराव के गंभीर कारण हैं. हालांकि कई बार हितों का यह टकराव सतह पर नज़र नहीं आता, लेकिन यही वह अवसर है, जिसमें कोई नीति निर्धारक किसी क्षेत्र विशेष के विकास के लिए वहां पहले से मौजूद वनक्षेत्र को ़खत्म करने के प्रस्ताव पर विचार करता है. ऐसी परिस्थितियों में ही उसके पूर्वाग्रह उसकी निर्णय प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने की हालत में आ जाते हैं, अन्यथा इसकी और कोई व्याख्या नहीं हो सकती कि ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किसी प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दे दी जाए, भले ही वह किसी पुराने ़फैसले के मुताबिक़ ग़ैरक़ानूनी हो.

हमारा सवाल यह है कि कहां गए ऐसे वैज्ञानिक, जिनका संबंध कॉरपोरेट घरानों से नहीं है? कहां हैं ऐसे विशेषज्ञ, जिनका राजनीतिक दलों से ताल्लुक़ नहीं है? पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर लिए जा रहे फैसलों में विशेषज्ञों का रंग तो बेशक दिखता है, लेकिन समस्या यह है कि वह हमेशा हरा नहीं होता.

 

साभार- चौथी दुनिया
http://www.chauthiduniya.com/2012/03/conflicts-on-environmental-issues.html

हिमालय में दवाओं का ख़ज़ाना

 

वनस्पति न स़िर्फ इंसानी जीवन, बल्कि पृथ्वी पर वास करने वाले समस्त जीव-जंतुओं के जीवन चक्र का एक अहम हिस्सा है. एक तऱफ जहां यह वातावरण को शुद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी तऱफ इसकी कई प्रजातियां दवा के रूप में भी काम आती हैं. वन संपदा के दृष्टिकोण से भारत का़फी संपन्न है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में भारत का विश्व में दसवां और एशिया में चौथा स्थान है. यहां अब तक लगभग छियालीस हज़ार से ज़्यादा पेड़-पौधों की प्रजातियों का पता लगाया जा चुका है, जो किसी न किसी रूप में हमारे काम आते हैं. पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के अंतर्गत लद्दा़ख यूं तो अत्यधिक ठंड के लिए प्रसिद्ध है. इसके बावजूद यहां एक हज़ार से भी ज़्यादा वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियां फल-फूल रही हैं. इनमें आधी ऐसी हैं, जिनका उपयोग औषधि के रूप में किया जा सकता है. समुद्र की सतह से क़रीब 11,500 फुट की ऊंचाई पर बसा लद्दा़ख अपनी अद्भुत संस्कृति, स्वर्णिम इतिहास और शांति के लिए विश्व प्रसिद्ध है. लद्दा़ख की कुल आबादी 1,17,637 है. ऊंचे क्षेत्र में स्थित होने और कम बारिश के कारण यहां का संपूर्ण जीवन कभी न समाप्त होने वाले ग्लेशियर पर निर्भर है, जो पिघलने पर कई छोटे-बड़े नदी-नालों को जन्म देता है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की.

नवंबर से मार्च के बीच यहां का तापमान शून्य से भी 40 डिग्री नीचे चला जाता है. भारी ब़र्फबारी के कारण इसका संपर्क इस दौरान पूरी दुनिया से कट जाता है. यहां का 70 प्रतिशत क्षेत्र साल भर ब़र्फ से ढका रहता है. इसी कारण इसे ठंडा रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन अगर आप क़रीब से इसका मुआयना करेंगे तो पता चलेगा कि यहां वनस्पतियों का एक संसार भी मौजूद है. दरअसल विषम भौगोलिक परिस्थिति ने यहां के लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया है. ऐसे में क्षेत्र के निवासी आसपास उपलब्ध वस्तुओं को ही जीवन चलाने का माध्यम बनाते रहे हैं. यहां मुख्य रूप से गेहूं, जौ, मटर और आलू की खेती की जाती है. सब्ज़ियां, दवाएं, ईंधन और जानवरों के लिए चारा जैसी बुनियादी आवश्यकताएं भी जंगली पौधों से पूरी की जाती हैं. जंगली पौधों पर इतने सालों तक निर्भरता ने इन्हें इनके फायदों का ब़खूबी एहसास करा दिया है.

विल्लो पोपलर एवं सीबुक थ्रोन यहां सबसे ज़्यादा पाई जाने वाली वनस्पतियां हैं. उपचार की चिकित्सा पद्धति, जिसे स्थानीय भाषा में स्वा रिग्पा अथवा आमची कहा जाता है, पूर्ण रूप से इन्हीं वनस्पतियों पर निर्भर है और यह वर्षों से स्थानीय लोगों के लिए उपचार का साधन है. स्थानीय स्तर पर उपचार के लिए तैयार की जाने वाली औषधियां इन्हीं वनस्पतियों के मिश्रण से बनाई जाती हैं. इस पद्धति के तहत हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाली जड़ी-बूटियों एवं खनिजों का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है. ट्रांस हिमालय में पाई जाने वाली वनस्पतियां आमची की अधिकतर दवाओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित होती हैं. आज भी दवाओं में इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी-बूटियां द्रास, नुब्रा, चांगथान एवं सुरू घाटी में आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं. लेह स्थित आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च देश की दो ऐसी प्रयोगशालाएं हैं, जहां ट्रांस हिमालय से प्राप्त वनस्पतियों को दवाओं में प्रयोग किए जाने के विभिन्न स्वरूपों पर अध्ययन किया जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार, लद्दा़ख और लाहोल स्फीति के ट्रांस हिमालय क्षेत्रों में मौजूद वनस्पतियों का दस से अधिक वर्षों से अध्ययन किया जा रहा है. इन अध्ययनों में कम से कम 1100 क़िस्मों को रिकॉर्ड किया गया है, जिनमें 525 क़िस्में ऐसी हैं, जिन्हें कई दवाओं में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस संबंध में आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च कई स्तरों पर लोगों को जागरूक कर रही हैं. कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों और कार्यशालाओं के माध्यम से इन वनस्पतियों के ़फायदों के बारे में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. दवाओं में प्रयोग होने वाले पौधे स्वच्छ वातावरण में पनपते हैं, परंतु हाल के अध्ययनों से पता चला है कि इन पौधों की कुछ प्रजातियों पर जलवायु परिवर्तन के कारण नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिन्हें संरक्षण की सख्त ज़रूरत है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन एवं उद्योग जगत को आगे आने की आवश्यकता है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि इससे होने वाले फायदों में स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व बराबर का हो. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की तीन चौथाई आबादी आधुनिक तकनीक से तैयार दवाएं खरीदने में अक्षम है और उसे ऐसे ही पौधों से बनने वाली परंपरागत दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. वर्षों से शोध और निष्कर्ष के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन इन्हीं जड़ी-बूटियों से तैयार दवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि इनकी क़ीमत का़फी कम होती है और ये सबकी पहुंच में भी हैं. (चरखा)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/treasure-of-drugs-in-himalayas.html

वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.

समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

पृष्ठभूमि

जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.

परिवर्तन की पहली लहर

पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.

यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.

वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन

यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.

इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.

दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.

स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.

स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.

तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.

चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.

इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.

कार्यान्वयन की चुनौतियां

आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.

उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.

इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.

एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.

निष्कर्ष

वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.

आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.

– प्रांजुल भंडारी

(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html

किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.

पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.

यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.

कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.

सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.

कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.

लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.

भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.

विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.

भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.

कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.

बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html


 

बुंदेलखंडः फटती धरती, कांपते लोग

बुंदेलखंड में बेतरतीब ढंग से खनन और भूजल दोहन के चलते ख़तरे की घंटी बज चुकी है. हमीरपुर में सबसे अधिक 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष भूजल दोहन हो रहा है. महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में खनन मा़फ़िया नियम-क़ायदों को तिलांजलि देकर पहाड़ के पहाड़ समतल भूमि में बदल रहे हैं. ललितपुर में डायस्फोर, पैराप्लाइट, राक फास्फेट, ग्रेनाइट एवं इमारती पत्थरों के भंडार हैं. उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक के बावजूद वन क्षेत्र वाले जनपदों में इमारती पत्थरों का खनन जारी है. यमुना, बेतवा और केन में बालू मा़फ़ियाओं ने नदी के पेटे को चीर डाला है. खनन मा़फ़िया और नेता काले कारोबार से ख़ूब फल-फूल रहे हैं, जनता ने मजबूरन आत्महत्या को मुक्ति का पर्याय समझ लिया है. वर्ष 2010-11 में भारत सरकार के भूगर्भ निदेशालय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 72 में से 40 ज़िले अति दोहित की श्रेणी में हैं. यहां पानी का भंडार घट रहा है. आंकड़ों के अनुसार, यहां प्रतिवर्ष एक लाख 92 हज़ार हेक्टेयर मीटर पानी का दोहन किया जा रहा है, जबकि भूगर्भ जल विकास दर दोहन की अपेक्षा अत्यंत कम है. बांदा, चित्रकूट, महोबा एवं हमीरपुर में भूगर्भ जल उपलब्धता 20 लाख 24 हज़ार 627 हेक्टेयर बताई गई है, जिसमें सबसे कम भूगर्भ जल हमीरपुर (महोबा सहित) में उपलब्ध है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हमीरपुर के अलावा ललितपुर, झांसी और जालौन में जल संकट बरसात की कमी के कारण हुआ है. बुंदेलखंड पर गहरी नज़र रखने वाले शिव प्रसाद भारती बताते हैं कि बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के 7 और मध्य प्रदेश के 21 ज़िलों में फैला एक विस्तृत क्षेत्र है. हमीरपुर यमुना और बेतवा के मध्य बसा है.

बुंदेलखंड अपनी वन संपदा, खनिज संपदा और शूरवीरता के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है. पानी की कमी, ग़रीबी और भुखमरी यहां की मुख्य समस्याएं हैं. पिछले चार-पांच सालों से यहां धरती फटने की नई समस्या पैदा हो गई है, जिसने किसानों को संकट में डाल दिया है. बीते 14 जून को हमीरपुर के मदारपुर गांव में एक अजीब घटना हुई. रात में 700 मीटर लंबाई में धरती फट गई, जिसकी चौड़ाई ढाई मीटर और गहराई 8-10 फीट थी. इसके बाद भरुआ सुमेरपुर में ज़मीन फटने एवं तीन मकानों में दरार पड़ने और फिर एक जुलाई को भिलावा मेरापुर में धरती फटने की घटना हुई. इसके पहले 2007 एवं 2008 में भी धरती फटने की घटनाएं हो चुकी हैं. धरती फटने से कहीं धुआं निकला, कहीं पानी निकल पड़ा और कहीं जोरदार आवाज़ निकली, जिससे ग्रामीण भयभीत हुए. इन घटनाओं की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाई गई तो घटनास्थलों पर लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. अगस्त 2007 में जब पहली बार जिगनी (हमीरपुर) में धरती फटने की घटना हुई तो वहां 350 फीट लंबी और एक फीट चौड़ी दरार पड़ गई थी. ज़्यादातर लोगों ने उसका वैज्ञानिक कारण जानने का प्रयास नहीं किया, बल्कि देवताओं के नाराज़ होने और बुंदेलखंड को श्राप देने जैसी बातें चर्चा में थीं. जब धरती फटने की लगातार हो रही घटनाओं के संबंध में ज़िला प्रशासन ने शासन को लिखा तो फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों की एक टीम आई, जिसने घटनास्थलों का दौरा करके अपनी रिपोर्ट तैयार की. वैज्ञानिकों का कहना था कि बुंदेलखंड में कई वर्षों से पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, जिससे भूजल की कमी हो गई है, जबकि जल का दोहन बराबर किया जा रहा है और उससे ज़मीन के अंदर गैप बन गया है. इसीलिए तनाव पैदा हुआ और धरती फट गई. वैज्ञानिकों ने यह भी कहा था कि हो सकता है, जिस जगह धरती फटी, उसके नीचे बह रही दो विशाल धाराओं में संभवत: प्रभावित क्षेत्रों का भूजल चला गया हो और उसकी वजह से गैप बन गया, जिसके कारण धरती फट गई. वैज्ञानिकों का आशय यह था कि बुंदेलखंड में पानी की कमी ही इसका मुख्य कारण है.

बुंदेलखंड अपनी वन संपदा, खनिज संपदा और शूरवीरता के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है. पानी की कमी, ग़रीबी और भुखमरी यहां की मुख्य समस्याएं हैं. पिछले चार-पांच सालों से यहां धरती फटने की नई समस्या पैदा हो गई है, जिसने किसानों को संकट में डाल दिया है. बीते 14 जून को हमीरपुर के मदारपुर गांव में एक अजीब घटना हुई. रात में 700 मीटर लंबाई में धरती फट गई, जिसकी चौड़ाई ढाई मीटर और गहराई 8-10 फीट थी.

केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बुंदेलखंड में 4 लाख 42 हज़ार 299 हेक्टेयर मीटर भूमिगत पानी बचा है. एक लाख 92 हज़ार 549 हेक्टेयर मीटर हर वर्ष जल दोहन हो रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वार्षिक दोहन के मामले में बुंदेलखंड में हमीरपुर सबसे आगे है (1995 से पहले महोबा हमीरपुर में शामिल था). हमीरपुर का वार्षिक भूजल दोहन 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर बताया गया. संभवत: इसी कारण यहां धरती फटने की घटनाएं अधिक हो रही हैं. सबसे कम भूजल दोहन 10 हज़ार 642 हेक्टेयर मीटर चित्रकूट में हो रहा है. केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय का कहना है कि आने वाले समय में खेतों और लोगों के जीवनयापन के लिए पानी का संकट बढ़ सकता है. भूगर्भ विज्ञानी सईद उल हक़ कहते हैं कि पानी की समस्या हमारी ख़ुद की पैदा की हुई है. यहां बारिश के पानी के संचयन और जल प्रबंधन को लेकर गंभीरता से काम नहीं किया गया. बुंदेलखंड में दिल्ली के बराबर बारिश होती है, किंतु यहां की मिट्टी में ग्रेनाइट होने के कारण जल संचयन में कठिनाई है. फिर भी यदि ईमानदारी से जल प्रबंधन होता तो यह समस्या नहीं पैदा होती. पानी की कमी के कारण चित्रकूट मंडल की सबसे कम कृषि उत्पादन वाली सर्वाधिक 18 न्याय पंचायतें हमीरपुर की हैं. जन प्रतिनिधियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नदियों और पहाड़ों में रात-दिन अंधाधुंध खनन हो रहा है, बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती छलनी की जा रही है. नदियों से निरंतर रेत और मौरंग निकाली जा रही है, पहाड़ों पर विस्फोट किए जा रहे हैं, जिससे भूगर्भ जल निकल रहा है, इसलिए तत्काल खनिज दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. जल की उपलब्धता और भूगर्भ जलस्तर बढ़ाने के लिए बुंदेलखंड राहत पैकेज में तालाब, चेकडैम और नहरों के निर्माण की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन उनके कार्यान्वयन में कोताही का आलम यह है कि करोड़ों रुपये ख़र्च होने के बाद भी समस्या जस की तस है.

फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों द्वारा रिपोर्ट पेश किए जाने पर शासन ने काफी गंभीरता दिखाई थी. तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता ने कहा था कि जिन स्थानों पर धरती फटी है, वहां भूमि संरक्षण का कार्य प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा, किंतु तीन वर्षों के बाद भी स्थिति जस की तस है. ललितपुर में जहां पत्थर मा़फ़िया अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं, वहीं खदानों में कार्यरत मज़दूरों को सिल्कोसिस नामक जानलेवा बीमारी मज़दूरी शुरू करने के सात सप्ताह बाद ही जकड़ लेती है. खांसी, जुकाम और बुखार से शुरू होने वाली सिल्कोसिस एक वर्ष पूरा होते-होते मज़दूरों की मौत पक्की कर देती है. इस दौरान सीने में दर्द और मुंह से ख़ून गिरने की शिकायत होने लगती है. यह बीमारी सिलिका नामक धूल की वजह से पैदा होती है, जो पत्थर काटते समय श्वांस लेने पर फेफड़ों में जमा हो जाती है और उन्हें कमज़ोर कर देती है. इस बीमारी का अभी तक कोई इलाज संभव नहीं है, इसलिए प्रतिवर्ष सैकड़ों मज़दूर मौत के मुंह में जा रहे हैं. 1986 में सिल्कोसिस से पीड़ित 16 मज़दूरों की एक साथ मौत होने पर तत्कालीन सांसद शरद यादव ने राज्यसभा का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा था, तब केंद्र सरकार ने इस रोग की पहचान एवं उपचार के लिए डॉ. एच एन सैय्यद के नेतृत्व में राष्ट्रीय व्यवसायिक स्वास्थ्य संस्थान, अहमदाबाद के एक विशेषज्ञ दल को सर्वेक्षण हेतु ललितपुर भेजा था. उक्त दल ने इस क्षेत्र के 500 से अधिक मज़दूरों में सिल्कोसिस के लक्षण पाए थे. वर्तमान में ग्राम नाराहट, डोगराकला, पाली, जाखलौन, धौर्रा, कपासी, मादोन, बंट, पटना, पारोट, राजघाट, भरपतुरा, मदनपुर एवं सौरई आदि के पास स्थित पत्थर खदानों में काम करने वाले खनिक इस बीमारी के शिकार हैं.

बेतरतीब खनन के परिणामस्वरूप पर्यावरण को काफी नुक़सान हुआ. क्रशरों और बालू के अवैध खनन के चलते यहां की जीवनदायिनी नदी बेतवा के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है. बीते पांच वर्षों में आजीविका पर बढ़ते संकट के कारण 267 लोगों ने आत्महत्या करके इसे अभागा क्षेत्र बना दिया. बुंदेलखंड के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट रोकने के लिए जब तक सार्थक पहल नहीं होती, तब तक कभी भूकंप का डर तो कभी सूखे की मार जैसी आपदाएं इस इलाक़े के भाग्य पर मंडराती रहेंगी. नरैनी में बड़े पैमाने पर अवैध खनन जारी है. यहां कुल 250 हेक्टेयर भूमि अनुमानित तौर पर लीज के दायरे में आती है. महोबा में कुल 330 खदानें हैं, जिनमें 2500 हेक्टेयर भूमि प्रभावित है. चित्रकूट में 272 खदानों में पत्थर तोड़ने का कार्य किया जाता है, यहां लगभग 2200-2400 हेक्टेयर भूमि खनन क्षेत्र में है. बुंदेलखंड को लेकर सियासी हमले करके जनता की अदालत में केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लगी मायावती सरकार का असली चेहरा यहीं देखने को मिलता है. पूरे बुंदेलखंड में खनिज व्यापारी, क्रशर मालिक और ठेकेदार गुंडा टैक्स के कारण हड़ताल करने को विवश हो गए हैं. अवैध उगाही का यह काम कभी सपा मुखिया की आंखों के तारे रहे पोंटी चड्‌ढा के आदमी कर रहे हैं, जो इन दिनों मायावती सरकार के चहेते हैं. बांदा, चित्रकूट, महोबा और झांसी में तक़रीबन साढ़े पांच सौ क्रशर प्लांटों में उत्पादन पूरी तरह ठप है, हज़ारों मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं. क्रशर मालिकों का कहना है कि उनसे जबरन गुंडा टैक्स वसूला जा रहा है. गिट्टी में सरकारी रॉयल्टी 68 रुपये प्रति घन मीटर और 15 प्रतिशत बिक्री कर चुकाना पड़ता है. दस टायर ट्रकों में 10 घन मीटर और छह टायर ट्रकों में छह घन मीटर गिट्टी भरी जाती है. इस तरह दस टायर ट्रक में तक़रीबन 800 रुपये का सरकारी टैक्स चुकाना पड़ता है. 50 ट्रकों के लिए रॉयल्टी शुल्क 34 हज़ार, सेल टैक्स 6 हज़ार यानी कुल 40 हज़ार रुपये राजस्व बुक जारी कराते समय चुका दिए जाते हैं. गुंडा टैक्स राजस्व बुक यानी एमएम-11 जारी कराते समय ही खनिज विभाग के बाहर मौजूद गुंडे वसूलते हैं. यह प्रति ट्रक 1500 यानी 50 ट्रकों पर 75 हज़ार रुपये तत्काल देने पड़ते हैं. बांदा के सदर विधायक विवेक कुमार सिंह का कहना है कि खनिज विभाग के अधिकारियों को निर्देश देकर गुंडा टैक्स की वसूली कराई जा रही है. बबेरू विधायक विशंभर सिंह यादव का कहना है कि जबरिया वसूली नहीं होनी चाहिए. तिंदवारी विधायक विशंभर प्रसाद निषाद ने कहा कि सिंडीकेट सिस्टम से वसूली पर अधिकारी चुप हैं, सरकार मौन है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवता द्विजेंद्र त्रिपाठी ने बसपा नेताओं के अवैध खनन, आबकारी और भूमि घोटालों की सीबीआई जांच कराने की मांग की है. त्रिपाठी बताते हैं कि सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों ने अवैध तरीक़े से पत्थर और बालू खनन के ठेके अपने चहेतों के पक्ष में करा लिए. सरकारी संरक्षण में नदियों से अनाधिकृत तरीक़े से बालू का अंधाधुंध खनन कराया जा रहा है. क्रशर यूनियन अध्यक्ष ध्यान सिंह, महामंत्री मिथलेश गर्ग, स्टोन मिल मालिक संजय सिंह, पंकज माहेश्वरी, सुनील बाहरी, संतोष पटेल एवं शुभलाल सिंह ने कहा कि चाहे जो हो जाए, अब वे गुंडा टैक्स नहीं देंगे.


साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/11/bundelkhand-earth-breaks-trembling-people.html

Lozol

How to rewrite the Durban script……..! by – Sunita Narain

It’s that time of the year again. Climate change talks are heating up, with the next conference of parties scheduled in Durban in end-November. There is heat but no light. The negotiations are stuck despite the clear signs of climate change: dangerous and potentially catastrophic extreme weather events.

Not much is expected in Durban, except the usual shadow-boxing. The European Union is leading the pack of climate champions. It wants the world to fast track negotiations for a single, legally binding treaty on cutting emissions. It does not say (loudly) that its real plan is to junk the Kyoto Protocol, which demands that industrialised countries cut emissions marginally, roughly 6 per cent below the 1990 levels by 2008-2012. The agreement in this Protocol is that rich countries, major historical and current emitters, go first, creating ecological and economic space for the developing world to grow. In time, the rest would follow. To facilitate actions in the developing and emerging world, technology and funds would be committed. All this done well would lead to a real deal. But it was not to be.

The US and its allies walked out of the Kyoto Protocol and now EU wants to dump it as well. It finds it difficult to meet its commitments to reduce emissions domestically.

At Durban, once again the stage is set for a dud act. EU will advocate climate action and its proposal for a single, legally binding treaty will get predictable responses. The US, the world’s biggest climate renegade, which pulls all strings, will oppose the proposal. Its objective is to do little at home, but most importantly, not to be made responsible for taking action based on contribution to the problem. It wants the distinction between the past and present polluters to be removed. It wants no discussion on a legal instrument. The other big polluting guns—Australia, Japan, New Zealand and Canada—will stand behind the US.

In the Durban-script the roles for the rest of the actors have also been written. The Association of Small Island States (AOSIS), which is rightfully angry over inaction, will go with the EU-designed approach. It will see no choice but to back EU’s proposal, even as it knows the stalemate will only prolong. On the other hand, China and India will side with the US and join the deniers. The rest, with small differences, will wait for the game to play out.

The host, South Africa, will want a deal in its city. What will this be? This country more than any other reflects the climate dilemma: to act or not to act? It has very high per capita emissions—almost equal to Europe’s —but it is yet to share economic benefits and energy access with its majority poor. It is dependent on coal mining and exports, which it cannot jeopardise. But it wants to play the gracious host and somehow get its basic friends—the coalition of the emerging polluters, Brazil, India and China—to dine the last supper. Brazil may play along; it hosts the next big environment summit and would want to look good. But China and India will know too much is at stake. Once they accept a single instrument, they will have to take costly action, with no resources.

The die is not even cast. But the end game is known.

So what can change the outcome? I believe there is no other way but that the developing world regroups and takes leadership. Our world is the worst hit. We do not need to be preached about the pain of climate change. We know it. This leadership will require making tough demands. It will mean demanding drastic emission reduction targets for the rich world. But it is equally important that our world does not hide behind the intransigence of the US. Our world must explain that it is already doing much to reduce emission intensity of its growth—growth of renewables in China, reduction of deforestation in Brazil and energy efficiency in India. It can and will do more. However, the high costs of transition to low-carbon growth must be paid for. This leadership must be firm on principles of climate justice and effective action.

This approach, I know, will be scoffed at and derided as being impractical. It is partly because the non-governmental groups following climate negotiations mirror the divide in the world. One half, the followers of the US and its grouping, will say this stance will jeopardise their democratic government and bring back the dreaded Republicans—Neanderthals who do not believe climate change is real. The other group, followers of EU and its grouping, will say this is good in words, but will not lead to effective action. In Durban they will want a deal, at whatever costs.

But their hedging will hide the one truth that needs to be revealed: most of the low-hanging fruit—easy options to reduce emissions—have already been picked in the climate-threatened world. This fact cannot be more inconvenient coming at a time when the rich world is faced with a double-digit recession; the euro-zone is threatened; and people are worked up against austerity measures.

The Durban deal (like its predecessors Copenhagen and Cancun) will be bad for all if not based on accepting the hard truths of climate change. It is time we grew up.

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To follow the buzz prior to Durban, do see our events section below.

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MORE FROM DOWN TO EARTH
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Courtesy-  DOWN TO EARTH

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‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्याना’साठी ११ नोव्हेंबरपासून आगळी मोहीम

 दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा
सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन
कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत
प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड

फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. यावर मात करण्यासाठी आता राष्ट्रीय उद्यानाचे संचालक व मुख्य वनसंरक्षक सुनील लिमये यांनी एक नवी शक्कल लढवली आहे. त्यासाठी पर्यटकांचीच मदत घेण्याचा निर्णय घेतला असून सायकल वरून रपेट करणाऱ्या पर्यटकांनी पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा केल्यास त्यांना सायकल भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्याचप्रमाणे येत्या ११ नोव्हेंबरपासून ‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्यान’ ही मोहीम राबविली  जाणार असून त्यात कचरा टाकणाऱ्यांविरोधात दंडाची तरतूदही              करण्यात आली आहे.
प्लास्टिकचा कचरा ही राष्ट्रीय उद्यानासाठी मोठीच डोकेदुखी ठरली आहे. दररोज उद्यानातून गोळा होणारे प्लास्टिक खूप मोठय़ा प्रमाणावर असते असे उद्यानाची सूत्रे स्वीकारल्यानंतर काही दिवसांतच लिमये यांच्या लक्षात आले. त्यानंतर त्यांनी कर्मचाऱ्यांच्या मदतीने काही महिन्यांसाठी प्लास्टिकच्या कचऱ्याचे मोजमाप करण्याचा निर्णय घेतला. त्यात समोर आलेली गेल्या पाच महिन्यांतील आकडेवारी धक्कादायक होती.
दरदिवशी उद्यानातून गोळा होणारा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल २५० किलो एवढा होता. तर सुट्टीच्या दिवशी हा आकडा तिपटीने वाढायचा. कचरा गोळा करणे आणि त्याची आकडेवारी करणे याच कालखंडात पर्यटकांना विनंती करण्याची मोहीमही पार पडली. उद्यानात प्लास्टिकविरोधात नवीन फलक जागोजागी लावण्यात आले. त्यातून प्लास्टिकच्या होणाऱ्या दुष्परिणामांची माहितीही देण्यात आली. मात्र त्याने फारसा कोणताही फरक पडला नाही.
अखेरीस हा प्लास्टिकचा भस्मासूर रोखण्यासाठी कडक धोरण अवलंबण्याचा आणि विद्यमान कायद्यातील तरतूदींचा आधार घेण्याचा निर्णय घेतला, असे सांगून संचालक सुनील लिमये म्हणाले की, वन्यजीव संरक्षण कायद्यातील कलम ३५ (६) नुसार, वन्यजीवनास धोका पोहोचवणारे कोणतेही कृत्य करणाऱ्यास तब्बल २५ हजार रुपये दंड आणि तीन महिने साध्या कैदेची तरतूद आहे. याच तरतुदीनुसार दंडात्मक कारवाईचा अधिकारही देण्यात आला आहे. तो आता वापरण्यात येणार आहे. त्यानुसार प्लास्टिक टाकताना पहिल्यांदा पकडले गेल्यास १०० रुपये आणि दुसऱ्यांदा पकडले गेल्यास ५०० रुपये दंड करण्यात येणार आहे. तिसऱ्यांदा पकडले गेल्यास त्या व्यक्तिविरुद्ध गुन्हा दाखल करून न्यायालयात खटला गुदरण्यात       येईल.  याशिवाय इतरही काही अभिनव मार्ग अवलंबण्यात येणार आहेत. गेल्या महिन्याभरापासून पर्यावरणप्रेमी उपक्रम म्हणून सायकल फेरी सुरु करण्यात आली आहे. त्यासाठीच्या सायकली वन विभागातर्फेच राष्ट्रीय उद्यानाच्या प्रवेशद्वारावर उपलब्ध करून दिल्या जातात. दोन तासांसाठी ४० रुपये भाडे आकारले जाते. या पर्यटकांना सायकल देताना ११ नोव्हेंबरपासून एक कापडी पिशवीही देण्यात येणार आहे. त्यांनी या फेरीदरम्यान पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा करून आणल्यास त्यांना भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेण्यात आला आहे. खरेतर हे उद्यान पर्यटकांसाठी आहे, त्यामुळे त्यांच्यावर कारवाई करण्याची इच्छा नव्हती. मात्र प्लास्टिकच्या भस्मासुराकडे पाहता असे लक्षात आले की, त्याला वेळीच आवर घातला नाही तर हा मानवजातीवरच उलटणार आहे. त्यामुळे अतिशय गांभीर्याने हा निर्णय घेतल्याचे लिमये यांनी सांगितले.

विनायक परब

साभार- लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=191453:2011-11-02-19-35-24&catid=73:mahatwachya-baatmyaa&Itemid=104

गंगा क्रांती आहवान…!

साभार- गंगा जलबिरदरी, जयपुर.

HAPPY DIWALI

Diwali…..”FESTIVAL OF LIGHTS” let us take pledge to avoid crackers, avoid Air & Noise Pollution… Gangajal nature Foundation, Mumbai