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हिमालय में दवाओं का ख़ज़ाना

 

वनस्पति न स़िर्फ इंसानी जीवन, बल्कि पृथ्वी पर वास करने वाले समस्त जीव-जंतुओं के जीवन चक्र का एक अहम हिस्सा है. एक तऱफ जहां यह वातावरण को शुद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी तऱफ इसकी कई प्रजातियां दवा के रूप में भी काम आती हैं. वन संपदा के दृष्टिकोण से भारत का़फी संपन्न है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में भारत का विश्व में दसवां और एशिया में चौथा स्थान है. यहां अब तक लगभग छियालीस हज़ार से ज़्यादा पेड़-पौधों की प्रजातियों का पता लगाया जा चुका है, जो किसी न किसी रूप में हमारे काम आते हैं. पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के अंतर्गत लद्दा़ख यूं तो अत्यधिक ठंड के लिए प्रसिद्ध है. इसके बावजूद यहां एक हज़ार से भी ज़्यादा वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियां फल-फूल रही हैं. इनमें आधी ऐसी हैं, जिनका उपयोग औषधि के रूप में किया जा सकता है. समुद्र की सतह से क़रीब 11,500 फुट की ऊंचाई पर बसा लद्दा़ख अपनी अद्भुत संस्कृति, स्वर्णिम इतिहास और शांति के लिए विश्व प्रसिद्ध है. लद्दा़ख की कुल आबादी 1,17,637 है. ऊंचे क्षेत्र में स्थित होने और कम बारिश के कारण यहां का संपूर्ण जीवन कभी न समाप्त होने वाले ग्लेशियर पर निर्भर है, जो पिघलने पर कई छोटे-बड़े नदी-नालों को जन्म देता है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की.

नवंबर से मार्च के बीच यहां का तापमान शून्य से भी 40 डिग्री नीचे चला जाता है. भारी ब़र्फबारी के कारण इसका संपर्क इस दौरान पूरी दुनिया से कट जाता है. यहां का 70 प्रतिशत क्षेत्र साल भर ब़र्फ से ढका रहता है. इसी कारण इसे ठंडा रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन अगर आप क़रीब से इसका मुआयना करेंगे तो पता चलेगा कि यहां वनस्पतियों का एक संसार भी मौजूद है. दरअसल विषम भौगोलिक परिस्थिति ने यहां के लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया है. ऐसे में क्षेत्र के निवासी आसपास उपलब्ध वस्तुओं को ही जीवन चलाने का माध्यम बनाते रहे हैं. यहां मुख्य रूप से गेहूं, जौ, मटर और आलू की खेती की जाती है. सब्ज़ियां, दवाएं, ईंधन और जानवरों के लिए चारा जैसी बुनियादी आवश्यकताएं भी जंगली पौधों से पूरी की जाती हैं. जंगली पौधों पर इतने सालों तक निर्भरता ने इन्हें इनके फायदों का ब़खूबी एहसास करा दिया है.

विल्लो पोपलर एवं सीबुक थ्रोन यहां सबसे ज़्यादा पाई जाने वाली वनस्पतियां हैं. उपचार की चिकित्सा पद्धति, जिसे स्थानीय भाषा में स्वा रिग्पा अथवा आमची कहा जाता है, पूर्ण रूप से इन्हीं वनस्पतियों पर निर्भर है और यह वर्षों से स्थानीय लोगों के लिए उपचार का साधन है. स्थानीय स्तर पर उपचार के लिए तैयार की जाने वाली औषधियां इन्हीं वनस्पतियों के मिश्रण से बनाई जाती हैं. इस पद्धति के तहत हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाली जड़ी-बूटियों एवं खनिजों का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है. ट्रांस हिमालय में पाई जाने वाली वनस्पतियां आमची की अधिकतर दवाओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित होती हैं. आज भी दवाओं में इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी-बूटियां द्रास, नुब्रा, चांगथान एवं सुरू घाटी में आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं. लेह स्थित आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च देश की दो ऐसी प्रयोगशालाएं हैं, जहां ट्रांस हिमालय से प्राप्त वनस्पतियों को दवाओं में प्रयोग किए जाने के विभिन्न स्वरूपों पर अध्ययन किया जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार, लद्दा़ख और लाहोल स्फीति के ट्रांस हिमालय क्षेत्रों में मौजूद वनस्पतियों का दस से अधिक वर्षों से अध्ययन किया जा रहा है. इन अध्ययनों में कम से कम 1100 क़िस्मों को रिकॉर्ड किया गया है, जिनमें 525 क़िस्में ऐसी हैं, जिन्हें कई दवाओं में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस संबंध में आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च कई स्तरों पर लोगों को जागरूक कर रही हैं. कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों और कार्यशालाओं के माध्यम से इन वनस्पतियों के ़फायदों के बारे में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. दवाओं में प्रयोग होने वाले पौधे स्वच्छ वातावरण में पनपते हैं, परंतु हाल के अध्ययनों से पता चला है कि इन पौधों की कुछ प्रजातियों पर जलवायु परिवर्तन के कारण नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिन्हें संरक्षण की सख्त ज़रूरत है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन एवं उद्योग जगत को आगे आने की आवश्यकता है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि इससे होने वाले फायदों में स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व बराबर का हो. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की तीन चौथाई आबादी आधुनिक तकनीक से तैयार दवाएं खरीदने में अक्षम है और उसे ऐसे ही पौधों से बनने वाली परंपरागत दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. वर्षों से शोध और निष्कर्ष के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन इन्हीं जड़ी-बूटियों से तैयार दवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि इनकी क़ीमत का़फी कम होती है और ये सबकी पहुंच में भी हैं. (चरखा)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/treasure-of-drugs-in-himalayas.html

इंडिया इन ट्रांजशिनः प्रौद्योगिकी मानव के इरादों को बुलंद करती है

अपने पर्यावरण की देशीय प्रकृति का ज्ञान संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण के प्रबंधन, भूमि संबंधी अधिकारों के आवंटन और अन्य समुदायों के साथ राजनयिक संबंधों के लिए आवश्यक है. भौगोलिक सूचनाएं प्राप्त करना और उनका अभिलेखन समुदाय को चलाने के लिए एक आवश्यक तत्व है. इन सूचनाओं की प्रोसेसिंग और उसके आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेना समुदाय के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, भले ही वह कोई घुमंतू जनजाति हो या फिर भारत के आकार का कोई देश.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं.

आज भारत संक्रमण काल से गुज़र रहा है, ऐसी कई स्वतंत्र एजेंसियां हैं, जो अलग-अलग लक्ष्यों और उद्देश्यों को सामने रखकर देश के संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में लगी हैं. पर्यावरण संबंधी विनियामक एजेंटों के बढ़ते काम के बोझ के कारण कार्यविधियों की बहुलता हो गई है, जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास की दर कम हो गई है और सरकार की पारदर्शिता भी कम हो गई है. खास तौर पर भारत के पर्यावरण और वनों के संरक्षण के लिए भारी मात्रा में भौगौलिक सूचनाओं को प्रोसेस करने और विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक अनुमोदनों की आवश्यकता होगी. निर्णय समर्थन प्रणाली को भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के साथ समन्वित करके भारत के पर्यावरण संबंधी विनियमन में सुधार लाया जा सकता है. भौगोलिक सूचनाओं के विश्लेषण के लिए विकसित भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) नामक यह सूचना प्रबंधन प्रणाली विभिन्न डेटा सेटों को समन्वित करती है और उपयोगकर्ताओं को एक ऐसी क्षमता प्रदान करती है, जिसकी सहायता से विभिन्न मूल स्थानों के साथ देशीय डेटा सेटों के आरपार की विशेषताओं को विश्लेषित किया जा सकता है.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं. सर्वेक्षक-दल भूमि के स्वामित्व की सीमाओं और भौतिक लक्षणों के परिमापन के काम में वर्षों का समय लगा सकते हैं और उच्च प्रशिक्षित मानचित्रक विस्तृत मानचित्रों के रूप में समस्त समुदायों की भौगोलिक सूचनाओं को अभिलेखित करेंगे. भौगोलिक सूचनाओं को एकत्र और अभिलेखित करने की भारत में लंबी परंपरा रही है. सबसे पहले और सबसे बड़ा भूमि सर्वेक्षण छठी सदी में शेरशाह सूरी ने भू-राजस्व के प्राक्कलन के लिए कराया था. मुगल बादशाह औरंगज़ेब और ब्रिटिश साम्राज्य ने भी सत्रहवीं सदी के अंत में लिखित अभिलेखों और क्षेत्रीय मानचित्रों की प्रणाली का उपयोग करते हुए अपनी अर्जित भूमि पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस काम को जारी रखा था. सूचनाओं के संकलन और विश्लेषण के लिए प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होती है, ताकि इस डेटा को प्रोसेस कराया जा सके और ज़्यादातर लोगों को इस विधि की जानकारी से दूर रखा जा सके, लेकिन पिछली सदी में सेटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग के आविष्कार के बाद इस स्थिति में काफ़ी बदलाव आ गया है. भौगोलिक सूचनाओं के संकलन के लिए यह अब अनिवार्य उपकरण बन गया है. रिमोट सेंसिंग सुदूर से ही निष्क्रिय और सक्रिय विद्युत चुंबकीय विकिरण द्वारा वस्तुओं के अध्ययन की विद्या है, जिसने सर्वेक्षण के  तौर-तरीक़ों को स्वचालित कर दिया है और इस प्रकार के डेटा को संकलित करने में लगने वाले समय को भी कम कर दिया है. अभिकलनात्मक (कम्यूटेशनल) शक्ति में वृद्धि होने और उन्नत सॉफ़्टवेयर के विकास के कारण सरलता से लगाई जा सकने योग्य भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के निर्माण को भी सहज बना दिया गया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा.

आज भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र में अनेक एजेंसियां हैं, जो रिमोट सेंसिंग डेटा के विभिन्न अनुप्रयोगों पर काम कर रही हैं. इन अनुप्रयोगों में सबसे प्रमुख है, प्रबंधन और संरक्षण की दृष्टि से पर्यावरण का अध्ययन. भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा देश के वन आवरण मानचित्रों का निर्माण किया जाता है और अन्य एजेंसियों द्वारा अपने हितों के संवर्धन के लिए मानचित्र बनाए या कमीशन किए जाते हैं. भौगोलिक सूचनाएं और पर्यावरणीय संरक्षण आपस में गुंथे हुए हैं. सीमाओं की पहचान और परिसीमन से उन क्षेत्रों या फिर सीमाओं पर पाबंदी लगाई जा सकती है या फिर उनमें प्रवेश मिल सकता है, जिनसे पारिस्थितिक सीमाओं या वन्य गतिविधियों को परिभाषित किया जा सकता है, जो पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए बहुत आवश्यक है. मानवीय गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव के नियंत्रण के लिए यह सूचना बहुत आवश्यक है, ताकि भारतीय पर्यावरण एवं वन (एमओईएफ) और विभिन्न राज्य वन विभाग जैसी पर्यावरणीय विनियामक एजेंसियों को इसे सुलभ कराया जा सके. इन एजेंसियों द्वारा लिए गए निर्णयों से हर रोज़ लाखों भारतीयों के जीवन और आजीविका पर असर पड़ता है. यह डेटा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जाता है और इन तमाम महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने के लिए इनका उपयोग किया जाता है, परंतु डेटाबेस बिखरा हुआ है. उच्चतम न्यायालय ने हाल में दिए गए अपने निर्णय में भारत की पर्यावरणीय सूचनाओं के डिजिटीकरण की ज़ोरदार शब्दों में वकालत की है और इस प्रकार इसकी आवश्यकता को स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा. इस जीआईएस का उपयोग भूदेशीय निर्णय समर्थन प्रणाली (जीडीएसएस) के रूप में किया जा सकेगा, ताकि विनियामक एजेंसियां पारदर्शी, सटीक, पुनरुत्पादक और नीति संबंधी मज़बूत निर्णय लेने में उनकी मदद ले सकें. इस जीडीएसएस के बिना सरकारी एजेंसियों की पहुंच उन सर्वोत्तम उपलब्ध उपकरणों तक नहीं हो सकती, जो देश के क़ानून को लागू करने के लिए आवश्यक हैं. उदाहरण के लिए गोवा राज्य की विधानसभा की लोक लेखा समिति ने अवैध खनन का पता लगाने के लिए हाल में गूगल अर्थ के  उपलब्ध सैटेलाइट बिंबों का खुलकर उपयोग किया. एक दक्ष जीआईएस की सहायता से संबंधित डेटाबेस का मात्र मिलान करके ही फ्लेग्रेंट उल्लंघनों को स्वत: फ़्लैग किया जा सकेगा. ऐसे बहुत से मामले होंगे, जो अब तक सामने नहीं आ पाए होंगे. यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा अनुरक्षित भूमि के उपयोग की निगरानी/कवर डायनेमिक्स वस्तुत: काम कर रहे जीडीएसएस का एक उदाहरण है. इस परियोजना का घोषित उद्देश्य यूरोपियन संघ की नीतियों एवं विधायिका की तैयारी, परिभाषा एवं कार्यान्वयन के समर्थन के लिए शहरी और क्षेत्रीय पर्यावरणों का मूल्यांकन, निगरानी, मॉडलिंग और विकास है. इसकी शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी. अमेरिकी वन सेवा भी जीडीएसएस के विभिन्न प्रयोजनों के लिए इसका उपयोग करती है. यह सेवा अपने इस नवीनतम उपकरण का उपयोग उन क्षेत्रों को चिन्हित करने के लिए करती है, जो सतही पेयजल की आपूर्ति करते हैं और जिन पर विकास के कारण ख़तरे मंडरा रहे हैं. जीडीएसएस से प्राप्त सूचना को उसके बाद वन कार्य योजनाओं में शामिल किया जा सकेगा या उसका उपयोग अन्य निर्णय संबंधी उपकरणों के लिए किया जा सकेगा.

इस (जीडीएसएस) का निर्माण एक तकनीकी और प्रौद्योगिकीय चुनौती होगी और इसका विकास गूगल या पैलेडिन जैसी निजी एजेंसियों द्वारा किया जा सकेगा, जो इस प्रकार के उद्यम स्तर के सॉफ़्टवेयर के डिज़ाइन और उत्पादन की प्रामाणिक तौर पर विशेषज्ञ हैं. राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईएस), राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए) जैसी भारत सरकार की एजेंसियां और विभिन्न सरकारी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) भी इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं. वैकल्पिक उत्पादन प्रक्रिया ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के विकास के द्वारा हो सकती है. बीते सितंबर माह में आयोजित अमेरिकी-रूसी सरकार का कोड-ए-थोन इस प्रक्रिया का एक उदाहरण है, जिसमें प्रोग्रामरों के दलों ने बेहतर शासन के लिए सूचना प्रणालियां निर्मित करने के लिए आपस में प्रतियोगिता की थी. व्यापक पर्यावरणीय जीडीएसएस निर्मित करने के लिए अपेक्षित प्रौद्योगिकी विद्यमान हैं, जिनके कार्यान्वयन से भारत में पर्यावरणीय विनियामक प्राधिकरणों की क्षमता बढ़ेगी और उनके इरादे बुलंद होंगे. आशा है, इससे भारत के पर्यावरण और वनों का बेहतर ढंग से संरक्षण होगा.

हिंदी अनुवाद : विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार.

(लेखक पर्यावरण के स्वतंत्र अनुसंधानकर्ता एवं मानचित्रकार हैं.) 

 

साभार- चौथिदुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/india-in-tronjshin-technology-has-elevated-human-motives.html

किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.

पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.

यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.

कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.

सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.

कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.

लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.

भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.

विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.

भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.

कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.

बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html


 

स्पीड का नया दावा

स्विटज़रलैंड में यूरोपीय परमाणु अनुसंधान केंद्र (सर्न) और इटली के वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि उन्हें ऐसे पार्टिकल मिले हैं जो प्रकाश की गति से तेज चलते हैं. वैज्ञानिक ख़ुद भी चकित हुए. पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि उन्हें न्यूट्रिनो नामक पार्टिकल मिले हैं, जो प्रकाश की गति से भी तेज चलते हैं. अगर यह कहीं और से भी साबित हो जाता है तो आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत ग़लत साबित हो जाएगा. स्विटजरलैंड की सर्न प्रयोगशाला और इटली की प्रयोगशाला में हुए प्रयोग के दौरान यह तथ्य सामने आया. पाया गया कि ये छोटे सब-एटॉमिक पार्टिकल 3,00,00,06 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से जा रहे हैं जो प्रकाश की गति से क़रीब छह किलोमीटर प्रति सेकेंड ज़्यादा है. इस प्रयोग के प्रवक्ता भौतिकविद्‌ एंटोनियो एरेडिटाटो ने कहा, यह नतीजा हमारे लिए भी आश्चर्यजनक है. हम न्यट्रिनो की गति नापना चाहते थे, लेकिन हमें ऐसा अद्भुत नतीजा मिलने की उम्मीद नहीं थी. हमने क़रीब छह महीने जांच, परीक्षण, नियंत्रण और फिर से जांच करने के बाद यह घोषणा की है. न्यूट्रिनो प्रकाश की तुलना में 60 नैनो सेकेंड जल्दी पहुंचे. इस प्रयोग में शामिल वैज्ञानिकों ने इसके नतीजों के बारे में नपे-तुले शब्दों में बात की. सर्न के निदेशक सर्गियो बेर्टोलुची ने कहा, अगर इस नतीजे की पुष्टि हो जाती है तो भौतिकी को देखने का हमारा नज़रिया बदल जाएगा. न्यूट्रिनो पर कोई आवेश नहीं होता और ये इतने छोटे होते हैं कि इनका द्रव्यमान भी अभी-अभी ही पता चल सका है. इनकी संख्या तो बहुत होती है, लेकिन इनका पता लगाना मुश्किल है. इन्हें भुतहा कण भी कहा जाता है और ये न्यूक्लियर फ्यूजन के कारण पैदा होते हैं. इस प्रयोग के तहत वैज्ञानिकों ने स्विटज़रलैंड और इटली की प्रयोगशालाओं के बीच प्रकाश पुंज फेंका. दोनों प्रयोगशालाओं के बीच 730 किलोमीटर की दूरी है. पार्टिकल फिजिक्स की दुनिया में इस घोषणा से सनसनी फैल गई है. फ्रांस में भौतिकी संस्थान के पिएरे बिनेट्यूरी ने कहा, सामान्य सापेक्षता और विशेष सापेक्षता दोनों ही सिद्धांतों पर इससे सवाल खड़ा हुआ है. भौतिकविद्‌ एंटोनियो जिचिषी कहते हैं, अगर आप प्रकाश की गति को छोड़ दें तो विशेष सापेक्षता का सिद्धांत तो नाकाम हो जाएगा.


 साभार- चौथि दुनिया

‘GANGA’ SAMMELAN, ALLAHABAD (23/24th Sept’2011)

All- pervasive corruption in the country has reduced most national rivers to gutters. The sacred Ganga which traditionally carried “nectar” now transports sewage and toxic effluents. This has occurred over time from 1985, when the Government initiated the exercise of cleaning up the dirty waters of Ganga. In spite of the huge expenditure, the river has become a bigger conveyor of filth. And the Government is again working on it, with more funds to be expended. It is my contention that more expenditure will only increase the number of gutters. Allowing rivers to degrade to sewers is the biggest form of corruption. And the result of corruption can only be rectified with a disciplined effort, not just money. To restore the status of Ganga as benevolent mother from its current gutter, like state, a disciplined and scientific scheme is required for her to again carry “holy water” and sustain livelihood. It is therefore imperative to begin by defining a River Policy.

Starting from September’10, we have traversed the entire length of the Ganga to understand the problems and issues first-hand, conducting several workshops and meetings with all stake-holders. A proforma of the River Policy has emerged from this exercise. The core has been formulated by dialogue with people across the nation, and has gained wide consensus. This widely accepted proforma prepared by the people will aid the formulation of a national policy for all rivers. With this in mind, we are convening a meeting of all people country‐wide who value rivers to finalise the River Policy in Allahabad on 23/24 September,’11. Accommodation and food will be provided by the UP Jal Biradari and activists from Allahabad.

This meeting is being co-ordinated by Shri Brijendra Pratap Singh (099362 37855),

email: bps1977@gmail.com. Program details will be available by email:

sammelan@jalsangrah.org

It is our earnest request that you join us to contribute in the making of the national

River Policy.

Sincerely,

Rajendra Singh

‘POSCO: take land but give life’ by- Sunita Narain

The sight on television was heartbreaking: children lying in rows in the searing sun to be human shields against the takeover of their land for Korean giant POSCO’s mega bucks project. Facing them were armed police sent by the state government to assist in the operation.

The steel plant and port project, located in a coastal district of Odisha, has been in a six-year-long eyeball-to-eyeball battle with people whose land will be acquired. Now with clearances coming through the state government wants the land acquired, at whatever cost it seems. It has put a financial offer on the table, which even pays for encroached government land. It believes this is a lifetime offer people should now accept. Move on, let the project be built and precious foreign investment come to the shores of this poor state.

The question we need to ask once again is why people who look so obviously poor are fighting this project. Why won’t they accept the financial compensation, which gives them an opportunity to start a new life and spare their children the drudgery of growing betel nut? Is it growth and development versus environment or just uninformed, illiterate people or even politically motivated agitators? Is it really as simple as that?

I am afraid not.

POSCO is about growth versus growth. People here are poor but they know that this project will make them poorer. This is the fact that we in the modern economy find difficult to comprehend. This is an area of betel farming done on mostly forestland belonging to the state. Of the 1,620 ha needed for the project 90 per cent, or 1440 ha, is this contested forestland.

When the project site was selected, government did not consider it would have to pay compensation for this land—it was encroached upon by the people, and government would simply take it back for the steel giant. But it was forestland and the people who lived there had cultivated on it for as long as they could remember. This then raised the tricky matter of the conditions under the Forest Rights Act that require people to give their consent to the project. The Union Ministry of Environment and Forests overruled its own dissenting committee to say it would have to trust the state government’s version that all procedures were followed in determining that people in these villages were not entitled to this right to decide because they were not traditional forest dwelling community.

With this sorted, environmental and forest clearance was granted. Land acquisition for the project could proceed. But people who were not asked still said no.

Why? After all, the state government says it has accommodated all demands in its offer. It has agreed to limit the acquisition of private dwellings and village land. People will still have homes; they will only lose livelihood. But even that will be compensated. It has agreed to pay for the loss of the use of forestland, even though technically people have no rights over it. The farmers will be paid, according to field reports from Odisha, some Rs 28.75 lakh for each ha of “encroached” betel farmland. Then the package includes provision for payment to wage earners, who will lose livelihood when betel farms go. The severance pay has a sweetener. The government will pay a stipend, limited to a year, for the period people look for “jobs”. In addition, the 460-odd families who lose homes will be resettled in colonies. So why is the generous offer being rejected?

Is it only because of the obduracy of a few people, namely the leaders of one gram panchayat, Dhinkia? This village has locked out the administration for the past three years. All roads to it are barricaded. It is a mutiny, fierce and determined. This village holds out alone because its gram panchayat covers some 55 per cent of the land earmarked for the steel plant, its captive power plant and its private port project. Two other gram panchayats are involved, but their loss is smaller and their leadership is not so strong. But my colleague who visited the residents of the villages waiting in a transit camp for their new houses to be built and handed over, found discontent brewing. Where is our livelihood, people asked? What will we do?

These questions are at the core of the battles raging across the country wherever land is being taken for development but people are losing livelihoods. In yet-to-be POSCO-land, betel farming earns Rs 10-17.5 lakh per ha per year. The compensation is equal to two to three years of earning. In addition, there is the earning from paddy, fish ponds and fruit trees. This land-based economy is employment-intensive. The iron and steel plant, however vital for the nation’s economic growth, cannot provide local employment. For one, local people are not “employable” in such a plant. Two, this modern state-of-the-art plant needs only a limited number of people in its operations.

POSCO is then about growth versus growth. It is just we who have discounted this economy of the land for so long in our understanding of what works and what matters. It is just we who have forgotten that development cannot be development if it takes lives of the very people for whom it is meant. The message is clear: if we want their land, we will have to give them a life.

by- Sunita Narain

Down To Earth

http://downtoearth.org.in/content/posco-take-land-give-life

सो कुल : फुटपाथ ?


वैयक्तिक आयुष्यातल्या साध्यासाध्या गोष्टीही आता परीक्षेच्या व्हायला लागल्या आहेत. आपलं शहर हे फक्त परगाव, परदेशातून येणाऱ्या मंत्र्यांच्या, अधिकाऱ्यांच्या दृष्टीसुखासाठी नाहीए. इथे आपण राहतो. सगळ्यांनीच बेपर्वा वागायचं ठरवलं तर अंदाधुंदी संपणारच नाही..
एखाद्या वेळी उगीचच आपल्याला झटका येतो ना.. तसंच झालं माझं. खरं तर रोज जिमला जाते मी, पण तिथल्या पंचतारांकित सुविधांचा अचानक कॉम्प्लेक्स आला एके दिवशी. सॅल्यूट मारणारे गार्ड, झपझप खालीवर करणाऱ्या दोन लिफ्ट्स, गुड मॉर्निग मॅऽऽऽम म्हणणारे रिसेप्शनवरचे तरुण कर्मचारी, आपल्या वस्तू सुरक्षित ठेवायला असणारे लॉकर, नजरभेट होता क्षणी ‘‘यू नीड हेल्प?’’ म्हणत धावणारे ट्रेनर, म्युझिक टीव्ही आणि यावर कडी म्हणजे तिथे चालू असणारा ए.सी.! त्या दिवशी वीटच आला मला या कौतुक सोहळ्याचा. भारतात राहूनही आपण असे गुळगुळीत, सपाट, स्वच्छ-सुंदर श्वास घेणारे फुलासारखे नागरिक होऊन जाऊ, या भीतीनं मला घेरलं, ताबडतोब, आता काही दिवस जिमला न जाता रस्त्यांवर चालायला जाऊनच आपला वॉक पूर्ण करायचा आणि बाकीचे स्ट्रेचिंगचे व्यायाम घरी करायचे असं ठरवून टाकलं.
एकदा निर्णय घेतल्यावर तो अमलात आणायला कितीसा वेळ लागतो? पाऊस सुरू व्हायला अजून महिना-दीड महिना होता. मी माझे स्पोर्ट शूज घातले आणि लिफ्ट न घेता जिन्याने उतरले. गेटपर्यंत आल्यावरच मला चुकल्यासारखं वाटायला लागलं. एरवी जममध्ये गेल्यावर आपण चपला बदलून बूट घालतो ना.. त्यामुळे ते फारसे न मळता नव्यासारखेच दिसतात. मनाने कच खाण्यापूर्वी टी.व्ही.वर दिसणारी ती जाहिरातीची सीरिज (मला न आवडणारी, मुलांच्या आचरटपणाला डोक्यावर घेणारी!) आणि त्यातलं ‘दाग अच्छे होते है’ हे वाक्य स्वत:ला समजावत नव्या हुरूपाने मी गेटबाहेर पडले.
उजवीकडे वळल्यावर फुटपाथ चालू होतो, पण वळण्यापूर्वीची २० पावलं तरी पादाक्रांत करायला पाहिजेत ना.. जागाच नव्हती! रस्त्याच्या कडेचा भाग हा फक्त पार्किंगसाठीच असल्याचा समज करून घेत सर्व चार चाकी गाडय़ा कंपाऊंडलगत सहा ते दहा फुटांची जागा व्यापून उभ्या होत्या. रिक्षा आणि त्यातली अर्धवट उतरून हुज्जत घालणारी गिऱ्हाईकं, वळणावर चौफेर नजर ठेवून असलेला एक टॅक्सीवाला. कुणाच्याही मध्ये घुसायला जागा नव्हती. पलीकडे जायला वावच नव्हता. सरळ रस्त्यावरून चालावं म्हटलं, तर समोरून येणारी वाहनं आपला वध करायला आल्यासारखी अंगावर चालून येत होती. स्वत:ला वाचवायला मारलेली एक उडी जवळजवळ जिवावर बेतणार होती, कारण फुटपाथ सुरू होण्यापूर्वी एका केळेवाल्याची हातगाडी आहे. तिथे केळी खाऊन समस्त माणसं मनसोक्त कुठेही साली फेकून जातात. माझा पाय एका सालीवर पडणार होता. थोडक्यात वाचला.
अखेर आला फुटपाथ. आता माझी पदयात्रा फुल्ल फॉर्ममध्ये चालू.. असं वाटेपर्यंत उजवीकडच्या हॉटेलमधून भसकन् बादलीभर घाण पाणी माझ्यासमोर फेकलं गेलं, शिंतोडे उडलेच अंगावर. फरशी पुसून झाल्यामुळे त्या मुलाच्या चेहऱ्यावर काम झाल्याचं समाधान विलसत होतं. ते काळं पाणी फुटपाथवर फेकून तो शांतपणे फडकं पिळत होता. त्याला काही सुनावण्याचा मोह चालून आल्यावर पूर्ण करावा असा गंभीर फैसला मनाशी करत मी मार्गक्रमण चालू ठेवलं. तेवढय़ात एक गल्ली आली. एकेरी वाहतुकीची वाहनं विलक्षण वेगानं रोरावत झुमझुम चालली होती. तिथून पुढचा फुटपाथी टप्पा गाठायला सहा-सात मिनिटं लागली. तिथे डिझायनर कपडय़ांच्या दुकानाबाहेर एक लाइफ साइझ मूर्ती आहे साईबाबांची, त्यांची आरती चालू होती. त्यांना नमस्कार करून जाणारी माणसं एकमेकांवर आदळत होती. नमस्कारवाल्यांना चुकवणारी माणसं फुटपाथच्या मध्ये असलेल्या झाडांवर आपटून कपाळ किंवा खांदामोक्ष करून घेत होती. त्या गर्दीत कुणाच्या तरी हातातली दोन केसाळ कुत्री सुटली आणि हाहाकार माजला. मी वैतागून रस्ता क्रॉस केला.
तर या बाजूला फुटपाथवर आरे दूध सरितेची प्रशस्त टपरी, बस स्टॉप, पानवाला, हारवाली- तिच्या पुढय़ात बुकेच्या फुलांच्या पाणी भरलेल्या बादल्या, रसवंतीगृह- तिथे  बसण्यासाठी केलेली बाकडी, नारळवाला- त्याच्यासमोर शहाळ्यांचे डोंगर, पथारीवर टोपल्या पसरून बसलेला भाजीवाला, त्याची बाकी भाज्यांची पोती- या सगळ्यांची विश्वास बसणार नाही अशी लाइन लागली होती. या अडथळ्याच्या शर्यतीला पार करेपर्यंत वीसेक मिनिटं गेली. मग अनुक्रमे किराणा सामान आणि स्टेशनरी कम सुपर मार्केट यांनी हक्काने फुटपाथवर आपलं सामान ठेवण्यासाठी अतिक्रमण केलं होतं. स्टेशनरीवाल्यांनी सुपल्यात गोळा केलेला केर रस्त्यावर रिकामा केला. तो चुकवायला आठय़ा घालत चटकन बाजूला होण्याच्या प्रयत्नात घात झालाच. माझा धक्का लागून एका काकूंचा पाय नुकत्याच प्रातर्विधी उरकून गेलेल्या कुत्र्याच्या ताज्या चकलीत पडला. शी! शिसारी वाटण्यापूर्वी, त्यांना सॉरी म्हणण्यापूर्वी मला पळता भुई थोडी झाली, कारण एक नोकरवजा माणूस दोन अक्राळविक्राळ कुत्र्यांना घेऊन माझ्या दिशेनेच येत होता. त्या कुत्र्यांचा आकार, उंची, लसलसत्या जिभा पाहून मी पूर्ण भेदरून गेले. त्यातच टपरीवरच्या माणसाने सिगरेट पीत फिल्मी धूर सोडला.
हसण्यावारी किती न्यायचं? नाक मुठीत धरून घामानं निथळत घरी पोचले, तेव्हा जाणवलं.. सलग दहा फूट फुटपाथसुद्धा समतल नव्हता. वाहनं जाण्यासाठी बिल्डिंगांनी केलेले उतार, भेगा पडलेल्या फरशा, फुटलेल्या कडा, खड्डे, अनधिकृत दुकान विक्रेते, सांडपाणी, पानाच्या पिचकाऱ्या.. मलाच असह्य़ होत होतं. ज्येष्ठ नागरिक कसे तोंड देत असतील? महानगरपालिका आणि अधिकारी फक्त स्वत:च्या बिल्डिंगमध्येच बसतात का???

सोनाली कुलकर्णी

साभार- लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=164182:2011-06-16-08-00-12&catid=329:2011-02-22-08-54-27&Itemid=331

दलालशाही!

कोणत्याही भ्रष्टाचारात, दोन नव्हे तर किमान तीन जण गुंतलेले असतात. घेणारा, देणारा आणि ‘मध्यस्थ!’ हा ‘मध्यस्थ’ कधी दलाल असतो, कधी नोकरशहा असतो, कधी माफियाचा कुणीतरी तर कधी आप्तेष्टांपैकी एखादा. ‘स्पेक्ट्रम’च्या व्यवहारात मुख्य चर्चा आहे ती घेणाऱ्याची- म्हणजे श्रीमान ए. राजा यांची. आता नोकरशहांनी केलेले व्यवहारही उघडकीला येऊ लागले आहेत. कधी हा ‘गॅझेटेड’ अगर बिगर सनदी अधिकारी हा स्वत: लाभार्थी असतो तर कधी दलाल. हल्लीच्या ‘एमबीए’च्या परिभाषेत त्याला ‘फॅसिलिटेटर’ म्हणतात. बहुतेक वेळा हा ‘फॅसिलिटेटर’च सर्वात पाताळयंत्री असतो. मंत्री वा राजकीय पुढारी लाभार्थी आणि लोभी असतोच; पण तो अडकतो, बदनाम होतो, मीडियाकडून त्याची अवहेलना होते, तो निवडणुकीत पडतो. पण ‘चालू’ वा ‘चलाख’ ‘फॅसिलिटेटर’ सहसा अडकत नाही. कित्येक वेळा तो दुसरी कुणीतरी राजकीय व्यक्ती- मंत्री, मुख्यमंत्री- हेरतो आणि आपले जाळे त्याच्यावर फेकतो. व्यवहार ऊर्फ ‘डिल्स’ करणे, त्यासाठी ‘कमिशन’ ठरविणे, योग्य तो ‘कट’ देणारी ‘पार्टी’ गाठणे, मंत्र्यांची भेट घालून देण्यापूर्वी त्या पार्टीशी, आणि इतरही काही पाटर्य़ाशी बोलणी करणे, कधी कधी माफियांचा पाठिंबा मिळविणे, मीडियामध्ये त्या पार्टीची आणि त्या मंत्र्यांची योग्य ती प्रतिमा निर्माण करण्यासाठी आणि ती जपण्यासाठी टीव्हीचे वा वृत्तपत्रांमध्ये ‘फिक्सिंग’ करणे, वेळ पडल्यास विरोधी पक्षांच्या पुढाऱ्यांना ‘मॅनेज’ करणे -अशी बरीच कामे ही ‘फॅसिलिटेटर’ मंडळी करतात. हल्लीच्या परिभाषेत या अत्याधुनिक व हायटेक दलालांना ‘सव्‍‌र्हिस प्रोव्हायडर्स’ असेही संबोधले जाते. आता तर या दलालांनी रीतसर कंपन्याच काढल्या आहेत. या कंपन्यांनी ‘सेलिब्रिटी मॅनेजमेण्ट’पासून ते ‘इमेज’ आणि ‘इव्हेण्ट’ मॅनेजमेंटपर्यंतची अनेक कामे करायची असतात. त्या व्यवहारासाठी ज्या अधिकाऱ्यांना ‘पटवायचे’ असेल त्यांना कोणकोणते छंद-फंद आहेत ते पाहून तेही पुरवायचे असतात. पंचतारांकित मेजवान्या द्यायच्या असतात. अलीकडच्या जागतिकीकरणाच्या काळात हे सर्व परदेशीही करावे लागते. कारण काही संबंधित कंपन्या विदेशी असतात. बहुतेक राजकीय व्यक्तींना या प्रकारचे ‘मल्टि-टास्किंग’ माहीत नसते वा जमत नाही. म्हणून प्रत्येक राजकीय व्यक्तीबरोबर असा फिक्सर्सचा ताफा असतो. या ताफ्यातील दलाल, उप-दलाल आणि तत्सम ‘ऑपरेटर्स’ असे एक समांतर नेटवर्किंग असते. आपल्या आजूबाजूला असे ‘ऑपरेटर्स’ वावरत असतात. त्यांच्याकडे दोन-तीन एकदम ‘लेटेस्ट’ मोबाइल फोन असतात. त्या फोन्सवर बडय़ा-बडय़ा सेक्रेटरीज्, पत्रकार, पोलीस अधिकारी, मंत्री, सेलिब्रिटीज्, फॅशन मॉडेल्स यांचे नंबर असतात. ही मंडळी सतत कुणाशी तरी बोलत असतात आणि एकदम पॉश मोटारींमधून फिरत असतात. त्यांना निश्चित स्वरूपाची नोकरी नसते, त्यांचा कुठचा निश्चित उद्योगधंदा- व्यवसाय नसतो; पण त्यांच्याकडे पैसे चिक्कार असतात. त्या पैशाचा ‘सोर्स’ अर्थातच संबंधित राजकीय व्यक्ती वा व्यवहार करू पाहणारी कंपनी असते. कित्येक वेळा तो मंत्री त्या कंपनीच्या मालकाला भेटतही नाही. सर्व काही बिनबोभाट आणि परस्पर होत असते. ‘स्पेक्ट्रम’ घोटाळ्यात राजा यांचा राजीनामा झाला; पण ज्या कंपन्यांनी स्वत:ची कंत्राटे मिळविली, त्या कंपन्यांना आणि त्या दलालांना व नोकरशहांना अजून धक्काही लागलेला नाही. त्या सर्वाची नावेही जाहीर झालेली नाहीत. म्हणजे ‘घेणारे’ भ्रष्टाचारी लोकांसमोर आले आहेत; पण ‘देणारे’ अजून उजळमाथ्याने समाजात वावरत आहेत. या सर्व कंपन्यांची कंत्राटे ताबडतोबीने रद्द करायला हवीत. कारण त्यांनीच तर राजा यांच्या माध्यमातून स्वत:चे कोटय़वधी रुपयांचे व्यवहार करून घेतले आहेत. भांडवलशाहीचे हे रूप जगभर अधिकाधिक उग्र आणि बीभत्स होताना आपण पाहत आहोत. मुंबईचे सर्व टॉवर्स, मल्टिप्लेक्सेस, सेलिब्रिटी इव्हेण्ट्स् ही सर्व या भांडवलशाहीची ओंगळ रूपे आहेत. निवडणुकांची प्रक्रिया आणि तिच्या माध्यमातून लोकशाहीच खरेदी करायला आता या कंपन्या आणि त्यांचे फिक्सर्स उतरले आहेत. विरोधी पक्षांकडून किंवा मीडियाकडून जेवढा कठोर हल्ला राजा, कलमाडी वा अशोक चव्हाण यांच्यावर होतो आहे, त्या तुलनेने या सर्व कंपन्या आणि त्यांचे दलाल ऊर्फ ‘फॅसिलिटेटर्स’ मात्र मोकळे आहेत. गेल्या आठवडय़ात इतक्या वेळा लोकसभा अधिवेशन तहकूब केले गेले; पण कुणीही संबंधित कंपन्यांची कंत्राटे रद्द करण्याची मागणी ठणकावून केलेली नाही. त्या कंपन्यांच्या अब्जावधी रुपयांच्या व्यवहारांशिवाय आणि दलालांच्या व्यापक नेटवर्कशिवाय एक लाख ७६ हजार कोटी रुपये (बापरे- म्हणजे एकावर किती शून्य ते वाचकांनी कागदावर करून पाहावे) इतक्या रकमेचा ‘भ्रष्टाचार’ शक्य नाही. याच स्तंभात यापूर्वी स्पष्ट केल्याप्रमाणे ही सर्व रक्कम प्रत्यक्षात नव्हती तर देशाला झालेल्या तोटय़ाची आणि कंत्राटांची संकल्पित रक्कम आहे. अर्थातच ती कंत्राटे मिळविण्यासाठी प्रत्यक्षात कोटय़वधी रुपये खर्च झाले आहेत. राजा यांना एका तामिळ उद्योगपतीने प्रचंड प्रमाणात मदत केली आहे. तामिळनाडूत लवकरच होणाऱ्या विधानसभा निवडणुकीसाठी प्रचंड प्रमाणात पैसे लागणार होते आणि ते मिळविण्यासाठी द्रमुक प्रयत्नशील होता, असे सांगितले जाते. या कंपन्यांपैकी कोणत्याही कंपनीवर प्राप्तिकर खात्याचे छापे पडलेले नाहीत. त्यांची अजून तरी सीबीआयने चौकशी सुरू केल्याचे वृत्त नाही. म्हणजेच सरकार अडचणीत आले तर त्यामागचा खरा ‘राज्यकर्ता वर्ग’ मार्ग अगदी सुरक्षित असतो. भांडवलशाहीला कारभारी (म्हणजे सरकार : मंत्री- नोकरशाही- पोलीस इ.) कोणत्याही पक्षाचे / आघाडीचे चालतात. अर्थातच या कंपन्यांचे आणि त्यांच्या दलालांचे काही लाडके पुढारी, नोकरशहा असतात. म्हणून तर मंत्रिमंडळ बनविणे जिकीरीचे आणि कौशल्याचे काम असते. कारण काही मंत्र्यांचे ‘नेटवर्किंग’ अगोदरपासून तयार असते. ‘सव्‍‌र्हिस प्रोव्हायडर’ ऊर्फ दलाल यांना नवीन मंत्री आला, की सगळेच्या सगळे सर्किट बदलावे लागते. कारण मंत्री बदलल्यावर अधिकारीही बदलला तर? तो धोका ‘फॅसिलिटेटर’ मंडळींना पत्करायचा नसतो. मंत्रीच नव्हे तर त्याचे खातेही बदलून चालत नाही. उदाहरणार्थ, अर्बन डेव्हलपमेण्ट, पीडब्ल्यूडी, रेव्हेन्यू अशी काही खाती असतात, की ज्यांची, कोटय़वधी रुपयांची गुंतवणूक असणाऱ्या कंपन्यांशी नाती जोडलेलीच असतात. ती कंत्राटे चालू ठेवण्यासाठी मंत्री, अधिकारी, खाते एकत्र असावे लागतात. साहजिकच दलाल मंडळींना मंत्रिमंडळ स्थापनेपासूनच कामात राहावे लागते. १० वर्षांत मीडियाची ताकद वाढली आहे आणि न्यायसंस्थेचे प्रस्थ. ही दलाल मंडळी ज्याप्रमाणे मीडियाबद्दल इत्यंभूत माहिती जमा करतात, तसेच कोणता वकील कोणाच्या ‘नेटवर्क’मध्ये आहे, कोणता खटला कोणासमोर चालणार आहे, कोणता खटला पुढे ढकलायचा आणि कोणत्या कारणाने याचीही सविस्तर माहिती ती राजकीय व्यक्ती वा कंपनी स्वत:हून जमा करू शकत नाही. त्यासाठी त्यांना हे दलाल ऊर्फ ‘इमेज मॅनेजर्स’ लागतात आणि ज्या वेळेस हे सर्व ‘फिक्सिंग’ कमी पडते तेव्हा कंपन्या वा राजकीय पुढारी ‘मसलमेन’ ऊर्फ थेट गुंडांनाच सुपारी देतात. आपली सिस्टीम आता इतकी पोखरली गेली आहे, की कुणाला सुपारी देऊन कुणाचा, कधी, कुठे, कसा ‘एन्काऊण्टर’ करायचा हेसुद्धा अनेकदा पोलीस खात्यातले लोकच सांगतात. अशा सर्व स्थितीतही भानगडी आणि घोटाळे बाहेर येत असतातच; पण जोपर्यंत त्या भानगड-घोटाळ्यांना पैसे पुरविणारे लोकांसमोर येत नाहीत तोपर्यंत सिस्टीमला जडलेला रोग दूर होणार नाही. ज्यांना वाटत होते, की आर्थिक उदारीकरण, खासगीकरण आणि खुली बाजारपेठ आपोआप ‘सिस्टीम’ला वळण लावेल, त्यांचा भ्रम दूर झाला असेल- कार्ल मार्क्‍सच्या शब्दांना नव्या काळाची परिभाषा वापरून म्हणता येईल, की भांडवलशाही मोकाट सुटली तर त्यातून एक महाराक्षस निर्माण होईल आणि तो महाराक्षस एकूण संस्कृतीचाच विध्वंस करू शकेल!

संपादकीय

लोकसत्ता.

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=115651:2010-11-18-16-54-07&catid=29:2009-07-09-02-02-07&Itemid=7

कारवाईचा आदेश देणारे मुख्यमंत्री हटले, झोपडय़ा मात्र तशाच!

कोटय़वधी रुपये खर्चून मिठी नदी आणि वाकोला नाल्याचा सर्वागीण विकास करण्यात आला असला तरी आता याच नदी-नाल्यांच्या दोन्ही बाजूस पुन्हा एकदा मोठय़ा प्रमाणात अनाधिकृत झोपडय़ा उभ्या राहू लागल्या आहेत. त्यामुळे दिवसागणिक वाढणाऱ्या या झोपडय़ा मिठी आणि तिच्या उपनद्यांना गिळंकृत करण्याची भीती पर्यावरणप्रेमींकडून व्यक्त होत आहे. याची दखल घेत माजी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण यांनी नदी किनाऱ्यावर होणाऱ्या अनधिकृत झोपडय़ा त्वरित हटविण्याचे आदेश एमएमआरडीएला दिले होते. प्रत्यक्षात मात्र कारवाईचे आदेश देणारे चव्हाणच मुख्यमंत्रीपदावरून हटले तरी या नाल्यावरील झोपडय़ा तशाच उभ्या आहेत. किंबहुना त्यात वाढच होत असल्याचे दिसून येत आहे.
जुलै २००५ मध्ये झालेल्या अतिवृष्टीचा मुंबईला मोठा फटका बसला होता. त्यानंतर मिठी नदी आणि वाकोला नाल्यासह अन्य काही नाल्यांचा सर्वागिण विकास करण्याची योजना प्राधिकरणाने हाती घेतली होती. त्यासाठी कोटय़वधी रूपये खर्चून मिठी नदी आणि वाकोला नाल्याच्या दोन्ही बाजूंची अतिक्रमणे हटविण्याबरोबरच नदीच्या पात्राचे रुंदीकरण, खोलीकरण आणि संरक्षक भिंत बांधणे आदी कामे करण्यात आली. त्याचबरोबर भविष्यात नदीपात्रामध्ये अतिक्रमणे होऊ नयेत आणि नदीचा प्रवाह मोकळा रहावा यासाठी काठावर संरक्षक भिंत बांधण्याबरोबरच दोन्ही बाजूंना सहा मीटर रुंदीचा सव्‍‌र्हिस रोड निर्माण करण्यात आला. भविष्यात केव्हाही मिठी अथवा वाकोला नाल्यात काही कामे करायची झाल्यास या सव्‍‌र्हिस रोडचा वापर करता येईल अशी या मागची प्राधिकरणाची भूमिका असली तरी हा सव्‍‌र्हिस रोड नदीच्या सुरक्षिततेसाठी नव्हे तर पात्रातील आणि आसपासच्या झोपडय़ांना ‘सीआरझेड’मधून मुक्त करण्यासाठीच बांधला जात असल्याच आरोप पर्यावरणप्रेमीेंकडून केला जात आहे. तसेच नदीच्या दोन्ही किनाऱ्याला बांधण्यात आलेल्या भिंतीमुळे आसपासची खारफुटी नष्ट होईल अशी भितीही व्यक्त होत आहे. मध्यंतरी वाकोला नाल्यावरील संरक्षक भिंतीचे प्रकरण न्यायालयात गेले तेव्हाही नाल्यात बांधकामे होऊ नयेत यासाठीच भिंत आणि सव्‍‌र्हिस रोड निर्माण करण्यात येत असल्याचा, असा दावा एमएमआरडीएने केला होता.
प्राधिकरणाच्या या दाव्यानुसार मिठी नदी आणि वाकोला नाल्यात अतिक्रमणे होणार नाहीत अशी अपेक्षा केली जात होती. प्रत्यक्षात मात्र या संरक्षण भिंतीला खेटूनच सव्‍‌र्हिस रोडवर बऱ्याच झोपडय़ा उभारल्या जात आहेत. भारतनगरमध्ये अनधिकृत झोपडय़ांचा असा सुळसुळाट झालेला असतानाच समोरच्या इंदिरानगर झोपडपट्टीत उरलीसुरली खारफुटीही नष्ट करून त्यावर झोपडय़ा उभारल्या जात आहेत. अशाच प्रकारे माहीम कॉजवे ते सीएसटी पुलाच्या दरम्यान आंबेडकर नगर, महाराष्ट्र नगर, वाल्मिकी नगर, संत ज्ञानेश्वर नगर, टॅक्सीमेन कॉलनी, शिक्षक नगर आणि मच्छिमार कॉलनी या भागातही नदीच्या पात्रातील झोपडय़ा कायम असून त्यात दिवसेंदिवस वाढ होत आहे. एमएमआरडीए मुख्यालयापासून हाकेच्या अंतरावर असलेल्या या भागात राजरोस या झोपडय़ा उभारल्या जात असताना प्राधिकरण मात्र मुग गिळून गप्प बसले आहे. झोपडय़ांच्या या अतिक्रमणाबाबत तत्कालिन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण यांच्याकडे नागरिकांनी तक्रारी केल्यानंतर या झोपडय़ांवर त्वरित कारवाई करण्याचे आदेश चव्हाण यांनी एमएमआरडीला दिले होते. मात्र या आदेशाला दोन महिने लोटल्यानंतरही सदर झोपडय़ांवर अद्याप कोणतीच कारवाई झाल्याचे दिसत नाही. आता तर या झोपडय़ा हटविण्याची आमची जबाबदारी नसून ती उपनगर जिल्हाधिकाऱ्यांची असल्याचा दावाही प्राधिकरणाच्या वरिष्ठ अधिकाऱ्याने केला तर ही जमिन प्राधिकरणाचीच असून त्यांनीच त्यावर रस्ता केला आहे. त्यामुळे झोपडय़ा हटविण्याची जबाबदारी त्यांचीच असल्याचे प्रत्युत्तर जिल्हाधिकाऱ्यांनी दिले.
कारवाईबाबत जिल्हाधिकारी कार्यालय आणि एमएमआरडीए परस्परांकडे अंगुलीनिर्देश करीत असत्याने अतिक्रमणमुक्त मिठीचे स्वप्न हवेतच विरण्याची लक्षणे दिसू लागली आहेत.

साभार-लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=115174:2010-11-16-19-49-12&catid=41:2009-07-15-03-58-17&Itemid=81

गंगापुत्र

विजय मुडशिंगीकर

दिवाळी सारखे सण आले की हल्ली मुंबईत रहावत नाही. फटाक्यांचा अतिरेक आणि कानठळ्या बसवणारा आवाज याने जीव हैराण होतो. आवाज, हवा यांच्या प्रदुषणात कमालीची वाढ होते. या वर्षी ऎन दिवाळीत अमेरिकेचे राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा मुंबईत होते. त्यांची सुरक्षा व्यवस्था चोख असली तरी त्यांच्यापर्यंत हे प्रदूषित हवा नक्कीच पोहोचली असणार. आपण प्रगत राष्टाच्या दिशेने वाटचाल करत आहोत. ओबामानी तर भारत प्रगतीशील नव्हे तर प्रगत देश आहे असे म्हटले आहे. पण त्यानी तसं म्हणून काय उपयोग. ते इथल्या प्रत्येक कृतीतून दिसून आलं पाहिजे. मुंबईवरून ओबामा उडत असताना त्यानी शहराचा झालेला उकिरडा नक्कीच बघितला असणार. विमानतळाजवळची मिठी नदी ओबामांच्या नजरेस पडली असती तरी त्याना भारत अजून किती मागे आहे हे समजलं असतं. हे आपणच असं का करतोय?

ओबामांनी भाराताबाद्दल आशावादी विचार मांडले. इथली मुलं, तरूण यांना पाहून ते प्रभावीतही झाले. एकप्रकारची ताकद आणि इच्छाशक्ती इथल्या वातावरणात त्यांना दिसून आली. खरच एक दिवस भारत सामर्थ्यवान देश बनेल अशी आशा त्यांना, तुम्हा आम्हा सर्वांना आहे त्याचं कारण एक ध्येय्य घेऊन झटणारी माणसं अजून या देशात आहेत. ओबामा भारतात यायला निघाले आणि सर्वच वृत्तपत्रात त्यांच्याबद्दल लिहून यायला लागलं. लोकसत्तामध्ये याच दरम्यान मिसिसिपी ते गंगा! हा अग्रलेख आला होता. मनात आणलं तर एक सामान्य माणूस काय करू शकतो हे त्या नमूद केलं होतं. ‘गेल्या काही वर्षांत विजय मुडशिंगीकर या महाराष्ट्रातील एका एकांडय़ा शिलेदाराने गंगेच्या स्वच्छतेची मोहीम हाती घेतली आहे. निवृत्तीनंतरची पुंजी म्हणून जमा करून ठेवलेला भविष्य निर्वाह निधी त्यांनी पूर्णपणे या मोहिमेत ओतला आहे.’ असा उल्लेख त्या अग्रलेखात होता. श्री. मुडशिंगीकरानी केलेलं काम नक्कीच दाद देण्यासारखं आहे, विचार करायला लावणारं आहे.

‘आदर्श’ सारखे घोटाळे, सत्ताधिश, नोकरशहा, बिल्डर, दलाल हे सगळे देश विकून खात असताना हा देश अजू

गंगोत्री

न तगून आहे तो मुडशिंगीकरांसारख्या

प्रामाणिक लोकांमुळेच. एक सोडून दोन वेळा मणक्याची ऑपरेशन झाली तरी त्यानी त्या आजारपणात ध्यास घेतला तो गंगा शुद्धीकरणाचा. ते आपल्या या भुमिकेशी एवढे प्रामाणिक राहिले की या भ्रमणयात्रे दरम्यान काढलेल्या छायाचित्रांना चांगली किंमत येत असतानाही त्यांनी ती विकली नाहीत. सगळ्याच क्षेत्रात होणारं प्रदुषण रोखण्याच्या बाबतीत ते आग्रही असतात.

‘गंगा’ ते ‘आदर्श’ सगळीकडेच भ्रष्टाचार, प्रदुषण. सगळ्या देशाचाच चेहरामोहरा विद्रूप होत असताना अशी काही माणसं (अण्णा हजारे, पोपटराव पवार) आपलं काम निष्ठेने करत रहातात म्हणून काही अंशी आपण हे विष पचवू शकतो. मुडशिंगीकरांसारख्यांच्या प्रयत्नाला हातभार लावला तर आणि तरच ‘गंगाजल’ पुन्हा शुद्ध होईल. पवित्र होईल.

– नरेंन्द्र प्रभू
साभार- नरेंन्द्र प्रभू ब्लाँग.

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