Category Archives: Panchganga

मेहनत रंग लाएगी, लेकिन…

जहां चाह है वहां राह है, लेकिन अपनी मंज़िल की ओर बढ़ना जितना आसान है उतना ही कठिन भी. कुछ ऐसा ही हाल है अंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च (आईपी यूनिवर्सिटी, दिल्ली) के 13 छात्रों का, जिन्होंने अपने सपने को साकार करने के लिए दिन रात मेहनत की मगर हर बार निराशा ही हाथ लगी. दरअसल, पूरा माजरा यह है कि ये छात्र एक ऐसे रोबोट पर काम कर रहे हैं, जो पानी के अंदर सक्रिय होगा, जिसे एयूवी यानी एकोयूस्टिक अंडरवाटर व्हेकिल्स कहा जाता है. इस टीम में बिहार के औरंगाबाद के कमलेश कुमार (टीम लीडर), हिमांशु गुप्ता, आशीष शर्मा, हिमांशु जैन, राहुल चौहान, अभिषेक जय कुमार, हिमांशी भारद्वाज, अश्विन अग्रवाल, मानव कपूर, रोहित शर्मा, आदित्य नागर, भारत त्रिपाठी और सुमित गुप्ता शामिल हैं. उनकी टीम का नाम है, टीम समुद्र. 13 जून, 2011 को चेन्नई में एनआईओटी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में उत्तर भारत से यही एकमात्र टीम थी, जिसने प्रतियोगिता में अपनी जगह बनाई और रनर-अप भी रही. उनके इस जोश को देखकर एनआईओटी के वैज्ञानिक भी दंग रह गए, क्योंकि मुक़ाबला इतना आसान नहीं था. इस मुक़ाबले में देश भर से आए आईआईटी और एनआईटी के छात्रों को टीम समुद्र ने कड़ी टक्कर दी. अब उन्हें प्रोत्साहन के साथ-साथ ज़रूरत थी थोड़ी सी आर्थिक मदद की. ज़ाहिर सी बात है कि किसी प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए मेहनत, निष्ठा, ईमानदारी के अलावा पैसों की भी उतनी ही आवश्यकता होती है. इन छात्रों ने अपनी तऱफ से पूरी कोशिश की कि कोई उनके साथ खड़ा हो, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी. शायद इस वजह से क्योंकि उनका कॉलेज कोई नामी गिरामी कॉलेज नहीं था. फिर भी इन छात्रों ने अपना प्रयास निरंतर जारी रखा और इस रोबोट पर काम करते रहे. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस रोबोट को बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मैकेनिक्स एंड इमेज प्रोसेसिंग की गहन जानकारी होना आवश्यक है. लेकिन इनमें से किसी भी छात्र का मैकेनिक्स प्रमुख विषय नहीं है.

प्रतिभा है, निष्ठा है और ईमानदारी भी. लेकिन आर्थिक कमी की वजह से इनका सपना पूरा होते-होते रह जाता है. यह कहानी है, उन नौजवानों की जिनके पास एक सपना है. उस सपने को पूरा करने का जज़्बा भी है. ऐसा उन्होंने अपने प्रयास से साबित करके दिखाया है. लेकिन इनके सपनों को पंख लगें, इसके लिए ज़रूरत है कि कोई आगे आए और उनकी मदद करे. क्या कोई इस सपने को पूरा करने के लिए आगे आएगा?

फिर भी इन छात्रों के पास इतनी जानकारी है कि ये अपनी जानकारी की बदौलत इस रोबोट को बनाकर खड़ा कर सकते हैं. इन छात्रों का कहना है कि उन्होंने इस रोबोट को बनाने के लिए दिन रात एक कर दिया. तारी़फ तो सबने की, लेकिन मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आया. एयूवी बनाने का प्रयास हालांकि 2008 में ही शुरू हो चुका था, लेकिन राह इतनी आसान न थी. इसे बनाने के लिए होनहार छात्रों की ज़रूरत थी, जिनके क़दम किसी भी परिस्थिति में न डगमगाएं. आख़िरकार फाइनल टीम का चुनाव कर लिया गया. इन छात्रों में जोश था, उमंग थी और कुछ कर गुज़रने की चाह भी, जो इस प्रोजेक्ट के लिए बेहद ज़रूरी थी. सब मिले और उन्होंने इस पर काम करना शुरू भी कर दिया. ये अब अपने एयूवी को पानी के अंदर उतारने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, लेकिन अफ़सोस उन्हें जगह तक नहीं मिली. इतनी कठिन परिस्तिथियों से दो चार होने के बावजूद उनके हौसलों में कोई कमी नहीं आई है और अब उन्होंने सारा ज़िम्मा अपने ही कंधों पर उठा लिया है. इसे बनाने के लिए सभी ज़रूरी चीज़ों को ये खुद ही खरीदेंगे और इस रोबोट को आ़खिरी रूप देंगे. अब ये छात्र एयूवीएसआई संस्थान और ऑफिस ऑफ नेवल रिसर्च (ओएनआर) द्वारा 17 से 22 जुलाई, 2012 तक आयोजित होने वाली 15वें अंतरराष्ट्रीय रोबो सब प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगे. यह प्रतियोगिता सैन डियेगो अमेरिका में होगी. अगर इन होनहार छात्रों की मेहनत रंग लाती है तो ये न स़िर्फ विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित होगी, बल्कि पूरे देश के लिए भी गर्व की बात होगी.

साभार – चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/05/hardwork-will-work-but.html

गंगे ‘हरी हरी…’

गंगा म्हणजे या महान देशाच्या संस्कृतीचे खळाळते, वाहते, पवित्र असे प्रतीक. अशा या नदीची सध्याची अवस्था काही फार चांगली नाही. ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई…’ असं राज कपूरनं त्याच्या सिनेमातून सांगण्याच्या आधीपासून भारतीय जनतेला हे सत्य माहिती आहे. नुकताच या नदीला राष्ट्रीय नदीचा दर्जाही देण्यात आला. तरीही परिस्थितीत फार फरक पडला नाही.

भारतातील एकूण लोकसंख्येच्या सुमारे ४० टक्के जनतेला गंगा पाणी पुरवते. एकूण ११ राज्ये तिचा लाभ घेतात. गंगेच्या किना-यांवर वसलेल्या शहरांतून सध्या रोज तब्बल २९० कोटी लिटर सांडपाणी सोडले जाते. त्यापैकी केवळ ११० कोटी लिटर पाण्यावर शुद्धीकरण प्रक्रिया होऊ शकते. मग ती ‘मैली’ होणार नाही तर काय! प्रथम इंदिरा गांधी आणि नंतर राजीव गांधींच्या कार्यकाळात गंगेच्या स्वच्छतेसाठी काही ठोस पावले उचलण्यात आली. ‘गंगा अॅक्शन प्लॅन’ बनविण्यात आला. मात्र, या योजना आरंभशूरच ठरल्या. गंगेच्या स्थितीविषयी पर्यावरणवाद्यांनी आणि माध्यमांनी आरडाओरडा केल्यानंतर तीन वर्षांपूर्वी ‘राष्ट्रीय गंगा नदी खोरे प्राधिकरणा’ची (एनजीआरबीए) स्थापना करण्यात आली. त्यात अनेक तज्ज्ञांचा समावेश करण्यात आला; परंतु सरकारला गंगेची स्वच्छता हा प्राधान्याचा विषय वाटत नसल्याचेच गेल्या तीन वर्षांत स्पष्ट झाले.

या काळात या प्राधिकरणाच्या केवळ तीन बैठका झाल्या. त्यातील तिसरी व शेवटची परवा १७ एप्रिलला दिल्लीत झाली. ही बैठकही सरकारने घाईघाईने घेतली; कारण जी. डी. आगरवाल या ८० वर्षांच्या वयोवृद्ध पर्यावरण तज्ज्ञांनी उपोषण केले आणि प्राधिकरणावरील तीन सदस्यांनी राजीनामे दिले, म्हणून! पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंगही या बैठकीला उपस्थित होते. त्यांनी गंगेच्या स्वच्छता मोहिमेला उशीर झाल्याचे मान्य करून, यापुढे सर्व संबंधित राज्यांनी याबाबत तातडीने हालचाली कराव्यात, असे सांगितले. पंतप्रधानांची तळमळ खरी असली, तरी प्रत्यक्षात सरकारला गंगेसाठी काहीही करण्याची इच्छा नाही, यावर अनेक तज्ज्ञांचे एकमत झाले आहे. प्राधिकरणाचे एक सदस्य रशीद हयात सिद्दिकी यांनी तर पद सोडण्याची इच्छा व्यक्त केली आहे. या प्रश्नात राजकारण आणले जात आहे, असे त्यांना वाटते. उत्तराखंडचे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा यांनी त्यांच्या राज्यात गंगेवर बांधल्या जाणा-या धरणांचे समर्थन केले आहे.

प्राधिकरण कुठलेच निर्णय घेत नाही. जे काही निर्णय घेतले जातात, ते राष्ट्रीय नदी संवर्धन महासंचालनालयामार्फत घेतले जातात. हे महासंचालनालय केंद्रीय वने व पर्यावरण खात्याच्या अखत्यारित येते. आता इंडो-तिबेट बॉर्डर पोलिसच्या २१ जवानांनी गंगोत्री ते गंगासागर असा प्रवास राफ्टिंगद्वारे करून गंगेच्या स्वच्छतेचा संदेश सर्वत्र पोचविण्याचा निर्णय घेतला आहे. बुधवारी या जवानांची मोहीम सुरू झाली. एकूणच गंगेच्या स्वच्छतेसाठी आता इंग्रजीतील ‘हरी हरी’ (घाई करा) म्हणायची वेळ आली आहे, हे खरे!

सौजन्य- महाराष्ट्र टाईम्स

http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/12739868.cms

पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर टकराव….

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

एक दिलचस्प बात यह है कि समय के साथ निर्णय लेने की इस प्रक्रिया का इस्तेमाल नीति-निर्धारण के मुद्दों से आगे बढ़कर क़ानून निर्माण के क्षेत्र में भी होने लगा है. हाल के वर्षों में रेगूलेटरी इंफोर्समेंट के बढ़ते चलन का परिणाम यह हुआ है कि पेशेवर संस्थाओं को भी स़िफारिशी कार्य सौंपे जा रहे हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वैज्ञानिक एवं पेशेवर संस्थाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी, जिन्हें पर्यावरण से जुड़े तमाम क़ानूनों को कार्यान्वित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. इनके गठन का प्रमुख उद्देश्य निर्णय प्रकिया में निष्पक्षता और कुशलता सुनिश्चित करना है. हालांकि इस काम में भी पर्यावरण की रक्षा उनका प्राथमिक उद्देश्य होगा.

यहां तक कि हम यह भी कहते हैं कि मौजूदा पर्यावरण नियम इकोलॉजिकल सिद्धांत के मुताबिक़ बनाए गए हैं, लेकिन इनके बीच दरार आनी शुरू हो चुकी है. वे अपरिपक्व मान्यताओं को चुनौती देते हैं. वे इस मान्यता को चुनौती देते नज़र आते हैं कि संस्थाएं और उन्हें चलाने वाले लोग अपने सामाजिक एवं राजनीतिक हित को किनारे रखकर काम करेंगे. यह कैसे मुमकिन है कि ऊर्जा मंत्रालय का कोई पूर्व सचिव, जो हाइड्रो पावर डेवलपर्स की गवर्निंग बॉडी में शामिल है, पर्यावरण क़ानूनों पर फैसले से संबंधित किसी मीटिंग में शामिल हो और अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित न हो? जब एक ग़ैर सरकारी संस्था का प्रमुख, जो किसी औद्योगिक संगठन का प्रतिनिधित्व भी करता है और पर्यावरण से संबंधित किसी कमेटी का सदस्य हो तो उसका कौन सा हित सबसे पहले आता है?

पिछले कुछ वर्षों में फैसले लेने वाली कमेटी के सामने हितों में टकराव कई बार देखने को मिला. भारत के बायोलॉजिकल डायवर्सिटी एक्ट 2002 के तहत नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी के ज़रिये एक कमेटी का गठन किया गया, जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बायोलॉजिकल संसाधनों के इस्तेमाल के लिए आने वाले आवेदनों की जांच करता है. जबसे इस कमेटी का गठन हुआ है, तबसे अब तक इसकी पांच बार बैठक हो चुकी है. इस दौरान सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थाओं मसलन, नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज़, एनआरसी ऑन मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट आदि के आवेदनों को भी मंज़ूरी दी गई, जबकि इनके प्रतिनिधि भी इस कमेटी के सदस्य हैं. बैठक में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) का एक वैज्ञानिक भी शामिल था. इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्‌स (आईपीआर) के लिए सीएसआईआर के 126 आवेदनों पर विचार किया गया और उसे म़ंजूरी भी दी गई. 26 जुलाई, 2007 को सेवानिवृत आईएएस अधिकारी एमएल मज़ूमदार की अध्यक्षता में गठित एक्सपर्ट अपराइज़ल कमेटी यानी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) द्वारा पांडुरंगा टिंबलो इंडस्ट्रीज़ को म़ंजूरी दी गई. मंज़ूरी देने के समय मज़ूमदार ख़ुद चार कंपनियों यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, आरबीजी मिनरल्स इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, हिंदुस्तान डॉर-ऑलिवर लिमिटेड और आधुनिक मेटालिक्स लिमिटेड के निदेशक थे. प्रत्यक्ष तौर पर इन माइंस का पांडुरंगा टिंबलो से कुछ खास लेना-देना नहीं है, लेकिन निश्चित तौर पर अध्यक्ष की नियुक्ति में निष्पक्षता नहीं बरती गई.

अक्टूबर 2009 में जेनेटिकली इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) ने भारत में पहले जेनेटिकली मोडिफाइड फसल बीटी बैंगन को म़ंजूरी दी. फैसला लेने से पहले मामले पर विचार करने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया गया. जीईएसी का अंतिम फैसला व्यापक तौर पर इसी कमेटी के सुझावों पर आधारित था. इस विशेषज्ञ समिति में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ वेजीटेबल रिसर्च (आईआईवीआर) के निदेशक डॉ. मथुरा राय शामिल थे. आईआईवीआर यूएस-एड के एबीएसपी-टू प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जिसके तहत बीटी बैंगन को विकसित किया गया. ज़ाहिर है, बीटी बैंगन की मंज़ूरी में किसी तरह का कोई संदेह नहीं था. समिति में शामिल अन्य लोगों में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के डॉ. आनंद कुमार भी थे, जो ख़ुद बीटी बैंगन को विकसित करने के काम से जुड़े हैं. ध्यान रहे कि इस कमेटी का प्रमुख काम जैविक सुरक्षा और प्रायोगिक परीक्षणों से मिलने वाले आंकड़ों का आकलन करना था. उक्त सभी टकराव के गंभीर कारण हैं. हालांकि कई बार हितों का यह टकराव सतह पर नज़र नहीं आता, लेकिन यही वह अवसर है, जिसमें कोई नीति निर्धारक किसी क्षेत्र विशेष के विकास के लिए वहां पहले से मौजूद वनक्षेत्र को ़खत्म करने के प्रस्ताव पर विचार करता है. ऐसी परिस्थितियों में ही उसके पूर्वाग्रह उसकी निर्णय प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने की हालत में आ जाते हैं, अन्यथा इसकी और कोई व्याख्या नहीं हो सकती कि ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किसी प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दे दी जाए, भले ही वह किसी पुराने ़फैसले के मुताबिक़ ग़ैरक़ानूनी हो.

हमारा सवाल यह है कि कहां गए ऐसे वैज्ञानिक, जिनका संबंध कॉरपोरेट घरानों से नहीं है? कहां हैं ऐसे विशेषज्ञ, जिनका राजनीतिक दलों से ताल्लुक़ नहीं है? पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर लिए जा रहे फैसलों में विशेषज्ञों का रंग तो बेशक दिखता है, लेकिन समस्या यह है कि वह हमेशा हरा नहीं होता.

 

साभार- चौथी दुनिया
http://www.chauthiduniya.com/2012/03/conflicts-on-environmental-issues.html

इंडिया इन ट्रांजिशनः भारत में कोयले की काली लकीर

यह समय सबसे अच्छा था, यह समय सबसे खराब था, यह युग समझदारी का था, यह युग ही बेवक़ूफ़ियों का था. कोयले की इस वर्तमान गतिशीलता की तुलना किसी षड्‌यंत्र और दो शहरों की कथा (ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़) के झंझावात से नहीं की जा सकती. यह कथा निश्चय ही आरंभिक भावनाओं को प्रतिबिंबित करती है और इससे इस क्षेत्र में चलने वाले घटनाचक्र का अंदाज़ा हो जाता है. हाल में बाज़ारी पूंजीवाद के संदर्भ में सबसे प्रतिष्ठित कंपनी के रूप में कोल इंडिया के उदय होने की चर्चा समाचार पत्रों में गूंजती रही है. वित्तीय जश्न मनाने की बजाय पिछले कुछ वर्षों से भारत में कोयले की भारी कमी रही है, जिसके कारण राज्य सरकारें, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की पावर और इस्पात कंपनियां समय पर कोयले की डिलीवरी न होने की लगातार शिकायतें करती रही हैं.

कोयले की आपूर्ति की निगरानी के लिए विकसित प्रशासनिक प्रणाली बहुत जल्द ही अपनी विश्वसनीयता खोने जा रही है. बिजली के क्षेत्र की क्षमता, शायद कुछ मूर्खतापूर्ण लगे, लेकिन कोयले की आपूर्ति की क्षमताओं से कहीं आगे निकल गई है. इस समय चलने वाले कई संयंत्र, खास तौर पर वे संयंत्र जो राज्य के क्षेत्र में हैं, अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. पिछले साल वर्तमान संविदागत क़रारों को पूरा करने में सक्षम न होने के कारण ही बहुत कम कोयला ईंधन आपूर्ति क़रारों पर हस्ताक्षर हो पाए हैं.

घरेलू कोयले के सुरक्षित भंडार से काफ़ी मात्रा में कोयला निकालने की भारत की क्षमता में गिरावट आने के  कारण उसकी नीति पर भी मूल रूप में इसका असर पड़ा है. कोयला मंत्रालय द्वारा निष्पादित नवीनतम कोयला ईंधन आपूर्ति क़रार (एफएसए) बिजली संयंत्रों की ईंधन संबंधी 75 प्रतिशत आवश्यकताओं को पूरा करने की गारंटी देते हैं, शेष की पूर्ति निजी तौर पर की जानी चाहिए. यदि कोयला ईंधन आपूर्ति क़रार (एफएसए) निष्पादित हो भी जाए, जो अपने आपमें संपर्क अनुमोदन प्रक्रिया की जटिलताओं को देखते हुए बेहद अनिश्चित है तो भी रेल और सड़क मार्ग के मिले-जुले रूप के कारण स्त्रोत स्थल से ले जाकर गंतव्य स्थल पर उन्हें खाली करने-कराने के तौर-तरीक़ों और उसके लिए ज़िम्मेदार एजेंसियों द्वारा लॉजिस्टिकल प्रबंधन के कमज़ोर समन्वयन के कारण और भी नुक़सान और देरी होती रहती है. इस बात को लेकर हैरानी भी नहीं होनी चाहिए कि बड़े-बड़े कोयला उपभोक्ता बेहतर क़िस्म के कोयले को चुनने के लिए उसे उन देशों से आयातित करने पर आमादा होने लगे हैं, जहां पर क़रार और लॉजिस्टिक्स से संबंधित दायित्वों का पूर्वानुमान किया जा सकता है. इसकी प्रतिक्रिया में कोयला निर्यातक देशों और अभी हाल में इंडोनेशिया ने भी कोयले की बढ़ती मांग को देखते हुए उसकी क़ीमत में बढ़ोतरी और विनियमों में परिवर्तन करना शुरू कर दिया है.

आशा है कि भारत अगले कुछ वर्षों में एक मिलियन टन से अधिक कोयले का आयात करेगा. क्या कारण है कि कोयले का घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने में विफल रहा है? हालांकि इस बारे में बहुत-से स्पष्टीकरण दिए जा चुके हैं, फिर भी यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब कदाचित सबसे कठिन है. कुछ लोग कहते हैं कि पर्यावरण संबंधी स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण ही मुख्य बाधाएं रही हैं. कुछ लोग इसका दोष राज्यों द्वारा स्वाधिकृत कोयला कंपनियों पर मढ़ देते हैं जो अपने परिचालन में आधुनिक खनन की परिपाटियों और प्रौद्योगिकी को प्रभावशाली रूप में अपनाने में असमर्थ रहे हैं. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कोयला कंपनियों के इन पुराणपंथी मालिकों की काफ़ी आलोचना भी हुई है. इनके कई मालिकों ने तो उत्पादन के लिए ब्लॉक ला पाने में विफल होने के  बाद अपने आवंटित ब्लॉकों को अनावंटित भी करा दिया. क़िस्सागोई की तरह आपराधिक तत्वों के  साथ कोयला उद्योग की मिलीभगत और उसके फलस्वरूप होने वाली चोरी और ग्रेड की गुणवत्ता को कम करने की वारदातों को भी समझा जा सकता है. यही कारण है कि घरेलू उद्योग में वर्तमान कमी के सही कारणों को समझना इतना आसान नहीं है, परंतु एक बात तो साफ़ है कि परंपरागत बाज़ार की अपेक्षित क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो पाया है.

भारतीय कोयला बाज़ार एक अजीबो-ग़रीब दानव है. कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल), सिंगरेनी कोल कोलियरी लिमिटेड (एससीसीएल) और नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन (एनएलसी) के बीच राज्यों की स्वाधिकृत कंपनियों के उत्पादन के अल्पाधिकार की भरपाई ऐतिहासिक रूप में क्रय के एकाधिकार द्वारा की जाती रही है. उदारीकरण से पहले तक कोयले के सबसे बड़े औद्योगिक उपभोक्ता अर्थात बिजली, लोहा व इस्पात और सीमेंट के काऱखाने भी ज़्यादातर राज्यों के स्वाधिकृत काऱखाने ही रहे हैं, लेकिन वास्तव में रेलवे ही एक ऐसी संस्था है जिसके पास कोयले को बड़े पैमाने पर उठाने और उसे वितरित करने की अच्छी-खासी मूल्य-शक्ति है. उदारीकरण के बाद जब ये ज़िम्मेदारियां सीआईएल को औपचारिक रूप में सौंप दी गईं, तब कोयला मंत्रालय ने 2000 के दशक की शुरुआत तक मूल्यों पर नियंत्रण बनाए रखा. फिर भी आयात-समानता के मूल्यों पर केवल  कोयले के उच्चतम ग्रेड ही बेचे गए और भारत का अधिकांश उत्पादन निचले ग्रेड का होने के कारण कम मूल्य पर बेचा गया और हो सकता है कि इन मूल्यों का निर्देश अनिवार्य वस्तुओं, खास तौर पर बिजली की लागत को कम रखने के लिए कदाचित कोयला मंत्रालय द्वारा दिया गया था. सन 2011 के आरंभ में सीआईएल ने विभेदक मूल्य प्रणाली शुरू की, जिसके आधार पर बाज़ार-संचालित क्षेत्रों के लिए उच्चतर मूल्य तय किए गए.

इन बदलती हुई मूल्य-व्यवस्थाओं के बावजूद काले बाज़ार को छोड़कर खुले बाज़ार में थोक में कोयला खरीदना सचमुच बहुत कठिन है. भारत के छह सौ मिलियन टन के घरेलू कोयला उत्पादन में से लगभग 80 प्रतिशत का आवंटन कोयला मंत्रालय की प्रशासनिक समितियों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के आवेदकों को किया गया. अतिरिक्त 10 प्रतिशत की बिक्री ऑनलाइन ई-नीलामी के माध्यम से की गई, जिसके परिणामस्वरूप अच्छा-खासा राजस्व भी मिला है. 2009-10 में ई-नीलामी मूल्य औसतन अधिसूचित मूल्यों से लगभग 60 प्रतिशत ऊपर रहा. अवरुद्ध कोयला ब्लॉक, जिन्हें जल्द ही प्रतियोगी बोलियों के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को आवंटित कर दिया जाएगा, 19 प्रतिशत अतिरिक्त था. अंततः घरेलू कोयला उत्पादन का आ़खिरी 1 प्रतिशत राज्य सरकार की एजेंसियों को, जो इसे स्थानीय बाज़ारों को उपलब्ध करा देते हैं, आवंटित कर दिया जाता है.

कोयले के कम मूल्य के पीछे का तर्क था कि बिजली, इस्पात और सीमेंट का परिणामी उत्पादन अनिवार्य था और वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए उसकी क़ीमत कम करना ज़रूरी था, लेकिन आर्थिक सलाहकार के कार्यालय से हाल के मूल्यों के आंकड़ों को देखते हुए 2004 से 2011 तक कोयले के मूल्य में 89 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि बिजली, इस्पात और सीमेंट के मूल्यों में क्रमशः 13 प्रतिशत, 26 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई. उसी अवधि में थोक मूल्य सूचकांक में 54 प्रतिशत वृद्धि हुई. जहां एक ओर बिजली के मूल्य विनियमित कर दिए गए, वहीं दोनों के  मूल्य का विनियमन नहीं हुआ है, जिसका अर्थ यह हुआ कि इन दोनों उद्योगों ने कोयले के बढ़ते मूल्यों को पर्याप्त रूप में आत्मसात करते हुए उनका प्रबंधन कर दिया. यदि स्थिति यही है तो कृत्रिम रूप से कोयले के  कम मूल्य के रूप में सहायता की इनपुट राशि का तर्क काफ़ी कमज़ोर है, लेकिन मूल्य-निर्धारण मूलभूत समस्या भी नहीं है.

कोयले की आपूर्ति की निगरानी के लिए विकसित प्रशासनिक प्रणाली बहुत जल्द ही अपनी विश्वसनीयता खोने जा रही है. बिजली के क्षेत्र की क्षमता, शायद कुछ मूर्खतापूर्ण लगे, लेकिन कोयले की आपूर्ति की क्षमताओं से कहीं आगे निकल गई है. इस समय चलने वाले कई संयंत्र, खासतौर पर वे संयंत्र जो राज्य के क्षेत्र में हैं, अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. पिछले साल वर्तमान संविदागत क़रारों को पूरा करने में सक्षम न होने के कारण ही बहुत कम कोयला ईंधन आपूर्ति क़रारों पर हस्ताक्षर हो पाए हैं. पिछले कुछ महीनों में श्रमिक संकट, भारी वर्षा और तेलंगाना विरोध के कारण इस प्रणाली की ऐसी कमी भी सामने आई है, जिसके कारण बिजली के संयंत्रों में कोयले के भंडार कम होने लगे और अनेक दक्षिणी राज्यों में लंबे समय तक बिजली की कटौती होने लगी.

ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में निजी क्षेत्र में भी जोखिम बढ़ने के कारण उत्साह में कमी दिखाई पड़ने लगी. सीआईएल के मूल्य-निर्धारण के उत्साह से भरे सारे प्रयासों पर बार-बार पावर क्षेत्र द्वारा पानी फेर दिया गया. यदि इन्हें उचित रूप में कार्यान्वित किया जाए तो इससे पावर क्षेत्र में सैद्धांतिक रूप में स्थितियों में सुधार आ जाएगा, लेकिन बढ़िया कोयले की डिलीवरी में सीआईएल के खराब रिकॉर्ड के कारण कई ऑपरेटर भारी रद्दोबदल करने की बजाय स्थिति को यथावत बनाए रखना ही पसंद करते हैं. इस प्रकार का संतुलन, जहां कोई भी पक्ष पूरी तरह से निकम्मी पड़ी इस प्रणाली में कोई भारी परिवर्तन नहीं चाहता, बहुत समय तक नहीं चल सकता.

इस प्रकार की समस्याओं का कोई सरल समाधान नहीं है, इसलिए इन पर गंभीर विचार मंथन की आवश्यकता है. रणनीतिक कारणों से विदेशों से कोयले के संसाधन मंगवाने की बात ठीक तो लगती है, लेकिन इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि कोयले की किसी खान को पूरी तरह से विकसित करने में पांच से सात साल तक का समय लगता है, अपने देश में ही कुछ अल्पकालिक उपायों की आवश्यकता तो होगी ही. कोयले के क्षेत्र में सुधारों पर शंकर समिति की रिपोर्ट में चार साल पहले कई ऐसी समस्याओं की भविष्यवाणी की गई थी और उस समिति की सिफ़ारिशों पर कार्रवाई करने में कुछ समय तो लगेगा ही. अनेक महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करना होगा. उदाहरण के लिए पिछले बीस वर्षों में भारतीय कोयला खनन कंपनियों की उत्पादकता में बदलाव कैसे आया? कोयले की आपूर्ति की लाइनें कैसे चलती हैं और इस प्रक्रिया में बाधाएं और विचलन कहां हैं? क्या भारत अपनी घरेलू खानों से इष्टतम मात्रा में कोयला निकाल सकता है? क्या यह संभव है कि वर्तमान क़ानूनी ढांचे के भीतर अधिक खुले कोयला बाज़ार में संक्रमण किया जा सके ? इन सवालों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद ही पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में चली आ रही समस्याओं के लगातार समाधान की कोशिशें रंग ला पाएंगी.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/black-streak-of-coal-in-india.html

 

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हिमालय में दवाओं का ख़ज़ाना

 

वनस्पति न स़िर्फ इंसानी जीवन, बल्कि पृथ्वी पर वास करने वाले समस्त जीव-जंतुओं के जीवन चक्र का एक अहम हिस्सा है. एक तऱफ जहां यह वातावरण को शुद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी तऱफ इसकी कई प्रजातियां दवा के रूप में भी काम आती हैं. वन संपदा के दृष्टिकोण से भारत का़फी संपन्न है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में भारत का विश्व में दसवां और एशिया में चौथा स्थान है. यहां अब तक लगभग छियालीस हज़ार से ज़्यादा पेड़-पौधों की प्रजातियों का पता लगाया जा चुका है, जो किसी न किसी रूप में हमारे काम आते हैं. पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के अंतर्गत लद्दा़ख यूं तो अत्यधिक ठंड के लिए प्रसिद्ध है. इसके बावजूद यहां एक हज़ार से भी ज़्यादा वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियां फल-फूल रही हैं. इनमें आधी ऐसी हैं, जिनका उपयोग औषधि के रूप में किया जा सकता है. समुद्र की सतह से क़रीब 11,500 फुट की ऊंचाई पर बसा लद्दा़ख अपनी अद्भुत संस्कृति, स्वर्णिम इतिहास और शांति के लिए विश्व प्रसिद्ध है. लद्दा़ख की कुल आबादी 1,17,637 है. ऊंचे क्षेत्र में स्थित होने और कम बारिश के कारण यहां का संपूर्ण जीवन कभी न समाप्त होने वाले ग्लेशियर पर निर्भर है, जो पिघलने पर कई छोटे-बड़े नदी-नालों को जन्म देता है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की.

नवंबर से मार्च के बीच यहां का तापमान शून्य से भी 40 डिग्री नीचे चला जाता है. भारी ब़र्फबारी के कारण इसका संपर्क इस दौरान पूरी दुनिया से कट जाता है. यहां का 70 प्रतिशत क्षेत्र साल भर ब़र्फ से ढका रहता है. इसी कारण इसे ठंडा रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन अगर आप क़रीब से इसका मुआयना करेंगे तो पता चलेगा कि यहां वनस्पतियों का एक संसार भी मौजूद है. दरअसल विषम भौगोलिक परिस्थिति ने यहां के लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया है. ऐसे में क्षेत्र के निवासी आसपास उपलब्ध वस्तुओं को ही जीवन चलाने का माध्यम बनाते रहे हैं. यहां मुख्य रूप से गेहूं, जौ, मटर और आलू की खेती की जाती है. सब्ज़ियां, दवाएं, ईंधन और जानवरों के लिए चारा जैसी बुनियादी आवश्यकताएं भी जंगली पौधों से पूरी की जाती हैं. जंगली पौधों पर इतने सालों तक निर्भरता ने इन्हें इनके फायदों का ब़खूबी एहसास करा दिया है.

विल्लो पोपलर एवं सीबुक थ्रोन यहां सबसे ज़्यादा पाई जाने वाली वनस्पतियां हैं. उपचार की चिकित्सा पद्धति, जिसे स्थानीय भाषा में स्वा रिग्पा अथवा आमची कहा जाता है, पूर्ण रूप से इन्हीं वनस्पतियों पर निर्भर है और यह वर्षों से स्थानीय लोगों के लिए उपचार का साधन है. स्थानीय स्तर पर उपचार के लिए तैयार की जाने वाली औषधियां इन्हीं वनस्पतियों के मिश्रण से बनाई जाती हैं. इस पद्धति के तहत हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाली जड़ी-बूटियों एवं खनिजों का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है. ट्रांस हिमालय में पाई जाने वाली वनस्पतियां आमची की अधिकतर दवाओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित होती हैं. आज भी दवाओं में इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी-बूटियां द्रास, नुब्रा, चांगथान एवं सुरू घाटी में आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं. लेह स्थित आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च देश की दो ऐसी प्रयोगशालाएं हैं, जहां ट्रांस हिमालय से प्राप्त वनस्पतियों को दवाओं में प्रयोग किए जाने के विभिन्न स्वरूपों पर अध्ययन किया जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार, लद्दा़ख और लाहोल स्फीति के ट्रांस हिमालय क्षेत्रों में मौजूद वनस्पतियों का दस से अधिक वर्षों से अध्ययन किया जा रहा है. इन अध्ययनों में कम से कम 1100 क़िस्मों को रिकॉर्ड किया गया है, जिनमें 525 क़िस्में ऐसी हैं, जिन्हें कई दवाओं में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस संबंध में आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च कई स्तरों पर लोगों को जागरूक कर रही हैं. कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों और कार्यशालाओं के माध्यम से इन वनस्पतियों के ़फायदों के बारे में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. दवाओं में प्रयोग होने वाले पौधे स्वच्छ वातावरण में पनपते हैं, परंतु हाल के अध्ययनों से पता चला है कि इन पौधों की कुछ प्रजातियों पर जलवायु परिवर्तन के कारण नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिन्हें संरक्षण की सख्त ज़रूरत है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन एवं उद्योग जगत को आगे आने की आवश्यकता है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि इससे होने वाले फायदों में स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व बराबर का हो. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की तीन चौथाई आबादी आधुनिक तकनीक से तैयार दवाएं खरीदने में अक्षम है और उसे ऐसे ही पौधों से बनने वाली परंपरागत दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. वर्षों से शोध और निष्कर्ष के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन इन्हीं जड़ी-बूटियों से तैयार दवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि इनकी क़ीमत का़फी कम होती है और ये सबकी पहुंच में भी हैं. (चरखा)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/treasure-of-drugs-in-himalayas.html

इंडिया इन ट्रांजशिनः प्रौद्योगिकी मानव के इरादों को बुलंद करती है

अपने पर्यावरण की देशीय प्रकृति का ज्ञान संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण के प्रबंधन, भूमि संबंधी अधिकारों के आवंटन और अन्य समुदायों के साथ राजनयिक संबंधों के लिए आवश्यक है. भौगोलिक सूचनाएं प्राप्त करना और उनका अभिलेखन समुदाय को चलाने के लिए एक आवश्यक तत्व है. इन सूचनाओं की प्रोसेसिंग और उसके आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेना समुदाय के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, भले ही वह कोई घुमंतू जनजाति हो या फिर भारत के आकार का कोई देश.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं.

आज भारत संक्रमण काल से गुज़र रहा है, ऐसी कई स्वतंत्र एजेंसियां हैं, जो अलग-अलग लक्ष्यों और उद्देश्यों को सामने रखकर देश के संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में लगी हैं. पर्यावरण संबंधी विनियामक एजेंटों के बढ़ते काम के बोझ के कारण कार्यविधियों की बहुलता हो गई है, जिसके फलस्वरूप आर्थिक विकास की दर कम हो गई है और सरकार की पारदर्शिता भी कम हो गई है. खास तौर पर भारत के पर्यावरण और वनों के संरक्षण के लिए भारी मात्रा में भौगौलिक सूचनाओं को प्रोसेस करने और विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक अनुमोदनों की आवश्यकता होगी. निर्णय समर्थन प्रणाली को भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के साथ समन्वित करके भारत के पर्यावरण संबंधी विनियमन में सुधार लाया जा सकता है. भौगोलिक सूचनाओं के विश्लेषण के लिए विकसित भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) नामक यह सूचना प्रबंधन प्रणाली विभिन्न डेटा सेटों को समन्वित करती है और उपयोगकर्ताओं को एक ऐसी क्षमता प्रदान करती है, जिसकी सहायता से विभिन्न मूल स्थानों के साथ देशीय डेटा सेटों के आरपार की विशेषताओं को विश्लेषित किया जा सकता है.

परंपरागत रूप में भौगोलिक सूचनाओं का संकलन क्षेत्रों के सर्वेक्षक दल द्वारा किया जाता था और उन्हें मानचित्र के भौतिक माध्यम में अभिलिखित किया जाता था. वृक्षों के आच्छादन, खेती-बाड़ी की ज़मीन और पहाड़ों एवं नदियों जैसे भौतिक लक्षणों से संबंधित भू-आच्छादन और सीमाओं एवं परिसीमाओं तक फैले हुए स्थलों के आभासी डेटा को भौगोलिक सूचना के रूप में जाना जाता है. पृथ्वी की सतह के बिंदुओं से संबंधित स्थलों के परिमापन संबंधी विज्ञान का सर्वेक्षण, मानचित्रण और इन सूचनाओं के साथ मानचित्र निर्मित करने के पूरक विज्ञान अध्ययन के प्राचीन क्षेत्र रहे हैं. सर्वेक्षक-दल भूमि के स्वामित्व की सीमाओं और भौतिक लक्षणों के परिमापन के काम में वर्षों का समय लगा सकते हैं और उच्च प्रशिक्षित मानचित्रक विस्तृत मानचित्रों के रूप में समस्त समुदायों की भौगोलिक सूचनाओं को अभिलेखित करेंगे. भौगोलिक सूचनाओं को एकत्र और अभिलेखित करने की भारत में लंबी परंपरा रही है. सबसे पहले और सबसे बड़ा भूमि सर्वेक्षण छठी सदी में शेरशाह सूरी ने भू-राजस्व के प्राक्कलन के लिए कराया था. मुगल बादशाह औरंगज़ेब और ब्रिटिश साम्राज्य ने भी सत्रहवीं सदी के अंत में लिखित अभिलेखों और क्षेत्रीय मानचित्रों की प्रणाली का उपयोग करते हुए अपनी अर्जित भूमि पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस काम को जारी रखा था. सूचनाओं के संकलन और विश्लेषण के लिए प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता होती है, ताकि इस डेटा को प्रोसेस कराया जा सके और ज़्यादातर लोगों को इस विधि की जानकारी से दूर रखा जा सके, लेकिन पिछली सदी में सेटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग के आविष्कार के बाद इस स्थिति में काफ़ी बदलाव आ गया है. भौगोलिक सूचनाओं के संकलन के लिए यह अब अनिवार्य उपकरण बन गया है. रिमोट सेंसिंग सुदूर से ही निष्क्रिय और सक्रिय विद्युत चुंबकीय विकिरण द्वारा वस्तुओं के अध्ययन की विद्या है, जिसने सर्वेक्षण के  तौर-तरीक़ों को स्वचालित कर दिया है और इस प्रकार के डेटा को संकलित करने में लगने वाले समय को भी कम कर दिया है. अभिकलनात्मक (कम्यूटेशनल) शक्ति में वृद्धि होने और उन्नत सॉफ़्टवेयर के विकास के कारण सरलता से लगाई जा सकने योग्य भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) के निर्माण को भी सहज बना दिया गया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा.

आज भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र में अनेक एजेंसियां हैं, जो रिमोट सेंसिंग डेटा के विभिन्न अनुप्रयोगों पर काम कर रही हैं. इन अनुप्रयोगों में सबसे प्रमुख है, प्रबंधन और संरक्षण की दृष्टि से पर्यावरण का अध्ययन. भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा देश के वन आवरण मानचित्रों का निर्माण किया जाता है और अन्य एजेंसियों द्वारा अपने हितों के संवर्धन के लिए मानचित्र बनाए या कमीशन किए जाते हैं. भौगोलिक सूचनाएं और पर्यावरणीय संरक्षण आपस में गुंथे हुए हैं. सीमाओं की पहचान और परिसीमन से उन क्षेत्रों या फिर सीमाओं पर पाबंदी लगाई जा सकती है या फिर उनमें प्रवेश मिल सकता है, जिनसे पारिस्थितिक सीमाओं या वन्य गतिविधियों को परिभाषित किया जा सकता है, जो पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए बहुत आवश्यक है. मानवीय गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव के नियंत्रण के लिए यह सूचना बहुत आवश्यक है, ताकि भारतीय पर्यावरण एवं वन (एमओईएफ) और विभिन्न राज्य वन विभाग जैसी पर्यावरणीय विनियामक एजेंसियों को इसे सुलभ कराया जा सके. इन एजेंसियों द्वारा लिए गए निर्णयों से हर रोज़ लाखों भारतीयों के जीवन और आजीविका पर असर पड़ता है. यह डेटा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जाता है और इन तमाम महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने के लिए इनका उपयोग किया जाता है, परंतु डेटाबेस बिखरा हुआ है. उच्चतम न्यायालय ने हाल में दिए गए अपने निर्णय में भारत की पर्यावरणीय सूचनाओं के डिजिटीकरण की ज़ोरदार शब्दों में वकालत की है और इस प्रकार इसकी आवश्यकता को स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है.

आदर्श रूप में पर्यावरणीय या वन संबंधी अनुमति के आवेदनों से प्राप्त देशीय डेटा की जीआईएस में तेज़ी से प्रविष्टि की जाएगी और फिर उसका मिलान वन आच्छादन, भूजल और संरक्षित क्षेत्रों से दूरी जैसे डेटाबेस से किया जाएगा. चूंकि सभी आवेदनों का डेटा उसी जीआईएस के अंदर निहित होगा, विशिष्ट क्षेत्र पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव का तेज़ी से अनुमान लगाया जा सकेगा. इस जीआईएस का उपयोग भूदेशीय निर्णय समर्थन प्रणाली (जीडीएसएस) के रूप में किया जा सकेगा, ताकि विनियामक एजेंसियां पारदर्शी, सटीक, पुनरुत्पादक और नीति संबंधी मज़बूत निर्णय लेने में उनकी मदद ले सकें. इस जीडीएसएस के बिना सरकारी एजेंसियों की पहुंच उन सर्वोत्तम उपलब्ध उपकरणों तक नहीं हो सकती, जो देश के क़ानून को लागू करने के लिए आवश्यक हैं. उदाहरण के लिए गोवा राज्य की विधानसभा की लोक लेखा समिति ने अवैध खनन का पता लगाने के लिए हाल में गूगल अर्थ के  उपलब्ध सैटेलाइट बिंबों का खुलकर उपयोग किया. एक दक्ष जीआईएस की सहायता से संबंधित डेटाबेस का मात्र मिलान करके ही फ्लेग्रेंट उल्लंघनों को स्वत: फ़्लैग किया जा सकेगा. ऐसे बहुत से मामले होंगे, जो अब तक सामने नहीं आ पाए होंगे. यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र द्वारा अनुरक्षित भूमि के उपयोग की निगरानी/कवर डायनेमिक्स वस्तुत: काम कर रहे जीडीएसएस का एक उदाहरण है. इस परियोजना का घोषित उद्देश्य यूरोपियन संघ की नीतियों एवं विधायिका की तैयारी, परिभाषा एवं कार्यान्वयन के समर्थन के लिए शहरी और क्षेत्रीय पर्यावरणों का मूल्यांकन, निगरानी, मॉडलिंग और विकास है. इसकी शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी. अमेरिकी वन सेवा भी जीडीएसएस के विभिन्न प्रयोजनों के लिए इसका उपयोग करती है. यह सेवा अपने इस नवीनतम उपकरण का उपयोग उन क्षेत्रों को चिन्हित करने के लिए करती है, जो सतही पेयजल की आपूर्ति करते हैं और जिन पर विकास के कारण ख़तरे मंडरा रहे हैं. जीडीएसएस से प्राप्त सूचना को उसके बाद वन कार्य योजनाओं में शामिल किया जा सकेगा या उसका उपयोग अन्य निर्णय संबंधी उपकरणों के लिए किया जा सकेगा.

इस (जीडीएसएस) का निर्माण एक तकनीकी और प्रौद्योगिकीय चुनौती होगी और इसका विकास गूगल या पैलेडिन जैसी निजी एजेंसियों द्वारा किया जा सकेगा, जो इस प्रकार के उद्यम स्तर के सॉफ़्टवेयर के डिज़ाइन और उत्पादन की प्रामाणिक तौर पर विशेषज्ञ हैं. राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईएस), राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी (एनआरएसए) जैसी भारत सरकार की एजेंसियां और विभिन्न सरकारी अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (एसएसी) भी इस प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं. वैकल्पिक उत्पादन प्रक्रिया ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर के विकास के द्वारा हो सकती है. बीते सितंबर माह में आयोजित अमेरिकी-रूसी सरकार का कोड-ए-थोन इस प्रक्रिया का एक उदाहरण है, जिसमें प्रोग्रामरों के दलों ने बेहतर शासन के लिए सूचना प्रणालियां निर्मित करने के लिए आपस में प्रतियोगिता की थी. व्यापक पर्यावरणीय जीडीएसएस निर्मित करने के लिए अपेक्षित प्रौद्योगिकी विद्यमान हैं, जिनके कार्यान्वयन से भारत में पर्यावरणीय विनियामक प्राधिकरणों की क्षमता बढ़ेगी और उनके इरादे बुलंद होंगे. आशा है, इससे भारत के पर्यावरण और वनों का बेहतर ढंग से संरक्षण होगा.

हिंदी अनुवाद : विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार.

(लेखक पर्यावरण के स्वतंत्र अनुसंधानकर्ता एवं मानचित्रकार हैं.) 

 

साभार- चौथिदुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/india-in-tronjshin-technology-has-elevated-human-motives.html

अवैध खनन : सरकार एजेंट की भूमिका निभा रही है

देश में अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है. राजनेताओं के संरक्षण और अ़फसरों की मिलीभगत से खनन मा़फिया देश के खनिज बहुल राज्यों में प्राकृतिक खनिजों को लूटने में जुटे हैं. अ़फसोस की बात तो यह है कि लोकतांत्रिक देश की सरकार और जनप्रतिनिधि जनहित को ताक़ पर रखकर पूंजीपतियों के एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं. कर्नाटक के लोकायुक्त एन संतोष हेग़डे की अवैध खनन मामले में आई रिपोर्ट भी इस अवैध कारोबार में सरकार और जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता को साबित करती है. अवैध खनन के कारोबार में कांग्रेस और भाजपा नेताओं का गठजो़ड रहा है. संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के साथ ही पिछले दस साल में कर्नाटक की कांग्रेस, जनतादल सेक्युलर और भाजपा की सभी सरकारों को दोषी क़रार दिया गया है. हालांकि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा विदेश मंत्री एस एम कृष्णा का कहना है कि उनके कार्यकाल में खनन का कोई लाइसेंस नहीं दिया गया. लोकायुक्त कोर्ट के विशेष न्यायाधीश एन के सुधींद्र राव द्वारा अवैध खनन मामले में उनकी जांच के आदेश दिए जाने के बाद उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए मैंने खान एवं भूगर्भ विभाग अपने पास कभी नहीं रखा.

पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी.

बंगलुरु के व्यापारी टी जे अब्राहम ने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि एस एम कृष्णा, धर्म सिंह और एच डी कुमारस्वामी के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में अवैध खनन हुआ, जिसे उन्होंने नहीं रोका. याचिका में 11 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है. एस एम कृष्णा 11 अक्टूबर, 1999 से 28 मई, 2004 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर गठबंधन की सरकार में एन धर्म सिंह 28 मई, 2004 से 28 जनवरी, 2006 तक मुख्यमंत्री रहे. जबकि इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी और जनता दल सेक्युलर गठजो़ड की सरकार में एच डी कुमारस्वामी 2 फरवरी, 2006 से 8 अक्टूबर, 2007 तक मुख्यमंत्री रहे. एन धर्म सिंह इस समय उत्तरी कर्नाटक के बिदर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं, जबकि कुमारस्वामी बंगलुरु के समीप रामनगरम से सांसद हैं. रिपोर्ट में मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा और कई अन्य मंत्रियों को दोषी ठहराया गया, जिनमें पूर्व मंत्री कट्टा सुब्रमन्या नायडू, एस एन शेट्टी और मौजूदा गृह मंत्री आर अशोका, उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी एवं गृह निर्माण मंत्री वी सोमाना शामिल हैं. इससे जहां भाजपा की खासी किरकिरी हुई, वहीं येदियुरप्पा को अपनी कुर्सी भी गंवानी प़डी. कर्नाटक में लोकायुक्त की जांच के  घेरे में आने वाले सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है. विधानसभा अध्यक्ष के जी बोपैया के खिला़फ भी धन का दुरुपयोग करने के मामले में जांच शुरू हो चुकी है. हाल में केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने आंध्र प्रदेश की भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी वाई श्रीलक्ष्मी को जेल भेज दिया. उन पर आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की सरकार के कार्यकाल में खनन विभाग की सचिव रहते हुए रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम कंपनी को लाइसेंस देने में पक्षपात करने का आरोप है. खनन माफिया, अ़फसरों और नेताओं का गठजोड़ चांदी कूटने के साथ ही सरकारी खज़ाने को अरबों का चूना भी लगा रहा है. कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेग़डे की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006-2010 के बीच राज्य से क़रीब तीन करो़ड टन अवैध लौह अयस्क का खनन किया गया. इससे देश को क़रीब 16,200 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ. वहीं गोवा में 12,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है. पिछले पांच वर्षों में राज्य में 1.42 करो़ड टन अवैध खनन हुआ. राज्य का खनन विभाग मुख्यमंत्री दिगंबर कामत के पास है. यहां से सालाना 5.4 करो़ड टन लौह अयस्क का निर्यात होता है.

पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी. पिछले दिनों लीक हुई इस रिपोर्ट में राज्य में ब़डे खनन घोटाले का ज़िक्र किया गया था. उड़ीसा में देश का लगभग एक तिहाई लौह अयस्क भंडार है. यहां की 243 खदानों में वर्ष 2009 से खनन बंद है. अकेले उड़ीसा में अवैध खनन से सरकारी खज़ाने को तीन लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो चुका है. सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक़, अवैध खनन के कारण पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में क़रीब 1500 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी एक रिपोर्ट में अवैध खनन के मामले में राज्य के खनन मंत्री राजेंद्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को ज़िम्मेदार ठहराया है, जबकि दोनों ही मंत्रियों ने इन आरोपों को ग़लत बताया है. छत्तीसग़ढ में 700 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़, झारखंड में अवैध खनन से सरकार को सालाना 600 करो़ड रुपये का ऩुकसान होता है. यहां के पूर्व मुख्यमंत्री मधु को़डा पर भी अवैध खनन में शामिल होने के आरोप लगे हैं. राजस्थान में पिछले पांच वर्षों में सरकार को 150 करो़ड रुपये के राजस्व का नुक़सान हुआ है.

खनन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि देश में अवैध खनन का कारोबार फल-फूल रहा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006 से 2010 तक देश भर में अवैध खनन के एक लाख 61 हज़ार 140 मामले सामने आए. इनमें सर्वाधिक 39670 मामले अकेले आंध्र प्रदेश के थे. इसके बाद गुजरात में 24936 मामले दर्ज किए गए. महाराष्ट्र में 22885, मध्य प्रदेश में 17397, कर्नाटक में 12191, राजस्थान में 11513, केरल में 8204, छत्तीसगढ़ में 7402, तमिलनाडु में 5191, हरियाणा में 3897, हिमाचल प्रदेश में 2095, गोवा में 492, झारखंड में 953 और पश्चिम बंगाल में 901 मामले सामने आए. अ़फसोस की बात यह है कि कई राज्यों में तो अवैध खनन के मामलों में प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हुई है. देश भर में स़िर्फ 44 हज़ार 445 मामलों में ही कार्रवाई हुई. आंध्र प्रदेश में कोई भी मामला अदालत तक नहीं पहुंच पाया, जबकि छत्तीसग़ढ में 2383, गुजरात में आठ, हरियाणा में 138, हिमाचल प्रदेश में 711, झारखंड में 39, कर्नाटक में 771, मध्य प्रदेश में 16157, महाराष्ट्र में 13, उड़ीसा में 86, राजस्थान में 59, तमिलनाडु में 421 और बंगाल में 91 मामले अदालत में गए. गुजरात में 158 मामले पुलिस में दर्ज किए गए, जबकि हरियाणा में 103, झारखंड में 205, कर्नाटक में 959, मध्य प्रदेश में पांच, महाराष्ट्र में 20197, उड़ीसा में 57, राजस्थान में 607, तमिलनाडु में 579 और पश्चिम बंगाल में 974 मामले पुलिस तक पहुंचे.

देश के विभिन्न राज्यों में कोयला, एल्यूमिनियम, अभ्रक, तांबा और मैगनीज आदि क़ीमती खनिजों का भंडार है. सुप्रीमकोर्ट की सख्त हिदायतों के बावजूद अवैध खनन पर रोक नहीं लग पा रही है. अवैध खनन के कारण पर्यावरण को खतरा पैदा हो गया है. पश्चिम बंगाल के रानीगंज, आसनसोल और झारखंड के झरिया का उदाहरण सबके सामने है. अवैध खनन के कारण यहां का एक ब़डा क्षेत्र कभी भी भयानक रूप ले सकता है, क्योंकि यहां ज़मीन के भीतर आग दहक रही है. यहां ज़मीन में प़डी दरारों से आग की लपटें निकलती हैं. यहां का क़ीमती कोयला हर पल राख के ढेर में बदल रहा है. काग़ज़ों में तो यहां की कई खदानें बदं प़डी हैं, लेकिन कोयला माफियाओं के लिए यहां आज भी काम बदस्तूर जारी है. अवैध खनन के कारण जहां मज़दूरों की जान खतरे में रहती है, वहीं अत्यधिक खनन से खनिजों के भंडार भी खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं, मगर राजनीतिज्ञों के संरक्षण के कारण यह धंधा बिना रोक-टोक के चल रहा है. इस धंधे ने लोगों को स़डक से उठाकर मंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया है. जनार्दन रेड्डी को ही लीजिए. सामान्य हेड कांस्टेबल चेंगा रेड्डी के घर में पैदा हुए जनार्दन रेड्डी ने 1995 में बेल्लारी में चिटफंड कंपनी खोली, लेकिन तीन साल बाद ही खुद को दिवालिया घोषित करके उसे बंद कर दिया. इसके बाद उन्होंने होटल और मीडिया बिजनेस शुरू किया, वहां भी उन्हें घाटा उठाना प़डा, लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव के व़क्त उनके दिन बदल गए. सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज के  बीच चुनावी म़ुकाबले में उन्होंने सुषमा स्वराज के लिए काम किया. सुषमा स्वराज को भले ही हार का मुंह देखना प़डा हो, लेकिन रेड्डी बंधुओं का भला हो गया. सियासत में आते ही उन्होंने खनन उद्योग में क़दम रखा और अवैध खनन के चलते वे दौलतमंद होते चले गए. जनार्दन रेड्डी और उनके साले श्रीनिवास रेड्डी ने राजनीतिज्ञों से संबंधों के कारण कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पैर जमा लिए. हालत यह हो गई कि उन्होंने बेल्लारी की लोहे की खानों को खाली कर डाला. कर्नाटक में अवैध खनन पर जारी लोकायुक्त की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2009-10 में ही रेड्डी बंधुओं ने 4635 करोड़ रुपये का अवैध खनन किया. रेड्डी बंधु भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं और जी जनार्दन रेड्डी के अलावा उनके भाई जी करुणाकर रेड्डी कर्नाटक की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. आंध्र प्रदेश के  पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का भी उन्हें संरक्षण हासिल था. यह रेड्डी बंधुओं का प्रभाव ही था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2009 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन के रोसैया सरकार द्वारा अनंतपुर ज़िले में अवैध खनन और धांधली के आरोप में रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के खिला़फ मामला दर्ज कराने के बावजूद सीबीआई ने उनके खिला़फ कार्रवाई करने में देर की. इसमें कोई दो राय नहीं कि सर्वदलीय सहमति और केंद्रीय खनन मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय खनन ब्यूरो और सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत के बग़ैर इतना ब़डा अवैध खनन का कारोबार चल ही नहीं सकता. केंद्र सरकार की नीतियों ने भी अवैध खनन को ब़ढावा देने का काम किया. 1993 में केंद्र की नरसिम्हाराव सरकार ने खनन को निजी और विदेशी पूंजी के हवाला कर दिया. नतीजतन, पोस्को से लेकर वेदांता जैसी कंपनियां भी क़ीमती खनिजों की लूट में शामिल हो गईं.

सिद्धांतों का ढोल पीटने वाली भाजपा ने भी अवैध खनन को का़फी ब़ढावा दिया. भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखंड में गंगा में अवैध खनन जारी है. इसके खिला़फ आमरण अनशन पर बैठे स्वामी निगमानंद की कथित हत्या के बाद भी सरकार खनन पर रोक नहीं लगा पाई. स्वामी निगमानंद के गुरु शिवानंद का आरोप है कि खनन माफिया पार्टी फंड के लिए चंदे के रूप में एक मोटी रक़म देता है, इसलिए भाजपा सरकार ने उसे खनन की खुली छूट दे रखी है. अवैध खनन से जहां सरकारी खज़ाने को ऩुकसान होता है, वहीं इससे सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश पर भी विपरीत असर प़डता है. आदिवासियों से उनकी पैतृक ज़मीन छीनी जा रही है. आदिवासियों को अपनी पुश्तैनी जगह छो़डकर दूरदराज के इलाक़ों में पलायन करना प़ड रहा है. इससे उनके सामने रोज़गार का संकट पैदा हो गया है, उनकी सांस्कृतिक पहचान, उनके रीति-रिवाज भी खत्म होते जा रहे हैं. विकास के लिए खनन ज़रूरी है, लेकिन सुधार के नाम पर किए जा रहे अति खनन यानी अवैध खनन के दूरगामी नतीजे अच्छे नहीं होंगे. सरकार को चाहिए कि वह जनहित के मद्देनज़र अवैध खनन पर रोक लगाए, वरना वह दिन दूर नहीं, जब खानों से खनिजों के भंडार समय से पहले खत्म हो जाएंगे.

अवैध खनन रोकने की सरकारी क़वायद

अवैध खनन रोकने की क़वायद का दावा करते हुए इसी साल सितंबर माह में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है. इसमें प्रावधान है कि कोयला खनन कंपनियों को हर साल अपने शुद्ध लाभ का 26 फीसदी और अन्य खनिज कंपनियों को रॉयल्टी के बराबर धनराशि ज़िलास्तरीय खनिज न्यास को देनी होगी. इस रक़म का इस्तेमाल स्थानीय लोगों के विकास के लिए किया जाएगा. केंद्रीय खान मंत्री दिनशा पटेल का कहना है कि खनन से पहले प्रभावित होने वाले लोगों से बात करना अनिवार्य होगा. अवैध खनन से संबंधित मामलों के निपटारे के लिए राज्य स्तर पर विशेष अदालतें स्थापित करने का प्रावधान किया गया है. देश के 60 ऐसे ज़िलों में राष्ट्रीय खनन नियामक प्राधिकरण और राष्ट्रीय खनिज ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे, जहां खनिज संसाधन काफ़ी प्रचुर मात्रा में हैं. इस विधेयक के आने से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी 4500 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,500 करोड़ रुपये हो जाएगी. विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि खनन कंपनियों को राज्य सरकार को कुल रॉयल्टी पर 10 फीसदी और केंद्र सरकार को 2.5 फीसदी का उपकर जमा करना होगा. सरकार का दावा है कि इस विधेयक में अवैध खनन रोकने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं. आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखकर ही इसे तैयार किया गया. इसके तहत कोयला कंपनियों के शुद्ध लाभ का 26 फीसदी हिस्सा प्रभावित लोगों के विकास के लिए खर्च किया जाएगा. यह विधेयक खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम 1957 की जगह लेगा.

 साभार- चौथि दुनिया

वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.

समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

पृष्ठभूमि

जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.

परिवर्तन की पहली लहर

पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.

यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.

वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन

यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.

इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.

दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.

स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.

स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.

तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.

चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.

इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.

कार्यान्वयन की चुनौतियां

आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.

उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.

इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.

एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.

निष्कर्ष

वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.

आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.

– प्रांजुल भंडारी

(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html

किस बात की चेतावनी दे रहा है कोहरा? उफ, ये कोहरा!

पिछले का़फी समय से मौसम का मिज़ाज लगातार बदल रहा है. पृथ्वी के किसी क्षेत्र में बहुत अधिक बाढ़ आ रही है, कहीं बहुत अधिक तू़फान आ रहे हैं, तो कहीं बहुत अधिक ठंड व गर्मी पड़ने लगी है. भारत में भी यह असर बाढ़, सूखे व ठंड में तीव्रता के रूप में देखा जा सकता है. उत्तरी भाग में सबसे अधिक तीक्ष्ण प्रभाव यहां की कष्टप्रद सर्दी है. दिसंबर शुरू होते ही उत्तर भारत के अनेक राज्य घने कोहरे से ग्रस्त होने लगते हैं. इस बीच यदि बारिश हो जाए तो यह प्रभाव और अधिक व तीव्र हो जाता है. पंजाब व हरियाणा से इसकी शुरुआत होने के बाद यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, राजस्थान के अलावा हिमाचल, उत्तराखंड राज्यों में कहीं पूर्ण तो कहीं आंशिक रूप से छाने लगता है. कोहरे का यह प्रभाव विभिन्न स्थानों पर 25 से 45 दिनों तक रहता है. जनवरी की समाप्ति के साथ इसका प्रभाव कम होने लगता है. कोहरे का यह असर भारत के अलावा निकटवर्ती देशों पाकिस्तान व नेपाल की तराई में समान रूप से दिखता है.

पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

कोहरा कई समस्याओं को लेकर आता है. कोहरा न छंटने का जनजीवन पर चौतऱफा प्रभाव प़डता है. परिवहन तंत्र से लेकर कृषि, बाग़वानी पर तो असर होता ही है. साथ ही इससे आर्थिक गतिविधियां भी बुरी तरह से प्रभावित होती हैं.

यूं कहें कि कोहरे का सबसे ज़्यादा प्रभाव परिवहन तंत्र पर पड़ता है तो ग़लत न होगा. इससे हवाई, रेल व स़डक परिवहन पटरी से पूरी तरह उतर जाता है. रनवे पर दृश्यता में कमी से उत्तर भारत के ज़्यादातर हवाई अड्डों तथा दिल्ली, लखनऊ, अमृतसर, चंडीगढ़, इलाहाबाद के अलावा पटना तक आने जाने वाली अनेक उड़ानें या तो देरी से चलती हैं और कई बार इनको रद्द कर दिया जाता है. रेल परिवहन के लिए कोहरा सबसे बड़ी समस्या होता है. इससे सैकड़ों रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती हैं और अनेक रेलगाडि़यां कई-कई घंटे देरी से चलती हैं. कोहरे का असर सड़क परिवहन पर भी होता है. इसकी गति कम हो जाती है. स़डक दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जाते हैं व घायल होते हैं.

कोहरे के कारण धूप न पहुंचने से फसल व सब्ज़ियों का उत्पादन भी प्रभावित होता है. प्रकृति के इस क़हर को उत्तर भारत की लगभग 30 करोड़ की आबादी एक से दो माह तक झेलती है. उत्तर भारत में 15 साल पूर्व जाड़े में यह असर सामान्य धुंध के रूप में ही नज़र आता था, लेकिन अब यह मानसून के आगमन जैसी नियमित प्रक्रिया बन चुकी है. कोहरे के बावजूद तापमान में कमी का रिकॉर्ड बनना भी आश्चर्यजनक है. दिल्ली, राजस्थान, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हर साल न्यूनतम तापमान के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. अब शून्य अंश तापमान पहाड़ के अतिरिक्त मैदान में रिकॉर्ड हो रहा है. मौसम में इस बदलाव को समझने के अभी तक बहुत ही कम प्रयास हुए हैं. वैज्ञानिक समुदाय अभी तक एक लघुकालिक मौसम परिवर्तन के रूप में देखता आया है. भारत में कोहरे को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं हैं. धुर पर्यावरणवादी विचारधारा के अनुसार, इसके लिए मानवीय हलचलें ही ज़िम्मेदार हैं, जो दुनिया भर में मौसम परिवर्तन का कारण हैं. उधर, मौसम वैज्ञानिक कई प्रकार के प्रभावों को इसका कारण बताते हैं, जबकि भूगोलविदों की नज़र में कोहरे के भौगोलिक कारण भी हो सकते हैं.

सामान्य रूप से कोहरा तब बनता है, जब वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प वायु के अणुओं पर जमता है. कोहरा कई प्रकार का होता है. किसी स्थान पर ठंडा होने का मतलब यह नहीं है कि वहां पर भी कोहरा लगे. कोहरे के लिए आर्द्रता और कम तापमान व वायुमंडलीय परिस्थितियां मैदानी क्षेत्र में शीतकाल में नवंबर से दिसंबर में बनने लगती हैं. कोहरे के बनने के अन्य कारक भी होते हैं, मसलन इस स्थान का तापमान, उच्च वायुमंडलीय दाब, आसमान का सा़फ होना, वायु का कम प्रवाह. वायु प्रवाह के कारण कोहरा कम लगता है. इसी प्रकार से आसमान में बादल होने या स्थान विशेष पर विक्षोभ बनने से भी वह नहीं लगता है.

कोहरा भले ही जिन कारणों से लगता हो, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उत्तर भारत में बड़ी संख्या में बनी सिंचाईं योजनाएं, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल होना व तटबंध उत्तर भारत में कोहरा लगने का एक कारण है, जिससे इस क्षेत्र विशेष में सापेक्ष आर्द्रता बहुत अधिक बढ़ जाती है. शीतकाल में तापमान के नीचे जाने से नमी का स्तर और भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वायुमंडलीय प्रदूषण व ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन के असर से कुहासे की समस्या पैदा हुई है, लेकिन पहले ऐसा क्यों न था या फिर अचानक नमी व प्रदूषण का स्तर क्या इतना बढ़ गया है? लेकिन मात्र यही कारण हैं, सब सहमत नहीं हैं. तब पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों इस प्रकार कोहरे के आच्छादन की समस्या क्यों नहीं आती है? जहां पर जाड़े के दिन पहले की बजाय अधिक खुशगवार मौसम मिलता है. हालांकि इसका एक कारण वह हिमालय की ऊंची चोटियों व लघु चोटियों के बीच ग्रीन हाऊस गैसों को बताते हैं, जो अब यहां पर इस असर को पैदा करती हैं, जबकि इसके सापेक्ष मैदान में ऐसा प्रभाव नहीं बन पाता है.

लेकिन कोहरा छाने व भीषण सर्दी के पीछे आखिर कौन से और कारण हो सकते हैं, वैज्ञानिक अभी भी अनुमान ही लगा पाए हैं. भारत में कोहरे की घटना विश्वव्यापी मौसम परिवर्तन का हिस्सा नहीं है, इसे नकारा नहीं जा सकता है. यदि यह विश्व के मौसम में बदलाव के कारण हो रहा है तो इन सारे कारकों पर प्रकाश डालना ज़रूरी होगा जो, इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं. ये सभी कारण वैज्ञानिक अध्ययनों पर ही आधारित हैं, जिन्हें यदि ये सही नहीं हैं तो इनको ग़लत भी नहीं कहा जा सकता है. मौसम वैज्ञानिक, भूगोलवेत्ता, भूभौतिकविद मौसमी बदलाव को विश्व संदर्भ में अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते रहे हैं. पर्यावरण वैज्ञानिक मौसमी बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मानते हैं और तापमान में वृद्धि के कारण दुनिया में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों की भविष्यवाणियां करते रहते हैं, मसलन इनकी एक भविष्यवाणी कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के प्रभाव से 2050 तक समुद्र के किनारों पर बसे कई शहर जलमग्न हो जाएंगे, सत्य लगती है. आज विश्व के उत्तर व दक्षिण धु्रव व ऊंचे पहाड़ों पर सुरक्षित ब़र्फ के भंडार बड़ी तेज़ी से पिघल रहे हैं, फलस्वरूप सागर के जलस्तर में वृद्धि हो रही है.

भूगोल व मौसमवेत्ता विश्वव्यापी मौसमी बदलाव को कुछ खास प्रभावों की देन मानते हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून के चक्र में परिवर्तन हो या अमेरिका में आए विनाशकारी तू़फान या बाढ़ हो, या अफ्रीका में सूखा या ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के लिए अल-निनो प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जो हर 4-5 सालों में दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर में उभरता है और 12 से 18 माह की अवधि के बाद समाप्त हो जाता है. अल-निनो भूमध्य रेखा के इर्दगिर्द प्रशांत महासागर के जल के इस दौरान 2 से.ग्रे. तक गर्म होने की घटना है. इसे सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में पेरू के मछुआरों ने महसूस किया और इसे अल-निनो नाम दिया गया. प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म होने के असर के कारण पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है और आए दिन इसकी चर्चा होती रहती है, लेकिन ठीक इसके उलट दूसरी घटना ला-निना है, जिसके असर के चलते समुद्र की सतह ठंडी हो जाती है और इसके कारण भी मौसम बदलाव की बात होती है. यह प्रभाव भी प्रशांत महासागर में महसूस किया जाता रहा है. भारत, पाकिस्तान व नेपाल में लगने वाले कोहरे को कुछ मौसम वैज्ञानिक इसकी देन बताते हैं, जिस कारण इस क्षेत्र विषेश के ऊपर नम हवाएं बहने लगती हैं और कोहरे को जन्म देती हैं.

विश्वव्यापी मौसमी बदलाव के बारे में कुछ भूगोलविद् टेक्टोनिक प्लेटों का खिसकना भी बताते हैं. इसी तरह कुछ का मानना है कि पृथ्वी के घूमने का अक्ष 41 हज़ार सालों में 21.2 से 24.5 अंश के कोण के मध्य रहता है. इससे सूर्य के प्रकाश की तीव्रता प्रभावित होती है. उधर, अंतरिक्ष व भूभौतिकविद् पृथ्वी पर मौसमी बदलाव को सूर्य पर चक्रीय आधार पर होने वाले सन स्पॉट से जोड़कर देखते हैं, जिससे पृथ्वी की जलवायु प्रभावित होती है. इनके कारण सूर्य की सतह पर तापक्रम बदलता रहता है. समय-समय पर इसकी सतह पर परिवर्तन होता रहता है. इसी प्रकार सौर सक्रियता को भी पृथ्वी में मौसमी परिवर्तन से जोड़कर देखा जाने लगा है. 8 से 11 साल बाद प्रकट होने वाली सौर सक्रियता के दौरान सूर्य में बढ़ी हलचल से सूर्य से उत्पन्न होने वाले विकीरणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर प्रभावित होता है जो अंतरिक्ष से आने वाले विकिरणों को पृथ्वी तक आने से रोकता है. भारत में कोहरे पर मौसम वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि कहीं यह वायुमंडल में मात्र प्रदूषणकारी मुख्य गैसों यथा सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड व अन्य ग्रीन हाऊस गैसों के कारण तो नहीं होता है और कोहरे के घनेपन का इसका क्या संबंध है.

भू-गर्भवेत्ताओं की नज़र में हिमयुग वापस लौटने को है, जो एक समयबद्ध घटना है. यद्यपि इसके आने में अभी 1500 साल हैं, लेकिन कुछ इसके समय को लेकर असहमत हैं. अमेरिका व यूरोप में इस साल की सर्दी हिमयुग की विचारधारा पर सोचने को मजबूर करती है, किंतु इसका अध्ययन किए बग़ैर ऐसा यक़ीनन नहीं कहा जा सकता है कि विश्व हिमयुग की दहलीज़ पर है.

कोहरे व ठंड की मार आज एक तरह की आपदा का रूप ले चुकी है. कोहरे की मार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी जन-धन का नुक़सान होता है. इसलिए सूखे, समुद्री तू़फान, भूकंप, भू-स्खलन या बाढ़ की तरह ही कोहरे से जन-धन के नुक़सान के आकलन की आवश्यकता महसूस होने लगी है. लोगों को यह याद होगा कि दिसंबर 02 व जनवरी 03 की कोहरे भरी सर्दी से उत्तर भारत के राज्यों में 1500 लोगों की मौत हुई थी. 2004-05 में यह आंकड़ा लगभग 800 रहा था. 2008 में दिसंबर से जनवरी में यह आंकड़ा लगभग 600 के आसपास रहा. 2008 से जनवरी के बीच में हालांकि यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन 2011 के साल में अब तक उत्तर प्रदेश में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि कोहरे, कोहरा जन्य दुर्घटनाओं को मिलाकर देश में यह संख्या 250 तक रही. अब 2011 की सर्दियां दर पर हैं और फिर से उत्तर भारत में कोहरा असर दिखाने लगा है.

बहरहाल, पृथ्वी का मौसम एक बेहद जटिल प्रणाली है. जिस प्रकार से भारत में मानूसन को समझा गया है, उसी तरह के प्रयास कोहरे की घटना को समझने के लिए करने होंगे. हालांकि इसके अध्ययन से तात्कालिक कोई समाधान तो नहीं निकल सकता है, लेकिन इससे कम से कम इन कारणों का तो खुलासा हो सकता है जो आम आदमी के मन पर पिछले कई सालों से छाए हैं कि 15 साल पहले उत्तर भारत में कोहरा वास्तव में क्यों नहीं बनता था. यदि यह मानवजन्य है तो कालांतर में हमें इससे बचने के उपाय करने ही होंगे.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/what-is-warning-of-the-fog-no-these-fog.html


 

शेखावाटीः चलें गांव की ओर

राजस्थान के झुंझनू का कठराथल गांव, दूर तक नज़र आते लहलहाते खेत, चरते पशु और रंग-बिरंगे पक्षी, कच्ची पगडंडियों के किनारे बने मिट्टी और घास-फूंस के छोटे-ब़डे घर, सौंधी खुशबू वाली आबोहवा और प्रकृति के प्रेम से सराबोर वातारण. इन सबके बीच सुशीला देवी और कान सिंह का घर किसी चित्रकार की कल्पना-सा प्रतीत होता है. घर की दीवारों पर सुंदर रंग-बिरंगी राजस्थानी चित्रकारी बरबस आकर्षित करती है. घर की मुंडेर पर गमलों की कतार और घर के पीछे फैले खलिहान, गांव में सैर के लिए बथान में बंधे घोड़े और सुरक्षा के लिए दो ब़डे पालतू कुत्ते. इन सबमें खास यहां का प्राकृतिक फ्रिज जिसे ज़मीन में ही गड्ढा कर ईंट की दीवार बनाकर छर्रे और मिट्टी से तैयार किया गया है. घर के कमरे जहां बाहर से मिट्टी के हैं, वहीं अंदर आराम का पूरा साजो-सामान है, सोफा, बैड, डायनिंग टेबल और ज़मीन पर बिछी क़ालीन. यहां सुकून का खास इंतज़ाम है. घर के आंगन में झूला खूबसूरती में चार चांद लगाता है. यह घर किसी पेंटिंग का सजीव चित्रण लगता है. यह घर ग्रामीण पर्यटन के लोकप्रिय ठिकानों में से है. इस क्षेत्र से पिछले चार सालों से ज़ुडी सुशीला देवी और उनके परिवार की ज़िंदगी ग्रामीण पर्यटन ने बदल दी है. पहले उनके पास खेतीबा़डी के अलावा कोई और काम नहीं था. प़ढे-लिखे उनके दोनों बेटों का खेती में जी नहीं लगता था. वे शहर जाकर काम करना चाहते थे, दुनिया देखना चाहते थे, लेकिन अब दुनिया चलकर उनके पास आती है. मोरारका फाउंडेशन ने गांव में ही रहकर नए प्रकार के काम करने का आइडिया दिया, जो बच्चों को भी पसंद आया और उन्हें भी. शुरू में घर छोटा होने, सीमित संसाधन होने की वजह से समस्या भी आई, पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया. सुशीला देवी के बच्चे अब फाउंडेशन द्वारा दी गई ट्रेनिंग की बदौलत फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और घर आए मेहमानों को इलाक़े की सैर करवाते हैं, वहां के कला-साहित्य और दूसरी लोक कृतियों से परिचित करवाते हैं. विदेशियों के साथ संचार की कोई समस्या नहीं रह गई. विदेशी पर्यटकों को और क्या चाहिए था. घर की महिला के हाथों से बना शुद्ध पारंपरिक भोजन वह भी पारंपरिक तरीक़े से. सुशीला देवी कहती हैं कि देशी पर्यटकों में ग्रामीण पर्यटन को सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है. वे ब़ुजुर्ग और नौजवान जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा है या फिर अपने गांव को छो़डकर मजबूरन शहर चले गए हैं, वे इसे ज़्यादा पसंद करते हैं. इसके अलावा हनीमून जो़डे और शहर में रहने वाले परिवार भी खूब चाव से यहां ठहरते हैं.

क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के यहां तीन दिनों के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख-समझ कर गए.

मेहमानों को अपनी संस्कृति को अधिक क़रीब से दिखाने के लिए सुशीला देवी घर पर ही मेहंदी प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, लोक नृत्य, कठपुतली का खेल और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं. सुशीला देवी को इस बात पर गर्व होता है कि विदेश से आने वाले लोग उन्हें सुपरवुमैन कहते हैं, क्योंकि वे सुशीला देवी के ब़डे परिवार का प्रबंधन देखकर आश्चर्य में प़ड जाते हैं. यही नहीं सुशीला देवी से मेहमान भारतीय मेहमान नवाज़ी, पशुओं का दूध का़ढना, चारा देना और खेतों पर काम करने जैसा सुखद अनुभव भी लेकर जाते हैं. लेकिन सुशीला देवी और उन जैसे ग्रामीण पर्यटन को ब़ढावा देने वाले किसान परिवारों के लिए यह सब आसान नहीं था. ग्रामीण पर्यटन के लिए गांव वालों के सामने कुछ खास चुनौतियां थीं, जैसे प्रशिक्षित लोगों की कमी, आर्थिक तंगी, लोगों में उत्साह की कमी, ग्रामीण परिवेश की वजह से लोगों का अल्प विकास, सहभागिता की कमी, बिजनेस प्लानिंग क्षमता की कमी, भाषाई समस्या, बुनियादी शिक्षा की कमी, संचार का माध्यम, प्रशिक्षित टूरिस्ट गाइड. लेकिन मोरारका फाउंडेशन ने स्थानीय लोगों और उनके पूरे परिवार को खास ट्रेनिंग दी, जिसकी वजह से सारी चुनौतियां खत्म हो गईं. ग्रामीण पर्यटन को राजस्थान में 500 से ज़्यादा चिन्हित परिवारों से जो़डकर मोरारका फाउंडेशन ने यहां की सभ्यता और संस्कृति को विश्व पटल पर उकेरने में ब़डी भूमिका निभाई है. पर्यावरण हित को ध्यान में रखते हुए प्रकृतिजन्य पर्यटन का विकास करवाया है. ग्रामीण समुदायों को पर्यटन का हिस्सा बनाकर उनके आर्थिक और शैक्षिक स्तर का विकास करवाया है, जिससे ग्रामीणों के शहरों की तऱफ पलायन में कमी आ सके. का़फी वक़्त से ग्रामीणों की स्थिति खराब होती जा रही थी. इसका मुख्य कारण था कृषि की उपेक्षा, इसके प्रति लापरवाही, इसे किसी अन्य व्यवसाय के मुक़ाबले कम आंकना और युवाओं का इससे न जु़डना. इसी समस्या को दूर करने का उपाय मोरारका फाउंडेशन ने खोज निकाला फार्म पर्यटन के ज़रिए. क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के तीन दिन के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख और समझ कर गए. फार्म पर्यटन पर आए फ्रांस के 21 लोगों को बिडोदी के किसान मनोज शर्मा के यहां दो दिन के लिए ठहरना भारत से विशेष लगाव का अहसास दे गया. शेखावाटी में किसानों को पर्यटकों के स्वागत के लिए खासतौर से तैयार किया गया, ताकि वे पर्यटकों के साथ अच्छी तरह संबंध बना सकें और उन्हें ठहरने के दौरान कोई परेशानी न आए. शेखावाटी क्षेत्र में मीलों का बास के हरीराम मील ने साल भर में 16 फ्रांसीसी मूल के पर्यटकों को ठहराया, तो बीदासर के किसान नेकीराम गोदारा ने कजाकिस्तान से आए दो पर्यटकों और फ्रांस से आए 16 पर्यटकों की दो दिन तक खातिरदारी की. वाहिपुरा के कृष्ण सिंह शेखावत ने 11 और कल्याणपुरा के रामअवतार बुगालिया ने 19 फ्रांसीसी पर्यटकों को दो दिन में अपनी संस्कृति से रूबरू करा दिया. वहीं वाहिदपुरा के सुरेंद्र कुमार ने 4 स्विस पर्यटकों को दो दिन में ही गांव की आबोहवा का क़ायल बना दिया. पिछले कुछ सालों में हज़ारों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को गांवों में भ्रमण कर ग्रामीण जीवनशैली को नज़दीक से जानने, समझने, परखने का मौक़ा मिला है.

मोरारका फाउंडेशन ने ग्रामीण पर्यटन द्वारा सफलता की एक नई कहानी लिखी है. इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि चूंकि केवल पर्यटन से आजीविका कमाने के अवसर ब़ढ जाते हैं जिससे किसान लगातार पर्यटन के कार्य से जु़डकर कृषि जैसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण कार्य को छो़डने की भूल कर सकते हैं. इसी वजह से यहां फार्म पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. ग्रामीण पर्यटन से न केवल विकल्प रोज़गार के अवसर विकसित होते हैं, बल्कि कई तरह के फायदे होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि गांववालों को आजीविका का साधन मिल जाता है, खासकर ग्रामीण युवा को. इससे जीवन स्तर में सुधार आता है मसलन शिक्षा, सेहत का भी स्तर बेहतर हो जाता है. गांव में ज़मीन की क़ीमत ब़ढती है, व्यापारिक वस्तुओं और पब्लिक सेवाओं के दाम भी ब़ढते हैं. स्थानीय कारोबार जैसे क्षेत्रीय कला, ट्रांसपोर्ट और दुकानदारों इत्यादि को फायदा पहुंचता है. गांव के सीधे-सादे लोग विदेशों-शहरों के समझदार लोगों से बेवकू़फ न बन जाएं या फिर ब़डे शहरों और विदेशों से आने वाले लोगों से बातचीत कर सकें, इसके लिए गांव के लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता भी ब़ढी है.

शेखावाटी के गांवों के लोग ब़डे समझदार हैं. शहर से आने वाले लोगों से न केवल आय कमा रहे हैं, बल्कि जीने का सलीक़ा भी सीख लेते हैं. गांव के लोग स्वस्थ वातावरण के साथ स़फाई व्यवस्था, स़डक, बिजली, दूरसंचार के नए माध्यम और रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वाले आधुनिक उपकरण के इस्तेमाल और जीवन को सुलभ बनाने वाली तकनीकी चीज़ों से रूबरू होते हैं. इसके अलावा शहर से आए बुद्धिजीवियों से प्राकृतिक आवास, जैव-विविधता और ऐतिहासिक स्मारकों, धरोहरों का संरक्षण करने के नए उपायों के बारे में सीखते हैं और प्राकृतिक उद्यानों को सहेजने के प्रति जागरूक होते हैं. परंपराओं को सर आंखों पर रखने वाले गांव के ब़डे बुज़ुर्गों को यह चिंता थी कि ग्रामीण पर्यटन से ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति को क्षति पहुंच सकती है और गांव की युवा पी़ढी आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी संस्कृति से दूर हो जाएगी. मगर फाउंडेशन ने इस डर को दूर किया. फाउंडेशन ने सिखाया कि दरअसल गांव का परिवेश और परंपरागत चीज़ें ही उनके काम की शान हैं और इसे ब़ढावा दे सकती हैं. इस लिहाज़ से ब़ुजुर्गों का यह डर भी खत्म हो गया कि ग्रामीण पर्यटन के विकास से गांव के परंपरागत व्यापार और उद्योग, रोज़गार और माहौल पर ग़लत असर हो सकता है. मोरारका फाउंडेशन ग्रामीण पर्यटन के प्रति इतनी अधिक रुचि और लगन से कार्य करवा रहा है कि इस क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.

गाइड ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू कराते है

मीण पर्यटन एवं ऊंची-ऊंची हवेलियों की वजह से नवलग़ढ राजस्थान में जाना पहचाना नाम है. हर साल तक़रीबन 30,000 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्यटक न नवलग़ढ की खूबसूरत हवेलियों, मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों और जैविक खेती के प्रयासों को देखने समझने आ रहे हैं. यहां के गाइड इन भ्रमणीय स्थलों से पर्यटकों का जोडते हैं. यह गाइड पहले अप्रशिक्षित थे, कम प़ढे-लिखे थे. उनके पास समुचित विषयपरख जानकारी जुटाने का न तो कोई स्त्रोत था और न ही अवसर, इसलिए  गाइड सुनी-सुनाई जानकारियों को अनगढ़ तरीक़े से पर्यटकों को पेश करते थे, और पर्यटक मजबूरन उनकी सेवाएं लेते थे. उपेक्षा और सरकारी नियमों की आ़ड में उन्हें न तो कोई प्रशिक्षण दिया गया था और न ही कोई सुविधा मुहैया कराई गई थी. ऐसे में मोरारका फाउंडेशन ने आगे ब़ढकर स्थानीय नगर पालिका से बात करके इन अप्रशिक्षित गाइडों को विधिवत शिक्षण देना प्रारंभ किया, जिसके तहत स्थानीय हैरिटेज, होटल, स्मारक पर्यटन, व्यापार से जु़डे विशेषज्ञों की मदद से 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया. इसमें नवलग़ढ के सभी अप्रशिक्षित गाइड समुदाय ने हिस्सा लेकर और शिविर से जुड़कर नवलग़ढ के बारे में पर्यटन की दृष्टि से पूरी जानकारी प्राप्त की. यही नहीं पर्यटन से जु़डे अन्य आयामों के बारे में भी जाना. ट्रेनिंग पाकर खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे गाइड आबिद खान कहते हैं कि इस प्रशिक्षण से न केवल आत्म विश्वास ब़ढा, बल्कि हम अधिकार पूर्वक पर्यटन से जु़डे विषयों पर पर्यटकों को जानकारी देने में भी सक्षम हो गए हैं. एक अन्य गाइड मनोज शर्मा का कहना है कि हैरिटेज की जानकारी तो मोरारका फाउंडेशन पहले भी हैरिटेज संरक्षण शिविर के माधयम से दे रहा है, पर पर्यटकों को ये जानकारियां किस तरह की पूरी तहज़ीब और संस्कृति के साथ दी जाएं, इसका पता इस शिविर के माध्यम से ही चला. साथ ही बहुत से अनछुए पहलुओं पर चर्चाएं भी उपयोगी सिद्ध हुई हैं. उन्हें सबसे ज़्यादा तो खुशी इस बात की हुई कि अप्रशिक्षित का लेबल अब हमेशा के लिए हट गया है और वह भी अब गर्व  के साथ पर्यटकों को नवलग़ढ की विरासत से रूबरू करवा रहे हैं.


साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/11/shekhawati-towards-village.html