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गंगे ‘हरी हरी…’

गंगा म्हणजे या महान देशाच्या संस्कृतीचे खळाळते, वाहते, पवित्र असे प्रतीक. अशा या नदीची सध्याची अवस्था काही फार चांगली नाही. ‘राम तेरी गंगा मैली हो गई…’ असं राज कपूरनं त्याच्या सिनेमातून सांगण्याच्या आधीपासून भारतीय जनतेला हे सत्य माहिती आहे. नुकताच या नदीला राष्ट्रीय नदीचा दर्जाही देण्यात आला. तरीही परिस्थितीत फार फरक पडला नाही.

भारतातील एकूण लोकसंख्येच्या सुमारे ४० टक्के जनतेला गंगा पाणी पुरवते. एकूण ११ राज्ये तिचा लाभ घेतात. गंगेच्या किना-यांवर वसलेल्या शहरांतून सध्या रोज तब्बल २९० कोटी लिटर सांडपाणी सोडले जाते. त्यापैकी केवळ ११० कोटी लिटर पाण्यावर शुद्धीकरण प्रक्रिया होऊ शकते. मग ती ‘मैली’ होणार नाही तर काय! प्रथम इंदिरा गांधी आणि नंतर राजीव गांधींच्या कार्यकाळात गंगेच्या स्वच्छतेसाठी काही ठोस पावले उचलण्यात आली. ‘गंगा अॅक्शन प्लॅन’ बनविण्यात आला. मात्र, या योजना आरंभशूरच ठरल्या. गंगेच्या स्थितीविषयी पर्यावरणवाद्यांनी आणि माध्यमांनी आरडाओरडा केल्यानंतर तीन वर्षांपूर्वी ‘राष्ट्रीय गंगा नदी खोरे प्राधिकरणा’ची (एनजीआरबीए) स्थापना करण्यात आली. त्यात अनेक तज्ज्ञांचा समावेश करण्यात आला; परंतु सरकारला गंगेची स्वच्छता हा प्राधान्याचा विषय वाटत नसल्याचेच गेल्या तीन वर्षांत स्पष्ट झाले.

या काळात या प्राधिकरणाच्या केवळ तीन बैठका झाल्या. त्यातील तिसरी व शेवटची परवा १७ एप्रिलला दिल्लीत झाली. ही बैठकही सरकारने घाईघाईने घेतली; कारण जी. डी. आगरवाल या ८० वर्षांच्या वयोवृद्ध पर्यावरण तज्ज्ञांनी उपोषण केले आणि प्राधिकरणावरील तीन सदस्यांनी राजीनामे दिले, म्हणून! पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंगही या बैठकीला उपस्थित होते. त्यांनी गंगेच्या स्वच्छता मोहिमेला उशीर झाल्याचे मान्य करून, यापुढे सर्व संबंधित राज्यांनी याबाबत तातडीने हालचाली कराव्यात, असे सांगितले. पंतप्रधानांची तळमळ खरी असली, तरी प्रत्यक्षात सरकारला गंगेसाठी काहीही करण्याची इच्छा नाही, यावर अनेक तज्ज्ञांचे एकमत झाले आहे. प्राधिकरणाचे एक सदस्य रशीद हयात सिद्दिकी यांनी तर पद सोडण्याची इच्छा व्यक्त केली आहे. या प्रश्नात राजकारण आणले जात आहे, असे त्यांना वाटते. उत्तराखंडचे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा यांनी त्यांच्या राज्यात गंगेवर बांधल्या जाणा-या धरणांचे समर्थन केले आहे.

प्राधिकरण कुठलेच निर्णय घेत नाही. जे काही निर्णय घेतले जातात, ते राष्ट्रीय नदी संवर्धन महासंचालनालयामार्फत घेतले जातात. हे महासंचालनालय केंद्रीय वने व पर्यावरण खात्याच्या अखत्यारित येते. आता इंडो-तिबेट बॉर्डर पोलिसच्या २१ जवानांनी गंगोत्री ते गंगासागर असा प्रवास राफ्टिंगद्वारे करून गंगेच्या स्वच्छतेचा संदेश सर्वत्र पोचविण्याचा निर्णय घेतला आहे. बुधवारी या जवानांची मोहीम सुरू झाली. एकूणच गंगेच्या स्वच्छतेसाठी आता इंग्रजीतील ‘हरी हरी’ (घाई करा) म्हणायची वेळ आली आहे, हे खरे!

सौजन्य- महाराष्ट्र टाईम्स

http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/12739868.cms

वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.

समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

पृष्ठभूमि

जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.

परिवर्तन की पहली लहर

पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.

यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.

वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन

यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.

इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.

दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.

स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.

स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.

तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.

चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.

इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.

कार्यान्वयन की चुनौतियां

आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.

उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.

इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.

एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.

निष्कर्ष

वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.

आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.

– प्रांजुल भंडारी

(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html

‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्याना’साठी ११ नोव्हेंबरपासून आगळी मोहीम

 दररोज पर्यटक टाकतात २५० किलो प्लास्टिकचा कचरा
सुट्टीच्या दिवशीचा कचरा तब्बल ६५० किलो प्रतिदिन
कचरा गोळा करणाऱ्या पर्यटकांना भाडय़ात सवलत
प्लास्टिक कचरा टाकणाऱ्या पर्यटकांना होणार दंड

फिरायला येणारे पर्यटक संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यानातून घरी परत जाताना दररोज सुमारे २५० किलोचा प्लास्टिकचा कचरा उद्यानातच टाकून जातात. तर सुट्टीच्या दिवशीचा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल ६५० किलोच्या घरात जातो. यावर मात करण्यासाठी आता राष्ट्रीय उद्यानाचे संचालक व मुख्य वनसंरक्षक सुनील लिमये यांनी एक नवी शक्कल लढवली आहे. त्यासाठी पर्यटकांचीच मदत घेण्याचा निर्णय घेतला असून सायकल वरून रपेट करणाऱ्या पर्यटकांनी पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा केल्यास त्यांना सायकल भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेतला आहे. त्याचप्रमाणे येत्या ११ नोव्हेंबरपासून ‘प्लास्टिकमुक्त राष्ट्रीय उद्यान’ ही मोहीम राबविली  जाणार असून त्यात कचरा टाकणाऱ्यांविरोधात दंडाची तरतूदही              करण्यात आली आहे.
प्लास्टिकचा कचरा ही राष्ट्रीय उद्यानासाठी मोठीच डोकेदुखी ठरली आहे. दररोज उद्यानातून गोळा होणारे प्लास्टिक खूप मोठय़ा प्रमाणावर असते असे उद्यानाची सूत्रे स्वीकारल्यानंतर काही दिवसांतच लिमये यांच्या लक्षात आले. त्यानंतर त्यांनी कर्मचाऱ्यांच्या मदतीने काही महिन्यांसाठी प्लास्टिकच्या कचऱ्याचे मोजमाप करण्याचा निर्णय घेतला. त्यात समोर आलेली गेल्या पाच महिन्यांतील आकडेवारी धक्कादायक होती.
दरदिवशी उद्यानातून गोळा होणारा प्लास्टिकचा कचरा तब्बल २५० किलो एवढा होता. तर सुट्टीच्या दिवशी हा आकडा तिपटीने वाढायचा. कचरा गोळा करणे आणि त्याची आकडेवारी करणे याच कालखंडात पर्यटकांना विनंती करण्याची मोहीमही पार पडली. उद्यानात प्लास्टिकविरोधात नवीन फलक जागोजागी लावण्यात आले. त्यातून प्लास्टिकच्या होणाऱ्या दुष्परिणामांची माहितीही देण्यात आली. मात्र त्याने फारसा कोणताही फरक पडला नाही.
अखेरीस हा प्लास्टिकचा भस्मासूर रोखण्यासाठी कडक धोरण अवलंबण्याचा आणि विद्यमान कायद्यातील तरतूदींचा आधार घेण्याचा निर्णय घेतला, असे सांगून संचालक सुनील लिमये म्हणाले की, वन्यजीव संरक्षण कायद्यातील कलम ३५ (६) नुसार, वन्यजीवनास धोका पोहोचवणारे कोणतेही कृत्य करणाऱ्यास तब्बल २५ हजार रुपये दंड आणि तीन महिने साध्या कैदेची तरतूद आहे. याच तरतुदीनुसार दंडात्मक कारवाईचा अधिकारही देण्यात आला आहे. तो आता वापरण्यात येणार आहे. त्यानुसार प्लास्टिक टाकताना पहिल्यांदा पकडले गेल्यास १०० रुपये आणि दुसऱ्यांदा पकडले गेल्यास ५०० रुपये दंड करण्यात येणार आहे. तिसऱ्यांदा पकडले गेल्यास त्या व्यक्तिविरुद्ध गुन्हा दाखल करून न्यायालयात खटला गुदरण्यात       येईल.  याशिवाय इतरही काही अभिनव मार्ग अवलंबण्यात येणार आहेत. गेल्या महिन्याभरापासून पर्यावरणप्रेमी उपक्रम म्हणून सायकल फेरी सुरु करण्यात आली आहे. त्यासाठीच्या सायकली वन विभागातर्फेच राष्ट्रीय उद्यानाच्या प्रवेशद्वारावर उपलब्ध करून दिल्या जातात. दोन तासांसाठी ४० रुपये भाडे आकारले जाते. या पर्यटकांना सायकल देताना ११ नोव्हेंबरपासून एक कापडी पिशवीही देण्यात येणार आहे. त्यांनी या फेरीदरम्यान पिशवीभर प्लास्टिकचा कचरा गोळा करून आणल्यास त्यांना भाडय़ात सवलत देण्याचा निर्णय घेण्यात आला आहे. खरेतर हे उद्यान पर्यटकांसाठी आहे, त्यामुळे त्यांच्यावर कारवाई करण्याची इच्छा नव्हती. मात्र प्लास्टिकच्या भस्मासुराकडे पाहता असे लक्षात आले की, त्याला वेळीच आवर घातला नाही तर हा मानवजातीवरच उलटणार आहे. त्यामुळे अतिशय गांभीर्याने हा निर्णय घेतल्याचे लिमये यांनी सांगितले.

विनायक परब

साभार- लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=191453:2011-11-02-19-35-24&catid=73:mahatwachya-baatmyaa&Itemid=104

निसर्गकिमया…..!

निसर्गात मोठय़ा प्रमाणात जैवविविधता आढळते. भूतलावरील प्रत्येक कोपर्‍यात सृष्टीचे हे अद्भूत रुप पाहता येते. त्यासाठी गरज असते ती फक्त धैर्य आणि निरिक्षणशक्तीची. रोजच्या धकाधकीच्या जीवनात सभोवती निसर्ग असूनही हे सौंदर्य आपल्याला अनुभवता येत नाही. त्यामुळे आनंदाचे बहुमोल क्षण आपल्या हातून निघून जातात. किर्लोस्कर आंतरराष्ट्रीय वसुंधरा चित्रपट महोत्सवाच्या निमित्ताने आयोजित ‘नेचर वॉक’मध्ये सहभागी झालेल्या रत्नागिरीकरांच्या मनात हीच भावना असावी.

निसर्गाचा वरदहस्त असलेल्या या जिल्ह्यात निसर्गप्रेमींच्या प्रयत्नाने हा महोत्सव होत आहे. चित्रपट महोत्सव जरी असला तरी त्यानिमित्ताने विविध उपक्रमांचे आयोजन करण्यात येत आहे. त्याचाच एक भाग म्हणून महोत्सव काळात सकाळी सात वाजता ‘नेचर वॉक’चे आयोजन करून निसर्गाच्या सान्निध्यात त्याचे पैलू जाणून घेण्याची संधी निसर्गप्रेमींना उपलब्ध झाली आहे. शुक्रवारी पक्ष्यांच्या दुनियेबद्दल जाणून घेतल्यानंतर शनिवारी कातळावरील जैवविविधता जाणून घेण्यासाठी डॉ.मधुकर बाचुळकर यांच्यासमवेत ‘नेचर वॉक’चे आयोजन करण्यात आले होते.

रत्नागिरी शहराच्या बाहेरील बाजूस पावस रस्त्यावरील मोकळ्या पठाराची यासाठी निवड करण्यात आली होती. त्या ठिकाणी जातांना रस्त्यात भाटय़े समुद्र किनार्‍याचे दर्शन घडले. खाडीवरील पूल ओलांडतांना पश्चिमेकडील समुद्रकिनार्‍याकडे फेसाळत येणार्‍या शुभ्र लाटा आणि पूर्वेकडे कोवळ्या सुर्यकिरणात चमकणारे खाडीतील ‘सोनेरी’ पाणी असे विलोभनीय दृष्य पाहतांना समुद्रावरून येणार्‍या गार वार्‍याचा स्पर्श मनात आनंदाची शिरशिरी निर्माण करीत होता. अशा स्वर्गीय आनंदाला आपण दररोज मुकतो…

… या नेचरवॉकसाठी शुक्रवारी दुपारच्या सत्रात झालेल्या व्याख्यानाने चांगली वातावरण निर्मिती केली होती. या व्याख्यानात डॉ.बाचुळकरांनी पश्चिम घाट आणि विशेषत: कोकणातील जैवविविधतेविषयी सविस्तर आणि तेवढीच उद्बोधक माहिती दिली. जगातील ५० टक्क्यापेक्षा जास्त जैवविविधता विषुववृत्तीय परिसरातील केवळ ७ टक्के भूभागावर आहे. एकटय़ा मदागास्कर देशात वनस्पतींच्या १२ हजार प्रजाती आढळतात आणि त्यापैकी ८ हजार इतरत्र कुठेही आढळत नाही. ग्लोबल वॉर्मिंगमुळे काही वर्षांनी या देशाचे अस्तित्त्वच धोक्यात येणार आहे.

जगात वनस्पती आणि प्राण्यांच्या एकूण १५ ते १६ लाख प्रजाती आहेत. त्यापैकी केवळ १८ टक्के प्रजातींची माहिती अभ्यासाअंती प्राप्त झाली आहे. त्यात २ लाख ५० हजार ७५० सपुष्प आणि १ लाख ३० हजार अपुष्प वनस्पतींचा समावेश आहे. जगात सर्वाधिक जैवविविधता आढळणारे १२ देश आहेत. त्यात भारताचा सहावा क्रमांक लागतो. युरोपातील एकाही देशाचा त्यात समावेश नाही तर दक्षिण अमेरीकेतील देशांची संख्या सर्वाधिक आहे. भारतात जगात आढळणार्‍या एकूण जैवविविधतेपैकी ६.७ टक्के प्रजाती आढळतात. त्यात ८१ हजार प्राणी आणि ४७ हजार ५२० वनस्पतींच्या प्रजातींचा समावेश आहे. त्यात धान्य ५१, फळ १०४, मसाले २७, भाज्या ५५ (जंगलात निवास करणार्‍यांकडून वापरल्या जाणार्‍या प्रजाती आणखी वेगळ्या असू शकतात.), तेलबिया १२ आणि वनौषधींच्या ८ हजार प्रजातींचा समावेश आहे. कोकण वनौषधींच्या बाबतीत समृद्ध आहे. या ८ हजार पैकी १२० नष्ट होण्याच्या मार्गावर असून ३० वनस्पतींच्या वापरावर शासनाने बंदी आणली आहे. भारतातील ईशान्य हिमालय आणि पश्चिम घाटात सर्वाधिक जैवविविधता आढळते. प.घाटातील ४९० वनस्पतींपैकी ३०८ प्रजाती इतरत्र कुठेच आढळत नाही. अशी समृद्ध जैवविविधता अभ्यसतांना एका अभ्यासानुसार जगात रोज एक वनस्पती नष्ट होत असल्याचे अभ्यासकांच्या निदर्शनास आले आहे. ही जैवविविधता जपण्यासाठी त्याचा अभ्यास होणे आणि नागरिकांनी त्यासाठी प्रयत्न करणे आवश्यक असल्याचे बाचुळकरांनी सांगितले.

…वॉकचे ठिकाण सात किलोमीटर अंतरावर असूनही निसर्गप्रेमी वेळेवर एकत्रित झाले होते. बदलता निसर्ग, त्याच्या लहरीपणामुळे निर्माण होणार्‍या समस्या यामुळे हळूहळू त्याच्याविषयीची जागरूकता वाढत असल्याचा सूर त्या ठिकाणी उमटला. खरं तर निसर्ग नव्हे तर माणूस बदललाय, तो निसर्गाला ओरबाडायला लागलायं आणि त्याची प्रतिक्रीया निसर्गाकडून होतेय…चर्चेतील आणखी एक विचार…निसर्गाविषयीच्या विचारांची अशी देवाणघेवाण होत असतांनाच नेचर वॉकला सुरुवात झाली.

समोरच्या विस्तीर्ण कातळावर पिवळ्या फुलांचा गालिचा पसरलेला दिसत होता. मधूनच जांभळ्या रंगाची रानफुले डोकं वर काढून जणू आपल्या अस्तित्त्वाची जाणीव करून देत होती. फुलांच्या या नाजूक विश्वाकडे पाहतांना मैदानावर मुक्तपणे बागडणार्‍या शाळकरी चिमुकल्यांचा घोळका नजरेसमोर सहजच आला.

‘आईच्या मांडीवर बसुनी झोके घ्यावे गावी गाणी
याहुनि ठावे काय तियेला साध्या भोळ्या फुलराणीला’

असं फुलांचं नाजूक विश्व जाणून घेतांना होणारा आनंद निराळाच असतो. शब्दात त्याचं वर्णन शक्य नाही. शास्त्र त्यांची माहिती देईल पण त्यांना जपण्यासाठी शास्त्रासोबत मनाची सौंदर्यदृष्टी आणि निसर्गाबद्दलची संवेदनशिलताच हवी.

‘तुझी गोजिरी शिकुन भाषा गोष्टी तुजल्या सांगाव्या
तुझे शिकावे खेळ आणखी जादू तुजल्या शिकवाव्या’

त्या विश्वात रममाण होऊन स्वर्गीय आनंद घेण्यासाठी ही भावना मनात निर्माण होणं महत्त्वाचं आहे. फुलांचं ‘स्ट्रक्चर’ समजावून घेतांना त्याचं हे सहज-सोपं आणि तेवढच अवखळ नी नाजूक ‘नेचर’ समजाऊन घेतलं तर मिळणारा आनंद निश्चित द्विगुणीत होईल आणि त्यातूनच पर्यावरण रक्षणाची भावना आणखी घट्टपणे मनात रुजेल…

…डॉ.बाचूळकर यांनी कोकणात आढळणार्‍या विविध वनस्पती प्रजातींची माहिती दिली. विशेषत: ऑर्कीडचे आढळणारे प्रकार, त्यांचे परागण याविषयी ते भरभरून बोलले. पावस परिसरातील कातळावर आढळणार्‍या वनस्पतींचे जिवनमान केवळ १५-२० दिवसाचे असते. तो कालावधी झाल्यानंतर नवी वनस्पती त्या ठिकाणी उगवते. कुठली वनस्पती केव्हा उगवावी याचा क्रम आणि वेळ निसर्गाने निश्चित केलेली असते. डॉ.बाचूळकरांनी दिलेल्या माहितीमुळे छान वातावरण निर्मिती झाली. विशेषत: प्रत्येक प्रकारच्या ऑर्किडचे परागण एकाच विशिष्ट प्रकारच्या किटकापासून होते हे ऐकून निसर्गाचे कौतुक वाटले.

त्यांच्यासोबत कातळावर भटकंती करताना पिवळ्या फुलांचे स्मितीया, आयुर्वेदिक उपयुक्ततेचे कुरडू आणि बला, मेंदीच्या कुळातील पाणलवक, बारीक रेषेदार चिमणचारा, औषधी टाकळा, किटभक्षी ब्लँडरवर्ट आणि ड्रासेरा, भोपळ्याच्या कुळातलं मिलोफ्रीया, उग्र वास असणारं विमिया, औषधी गुण असणार्‍या विष्णूप्रांता अशा विविध प्रकारच्या वनस्पतींच्या प्रजातिंविषयी बाचूळकर यांनी माहिती दिली. उपस्थितांपैकी काही उत्साही मंडळी कातळावरील एखादे फुल, गवत किंवा रोपटे आणून दाखवत होती आणि डॉ.बाचूळकर त्याची माहिती सांगत होते.

माहितीचा काही भाग अत्यंत रोचक असा होता. ब्लँडरवर्ट पाण्याच्या प्रवाहातील किटक पकडतात, ड्रासेराच्या खोडावर बारीक उन्हात चमकणारे केस असल्याने किटक त्याकडे आकर्षीत होऊन चिकटतात,तुतारीच्या फुलाची एका रात्रीत लांबी वाढते, विमिया परिसरात लावले तर त्याच्या उग्र वासाने किटक येणार नाही, अशी अत्यंत उपयुक्त आणि निसर्गाचा चमत्कार स्पष्ट कराणारी माहिती मिळाल्यामुळे ही निसर्गयात्रादेखील आनंददायी ठरली. घराकडे पतरतांना

‘तुझ्या नृत्याचा उल्लास सदाबहर
वृक्षवेलींच्या माथ्यावर
वसणार्‍या ढगावर
सुकदुकीचा विसर’

या ओळी मनात होत्या. हा निसर्ग जपायला हवा हीच भावना प्रत्येकाची असावी. हीच जाणीव निर्माण करण्यासाठी कदाचीत या महोत्सवाचे आयोजन असावे.

-डॉ.किरण मोघे

साभार- ग्लोबल मरठी

http://globalmarathi.com/20110925/4832047505703110914.htm

भवताल : पवनेच्या पाण्याचा धडा!


altमहाराष्ट्र जलसंपत्ती नियमन प्राधिकरणाच्या रूपाने हळूहळू उभ्या राहत असलेल्या जलव्यवस्थेला पंगू करण्याचे काम राज्यातील आघाडी सरकारने केले, विशेष म्हणजे त्यात उपमुख्यमंत्री अजित पवार यांचा वाटा सर्वाधिक होता. म्हणूनच मावळात पवनेच्या पाण्यावरून जे काही घडते, त्याकडे एक स्वतंत्र घटना म्हणून पाहून चालणार नाही. व्यवस्था पंगू बनण्यामुळे काय घडू शकते आणि भविष्यात काय वाढून ठेवले आहे याची एक झलक म्हणूनच या घटनेकडे पाहावे लागेल!
पवना धरणाच्या पाण्यावरून मावळात रामायण घडलं.. पोलिसांच्या गोळीबारात तिघांना प्राण गमवावे लागले, जाळपोळ व तोडफोडीत अनेक वाहनांचे नुकसान झाले, वाहतुकीच्या खोळंब्यामुळे लाखो मनुष्यतास वाया गेले, राजकीय नेत्यांची एकमेकांवर चिखलफेक झाली, काहींनी त्यातून राजकारण साधले, तर काहींचे पितळही उघडे पडले. या सर्व प्रकारातून महाराष्ट्राच्या नावावर एका दुर्दैवी घटनेची कायमची नोंद झाली.. यात चूक कोणाची, हे कारस्थान होते का, गोळीबार टाळता आला असता का, या प्रश्नांची भरपूर चर्चा झाली. चौकशीतून कदाचित काही गोष्टी बाहेर येतील, काही येणारही नाहीत. पाण्यावरून संघर्ष किती शिगेला जाऊ शकतो, याचे उदाहरण म्हणून पुढे बराच काळ या घटनेकडे पाहिले जाईल. नाही म्हटलं तरी या घटनेने सरकारला हलविले. एरवी माध्यमांना फारशी किंमत न देणाऱ्या उपमुख्यमंत्री अजित पवार यांच्यावरही पत्रकार परिषद बोलावून स्पष्टीकरण देण्याची वेळ आली. ‘या प्रकरणात माझी कशी चूक नाही आणि मला विनाकारण कसं लक्ष्य केलं जातंय’ हे आपलं म्हणणं सलग दीड तास मांडणाऱ्या अजितदांदाचं वेगळं रूप त्या दिवशी पाहायला मिळालं.
अजितदादांनी मांडलेले अनेक मुद्दे रास्त होते. धरणापासून मोठय़ा शहरांपर्यंत बंद नळातून पाणी आणणं हे निसर्ग व्यवस्थेत बसत नसलं, तरी आताच्या बदललेल्या काळात व्यवहार्य आहे. तसे करून सुमारे एक टीएमसी पाण्याची बचत होणार असेल, तर ते स्वीकारायला हरकत नसावी. पण खरा मुद्दा याच्याही पलीकडचा आहे. तुम्ही व्यवहार्य वागत असतानाही विरोध होत असेल तर? येथे विरोध होण्यामागे राजकारण असेलही, पण आंदोलकांमध्ये आणि सर्वसामान्य लोकांमध्ये सर्वाधिक असंतोष आहे तो अजितदादांच्या तथाकथित मनमानीला! कोणी कितीही शक्तिशाली असला तरी त्याने मनाप्रमाणे निर्णय घेतला तर त्याला विरोध होतो, मग तो निर्णय बरोबर असला तरीसुद्धा! या प्रकरणातही काही प्रमाणात हेच दिसत आहे. त्यामुळे कोणताही महत्त्वाचा निर्णय व्यवस्थेवर सोपविला, तर विरोधाची धार कमी होऊ शकते. अर्थातच निर्णय वेळेवर आणि योग्य पद्धतीने होण्यासाठी व्यवस्था सशक्त असावी लागते, तशी ती घडवावी लागेल.. पण पाण्याच्या बाततीत दुर्दैवाने अशी व्यवस्था घडू दिली गेली नाही. उलट महाराष्ट्र जलसंपत्ती नियमन प्राधिकरणाच्या रूपाने हळूहळू उभी राहत असलेली व्यवस्था पंगू करण्याचे काम अलीकडेच राज्यातील आघाडी सरकारने केले, विशेष म्हणजे त्यात अजित पवार यांचाच वाटा सर्वाधिक होता. म्हणूनच मावळात पवनेच्या पाण्यावरून जे काही घडते, त्याकडे एक स्वतंत्र घटना म्हणून पाहून चालणार नाही, तर व्यवस्था पंगू बनण्यामुळे काय घडू शकते आणि भविष्यात काय वाढून ठेवले आहे याची एक झलक म्हणूनच पाहावे लागेल!
जलक्षेत्रात सुधारणा करण्यासाठी महाराष्ट्रात २००५ साली जलसंपत्ती नियमन प्राधिकरणाची स्थापना झाली. पाण्याचे हक्क व जलदर ठरविण्यापासून त्याचे वितरण करण्याची जबाबदारी प्राधिकरणाकडे आली. त्यावरील बहुतांश नियुक्तया राजकीय असल्याचे लपून राहिलेले नाही. तरीही त्या व्यवस्थेची शिस्त, जलक्षेत्रात काम करणाऱ्या विविध संस्थांकडून सातत्याने ठेवले जाणारे लक्ष आणि नेमलेल्या अधिकाऱ्यांच्या अनुभवामुळे ही व्यवस्था हळूहळू सुदृढ होत होती. पण मधल्या काही घडामोडींमुळे आघाडी सरकारने शेतीशिवायच्या पाण्याचे वाटप करण्याचे अधिकार मंत्रिमंडळाकडे घेतले. (त्या आधी ते जलसंपदा मंत्र्यांच्या अध्यक्षतेखाली असलेल्या उच्चाधिकार समितीकडे होते. कायद्यानुसार ते प्राधिकरणाकडे असणे आवश्यक होते. मात्र, सरकारने गेल्या अर्थसंकल्पी अधिवेशनात गनिमीकावा करून एक विधेयक संमत केले. त्याद्वारे हे अधिकार मंत्रिमंडळाकडे देण्यात आले.)
कायदा करून स्थापन केलेल्या जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाकडे पाण्याचे अधिकार देण्याची व ही व्यवस्था सुदृढ करण्याची संधी सरकारने गमावली. त्यामागचा ‘उदात्त’ हेतू कोणता होता? तर पाण्यावर हवे असलेले नियंत्रण! त्याद्वारे राजकारण खेळले जाते व अनेकांची राजकीय कोंडीसुद्धा केली जाते. अर्थात, अलीकडच्या काळातील राजकीय आघाडय़ा व अस्थैर्याच्या वातावरणात हे नियंत्रण फार काळ कोणा एकाकडे राहणेही दुरापास्तच! त्यामुळे एका राजवटीत (कशी का होईना) बसत आलेली जलव्यवस्थेची घडी, उद्या सरकार बदलले तर विस्कटणार, हे निश्चित! शिवाय अशा व्यवस्थेत राजकीय हितसंबंध अग्रस्थानी असल्याने त्याविरुद्ध असंतोष आणि होणारा विरोध कितीतरी पटीने अधिक असणार. याचा अर्थ असाही नाही की, या गोष्टी प्राधिकरणाकडे आल्यावर सर्व काही आलबेल होईल आणि लोक लगेच प्राधिकरणाच्या निकालानुसार वागतील. इतके झाले नाही तर निदान विरोधाची धार कमी होईल आणि मग कोणत्याही प्रकल्पाची / निर्णयाची अंमलबजावणी रेटून करण्यालासुद्धा खऱ्या अर्थाने नैतिक अधिकार प्राप्त होईल. आता सर्वच क्षेत्रांप्रमाणे राजकारणाची पातळी घसरलेली आहे. त्यातील नैतिकता, विधायक विरोध हे मुद्दे इतिहासजमा झाल्यासारखेच आहेत. अशा परिस्थितीत तर या सक्षम व्यवस्थांची आवश्यकता आणखी वाढते. त्यामुळेच जलसंपत्ती नियमन प्राधिकरण हे केवळ दिखाऊ न राहता सरकारने पाण्याबाबतचे अधिकार त्यांच्याकडे सोपविण्याची आवश्यकता आहे. या व्यवस्था पंगू करणे भविष्यात परवडणारे नाही.
हा इतिहास आणि आजचे मावळातील आंदोलन या गोष्टी बरेच काही शिकविणाऱ्या आहेत, पण त्यांचा परस्परांशी असलेला संबंध शोधला तरच ते शिकता येईल.. मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण काय किंवा उपमुख्यमंत्री अजित पवार काय, स्वभावप्रकृती व कार्यपद्धती भिन्न असली तरी हे दोघेही नेते राज्याच्या विकासासाठी झटणारे आहेत. त्यांच्या कार्यकाळात या व्यवस्था पंगू बनणे निश्चितच भूषणावह नाही. त्या एकदा मोडल्या तर पुन्हा उभे करण्यास बराच काळ जावा लागेल. पवनेच्या पाण्यावरून पेटलेल्या आंदोलनातून एवढा जरी धडा घेतला, तर ते विकासाच्या दिशेने आणखी काही पावले टाकल्यासारखे ठरेल!

अशक्त आणि आक्रस्ताळे….- साभार: संपादकीय, लोकसत्ता

प्रत्येक राष्ट्राच्या इतिहासात एक काळ असा येतो की, अविवेकी आणि आक्रस्ताळे यांच्यापुढे विवेकाचा आवाज क्षीण होतो आणि विचारी हतबल होतात. आपला देश सध्या या कालखंडातून जात असल्याचे दिसते. गेले दोन दिवस अण्णा हजारे आणि त्यांचा मेणबत्ती संप्रदाय यांचा सुरू असलेला धुडगूस आणि त्याला तोंड देताना समोर येत असलेली मनमोहन सिंग सरकारची दिशाहीनता हे दोन्ही विद्यमान नेतृत्वाविषयी गंभीर शंका निर्माण करणारे आहे, यात शंका नाही. अण्णा हजारे यांच्यापुढे शरणागती पत्करून त्यांना जर सोडायचेच होते, तर मग मुळात त्यांना अटक केलीच कशासाठी? अण्णांच्या अटकेनंतर निर्माण होणारी परिस्थिती हाताळणे आपल्याला झेपणार नाही, याचा अंदाज सरकारला नव्हता काय? की अण्णांना अटक करण्याचा निर्णय हा काँग्रेसच्या सर्वोच्च नेतृत्वाला, म्हणजे या क्षणी अर्थातच राहुल गांधी यांना, मान्य नव्हता आणि त्यामुळे अण्णांची मुक्तता करण्याचा निर्णय सरकारला घ्यावा लागला? काँग्रेसची परंपरा लक्षात घेता असेही घडले असेल की, सरकारने कारवाई करायची आणि गांधीपुत्राने ती मागे घेऊन आपल्या प्रतिमेला बळकटी आणायची. एरवीही अनेकदा गांधी घराणे हे काँग्रेस सरकारपासून कसे वेगळे आहे, हे दाखवण्याचा काँग्रेसजनांचा प्रयत्न असतो. तेव्हा, हा प्रकार त्यातलाच नसेल, असे म्हणता येणार नाही. कारणे काहीही असोत. जे काही झाले त्यामुळे सरकारची उरलीसुरली अब्रूही रस्त्यावर आली. हे सरकार रुद्राक्षासारखे बहुमुखी आहे, हे अनेकदा जाणवले होते. पण त्याला इतकी तोंडे असतील, हे अण्णांच्या निमित्ताने समोर आले. गृहमंत्री चिदंबरम आणि दूरसंचारमंत्री कपिल सिबल हे आपली वकिली बुद्धिमत्ता दाखवून अण्णांवरील कारवाईचे समर्थन करून दोन तासही उलटले नसतील तोच या कारवाईच्या विरोधात त्यांच्याच सरकारने निर्णय घेतला आणि अण्णांना सोडून द्यायचे ठरवले. यामुळे काय साधले? अण्णांवरील कारवाईचा निर्णय हा पूर्णपणे पोलिसांचाच होता, असे गृहमंत्री चिदंबरम यांनी कितीही शहाजोगपणे सांगितले तरी त्यावर काँग्रेस कार्यकर्त्यांचे शेंबडे पोरही विश्वास ठेवणार नाही. चिदंबरम यांची कार्यपद्धती लक्षात घेता त्यांच्या संमती अगर माहितीशिवाय इतकी मोठी कारवाई दिल्ली पोलीस करणे अशक्य. यामुळे सरकारची दुहेरी कोंडी झाली. एका बाजूला कारवाई मागे घ्यावी लागली आणि त्यावर पुन्हा अण्णांनी तुरुंगातून बाहेर पडायलाच नकार देऊन आपण कसे सवाई राजकारणी आहोत, ते दाखवून दिले. सरकारच्या निर्णयानंतरही त्यांनी तुरुंग सोडला नाही. त्यामुळे सिंग सरकारला पुन्हा त्यांच्या नाकदुऱ्या काढाव्या लागल्या. तोपर्यंत इलेक्ट्रॉनिक माध्यमाच्या सौजन्याने मेणबत्ती संप्रदायाचे लोकनृत्याचे प्रयोग ठिकठिकाणी सुरू झाले होते आणि या बिनपैशाच्या तमाशाने जनतेचे भान हरपले होते. वास्तविक अण्णांसंदर्भातील निर्णयाचा धरसोडपणा सोडला तर सिंग सरकारची भूमिका योग्य आहे, हे कोणीही विचारी व्यक्ती मान्य करील. प्रश्न निर्माण झाला तो सिंग हेच आपल्या भूमिकेविषयी ठाम आहेत किंवा नाही याविषयी संशय निर्माण झाल्याने. वास्तविक सरकार आणि कोणतीही व्यवस्था चालवण्याचे काही नियम असतात.  एखाद्याने उपोषणाची धमकी दिली म्हणून ते बदलायचे काय, हा प्रश्न मेणबत्ती संप्रदायांस पडणे अपेक्षित नाही. पण बुद्धिवादी आणि विचारी म्हणवणाऱ्यांनी तरी याबाबत पुरेसे गांभीर्य दाखवायला नको काय? उद्या एखाद्या पदावर विशिष्ट व्यक्तीची नेमणूक व्हावी यासाठी, एखाद्याच्या बदलीसाठी किंवा अगदी अयोध्येत राममंदिरासाठी कोणी आमरण उपोषण करण्याचे ठरवले आणि यापेक्षा अधिक गर्दी जमवली तर त्याचे सरकारने ऐकायचे काय? १९७५ साली मोरारजी देसाई यांनी उपोषण केले म्हणून निवडून आलेले गुजरात सरकार बरखास्त करण्याचा गाढवपणा त्यावेळच्या सरकारने केला होता. आता सुरू असलेला प्रकार पाहिल्यास तेव्हापासून आजतागायत आपल्यात काहीच राजकीय प्रौढत्व आले नाही, असे नाइलाजाने म्हणावे लागते. आंदोलनांची म्हणून एक मर्यादा असते आणि त्यापलीकडील प्रश्न हे आंदोलनांनी सोडवायचे नसतात. तशी प्रथा सुरू झाल्यास रस्त्यावरची गर्दीच साऱ्या प्रश्नांचे उत्तर ठरू लागेल. त्यानंतरची अवस्था असेल ती त्याची गर्दी विरुद्ध माझी गर्दी. म्हणजे अण्णांच्या विरोधात भूमिका असणाऱ्याने अधिक गर्दी जमवली आणि अधिक काळ उपोषण केले तर अण्णांनी घेतलेला निर्णय आपल्याला बदलावा लागेल. अशा व्यवस्थेला झुंडशाही म्हणतात. लोकशाही नव्हे. आपल्याला त्या दिशेने जायचे आहे काय, हा प्रश्न मेणबत्ती संप्रदायास या क्षणी विचारण्यात अर्थ नाही. अण्णा लोकप्रियतेच्या आनंदात आत्मानंदी टाळय़ा वाजवण्यात मग्न आहेत. त्यामुळे त्यांनाही याचे भान असणार नाही. कारण सगळेच उन्मनी अवस्थेत आहेत. पण अन्यांनी तरी या प्रश्नाकडे गांभीर्याने पाहायला हवे. कारण हा काही सिंग सरकार जाते की नाही, असा प्रश्न नाही. ते आपल्या कर्माने जाईल किंवा राहील. तो मुद्दा अगदीच गौण आहे. खरा प्रश्न आपण आपल्या देशात कोणती व्यवस्था आणणार हा आहे. अण्णांनी उपस्थित केलेले मुद्दे कितीही न्याय्य असले तरी ते सोडवण्याचा वा पदरात पाडून घेण्याचा हा मार्ग नि:संशय असू शकत नाही. कोणत्याही व्यवस्थेस नियमांचे अधिष्ठान नसेल तर ती कोसळून पडतेच पडते. आपल्या मार्गाने यश मिळत असल्याचा आनंद अण्णांना आता होत असला तरी उद्या त्यांच्याच विरोधात दुसरा एखादा अण्णा तयार होणार नाही, याची शाश्वती काय? किंवा अण्णांच्याच मेणबत्ती कळपातील एखादा उठला आणि अण्णांच्या विरोधात उपोषणाला बसला तर अण्णांची भूमिका काय असेल? तेव्हा कोणाचीही इच्छा, मग ती व्यक्ती कितीही चारित्र्यवान, दानशूर, एकपत्नी-एकवचनी वगैरे असली तरी, हाच कोणत्याही व्यवस्थेचा पाया असता नये. दीर्घकालीन, शाश्वत व्यवस्था उभी करायची झाल्यास मूल्याधारित नियमांची चौकट असावीच लागते.असे असले तरी त्याच वेळी देशातील इतक्या साऱ्यांना या आदर्श व्यवस्थेपासून फारकत का घ्यावी लागते, या प्रश्नाचा विचार करणेही आवश्यक आहे. महिनाभरात बांधलेल्या रस्त्यावर खड्डे पडतात, पूल पडतात, शाळेत पैसे दिल्याशिवाय प्रवेश मिळत नाही, जन्मनोंदणी असो, मर्तिकाचा दाखला असो वा रेशनकार्ड किंवा पासपोर्ट; लाच दिल्याशिवाय कामे होत नाहीत, आजारी पडल्यास डॉक्टर बनावट निघतात, तो खरा असल्यास औषधाची शाश्वती नाही, आणीबाणीच्या काळात त्याच्यापर्यंत पोचायचे झाल्यास प्रवासाची सोय नाही, रिक्षावालाही नाडतो, त्याविरुद्ध तक्रार केल्यास दखल घेणारे कोणी नाही.. असे पावलोपावली निराश व्हावे लागल्यास जनतेचा प्रचलित व्यवस्थेवरचा विश्वास उडतो. ज्या देशात शेकडोंनी बनावट वैमानिक तयार होतात आणि तरीही कोणालाही काहीही होत नाही, त्या देशातील जनतेने केवळ व्यवस्थेच्या चेहऱ्याकडे पाहून समाधान मानावे काय? अशा पिचलेल्या जनतेस चित्रपटातील अमिताभ बच्चन जगण्यात हवा असतो. आता तर तो चित्रपटातही आढळत नाही. कारण तेथील नायक हेही खलनायकी व्यवस्थेचे भाग झाल्याचे त्यास आढळते. अशा नाराजांच्या फौजेने विवेक बाळगावा, अशी अपेक्षादेखील करणे अमानुषपणाचे ठरेल. अशांना मग अण्णा जवळचे वाटतात आणि त्यांच्या निष्ठा अण्णांच्या चरणी वाहिल्या जातात. अण्णांनाही मग आपण चमत्कार करून दाखवू शकतो, असे वाटू लागते. ज्यांनी या व्यवस्थेचा पूरेपूर फायदा घेतला आहे, असे लोकही या प्रकारच्या आंदोलनामध्ये शिताफीने घुसतात. हे सर्व टाळायचे असल्यास व्यवस्था चालणे आवश्यक असते आणि जनतेच्या मनात त्याविषयी विश्वास निर्माण व्हावा लागतो. आता तसे होत आहे, असे म्हणणे धाष्टर्य़ाचे ठरावे. तरीही या समस्येस याच व्यवस्थेतून उत्तर तयार होण्यात देशाचे.. आणि आजच्या, उद्याच्याही अण्णांचे.. भले आहे. आक्रस्ताळेपणा आकर्षित करतो. पण त्यातून हाती काही लागत नाही.

संपादकीय

साभार: लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=177110:2011-08-17-15-46-36&catid=29:2009-07-09-02-02-07&Itemid=7

माझी पंढरीची चंद्रभागा..


altनदी म्हटलं, की मला सर्वात प्रथम आठवते ती माझी माहेरची चंद्रभागा नदी! बालपण म्हटलं, की आठवतो चंद्रभागेला येणारा पूर. तो बघण्यासाठी आम्ही घराच्या बाहेर पडत असू, तेव्हा घरातील मोठी मंडळी चिंतातूर असत आणि आम्ही बच्चेकंपनी मात्र स्वछंदतेने हुंदडत, कधी नदीतीरी पोहोचत हे लक्षातही येत नसे. गावातील असंख्य लोक नदीच्या दोन्ही काठांवर तोबा गर्दी करत. नदीचे पात्र तसे मोठे आहे. बाजूने पाट बांधलेले आहेत. भली मोठी दगडी कमान, पायऱ्या पाहून बालमनाला अनेक प्रश्न पडत. त्या पायऱ्या चढणे-उतरणे हा खेळ असे. सायंकाळी त्या पायऱ्यांवर जाऊन निवांत बसण्यासारखे सुख मोठय़ांना मिळत नसे. कारण दिवसभराच्या व्यापातून थकले भागलेले जीव जेव्हा नदीतीरी येत, तेव्हा चंद्रभागा त्यांना आपल्या कवेत घेत असे. जसं आई आपल्या दमलेल्या, थकलेल्या बाळांच्या अंगा-खांद्यावरून मायेने हात फिरवते तशी चंद्रभागाही या दमलेल्या जीवांना प्रेमाचा ओलावा देत असे.
आम्ही लहान मुले मात्र खेळत खेळत नदीच्या पात्रात उतरत असू. नदीच्या पात्रातील वाळूमध्ये बसून पाय मध्ये घालून वरून त्यावर वाळू थापत आणि हळुवार पाय काढून घेत असे. सुंदर छोटासा खोपा तयार होई. मग त्या बाजूची वाळू बाजूला सारून त्याचा परिसर सजवत आरडा-ओरडा चाले. ‘बघ तुझ्यापेक्षा माझाच खोपा सुंदर आहे.’ या चिडवा-चिडवीचं रूपांतर नकळत कधी कधी भांडणातही होत असे. त्याचबरोबर खोलवर वाळू उपसून छोटी विहीर तयार करत असू. कोणाच्या विहिरीला पाणी किती लागले यावर परत चर्चा होत असे. हो, पण तो खड्डा वगैरे नसायचा, ती विहीरच असायची. खरंच काय गंमत असते नाही? नवनिर्मितीची क्षमता आणि ओढ विलक्षण असायची, असं आज जेव्हा मी विचार करते तेव्हा वाटते.
हळूहळू त्या वाळूतील शंख-शिंपले गोळा करायला सुरुवात होत असे आणि वेगवेगळ्या आकाराचे शंख-शिंपले गोळा करतानाच गोल गुळगुळीत छोटे-छोटे दगडही गोळा करत असू. त्या दगडांचा वापर सागरगोटय़ाप्रमाणे करायला मजा येई, पण जेव्हा उंच फेकलेला तो सागरगोटय़ासारखा दिसणारा दगड झेलण्याची वेळ येई, तेव्हा मात्र मनात एकदम वेदना होई कारण तो काही वजनाने हलका नसायचा.
पाण्यात माशांचे निरीक्षण करण्याची गंमत काही औरच असे. इटुकल्या पिटुकल्या माशांना काही तरी खायला टाकून त्यांना एकत्र जमवणे हा मजेशीर खेळ प्रत्येकाला आवडायचा. आम्ही थोडी मोठी मुले लहान मुलांना हातात चुरमुरे देत असू आणि आम्ही मात्र फुटाणे, शेंगदाणे घेत असू. याची गंमत अशी व्हायची, की त्यांनी पाण्यात टाकलेले चुरमुरे पाण्यावर तरंगायचे आणि आम्ही टाकलेले शेंगदाणे, फुटाणे हे जड असल्याने पाण्यात खाली जायचे. त्यामुळे मासे लगेचच जमायचे. त्यांच्या चुरमुऱ्यामुळे मासे एकत्र येत नाहीत हे जेव्हा त्यांच्या लक्षात यायचं, तेव्हा ती मुले रागारागाने नदी पात्रातील वाळूच उचलून पाण्यात टाकत. त्यांनी टाकलेल्या वाळूच्या कणांना मासे फसत असत आणि गोळा होत. कोण आनंद होत असे त्या मुलांना! ‘कसं आम्ही फसवलं, फसले रे हुर्रेऽऽऽ’ असं म्हणत ती उडय़ा मारत.
नदीच्या पाण्यात डुंबणारी जनावरे, पाण्याच्या प्रवाहावर तरंगणारी नाव, होडय़ा, देवदर्शनाला जाण्याअगोदर पाण्यात अंघोळीला आलेले भक्त या सर्वासह आजही नदीपात्र डोळ्यासमोर जसेच्या तसे दिसते. नदी त्या वेळी मात्र सजीव, बोलकी वाटायची. अगदी लग्नानंतर काही वर्ष पंढरपूरला गेले आणि नदीला गेले नाही, असे कधी व्हायचं नाही. काही कारणाने जाणं झालं नाही तर मनाला एक वेगळी हुरहुर लागायची. एखाद्या जिवलग मैत्रिणीची भेट राहून गेल्यासारखे मन त्याच आठवणीत रमायचे. पात्रातलं पुंडलिकाचं मंदिर असो अथवा प्रत्येक घाटाशी असणारी मंदिरे असो, प्रत्येकाचे वेगळे वैशिष्टय़ जाणवते.
आता मात्र नदीचे रूप बदलले आहे. आज विठ्ठलभक्तांचं मग ते गावातील असोत की बाहेरगावचे सर्वच या दुर्दशेसाठी कारणीभूत आहेत. नदीच्या पात्रात आटोपले जाणारे प्रातर्विधीचे कार्यक्रम असोत, माणसांचे नदीस्नान असो, नदीतीरी बसून वेगवेगळ्या पदार्थाचा घेतलेला आस्वादही कचरा निर्माण करतो. हा कचरा वाळवंटामध्ये ठिकठिकाणी साठला जातो. या घाणीमुळे वारीच्या काळात साथीचे आजार पसरण्याचा धोका वाढतो. घाटाच्या पायऱ्यांवरून वाहणारे मैलमिश्रित सांडपाणी वाळवंटामध्ये येत असल्याने या परिसरामध्ये प्रचंड दरुगधी पसरली आहे. नदीच्या पात्रात वाहून जाणारा प्लास्टिक कचरा व कपडय़ांची घाण काढून टाकणे आवश्यक आहे. ही सर्व अव्यवस्था पाहून मनाला आज अत्यंत वेदना होतात.
नदीपात्रात भरभरून वाहणारा जलाशय, नदी काठावर बसण्याची रम्य ठिकाणं, नदीकाठी असणारी वृक्षवल्ली, पाण्यात तरंगणाऱ्या नौका, स्वच्छ व रमणीय परिसर या बालपणातल्या निसर्गरम्य आठवणी आजही ताज्या व्हाव्यात असे वाटते. त्यासाठी सर्वानीच प्रयत्नशील राहण्याची गरज आहे. फक्त कागदोपत्री योजना राबवून काहीही होणार नाही. त्यासाठी प्रत्येकाने स्वत:पासून सुरुवात करून ‘भोळा भाव, देवा मला पाव’ असे म्हणत विठ्ठलभक्ती केली तर! खरंच विठ्ठल अत्यंत भोळे दैवत आहे. श्रमकरी, कष्टकऱ्याची वेदना ते जाणते.
यासाठी गावातील सोयी व सुधारणा व्हायला हव्या व त्याचा वापर जनतेने योग्य पद्धतीने करणे गरजेचे आहे. गावात चांगल्या प्रतीची सुलभ शौचालय बांधून त्याचा योग्य पद्धतीने वापर करावा. त्यांची स्वच्छता ठेवणे, सांडपाण्याची विल्हेवाट लावणे, कचऱ्याची साठवणूक करताना ओला कचरा, सुका कचरा वेगवेगळा करून त्याचे खतात रूपांतर करणे, अंघोळीसाठी, कपडे धुण्यासाठी, वाहने स्वच्छ करण्यासाठी नदीपात्राचा वापर टाळणे गरजेचे आहे. तसेच नदीच्या दुतर्फा झाडे लावणे अत्यंत आवश्यक आहे.
आपण जर थोडे लक्ष देऊन हे बदल स्वत:पासूनच करायला सुरुवात केली, तर पंढरीच्या चंद्रभागेला पूर्वीचे वैभव प्राप्त व्हायला वेळ लागणार नाही, हे मात्र निश्चित..!!!

प्रा. नयन महेश राजमाने,
साभार- भवताल, लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=174365:2011-08-03-16-41-45&catid=96:2009-08-04-04-30-04&Itemid=108

लेक नावडती या घरची!

समाजातील गावंढळ समजुती तंत्रज्ञानाला कशा वेठीस धरतात हे गेल्या काही दिवसांतील घटनांतून दिसून आले. सोनोग्राफी हे सर्वार्थाने उपयुक्त तंत्रज्ञान. अनेक विकारांचे योग्य निदान होण्यासाठी ते उपयोगी पडते. पोटातील गर्भ कसा आहे, त्यामध्ये काही व्यंग आहे का किंवा मातेच्या गर्भाशयात काही गुंतागुंत झाली आहे का, हे त्वरित समजून घेण्यासाठी सोनोग्राफी उपयोगी पडते. ही तपासणी करीत असताना आपोआपच तो गर्भ मुलगा आहे की मुलगी आहे हे कळून येते. मात्र गर्भाच्या व्यंगाचे वा आरोग्याचे निदान करण्यासाठी सोनोग्राफीचा उपयोग करण्याऐवजी केवळ गर्भलिंग चाचणीसाठी या तंत्रज्ञानाचा उपयोग करण्याचे उद्योग देशात सुरू झाले. मुलीपेक्षा मुलगा श्रेष्ठ अशी एक विचित्र समजूत आपल्या समाजात रूढ झाली आहे. मुलगा होण्यात मातृत्वाचे सर्वस्व आहे, अशा मूर्ख समजुतीत हा समाज बुडलेला आहे. एकीकडे आईचे गोडवे हा समाज गातो. संतांना माऊलीची उपमा देतो. आई म्हणून देवतांची पूजा करतो. मात्र घरात लेक जन्माला येणे या समाजाला नकोसे वाटते. ‘लेक लाडकी या घरची’ म्हणायचे, प्रत्यक्षात तिला नावडतीची वागणूक द्यायची, अशी ही दुटप्पी वृत्ती आहे. जनगणनेतील आकडेवारीनुसार पंजाब, गुजरात यांसारख्या श्रीमंत राज्यांमध्येही मुलांच्या तुलनेत मुलींचे प्रमाण बरेच कमी आहे. महाराष्ट्रही त्यामध्ये मागे नाही. श्रीमंत राज्यांमध्ये मुलींचे प्रमाण कमी होण्यामागे तंत्रज्ञानाचा दुरुपयोग हे मुख्य कारण आहे. सोनोग्राफीसारख्या तंत्रज्ञानाचा वापर करून गर्भाचे लिंग तपासायचे आणि मुलगी असेल तर गर्भपात करायचा हा प्रकार देशात सर्वत्र चालतो. यासाठी पैसा लागतो व तो अर्थातच गरिबांपेक्षा श्रीमंताकडे सहज उपलब्ध असतो. मुलगा की मुलगी हे तपासून जन्मापूर्वीच गर्भाचा निकाल लावण्याचा पर्याय पैसा नसल्याने गरिबांना उपलब्ध नसतो. ते गर्भपात करून घेत नसले तरी मुलगी जन्माला आली की तिच्याकडे दुर्लक्ष करून तिचे आयुष्य कोवळ्या वयातच कसे संपेल हे पाहतात किंवा  प्रसंगी संपवितातही.सरकारी आकडेवारीत हे चित्र स्पष्टपणे दाखविलेले आहे. पुरेसे अन्न, कपडालत्ता व औषधे न मिळाल्यामुळे सहा वर्षे पूर्ण होण्यापूर्वीच मरण पावणाऱ्या बालकांमध्ये मुलींची संख्या जास्त आहे. मुलगी नको हा सामाजिक समजुतीचा विळखा सर्व समाजाभोवती किती घट्टपणे पडला आहे हे यावरून दिसून येईल. गेल्या आठवडय़ात मुंबई, ठाणे, पुणे अशा शहरांमध्ये सरकारी कारवाई करून गर्भलिंग चाचणी करीत असल्याचा संशय असणाऱ्या अनेक सोनोग्राफी केंद्रांना सील ठोकले. ठाणे व मुंबईतील उच्च मध्यमवर्गीयांच्या वस्तीत व्यवसाय करणाऱ्या डॉक्टरांना स्टिंग ऑपरेशन करून रंगेहाथ पकडण्यात आले. ‘लेक लाडकी’ या संस्थेच्या वतीने ही कारवाई करण्यात आली. या कारवाईचे वैशिष्टय़ असे की ‘लेक लाडकी’च्या कार्यकर्त्यांनी डॉक्टरांचा पर्दाफाश करण्यासाठी तंत्रज्ञानाचाच वापर केला. दोघांकडूनही अद्ययावत तंत्रज्ञान वापरले गेले. मात्र उच्चशिक्षित डॉक्टरांकडून केवळ भरपूर पैसा झटपट मिळविण्यासाठी तंत्रज्ञानाचा दुरुपयोग होत होता, तर सामाजिक कार्यकर्त्यांनी सामाजिक हितासाठी तंत्रज्ञानाचा योग्य वापर केला. गर्भलिंग चाचणीसाठी व मुलगी असल्यास गर्भपात करून घेण्यासाठी पन्नास हजार ते एक लाख रुपयांची मागणी या डॉक्टरांकडून होत होती. बाजारपेठीय अर्थव्यवस्थेचे लोण सध्या सर्वच क्षेत्रात पसरले असून वैद्यक ही सेवा न राहता कमशिर्यल उद्योग बनला आहे. परिणामी झटपट पैसा मिळविण्यासाठी गैरमार्ग अवलंबिण्यास काही डॉक्टरही मागेपुढे पाहात नाहीत. तथापि, या स्टिंग ऑपरेशन्समधून संपूर्ण वैद्यक क्षेत्राला आरोपीच्या पिंजऱ्यात उभे करण्याचा उद्योग काही मंडळींनी सुरू केला असून तो पूर्णपणे चुकीचा ठरेल. काही डॉक्टरांकडून गैरमार्गाचा अवलंब होतो म्हणून सर्वच डॉक्टर नालायक ठरत नाहीत. किंबहुना अपराधी डॉक्टरांवर कडक कारवाई करावी अशीच बहुसंख्य डॉक्टरांची मागणी आहे. ठाण्यातील डॉक्टरांवर कारवाई करताना रेडोलॉजिस्ट असोसिएशनच्या सरचिटणीसाने साक्षीदार म्हणून काम केले ही बाब येथे उल्लेखनीय ठरेल.सोनोग्राफी केंद्रात येणाऱ्या प्रत्येक गर्भवती स्त्रीचा एक फॉर्म डॉक्टरांनी भरून द्यायचा आहे. हा फॉर्म अतिशय किचकट असून त्यामध्ये चुका होण्याची शक्यता अनेक डॉक्टर बोलून दाखवितात. फॉर्म भरताना झालेल्या क्षुल्लक चुकांचा बागुलबुवा उभा करून सरकारचे वैद्यकीय अधिकारी अनेक प्रामाणिक डॉक्टरांना नाडतात. सरकारी वैद्यकीय अधिकाऱ्यांच्या या दंडेलीला चाप कसा लावता येईल हे सरकारने पाहिले पाहिजे. सरकारी वैद्यकीय अधिकाऱ्यांकडून धाडी घालण्यापेक्षा ठाणे, मुंबईत करण्यात आलेली स्टिंग ऑपरेशन्स संशयितांना पकडण्यासाठी अधिक उपयोगी पडतात. अशी स्टिंग ऑपरेशन्स करण्यास डॉक्टरांचाही पाठिंबा आहे. सोनोग्राफीची सोय जास्तीत जास्त सरकारी इस्पितळांमध्ये करून देणे हा एक उपाय असून सरकार तो योजण्याचा विचार करीत असल्याचे आरोग्यमंत्र्यांनी सांगितले. यामुळे सर्वच डॉक्टरांकडे संशयाने पाहणे कमी होणार असले तरी मूळ समस्या सुटणारी नाही. मुलीला नकार देण्याची मानसिकता ही कोणत्याही कायद्याच्या कठोर अंमलबजावणीने दूर होणारी नाही. या असंस्कृत मानसिकतेविरुद्ध लढण्यासाठी अनेक पातळींवरून प्रयत्न करावे लागतील.  मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यांनी याबाबत समंजस भूमिका घेतली असून कायद्याच्या धाकाबरोबरच समाजशिक्षण महत्त्वाचे ठरेल असे म्हटले. सेलिब्रेटिंग गर्ल चाइल्ड अशी संकल्पना त्यांनी मांडली. समाजात मुलींचे महत्त्व वाढावे, त्यांना प्रतिष्ठा मिळावी यासाठी सरकारने अनेक योजना सुरू केल्या आहेत. त्याला प्रतिसादही मिळतो. परंतु समाजाची मानसिकता बदलण्याची प्रक्रिया फार मंद चालते. अनेक वर्षांच्या अथक प्रयत्नांनंतर कुटुंबनियोजनाला सकारात्मक प्रतिसाद मिळण्यास अलीकडे सुरुवात झाली. गेल्या जनगणनेमध्ये लोकसंख्यावाढीचा वेग थोडा कमी झाल्याचे आढळून आले. वाढत्या कुटुंबाचा आर्थिक भार मोठा असतो हे वास्तव अनुभवास येत असूनही कुटुंबनियोजनाला पहिली अनेक वर्षे म्हणावा तसा प्रतिसाद मिळत नव्हता. मात्र आता चित्र झपाटय़ाने बदलत असून पुढील जनगणनेत त्याचे अधिक स्पष्ट प्रतिबिंब पडेल. मुलींना प्रतिष्ठा मिळवून देणारी मानसिकता समाजात रुजायला असाच काही काळ जावा लागेल. मात्र समाजाला त्या दिशेने नेण्यासाठी समाजशिक्षण व कायद्याचा धाक अशा दोन्ही स्तरांवर सातत्याने प्रयत्न करणे गरजेचे असते. ‘वंशाचा दिवा’ जन्माला घालण्याची घाई आणि ‘म्हातारपणाची काठी’ म्हणून मुलाकडे पाहण्याचा समाजाचा दृष्टीकोन हा यातला सर्वात मोठा अडथळा आहे.या आठवडय़ात लोकसंख्या दिनाच्या निमित्ताने गर्भातील मुलींना वाचविण्याची मोहीम सरकारने हाती घेतली व जिकडे-तिकडे धाडी घालण्याचे सत्र सुरू झाले. मात्र ‘लेक लाडकी’ या संस्थेने परिश्रमपूर्वक पुरावे गोळा करून डॉक्टरांना पकडले तसे सरकारी यंत्रणेने केलेले नाही. खरे तर सरकारी यंत्रणेकडून असे काम अपेक्षित होते. संशयित डॉक्टरांविरुद्ध ठोस पुरावे जमा करण्याऐवजी जास्तीत जास्त सोनोग्राफी यंत्रांना सील ठोकण्याचा कार्यक्रम हाती घेण्यात आला. एकदा हा लोकसंख्या दिनाचा विशेष संपला की या मोहिमेतील सरकारचा उत्साह मावळेल. समाजशिक्षणाची मोहीमही थंडावेल. पुढील जनगणनेमध्ये मुलांच्या तुलनेत मुलींचे प्रमाण आणखी खाली आले, जन्म घेणाऱ्या मुलींची संख्या घटत चालली आहे हे दिसून आले की पुन्हा एकदा सर्वाना या मोहिमेची जाग येईल. हे टाळायचे असेल तर गर्भलिंग चाचणीच्या विरोधात सुरू झालेली मोहीम सातत्याने सुरू राहिली पाहिजे. ही मोहीम योग्यरीतीने चालली तर त्याला डॉक्टरांचा विरोध होणार नाही. तसा विरोध झाला तर अशा डॉक्टरांच्या सचोटीबद्दल संशय घ्यावा लागेल. मुलीला नाकारणे हे लांच्छन आहे, अशी समजूत समाजात दृढ होईपर्यंत उसंत घेता येणार नाही.  अनेक देशांमध्ये ही मानसिकता समाजशिक्षणातूनच बदलली गेली. समाज आरोग्यसंपन्न करण्यासाठी तंत्रज्ञानाचा वापर झाला पाहिजे, कुणाचा जगण्याचा हक्क नाकारण्यासाठी नव्हे.

साभार- संपादकीय, लोकसत्ता

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शाश्वत समृद्धीकडे…….

सेंद्रिय शेती ही काळाची गरज तर आहेच पण नीट विचार केला तर ती शेती पद्धती ही आरोग्यदायी जीवनाची गुरुकिल्ली आहे. मृदशास्त्रामध्ये मातीला सजीव मानलेले आहे. कारण त्यात असंख्य प्रकारचे सूक्ष्मजीव व गांडुळे अविरतपणे कार्यरत असतात. आणि जमिनीवर पडणाऱ्या पालापाचोळ्याचे खतात  –  झाडाला उपलब्ध स्वरुपात –  रुपांतर  करण्याचे कार्य हे सूक्ष्मजीव व गांडुळेच करीत असतात. पालापाचोळ्यामधील  पोषक द्रव्ये झाडाला / पिकाला   वापरता येतील अशा  रुपात आणण्याचे बहुमूल्य कार्य सूक्ष्मजीव व गांडुळे करतात. त्या प्रक्रियेद्वारे निसर्ग वाळलेल्या पानात बंदिस्त असलेली पोषक द्रव्ये मुक्त करण्याचे काम किती सहजगत्या करून घेतो हे आपल्या लक्षात येईल.

हे करीत असताना त्या खतातील पोषक तत्वे वाढवण्याचं  कामही होते. जेव्हा रासायनिक घटकांचा वापर करून शेती केली जाते तेव्हा त्या रासायनिक घटकांमुळे मातीत असणाऱ्या या सजीवांच्या अस्तित्वाला धोका निर्माण होतो, हळूहळू त्यांची संख्या कमी होऊ लागते……आणि मातीमधले जीवन संपुष्टात येते.  अशा वेळी माती हे पिके वाढविण्याचे केवळ एक भौतिक माध्यम उरते.

गांडूळ हा शेतकऱ्याचा मित्र आहे हे आपण पुस्तकात वाचतो. पण शेतीमध्ये रासायनिक घटकांचा वापर करून ह्या मित्राचा सर्वनाश करून आपण उत्पादन वाढीची स्वप्ने पाहत आहोत !!!! ही स्वप्ने पूर्ण होण्याचा आपला मुलाधारच चुकीचा आहे. सेंद्रिय शेती हीच शाश्वत शेती असल्याचे विविध संशोधनातून आता सिद्ध होत आहे. ते खरं आहे कारण ते निसर्ग नियमाला धरून आहे. आपली प्रगती ही निसर्गाबरोबर चालूनच होणार आहे हे आता सर्वांच्या लक्षात येऊ लागले  आहे.

सेंद्रिय शेतीमध्ये मधमाश्या आणि इतर उपयुक्त कीटकांचा परागीभवन व कीड नियंत्रणासाठी उपयोग होतो. बरेच पक्षी वेगवेगळ्या प्रकारच्या किडी खावून फस्त करतात आणि त्यांना नियंत्रणात ठेवतात. त्यामुळे सेंद्रिय शेतीमध्ये पक्ष्यांनाही फार मोलाचे स्थान आहे. म्हणूनच  अशा प्रकारची शेती करणाऱ्यांनी पक्ष्यांसाठी निवारे उभारावेत ….. म्हणजेच भारतीय प्रजातीच्या विविध वृक्षांची लागवड आपल्या शेतावर करावी.

सेंद्रिय शेती करीत असताना खत म्हणून शेण, राख तसेच जमिनीवर पडणारा पालापाचोळा आणि पिकांचे अवशेष इत्यादींचा वापर करता येतो. पिकांचे किडी आणि रोगांपासून संरक्षण करण्यासाठी गोमुत्र, कडुलिंब तसेच इतर विविध वृक्षांच्या पानांचा वापर करता येतो. त्याच बरोबर वेगवेगळ्या पीक पद्धतीचाही वापर करता येतो. शेतीसाठी लागणारे असे विविध घटक (नैसर्गिक किवा सेंद्रिय खते, पीक  संवर्धक घटक,  बुरशीनाशके आणि कीटकनाशके  इत्यादी)  आता बाजारातही उपलब्ध आहेत. तसेच अशा शेतीचं ‘सेंद्रिय प्रमाणीकरण’ केल्याने शेतीतील उत्पन्नाला अधिक दरही मिळू शकतो.

आमची कार्यपद्धती

अशा शेती प्रकल्पामध्ये आम्ही त्याचे नियोजन, फळे आणि भाजीपाला लागवड आणि त्या पिकांची जोपासना (खत व्यवस्थापन, पाणी व्यवस्थापन, पीक  संरक्षण इत्यादी) यासाठी मार्गदर्शन करतो.
हे सर्व करताना शेतावरील दैनंदिन व्यवहारांच्या नोंदी (शेतावर होणारे काम, येणारे उत्पन्न, तसेच लागणाऱ्या सर्व घटकांच्या नोंदी इत्यादी ठेवण्यासाठी योग्य असे आराखडे ) आणि शेताचे सेंद्रिय प्रमाणीकरण याकरिता मार्गदर्शन करतो.

  • आवश्यकतेनुसार शेताला भेट देऊन मार्गदर्शन
  • भेटीच्या वेळी मागील सांगितलेल्या कामांच्या प्रगतीचा आढावा आणि आवश्यकतेनुसार पुढील कामांचे नियोजन.
  • काही कामांचे प्रात्यक्षिक – उदा. आंबा काजू इत्यादी फळ झाडांना खते देताना झाडांच्या वयाप्रमाणे आणि विस्ताराप्रमाणे गोलाकार चर (रिंग) तयार करावा लागतो. झाडाच्या विस्ताराप्रमाणे रिंगचा आकार लहान किवा मोठा करावा लागतो. याचे शेतावर प्रात्यक्षिक दाखवून त्यामागील शास्त्रीय कारण समजावून सांगितले जाते.
  • पुढील कामांसाठी लागणाऱ्या साहित्याची यादी व नियोजन.

आमच्या नियमित भेटीमुळे शेतीच्या कामामध्ये सातत्य व अचूकता टिकवता येते आणि त्यामुळे अशा प्रकल्पांची   व्यावहारिक आणि शास्त्रीय दृष्टीकोनातून योग्य दिशेने वाटचाल होण्यास मदत होते. अर्थातच शेतीचे यश हे आपल्या प्रयात्नांबरोबरच निसर्गावर अवलंबून आहे हे लक्षात ठेवायला हवं. निसर्गाच्या विविध घटकांचा  – हवा, पावसाचे कमी / अधिक प्रमाण, वारा, थंडी, उन्हाचं  प्रमाण / तीव्रता, ढगाळ हवामान इत्यादी – पिकांच्या वाढीवर आणि पर्यायाने उत्पन्नावर परिणाम होत असतो.

साभार-

Krishivarada Organic and Environment Learning

लैंगिकता आणि नैतिकता


तरुण मुले ब्ल्यू फिल्मस् का पाहतात? पुरुष गर्दीत वा अंधारात स्त्रीची छेडछाड करण्याची संधी का शोधतात? स्त्रिया अंगप्रदर्शनाच्या आहारी का जातात? भारतात विवाहसंस्था मजबूत असूनही आपण कोणत्या अतृप्त इच्छेच्या मागे धावत आहोत?  एकीकडे विवाहाद्वारे लैंगिक संबंधांवर बंधने घालून घेऊन, दुसरीकडे तीच बंधने झुगारण्यासाठी नकळतपणे चोरवाटा, पळवाटांचा आधार माणूस का घेत राहतो? हे वास्तव बदलायचे कसे?
भिन्नलिंगी आकर्षण, नंतर विवाह आणि मग त्यातून स्त्री-पुरुष जोडप्याला होणारे मूल ही चाकोरी मानवी जीवनाचा एक अविभाज्य भाग बनून गेलेली आहे. कधी एकेकाळी विवाह पद्धतीचा स्वीकार केल्यानंतर फक्त त्या चौकटीतल्या शरीरसंबंधाव्यतिरिक्त दोन व्यक्तींच्या शरीरसंबंधाच्या अन्य पद्धती मानवाला अनोळखी होऊन गेल्या. विवाहाद्वारे मान्यता मिळालेल्या आणि भिन्नलिंगी असणाऱ्या व्यक्तींनीच शरीरसंबंध करायचा आणि हा शरीरसंबंध म्हणजे संभोगच! शिवाय तो मूल होऊ देण्यासाठीच करायचा, अशा जखडलेल्या आणि निसर्गविरोधी समजुती विवाहप्रथेने आपल्या डोक्यात भरवून दिल्या. पती-पत्नीने शृंगारिक (रोमँटिक) होणे, हे संभोगासाठीच आवश्यक मानले जाऊ लागले. काही संस्कृतीत तर पती-पत्नीने एरव्ही आपसातली प्रेमभावना, ओढ लपवायची, एकमेकांजवळ बसायचे नाही, हास्यविनोद, गप्पा करायच्या नाहीत आणि फक्त रात्रीपुरतेच आम्ही (संभोगासाठी) एकत्र असतो, हे जगाला दाखवायचे, इतक्या टोकापर्यंत स्त्री-पुरुष (पती-पत्नी) संबंध हे पुढेपुढे अनेक शतके हास्यास्पद आणि कृत्रिम होऊन गेले, ते विवाहाच्या वाढत्या आग्रहामुळे आणि भन्नाट नैतिक कल्पनांच्या अट्टहासामुळे!
निसर्ग, पुनरुत्पत्तीसाठी, प्राणी शरीरांत हार्मोन्स निर्माण करून नर-मादींना एकत्र आणतो, हे खरं असलं तरी प्राण्यांमधील नर-मादी मात्र, अपत्य होऊ देण्याच्या जाणिवेने जवळ येत नसतात, हा मुद्दा महत्त्वाचा आहे. माणसाने बुद्धिसामर्थ्यांने विवाहाचा वापर हेतूत: अपत्य मिळवून देण्यासाठी केलेला असला तरीही स्त्री-पुरुषसुद्धा प्रत्येक वेळेस अपत्य होऊ देण्यासाठीच शरीरसंबंध करीत नाहीत, हेसुद्धा तितकेच महत्त्वाचे आहे. प्रत्येक सजीव प्राणी ‘जगणं’ याचा अर्थ त्याने फक्त ‘श्वसन करावे’ असा नसून, त्याने शारीरिक- मानसिक तंदुरुस्त असले पाहिजे आणि तो पुनरुत्पत्ती करू शकला पाहिजे, हे महत्त्वाचे असते. त्या दृष्टीने पोटाची भूक आणि लैंगिक भूक हे सजीव तंदुरुस्तपणे जगण्याचे प्रमुख आधारस्तंभ आहेत.
तरीसुद्धा एखाद्या खाद्यपदार्थाचा तुकडा माणूस तोंडात टाकतो, म्हणजे त्याला भूक लागलेली आहे, असा त्याचा अर्थ नसतो. अन्नाचा निव्वळ आस्वाद घेण्यासाठी, कुणाला साथ-सोबत करण्यासाठी, स्वत:चा वेळ घालविण्यासाठी, मनाचा ताण, नैराश्य किंवा शीण कमी करण्यासाठी, एकटेपणा विसरण्यासाठी माणूस खात किंवा पीत असतो. म्हणजेच ‘पोटाची भूक’ या नैसर्गिक ऊर्मीचे माणूस स्वत:चे शरीर-मन स्वस्थ ठेवण्यासाठी अनेक उपयोग करून घेतो. तद्वत शरीरसंबंधातूनही लैंगिक उत्कटता (orgasm) प्राप्त झाल्यास माणूस दैनंदिन ताणातून मुक्त होतो, ताजातवाना होतो आणि पुन्हा आपल्या कामाला उत्साहाने लागतो.
स्त्रीचा जननकाळ संपल्यावरसुद्धा स्त्री व पुरुषांमध्ये आकर्षण असते आणि शरीरसंबंधाची इच्छाही असते. अर्थात या वयातील लैंगिक संबंधाचा आनंद हा मूल मिळविण्यासाठीचा नाही, हे स्पष्टच आहे. तरीही orgasm च्या परमोच्च आनंदातून शारीरिक- मानसिक ताणाचा निचरा होऊन त्यायोगे फिट राहण्यासाठी हे शरीरसंबंध उपयुक्त असतात आणि म्हणून ते होत राहतात; हे लक्षात येते. पती-पत्नीमध्ये एकमेकांना लैंगिक उत्कटता प्राप्त करून देण्याचे प्रयत्न होत असतील तर दोघांमधील कोणताही गंभीर तणाव विरून तर जातोच; परंतु दिवसेंदिवस विश्वासाचे व प्रेमाचे नाते दृढ होत जाते. कारण orgasm  च्या अनुभवाने स्त्री-पुरुष रिलॅक्स व शांत होतात. अत्यंत महत्त्वाची बाब म्हणजे या रिलॅक्सेशनसाठी संभोग क्रियेची स्त्री-पुरुष दोघांनाही गरज असत नाही. निव्वळ स्पर्शानेसुद्धा ते सुख कोणत्याही दोन व्यक्तींना देता येत असते. अनेक सेक्सॉलॉजिस्टचे म्हणणे असते की, ”Sex doesn’t always mean intercourse.”
एखाद्या स्त्री वा पुरुषाला स्वत:ला मूल नको असते किंवा पारंपरिक पती-पत्नीक संसाराच्या कल्पना मान्य नसतात. अशा वेळेला खात्रीलायकपणे मूल न होणारे संबंध म्हणजे समलैंगिक संबंध! या संबंधात संभोगापेक्षा लैंगिक उत्कटतेची गरज भागविणे महत्त्वाचे असते. समलैंगिक संबंधामागील अनेक कारणांपैकी हे एक कारण आहे.
पुरुषांनी हस्तमैथुनाद्वारे लैंगिक उत्कटतेचा अनुभव घेणे हे अलीकडे स्वाभाविक मानले जाते आणि त्यास विकृती मानणे, जगातील सेक्सॉलॉजिस्टनी चुकीचे ठरविले आहे. लैंगिक orgasm पुरुषाला स्पर्शाद्वारे आणि संभोगक्रियेतून मिळू शकते. परंतु स्त्रीला, ही उत्कटता संभोगक्रियेतून खात्रीलायक मिळत नाही आणि जास्तकरून ती स्पर्शाने मिळते. पतीला हे समजत नसेल तर असंख्य विवाहित स्त्रिया अशा परमोच्च सुखाच्या क्षणापर्यंत पोहोचतच नाहीत. त्यामुळे अंतर्यामी त्या अस्वस्थ आणि नैराश्यग्रस्त असतात. ज्या स्त्रियांना ताणमुक्तीसाठी अशा स्पर्शाची गरज समजलेली आहे, त्यासुद्धा  हस्तमैथुन करतात, असे अमेरिकन अहवाल सांगतात.
माणसाचे मन आणि शरीर ही एकमेकांना जोडलेली अवलंबित अवस्था असल्यामुळे मनावरील ताणाचा निचरा लैंगिक उत्कटपणाच्या शारीरिक क्रियेमधून होऊन जाणे, या physiology चे महत्त्व दुर्दैवाने आपण जाणलेले नाही आणि निव्वळ त्याची नैतिक-अनैतिक अशी वर्गवारी करण्यात आपण शहाणपणा मानलेला आहे. सेक्स क्रियेतून लैंगिक उत्कटतेचा येणारा प्रत्यय स्त्री-पुरुषांचे भावनिक संतुलन स्थिर राखतो आणि कुटुंबातील, समाजातील अनेक अप्रिय घटना टळतात. शिवाय अनेक मानसिक व शारीरिक व्याधी आणि विकारांपासून माणूस मुक्त राहतो.
आधी उल्लेखिल्याप्रमाणे, स्त्रियांना हा परमोच्च उत्कटतेचा (orgasm)  अनुभव कसा देता येईल, याचे ज्ञान पतीला नसल्यास आणि मग आपण नेमके कशामुळे असमाधानी आहोत, हे स्त्रियांना माहीत नसल्यामुळे, पत्नी-पत्नीच्या संसारात हे असमाधान ‘धुसफूस’ स्वरूपात पत्नीकडून बाहेर पडत राहते. काही वेळेला याबाबत मन:शांती मिळविण्यासाठी स्त्रिया देव-धर्मात स्वत:ला बुडवून टाकतात, तर अनेक स्त्रिया बुवाबाजी करणाऱ्या पुरुषांच्या नादी लागतात. काही स्त्री-पुरुष आध्यात्मिक प्रवचनांतून या असमाधानाचे, बेचैनीचे उत्तर शोधू पाहतात, पण उत्तर दुसरीकडेच असते. काही स्त्रिया उद्वेगाने पतीबरोबरच्या संभोग क्रियेलाच विरोध करतात, कारण त्यापासून फक्त पतीला सुख मिळते आणि आपण वंचित राहतो, ही जाणीव त्यांना ग्रासून टाकते. त्यामुळे पती-पत्नी संबंधातच अडचण निर्माण होते. याचे मूळ कुठे आहे, हे न समजल्यामुळे एकमेकांवर अनेक व्यक्तिगत चुकीचे आरोप होऊन, स्त्री-पुरुषांचे घटस्फोट घडून आलेले पाहावे लागतात.
मानसिक ताणसुद्धा स्त्री आणि पुरुषांचे वेगवेगळे आणि कमी-अधिक तीव्रतेचे असतात. याला माझ्या मते, स्त्री-पुरुषाची नैसर्गिक जीवनशैली आणि वृत्ती कारणीभूत आहे. जगातील बहुसंख्य प्रौढ स्त्रियांना मातृत्वामुळे नवनिर्मितीचा आनंद मिळतो. आणि त्या निर्मितीचे पुढे अनेक वर्षे संगोपन करण्यामधून स्त्रियांच्या मानसिक ताणाचा निचरा होत असतो. स्त्री जितकी आपल्या मुलांमध्ये मानसिक-भावनिक गुंतलेली असते, तितका पुरुष निसर्गत: नसतोच. म्हणून अलीकडे ‘चांगले मन:स्वास्थ्य’ राहण्याकरिता, मुलांच्या संगोपनात स्वत:ला पुरुषांनी गुंतवावे, असा त्यांना सल्ला दिला जातो. स्त्रीकडे असणाऱ्या या नैसर्गिक देणगीमुळे, तिच्या आयुष्यातील ताणतणावांचा आणि लैंगिक उत्कटतेच्या असमाधानकारक अनुभवाचा ती बऱ्यापैकी सामना करू शकते.
पुरुष व्यक्तिमत्त्वात ही त्रुटी आहे. शिवाय पुरुषाची वृत्ती ही जास्तकरून स्पर्धात्मक आणि म्हणून सूडात्मक आहे, जी कोणत्याही दोन नरांमध्ये नैसर्गिकपणे वसलेली असते. त्यामुळे घराबाहेरील सर्व क्षेत्रे, जी पुरुषांनी स्त्रियांना घरात बसवून निर्माण केलेली आहेत, ती स्वाभाविकच या स्पर्धावृत्तीने भारलेली आहेत. या बाहेरच्या जगात वावरताना, स्वत:च निर्माण करून ठेवलेल्या या क्षेत्रात स्पर्धेला तोंड देताना, सूडात्मक कारस्थानात भाग घेतल्यामुळे किंवा बळी पडल्यामुळे पुरुषाला स्त्रीच्या तुलनेत जास्त ताणाखाली जगावे लागते. बालसंगोपन वा तत्सम कौटुंबिक जबाबदाऱ्यांमध्ये पुरुषाला भाग घेता न येण्याची अनेक कारणे असल्यामुळे किंवा कुटुंबापासून दूर राहावे लागल्यामुळे सेक्स अ‍ॅक्टिव्हिटी हा एकमेव पर्याय ताणमुक्त होण्याकरिता पुरुषांसमोर राहतो. त्याकरिता पत्नीवर जबरदस्ती, विवाहबाह्य़ संबंध, बलात्कार अशा मिळेल त्या मार्गाने पुरुष जेव्हा स्वत:ला रिलॅक्स करू पाहतो, तेव्हा ‘स्त्री’ नामक माणसाला अनेकदा अन्याय, अत्याचाराचे बळी व्हावे लागते. कारण विवाहापलीकडील शरीरसंबंध हे अन्याय, अनैतिकता किंवा विकृती  अशा पद्धतीनेच व्यक्त होऊ शकतात, अशी वस्तुस्थिती आहे.
निसर्गाने आपल्याला लैंगिक भावना जशी दिलेली आहे, तशी ती घेता येणे अनैतिक आहे, असे बिंबवून, त्यासंबंधी स्त्री-पुरुषांनी व्यक्त होणे हा असंस्कृतपणा आहे, असे आपण मागील कित्येक शतके ठरवून टाकलेले आहे. पुरुषाने स्त्रीकडे पाहून वा उद्देशून लैंगिक शब्दप्रयोग केल्यास, त्या शब्दास प्रतिशब्द वापरून हास्यविनोद करणारा आणि पुरुषाचीही चेष्टा-मस्करी करणारा स्त्रीवर्ग केव्हाच काळाच्या पडद्याआड गेलेला आहे. अशा स्त्रियांची आज आपण कल्पनाही करू शकत नाही.
ज्या जंगली काळात, मधोमध अग्नी प्रज्वलित करून त्या प्रकाशात आपले ऋषिपूर्वज स्त्री-पुरुष समागम करीत होते, त्या काळात कामुक भावना उद्दीपित करण्यासाठी स्त्री व पुरुष एकमेकांना उद्देशून लैंगिक शब्दांचा वापर करीत असत; असे इतिहासाचार्य वि. का. राजवाडे ‘भारतीय विवाहसंस्थेचा इतिहास’ या पुस्तकात नोंदवितात. ते लिहितात, ‘रानटी ऋषिपूर्वज स्त्री-पुरुष यज्ञभूमीवर म्हणजे धगधगीत धुनीभोवती उबाऱ्याला जमत. लिंग व योनी यांचे वाचक शब्द एकमेकांना उद्देशून हरहमेश बोलत. ‘यज् + न’ ते जमून प्रजोत्पादन करतात, असा यज्ञ या शब्दाचा मूळ अर्थ रानटी ऋषिपूर्वजांच्या भाषेत होता’, असे राजवाडे लिहितात. तसेच ‘गर्भ, योनी, रेत, इंद्रिय, वृष, वृषण, वीर्य ज्यांचा उच्चार आपल्याला आज अश्लील वाटतो, ते सर्व शब्द यजु:संहितेत अग्नीच्या सान्निध्याने पदोपदी आढळतात,’ असे वि. का. राजवाडे नोंदवितात. भारतीय ट्राइब्सवरील अगदी अलीकडील संशोधनात कमलाबाई चट्टोपाध्याय आपल्या ‘ट्रायबॅलिझम इन इंडिया’ या पुस्तकात लिहितात, ‘या ट्राइब्समध्ये लैंगिकता ही सर्व विश्वाचीच कल्पना मानली जाते. लैंगिक संबंध हे लाज वाटण्याची, लपविण्याची आणि लैंगिक इच्छा दडपून टाकण्याची बाब ते मानीत नाहीत.’
यावरून स्पष्ट होते की, विवाहप्रथा सुचलेली नसताना नैतिकतेच्या कल्पना वेगळ्या होत्या आणि विवाहप्रथेनंतर मानवाच्या लैंगिक संबंधावर, त्यासंबंधीच्या विचारांवर आणि व्यक्त होण्यावर सर्व बाजूंनी मर्यादा घातल्या गेल्या. प्राचीन काळात स्त्री-पुरुषांनी एकमेकांवर कामुक शब्दांची मोकळेपणाने उधळण करून व्यक्त होण्यात जी एक समानता होती, ते शब्द पुरुषांनी स्त्रीला लज्जित, अपमानित करण्याकरिता आज एकतर्फी वापरावेत, यावरून आपल्या मानसिकतेत पडलेला प्रचंड फरक लक्षात यावा.
सेक्सबाबत स्त्री-पुरुषांमधील नि:संकोच भावना या नैसर्गिक आहेत. त्यात वाईट चालीचे काहीही नाही; परंतु हे सर्व विवाहाच्या पाश्र्वभूमीवर वाईट ठरवणे भाग पडलेले आहे, हे नेमके आपण लक्षात घेत नाही. विवाहाने स्त्री-पुरुषांच्या लैंगिक इच्छेचे खासगीकरण करून टाकलेले आहे. हे खासगीकरण स्वीकारताना ‘चोरून पाहणे’ किंवा ‘लपून करणे’ या (प्रति)क्रिया दाबून टाकलेल्या लैंगिक भावना व्यक्त करण्यासाठी अपरिहार्य झालेल्या दिसतात. त्यातून निर्माण होत गेलेली स्थिती आणि परंपरा नैतिक म्हणायच्या का,  हे आता एकदा ठरवावे लागेल.
म्हणजे उदाहरणार्थ, कामुक शब्दांचा वापर विवाहप्रथेमुळे निषिद्ध झाल्यावर अनेक सहस्रकांची ही पद्धत लगेच बंद पडणे शक्य नव्हते. भारतीय संस्कृतीतल्या होळी सणात अग्नी मध्यभागी पेटवून, स्त्री-पुरुषांचा समागम नाही, तरी लैंगिक शब्दोच्चारण त्या सणामध्ये करण्याची प्रथा नंतर अनेक शतके रूढ होती. नैसर्गिक मुक्ताचरणाचा गमावलेला आनंद वर्षांतून एकदा तरी प्रतिकात्मक पद्धतीने घेता यावा, म्हणून आपल्या पूर्वजांनी आणलेला हा सण!
नंतर त्या शब्दोच्चारावरही बंदी आली. तोपर्यंत लेखनकलेच्या माध्यमातून महाकाव्ये, प्राचीन वाङ्मये, कथा-कादंबऱ्या, चित्रे-शिल्पे यामधून फक्त स्त्री-शरीराची वर्णने प्रदर्शित होत राहिली. कारण विवाहामुळे व्यवस्था उत्तरोत्तर ‘पुरुषांकरिता’ होत जाणे आणि स्त्रीच्या कौमार्याचे, चारित्र्याचे नवे स्तोम माजवणे, यामुळे लैंगिक उत्कटतेचा विचार स्त्रीबाबत जगभरात कुठेच शिल्लक राहिला नाही. स्त्रीने सहजपणे कामुक शब्दोच्चार पुरुषाला उद्देशून करण्याची परंपरा बंद पडली. फक्त तमाशा, मुजरा, कोठीनृत्य, कॅब्रे, वेश्यागृहे या सभ्य समाजाने निंद्य ठरविल्या गेलेल्या माध्यमांचा आधार स्त्रियांना घ्यावा लागलेला दिसतो. स्वत:च्या लैंगिक उत्कटतेचा आनंद मारून ‘पुरुषाला लैंगिक उत्तेजित करणारी’ असा एकतर्फी शिक्का स्त्रीच्या नशिबी आला.
आपण गेल्या काही शतकांचा सामाजिक इतिहास पाहिला तर, ज्या ज्या जमातींमध्ये विवाहाद्वारे स्त्री-पुरुष संबंधाचा ताबा घेतलेला दिसतो, त्या सर्व मानवी संस्कृतींमध्ये मुक्त व सहज स्त्री-पुरुष संबंधाची जागा अनावश्यक कुतूहल, पिळवणूक, छळ, मानहानी आणि त्यातून सवंग करमणूक अशा चिंताजनक विकृतीने घेतलेली दिसते.
शिवाय पुढील कालखंडातील अनेक शोध, उदा. फोटोतंत्र, चित्रपटतंत्र, फोनतंत्र, टेलिव्हिजन, सध्याच्या सीडीज्, वेबसाइट्स, मोबाईल या सर्वाचा उपयोग आहेच, पण या सुविधांकडे खेचून घेण्यासाठी ‘सेक्स’चा वाढता वापर, हे मार्केटिंग तंत्र बनलेले आहे. अर्धनग्न फोटोज्, चित्रपटातील सेक्सी नृत्ये आणि बेड सीन्स, ब्ल्यू फिल्म्स, पोर्नोग्राफी, दूरचित्रवाणीवरील अंगप्रदर्शन, विवाहबाह्य़ संबंध, सेक्सी जाहिराती, फोन आणि एसेमेसचा स्त्रियांना लैंगिक शब्दोच्चार ऐकविण्यासाठी पुरुषांकडून वापर आणि ज्या ज्या तंत्रांमध्ये सेक्ससंबंधी काही आहे, ती तंत्रे पाहण्यासाठी आणि खरेदीसाठी प्रचंड गर्दी.. हे सर्व जर आपण लक्षात घेतले तर एक गोष्ट सरळ स्पष्ट आहे की, विवाहाने अनैतिक, अनैतिक म्हणून जी नैसर्गिक कामुक भावना बंद पाडण्याचा प्रयत्न गेले कित्येक शतके केला, ती भावना खरेतर कुठल्याच काळात बंद पडलेली नाही. उलट नवनव्या टेक्नॉलॉजीच्या आधारे नव्या वाटा शोधत ती भावना अनैसर्गिक रूप धारण करून आपल्यावर आदळते आहे.
तरुण मुले ब्ल्यू फिल्म का पाहतात? शाळकरी मुले पोर्नोग्राफीसाठी सायबर कॅफेत का गर्दी करतात? रॅगिंगमध्ये लैंगिक छळाचा आनंद का घेतला जातो? पुरुष गर्दीत वा अंधारात स्त्रीची छेडछाड करण्याची संधी का शोधतात? स्त्रिया अंगप्रदर्शनाच्या आहारी का जातात? राखी सावंतचे चुंबन किंवा रॉयल किस भारतीय स्क्रीनवर भडिमाराने का दाखवले जाते? पाश्चात्त्यांच्या तुलनेत भारतात विवाहसंस्था मजबूत असूनही, आपण मग अशा कोणत्या अतृप्त इच्छेच्या मागे धावत आहोत?
मानवी जीवनात आपण सेक्सविषयक एक स्वच्छ, सहज, आनंददायक विचारसरणी इतकी गमावून बसलो आहोत की जिथे तिथे ‘सेक्स कुतूहल’ हे आपले दैनंदिन जीवन होऊन बसलेले आहे. विवाह करून वा न करून या स्थितीत फरक पडण्याची कोणतीही आशा दिसत नाही.
थोडक्यात, निसर्गाने सरळपणाने स्त्री-पुरुषांना देऊ केलेले, शरीरसंबंधाचे सन्माननीय प्रामाणिक तत्त्व आपण भलत्याच नैतिक कल्पना उराशी बाळगून गुन्हा पातळीवर नेलेले आहे. एकीकडे विवाहाद्वारे बंधने घालून घेऊन, दुसरीकडे तीच बंधने झुगारण्यासाठी नकळतपणे चोरवाटा, पळवाटांचा आधार माणूस अनेक शतके घेत राहिला. आजच्या युगात या पळवाटासुद्धा उत्तरोत्तर विकृत आणि हिंसक होत चाललेल्या दिसतात.
हे वास्तव बदलायचे असेल तर राजकीय इच्छाशक्तीने मुलांच्या शालेय नागरिकशास्त्रात मानवी नातेसंबंधांवर भर देणारा सकारात्मक बदल आणायला हवा. तसेच मुले, पालक व विवाहेच्छु तरुणांचे गट यांच्या वेगवेगळे गट करून त्यांना  लैंगिक शिक्षण द्यायाला हवे, तेही परस्परांना समजून घेण्याच्या दृष्टीने! इतिहास विषयात केवळ राजकीय इतिहास न ठेवता निसर्गशास्त्र, मानववंशशास्त्र व उत्क्रांतीच्या इतिहासाचा अंतर्भाव असायला हवा. असे ठोस प्रयत्न झाले तरच काही हजार वर्षे कृत्रीम नैतिक मूल्यांमध्ये अडकल्याने स्त्री-पुरुषांच्या एकूणच नातेसंबंधांची जी हानी झाली आहे, त्याबद्दल मुळातून विचार करण्याच्या स्थितीत आपण येऊ शकू.
जर आपण हे करू शकलो, तर मग एक वेळ अशी येईल की, प्रसारमाध्यमांतून कोणी काहीही विकृत प्रसारीत करावे, त्याला नाकारणारा प्रगल्भ प्रेक्षक व वाचक तयार होईल. तीच खऱ्या बदलाची नांदी ठरेल.

मंगला सामंत –

mangala_samant@yahoo.com

साभार- चतुरंग, लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=166014:2011-06-24-05-21-56&catid=194:2009-08-14-02-31-30&Itemid=194