पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का नया युग…..

भारत एक ऐसा देश है, जिसका पर्यावरण संबंधी आंदोलनों, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और उत्तरदायी उच्च न्यायपालिका का अपना समृद्ध इतिहास रहा है. ऐसे देश में 2011 का वर्ष पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष अर्थात मील का पत्थर साबित हुआ है. यद्यपि पर्यावरण संबंधी मुक़दमेबाज़ी पिछले तीन दशकों में काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के कारण 2011 का वर्ष फिर भी काफ़ी विशिष्ट है. केवल यही एकमात्र तथ्य नहीं है कि इसकी स्थापना की गई, क्योंकि इससे पहले भी ऐसे ही एक अधिकरण की स्थापना की गई थी, जो इससे कम शक्तिशाली था. लेकिन जिस तरह से उच्चतम न्यायालय द्वारा पर्यावरण और वन मंत्रालय को इस दिशा में सक्रियता से प्रेरित किया गया, वह इसकी विशेषता बन गई. राष्ट्रीय हरित अधिकरण का पहला क़दम और इसे पूरी तरह से स्थापित करने का निरंतर संघर्ष काफ़ी महत्वपूर्ण रहा है. पर्यावरण संबंधी मामलों पर केंद्रित और गठित राष्ट्रीय हरित अधिकरण के क़ानून को जून, 2010 में राष्ट्रपति की स्वीकृति तो मिल गई थी, लेकिन इसे केंद्र सरकार की अधिसूचना के ज़रिये उस वर्ष के  दौरान 18 अक्टूबर को ही लागू किया जा सका. उसी दिन भारत के उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एलएस पांटा को इसके पहले अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर दिया गया, हालांकि न तो किसी अन्य सदस्य को तब तक नियुक्त किया जा सका था और न ही इसके लिए बुनियादी ढांचा और र्स्टों मुहैया कराया जा सका था.

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन पर्यावरण और वन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए किया गया था. यद्यपि राष्ट्रीय हरित अधिकरण का अभी मूल्यांकन करना कदाचित जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतनी व्यापक शक्तियों और न्याय-सीमा के साथ ऐसे विशिष्ट अधिकरण के अस्तित्व से ही भारत में पर्यावरण संबंधी क़ानूनी मुद्दों का समय पर निपटारा किया जा सकता है.

राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम के लागू होने से दो वर्तमान क़ानून स्वतः ही भंग हो गए हैं. राष्ट्रीय पर्यावरण अधिकरण अधिनियम 1995 और राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम 1997 और इसी कारण राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण भी समाप्त हो गया, जिसे पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं के लिए दिए गए अनुमोदनों के खिलाफ़ सुनवाई करने के लिए एक अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में प्राधिकृत किया गया था. राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण के सामने लंबित सभी मामलों की सुनवाई अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण करेगा. इसके बंद हो जाने से एक न्यायिक शून्य पैदा हो गया था और नए मामलों की सुनवाई के लिए कोई मंच नहीं रह गया था और सभी लंबित मामले अधर में लटक गए थे. अध्यक्ष के अलावा कम से कम एक और सदस्य की नियुक्ति के बिना राष्ट्रीय हरित अधिकरण काम ही नहीं कर सकता था. यद्यपि पर्यावरण और वन मंत्रालय ने विनियामक अनुमोदन देना जारी रखा, लेकिन उन्हें चुनौती देने के लिए कोई न्यायिक निवारण तंत्र नहीं रह गया था. यह स्थिति अनिश्चित काल तक बनी रहती, यदि उच्चतम न्यायालय ने यह निर्देश न दिया होता कि पर्यावरण और वन मंत्रालय नए अधिकरण की स्थापना के संबंध में की गई प्रगति से उन्हें नियमित रूप में अवगत कराता रहे. इसके परिणाम स्वरूप 5 मई, 2011 को तीन न्यायिक सदस्यों और चार विशेषज्ञ सदस्यों को नियुक्त किया गया और राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अपनी पहली सुनवाई 25 मई, 2011 को शुरू की.

राष्ट्रीय हरित अधिकरण की न्याय-सीमा का दायरा अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण से कहीं अधिक व्यापक है. इसके अंतर्गत वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता सहित सात क़ानूनों के कार्यान्वयन से पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण सवाल उठने वाले मामले भी सुने जा सकते हैं. यह केवल अपीलीय निकाय ही नहीं है, बल्कि इसके मूल क्षेत्राधिकार में कुछ खास कोटि के मामलों पर निर्णय देने का अधिकार भी आ जाता है. यह क्षतिपूर्ति के निर्णय दे सकता है और क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकीय और संपत्ति के फिर से बहाली के प्रत्यक्ष निर्णय भी दे सकता है.

आजकल नियमित सुनवाई की जाती है, लेकिन राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने बड़ी संस्थागत चुनौतियां भी हैं. राष्ट्रीय हरित अधिकरण दो अलग-अलग परिसरों से अपना काम करता है, क्योंकि इनके अपने परिसर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस समय क़ाबिज़ है. कुल दस न्यायिक और दस विशेषज्ञ सदस्यों में से केवल दो न्यायिक और चार विशेषज्ञ सदस्यों की ही अब तक नियुक्ति की गई है और अध्यक्ष ने इस्तीफ़ा दे दिया है. लगता है कि सरकार सदस्यों के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराने में असमर्थ है. पुणे, कोलकाता और चेन्नई की सर्कट बेंचों में अभी तक सुनवाई शुरू भी नहीं हुई है, जबकि भोपाल बेंच में उद्‌घाटन के रूप में पहली सुनवाई पिछले नवंबर में ही हो गई थी. दिलचस्प बात तो यह है कि जब राष्ट्रीय हरित अधिकरण को पहले पहल संसद में पेश किया गया तो तत्कालीन पर्यावरण एवं वन मंत्री 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के प्रतीक के रूप में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की पहली बेंच की स्थापना भोपाल में ही कराने के लिए उत्सुक थे, लेकिन अधिनियम के पारित होने से पहले ही यह प्रस्ताव त्याग दिया गया.

पिछले नौ महीनों में लगभग अस्सी मामले राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने आए हैं. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की व्यापक न्याय-सीमा के आधार पर अनेक प्रकार के मुद्दे उठाए गए. इन मुद्दों में बिजली परियोजनाओं को पर्यावरण संबंधी अनुमोदन प्रदान करने से जुड़े मामलों को चुनौती देने से लेकर वन्य भूमि के उपयोग के लिए सरकार द्वारा अनुमति देने तक और वायु एवं शोर प्रदूषण तक के मामले भी शामिल थे. जहां राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण में जाने वाले लोग मुख्यतः परियोजनाओं से प्रभावित लोग या समुदाय-आधारित संगठन ही होते थे, वहीं राष्ट्रीय हरित अधिकरण में जो आवेदक आते हैं, उनमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्णयों से प्रभावित छोटे और मध्यम आकार के उद्यमियों से लेकर उन पर थोपी गई नियामक स्थितियों को चुनौती देने वाली बड़ी कंपनियां भी शामिल होती हैं. इस प्रकार राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण के विपरीत राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आवेदकों में व्यापक स्तर पर विविध प्रकार के आवेदक होते हैं. अपनी स्थापना से लेकर अब तक राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अनेक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए हैं.

अधिकरण के सामने देरी से लाए गए मामलों के संबंध में भी राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने उदार रु़ख अपनाया है, ताकि न्याय पाने के इच्छुक लोगों के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण के दरवाज़े लंबे समय तक खुले रखे जा सकें. क़ानून के अनुसार, यदि कोई सरकारी निर्णय को चुनौती देना चाहता है तो उसे निर्णय जारी होने की तारी़ख के  तीस दिनों के अंदर ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क करना चाहिए. राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क करने का समय साठ दिनों तक तभी बढ़ाया जा सकता है, जब विलंब करने के पर्याप्त कारण मौजूद हों और अधिकरण इसे स्वीकार या अस्वीकार भी कर सकता है, लेकिन नब्बे दिन बीत जाने पर इस अवधि को बढ़ाने का राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पास कोई उपाय शेष नहीं बचता. हिमाचल प्रदेश में पन-बिजली परियोजना के निर्माण के लिए वन्य भूमि के दिशा-परिवर्तन को चुनौती देने वाले एक अपीलकर्ता ने निर्णय लिए जाने के 90वें दिन राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क किया था. राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने विलंब के कारण को स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को मंज़ूर करते हुए कि यदि विवादी की तरफ़ से कोई लापरवाही या देरी नहीं की गई है और विवादी सदाशयी है तो ऐसे मामले में उदार रु़ख अपनाया जा सकता है, यह व्यवस्था दी कि विलंब की व्याख्या का कोई बना-बनाया सीधा फॉर्मुला नहीं हो सकता.

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय इस बात पर था कि अधिकरण से कौन संपर्क कर सकता है अर्थात कौन इसके लिए क़ानूनी रूप से अधिकारी है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यह व्यवस्था दी कि कोई भी व्यक्ति प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के संबंध में अधिकरण से तब तक संपर्क कर सकता है, जब तक कि उसकी याचिका तुच्छ न हो. यह निर्णय बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अधिक से अधिक हितधारक पर्यावरण के संबंध में क़ानूनी सवाल उठा सकते हैं और इससे उसका दायरा और भी बढ़ सकता है. ज़रूरी नहीं है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण से संपर्क करने वाले लोग सरकार के किसी निर्णय (जैसे ताप बिजली घर या बांध बनाने के लिए अनुमोदन देना आदि) से सीधे प्रभावित या घायल हुए हों. कोई भी व्यक्ति जिसके पास यह मानने का कोई कारण हो कि सरकार के किसी निर्णय से प्राकृतिक पर्यावरण पर बुरा असर पड़ सकता है, अधिकरण से संपर्क कर सकता है.

खनन कार्य से संबंधित गुण-दोषों पर आधारित एक निर्णय पर परियोजना से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के मूल्यांकन में हुई चूकों का पता लगाते समय राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारत में पर्यावरण संबंधी प्रभाव के  मूल्यांकन की कमियों पर टिप्पणी की थी. पहली टिप्पणी थी, 10 किमी के अर्धव्यास के अंदर अन्य परियोजनाओं के संचयी प्रभाव के मूल्यांकन में कमी, दूसरी टिप्पणी यह है कि पर्यावरण संबंधी प्रभाव का मूल्यांकन उन सलाहकारों द्वारा किया जाता है, जिनका भुगतान परियोजना के समर्थकों द्वारा किया जाता है, हितों का टकराव होने लगता है और इस बात की भी संभावना बनी रहती है कि कुछ भीतरी सूचनाएं, जो समर्थकों के खिलाफ़ जा सकती हैं उन्हें प्रकट न किया जाए और तीसरी टिप्पणी यह है कि वे सलाहकार जिनकी पर्यावरण संबंधी प्रभाव के मूल्यांकन की रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं, वे अपनी सूचना के लिए किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं हैं. पर्यावरणविदों द्वारा ये मामले बार-बार उठाए जाते रहे हैं, लेकिन सरकार द्वारा इन पर न तो किसी नीति की घोषणा की जाती है और न ही विधायी प्रतिक्रिया प्रकट की जाती है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अंततः यह निर्णय कर लिया है कि किसी भी अनुमोदन को तब तक आस्थगित रखा जाएगा जब तक कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय परियोजना और पर्यावरण पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर लेता. पर्यावरण संबंधी विधिवेत्ताओं ने इन मिसालों का स्वागत किया है और इन्हें प्रगतिशील कहा है और साथ ही साथ राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश बहुत सावधानी से लिए गए हैं. उदाहरण के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने मामलों के लंबित रहते हुए परियोजना-स्थलों पर काम रोकने से इंकार भी किया है और यह व्यवस्था भी दी है कि परवर्ती चरण में कपनियां इक्विटी के लिए दावा नहीं कर सकतीं या दूसरे शब्दों में अब बहुत देर हो गई है, इसलिए अब कुछ नहीं किया जा सकता. परंतु दुख केवल इस बात का रह जाता है कि एक बार उजड़ी हुई जनजातियां और पर्यावरण को दोबारा नहीं बसाया या संवारा जा सकता.

राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन पर्यावरण और वन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए किया गया था. यद्यपि राष्ट्रीय हरित अधिकरण का अभी मूल्यांकन करना कदाचित जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतनी व्यापक शक्तियों और न्याय-सीमा के साथ ऐसे विशिष्ट अधिकरण के अस्तित्व से ही भारत में पर्यावरण संबंधी क़ानूनी मुद्दों का समय पर निपटारा किया जा सकता है.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/03/the-new-era-of-environmental-litigation.html

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