हिमालय में दवाओं का ख़ज़ाना

 

वनस्पति न स़िर्फ इंसानी जीवन, बल्कि पृथ्वी पर वास करने वाले समस्त जीव-जंतुओं के जीवन चक्र का एक अहम हिस्सा है. एक तऱफ जहां यह वातावरण को शुद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी तऱफ इसकी कई प्रजातियां दवा के रूप में भी काम आती हैं. वन संपदा के दृष्टिकोण से भारत का़फी संपन्न है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में भारत का विश्व में दसवां और एशिया में चौथा स्थान है. यहां अब तक लगभग छियालीस हज़ार से ज़्यादा पेड़-पौधों की प्रजातियों का पता लगाया जा चुका है, जो किसी न किसी रूप में हमारे काम आते हैं. पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र के अंतर्गत लद्दा़ख यूं तो अत्यधिक ठंड के लिए प्रसिद्ध है. इसके बावजूद यहां एक हज़ार से भी ज़्यादा वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियां फल-फूल रही हैं. इनमें आधी ऐसी हैं, जिनका उपयोग औषधि के रूप में किया जा सकता है. समुद्र की सतह से क़रीब 11,500 फुट की ऊंचाई पर बसा लद्दा़ख अपनी अद्भुत संस्कृति, स्वर्णिम इतिहास और शांति के लिए विश्व प्रसिद्ध है. लद्दा़ख की कुल आबादी 1,17,637 है. ऊंचे क्षेत्र में स्थित होने और कम बारिश के कारण यहां का संपूर्ण जीवन कभी न समाप्त होने वाले ग्लेशियर पर निर्भर है, जो पिघलने पर कई छोटे-बड़े नदी-नालों को जन्म देता है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की.

नवंबर से मार्च के बीच यहां का तापमान शून्य से भी 40 डिग्री नीचे चला जाता है. भारी ब़र्फबारी के कारण इसका संपर्क इस दौरान पूरी दुनिया से कट जाता है. यहां का 70 प्रतिशत क्षेत्र साल भर ब़र्फ से ढका रहता है. इसी कारण इसे ठंडा रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन अगर आप क़रीब से इसका मुआयना करेंगे तो पता चलेगा कि यहां वनस्पतियों का एक संसार भी मौजूद है. दरअसल विषम भौगोलिक परिस्थिति ने यहां के लोगों को आत्मनिर्भर बना दिया है. ऐसे में क्षेत्र के निवासी आसपास उपलब्ध वस्तुओं को ही जीवन चलाने का माध्यम बनाते रहे हैं. यहां मुख्य रूप से गेहूं, जौ, मटर और आलू की खेती की जाती है. सब्ज़ियां, दवाएं, ईंधन और जानवरों के लिए चारा जैसी बुनियादी आवश्यकताएं भी जंगली पौधों से पूरी की जाती हैं. जंगली पौधों पर इतने सालों तक निर्भरता ने इन्हें इनके फायदों का ब़खूबी एहसास करा दिया है.

विल्लो पोपलर एवं सीबुक थ्रोन यहां सबसे ज़्यादा पाई जाने वाली वनस्पतियां हैं. उपचार की चिकित्सा पद्धति, जिसे स्थानीय भाषा में स्वा रिग्पा अथवा आमची कहा जाता है, पूर्ण रूप से इन्हीं वनस्पतियों पर निर्भर है और यह वर्षों से स्थानीय लोगों के लिए उपचार का साधन है. स्थानीय स्तर पर उपचार के लिए तैयार की जाने वाली औषधियां इन्हीं वनस्पतियों के मिश्रण से बनाई जाती हैं. इस पद्धति के तहत हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाली जड़ी-बूटियों एवं खनिजों का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है. ट्रांस हिमालय में पाई जाने वाली वनस्पतियां आमची की अधिकतर दवाओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण साबित होती हैं. आज भी दवाओं में इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी-बूटियां द्रास, नुब्रा, चांगथान एवं सुरू घाटी में आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं. लेह स्थित आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च देश की दो ऐसी प्रयोगशालाएं हैं, जहां ट्रांस हिमालय से प्राप्त वनस्पतियों को दवाओं में प्रयोग किए जाने के विभिन्न स्वरूपों पर अध्ययन किया जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार, लद्दा़ख और लाहोल स्फीति के ट्रांस हिमालय क्षेत्रों में मौजूद वनस्पतियों का दस से अधिक वर्षों से अध्ययन किया जा रहा है. इन अध्ययनों में कम से कम 1100 क़िस्मों को रिकॉर्ड किया गया है, जिनमें 525 क़िस्में ऐसी हैं, जिन्हें कई दवाओं में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इस संबंध में आमची मेडिसिन रिसर्च यूनिट और फील्ड रिसर्च कई स्तरों पर लोगों को जागरूक कर रही हैं. कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों और कार्यशालाओं के माध्यम से इन वनस्पतियों के ़फायदों के बारे में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. दवाओं में प्रयोग होने वाले पौधे स्वच्छ वातावरण में पनपते हैं, परंतु हाल के अध्ययनों से पता चला है कि इन पौधों की कुछ प्रजातियों पर जलवायु परिवर्तन के कारण नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिन्हें संरक्षण की सख्त ज़रूरत है.

बदलते परिदृश्य में बढ़ती जनसंख्या और दूषित वातावरण के कारण एक तऱफ जहां नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, वहीं इसे बाज़ार का रूप भी दिया जा रहा है. हालांकि व्यापारिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन ट्रांस हिमालयी पौधों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से मैदानी इलाक़ों में भी उगाया जा सकता है. अगर इस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का उचित उपयोग किया गया तो इनसे अच्छे हर्बल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं. ऐसे में ज़रूरत है इनकी पैदावार बढ़ाने, इनका संरक्षण करने और उचित उपयोग की. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संगठन एवं उद्योग जगत को आगे आने की आवश्यकता है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि इससे होने वाले फायदों में स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व बराबर का हो. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की तीन चौथाई आबादी आधुनिक तकनीक से तैयार दवाएं खरीदने में अक्षम है और उसे ऐसे ही पौधों से बनने वाली परंपरागत दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. वर्षों से शोध और निष्कर्ष के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन इन्हीं जड़ी-बूटियों से तैयार दवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि इनकी क़ीमत का़फी कम होती है और ये सबकी पहुंच में भी हैं. (चरखा)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2012/02/treasure-of-drugs-in-himalayas.html

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