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अब तो मां का दूध भी जहर हो गया है

देश की सोना उगलने वाली कृषि भूमि और पानी तो प्रदूषित हो ही चुका है, मगर अब मां के अमृत रूपी दूध में भी विषैले तत्व पाए गए हैं. महाराष्ट्र के रत्नागिरी के चिपलुन के डीबीजे कॉलेज के जिओलॉजी विभाग के एक अध्ययन के मुताबिक़, मां के दूध में रसायनों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पाई गई है. विभाग ने कोटावली सहित इलाक़े के सात गांवों अवाशी, लोटे, गुनाडे, गनुकंड, सोनगांव और पीरलोटे में वर्ष 2003 से 2004 के बीच अध्ययन किया. पशुओं के दूध में सीसे की मात्रा 3.008 पीपीएम पाई गई, जबकि इसकी उचित मात्रा 0.1 है. इसी तरह मां के दूध में भी एल्यूमिनियम की मात्रा 5.802 पीपीएम दर्ज की गई, जबकि इसकी मात्रा 0.3 होनी चाहिए. इसके अलावा दूध में क्रोमियम, निकल और आयरन भी पाया गया. ज़िले के 575 हेक्टेयर इलाक़े में 70 औद्योगिक इकाइयां हैं. इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले औद्योगिक कचरे को पानी में बहा दिया जाता है. इसके कारण इलाक़े के जलस्रोतों का पानी अत्यधिक विषैला हो गया है. हालत यह है कि मछलियां भी दम तोड़ने लगी हैं. पानी के अलावा इलाक़े की भूमि भी ज़हरीली होती जा रही है. दूध में रसायनों का अधिक मात्रा में पाया जाना बेहद चिंता का विषय है. अगर यही हालत रही तो माताएं अपने बच्चों को दूध पिलाने से भी डरने लगेंगी. स्वास्थ्य की दृष्टि से मां का दूध बच्चे के लिए अमृत समान होता है, जो उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा करता है, लेकिन प्रदूषण मां के दूध को भी ज़हर में बदल रहा है.

देश की नदियों की हालत बेहद खराब है. इनमें गंगा, यमुना, दामोदर, सोन, कावेरी, नर्मदा एवं साही आदि शामिल हैं. गंगा जैसी पवित्र नदी भी प्रदूषण की शिकार होकर दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में शामिल हो गई है. इसका 23 फीसदी जल प्रदूषित हो चुका है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, यमुना में 7.15 करोड़ गैलन गंदा पानी रोज़ छो़डा जाता है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मानें तो यमुना का पानी नहाने के क़ाबिल भी नहीं रहा है.

देश की नदियों की हालत बेहद खराब है. इनमें गंगा, यमुना, दामोदर, सोन, कावेरी, नर्मदा एवं साही आदि शामिल हैं. गंगा जैसी पवित्र नदी भी प्रदूषण की शिकार होकर दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में शामिल हो गई है. इसका 23 फीसदी जल प्रदूषित हो चुका है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, यमुना में 7.15 करोड़ गैलन गंदा पानी रोज़ छो़डा जाता है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मानें तो यमुना का पानी नहाने के क़ाबिल भी नहीं रहा है. हालांकि बोर्ड नदी की स़फाई के नाम पर 1800 करो़ड रुपये खर्च कर चुका है. अब वह 15 करो़ड रुपये और खर्च करने की योजना बना रहा है. सुप्रीम कोर्ट भी यमुना में लगातार ब़ढते प्रदूषण को लेकर चिंतित है. वर्ष 1985 में यमुना में प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दा़खिल की गई थी. इस पर 1989 में अदालत ने सरकार को यमुना को सा़फ करने का निर्देश दिया था. हालांकि अनेक एजेंसियां और संस्थाएं नदी की स़फाई की मुहिम में शामिल हुईं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहा. काऱखानों द्वारा दामोदर नदी में भी 40 लाख गैलन विषैला पानी छो़डा जाता है. चेन्नई की दो करो़ड गैलन गंदगी नदियों को दूषित करती है. इसी तरह धरती के स्वर्ग कश्मीर की राजधानी श्रीनगर का गंदा पानी झेलम नदी को दूषित कर रहा है. वर्ष 1940 में जहां एक लीटर पानी में ऑक्सीजन की मात्रा 2.5 घन सेंटीमीटर थी, वहीं अब यह घटकर महज़ 0.1 घन सेंटीमीटर रह गई है. काग़ज, चर्मशोधन, खनिज एवं कीटनाशक आदि के काऱखाने नदियों के किनारे हैं. काऱखानों से निकलने वाले रासायनिक कचरे और शहरों की गंदगी को नदियों में बहा दिया जाता है. देश में अमूमन हर साल 10 लाख लोगों पर पांच लाख टन मल उत्पन्न होता है, जिसका ज़्यादातर हिस्सा समुद्र और नदियों में छो़ड दिया जाता है. एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में एक लाख से ज़्यादा आबादी वाले 142 शहरों में से स़िर्फआठ शहर ही ऐसे हैं, जिनमें मल प्रबंधन की पूरी व्यवस्था है, जबकि 62 शहरों में हालत कुछ ठीक है और 72 शहर तो ऐसे हैं, जहां मल प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं है. इसलिए छुटकारा पाने के लिए इसे नदी-नालों के हवाले कर दिया जाता है. नदियों का 70 फीसदी जल प्रदूषित है. इस प्रदूषित जल में बैक्टीरिया, पारा, सीसा, ज़िंक, क्रोमाइट और मैगनीज़ के तत्व भारी मात्रा में पाए जाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, हर साल पांच लाख बच्चे जल प्रदूषण के शिकार होते हैं. भारत में 30 से 40 फीसदी लोगों की मौत प्रदूषित जल के कारण होती है. प्रदूषित जल की वजह से लोग अनेक भयंकर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. हालांकि जल प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने 1974 में जल प्रदूषण नियंत्रण और निवारण अधिनियम बनाया था, मगर इसके बावजूद नदियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

प्रदूषित जल की वजह से पंजाब के फिरोजपुर ज़िले के  तेजा रूहेला, नूरशाह, डोना नांका और खदूका आदि गांवों के बच्चे या तो दृष्टिहीन पैदा हो रहे हैं या जन्म से कुछ व़क्त बाद अपनी आंखों की रोशनी खो रहे हैं. कुछ व़क्त पहले गांव डोना नांका के करीब एक दर्जन बच्चे अंधेपन का शिकार हुए. इसी तरह गांव नूरशाह और तेजा रूहेला के क़रीब 50 लोग अंधेपन की चपेट में आए, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं. पंजाब के भूजल में यूरेनियम भी पाया गया है. इसकी वजह से दक्षिणी-पश्चिमी पंजाब के बच्चे सेरेबल पाल्सी से पी़िडत हो रहे हैं. जर्मनी की माइक्रो ट्रेस मिनेरल लैब की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, फरीदकोट में मंदबुद्धि बच्चों की संस्था बाबा फरीद केंद्र के 150 बच्चों के बालों पर शोध किया गया. इन बच्चों के बालों में 82 से 87 फीसदी तक यूरेनियम पाया गया. पंजाब के भटिंडा, संगरूर, मंसा और मोगा आदि इलाक़ों के पानी में भी यूरेनियम पाया गया है. भटिंडा ज़िले के पानी में यूरेनियम की सांद्रता 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक पाई जा चुकी है, जबकि इसका उचित मानक स्तर 9 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है.

प्रदूषित जल के कारण मिट्टी में भी हानिकारक तत्व पाए जा रहे हैं. इसके अलावा कीटनाशकों ने भी भूमि को ज़हरीला बनाने का काम किया है. ऐसे ही एक कीटनाशक एंडोसल्फान को लेकर पिछले का़फी व़क्त से देश में मुहिम चल रही है. एंडोसल्फान बेहद ज़हरीला रसायन है. एंडोसल्फान को 1950 से पहले ही विकसित कर लिया गया था, लेकिन इसे 1950 में पेश किया गया. यह हेक्साक्लोरो साइक्लोपेंटाडीन का व्यापारिक नाम है. हालांकि अब तक इसका पेटेंट नहीं किया गया है. इसके बेहद ज़हरीले होने की वजह से यूरोपीय संघ सहित 81 देशों ने इस पर पाबंदी लगाई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, पूरी दुनिया में 1990 के दशक तक इसका सालाना उत्पादन 12,800 टन को पार कर गया था. भारत इसका सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है, जहां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हिंदुस्तान इंसेक्टिसाइट्‌स लिमिटेड, एक्सेल क्रॉप केयर और कोरोमंडल फर्टिलाइजर मिलकर क़रीब 8,500 टन एंडोसल्फान बना रही हैं. वैसे अपने देश में 2001 से ही इसके इस्तेमाल पर बहस चल रही है.

हाल में जिनेवा में आयोजित स्टॉकहोम कन्वेंशन में एंडोसल्फान पर विश्वव्यापी प्रतिबंध लगाने पर ज़ोर दिया गया. संबंधित पक्षों ने दुनिया भर में कुछ अपवादों को छो़डकर एंडोसल्फान और उसके अपरूपों का उत्पादन और इस्तेमाल खत्म करने का एक प्रस्ताव पारित किया. हालांकि यह फैसला भारत में तभी लागू होगा, जब सरकार इसे मंज़ूरी दे. भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताई है. समीक्षा समिति कन्वेंशन में शामिल पक्षों और पर्यवेक्षकों के साथ विचार-विमर्श कर एंडोसल्फान के विकल्प सुझाएगी. साथ ही कन्वेंशन विकासशील देशों को एंडोसल्फान का विकल्प अपनाने के लिए वित्तीय मदद भी देगी. प्रस्ताव में कुल 22 फसलों के लिए छूट दी गई है, जिनमें गेहूं, धान, चना, सरसों, मूंगफली, कपास, जूट, कॉ़फी, चाय, तंबाक़ू, टमाटर, प्याज़, आलू, मिर्च, आम और सेब आदि शामिल हैं. सम्मेलन में 12 कीटनाशकों पर पाबंदी लगाई गई. इसी फेहरिस्त में एंडोसल्फान को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है.

केरल के कासरगोड़ ज़िले में पिछले कुछ वर्षों के दौरान इसके इस्तेमाल से कई लोगों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग बीमारियों की चपेट में आए हैं. ज़िले के जिन गांवों में एंडोसल्फान का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहां के लोग दिमाग़ी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. राज्य में एंडोसल्फान को प्रतिबंधित कर दिया गया. कर्नाटक में भी एंडोसल्फान पर पाबंदी लगी हुई है और आंध्र प्रदेश में भी इसे प्रतिबंधित किए जाने की प्रक्रिया चल रही है. केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने एंडोसल्फान पर देशव्यापी पाबंदी लगाने की मांग को लेकर ह़डताल भी की. कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा ने भी एंडोसल्फान पर पाबंदी लगाए जाने की वकालत की है. भारतीय जनता पार्टी ने भी एंडोसल्फान पर पाबंदी लगाने की मांग की है. राज्य में कांग्रेस एंडोसल्फान पर प्रतिबंध लगाए जाने का समर्थन कर रही है, लेकिन उसने एलडीएफ की हड़ताल की आलोचना की. हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर समर्थन मांगा है. इस मामले में खुद अच्युतानंदन एक दिन का अनशन कर चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने एंडोसल्फान पर पाबंदी लगाने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सहित सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की युवा इकाई डेमोके्रटिक यूथ फेडरेशन द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि एंडोसल्फान का मानव विकास पर बुरा असर प़डता है और कई अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है. याचिका में केरल के कासरगोड़ ज़िले का भी ज़िक्र किया गया है. यहां के बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक गया है. यहां पिछले दो दशकों से काजू की खेती में इसका छ़िडकाव किया जा रहा है.

केरल के कृषि मंत्री मुल्लाकरा रत्नकरण के मुताबिक़, एक कीटनाशक के इस्तेमाल से अनाज खराब हो गया था और उसे खाने से क़रीब सौ लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 800 लोग गंभीर रूप से बीमार हो गए थे. इसके बाद 1968 में कीटनाशक अधिनियम बनाया गया. केरल विधानसभा में विपक्षी नेता ओमान चांडी और केपीसीसी के अध्यक्ष रमेश चेन्निथला ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाक़ात की थी. इसके बाद पीएमओ की ओर से जारी बयान में कहा गया कि केरल में एंडोसल्फान का इस्तेमाल प्रतिबंधित है. हालांकि इस पर देशव्यापी पाबंदी लगाने का फैसला वैज्ञानिक अध्ययन और राष्ट्रीय सहमति के आधार पर लिया जाएगा. प्रधानमंत्री ने कहा कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के डायरेक्टर जनरल की अध्यक्षता में एक समिति लोगों की सेहत पर एंडोसल्फान के दुष्प्रभाव की जांच कर रही है.

कृषि मंत्री शरद पवार यह स्वीकार करते हैं कि एंडोसल्फान सेहत के लिए बेहद खतरनाक है, लेकिन साथ ही वह यह भी कहते हैं कि इस पर देशव्यापी पाबंदी लगाना व्यवहारिक नहीं है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि केरल के हालात के लिए वहां के किसान ही ज़िम्मेदार हैं, जो जानबूझ कर एंडोसल्फान का छिड़काव कर रहे हैं. हालांकि पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एंडोसल्फान पर पाबंदी लगाने की मांग कर रहे राज्यों को भरोसा दिलाया है कि अगर अध्ययन में इसके हानिकारक होने के सबूत मिलते हैं तो इस पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा. हैरानी की बात तो यह है कि सरकार को ज़हर को ज़हर साबित करने के लिए भी सबूतों की ज़रूरत प़ड रही है.

अगर यह कहा जाए कि सरकार जनता की जान को जोखिम में डालकर एंडोसल्फान की निर्माता कंपनियों के हित साधने में लगी है तो ग़लत नहीं होगा. खास बात यह भी है कि कुछ व़क्त पहले पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति कह चुकी है कि इसके इस्तेमाल से मानव स्वास्थ्य पर किसी भी तरह का ग़लत असर नहीं प़डेगा. देश की जनता के साथ इससे ब़डा मज़ाक़ भला क्या हो सकता है. एंडोसल्फान पर पाबंदी को लेकर कई झोल हैं. पहला, सरकार द्वारा कंपनियों को लाभ पहुंचाना और दूसरा, किसानों को इसका विकल्प मुहैया कराना. देश में 70 से ज़्यादा फसलों में ब़डे पैमाने पर इसका इस्तेमाल किया जाता है. यह अकेला ऐसा कीटनाशक है, जिसका प्रतिरोध फसलों को ऩुकसान पहुंचाने वाले कीट अभी तक नहीं कर पाए हैं. इसी वजह से इसकी खूब बिक्री होती है. किसानों की भी यह मजबूरी है कि उनके पास इसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है. ऐसे में यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह किसानों को इसका विकल्प मुहैया कराए, क्योंकि उसके बिना इस पर पाबंदी का भी कोई खास फायदा नहीं होगा. प्रतिबंध लगने के बावजूद यह चोरी-छुपे महंगे दामों पर बिकने लगेगा, जिससे सबसे ज़्यादा नुक़सान किसानों को ही होगा.

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/05/ab-to-maa-ka-doodh-bhi-jahar-ho-gaya-hai.html

सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहें |

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए. जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक रूप से देखा जाए तो आदिवासियों और वनों के बीच अटूट रिश्ता है. वन हैं तो आदिवासी हैं. आदिवासी हैं तो दुर्लभ वन्यजीव-जंतु भी हैं. वनग्राम सूरमा और गोलबोझी के आदिवासियों ने आख़िर वनाधिकार क़ानून 2006 के सहारे यह साबित कर दिया कि वन्यजीव-जंतुओं की तरह वे भी वनों के अभिन्न अंग हैं, जिसे दुर्भाग्यवश वन विभाग और अभिजात्य वर्ग समझने में असमर्थ है. सूरमा वनग्राम को इस क़ानून के तहत देश में किसी नेशनल पार्क के कोर ज़ोन में मान्यता पाने वाले पहले गांव का गौरव प्राप्त हुआ. बीते 8 अप्रैल को ज़िलाधिकारी खीरी ने स्वयं इन गांवों में जाकर 347 परिवारों को मालिकाना हक़ सौंपा.

सूरमा गांव का इतिहास 1861 में वन विभाग की स्थापना के बाद बनी इस क्षेत्र की विभिन्न कार्य योजनाओं में मिलता है. उनमें बताया गया है कि यह गांव 1857 से भी पूर्व से बसा है, जब ब्रिटिश हुक़ूमत ने वन विभाग की स्थापना भी नहीं की थी. यहां थारुओं के 37 गांव थे, जो बर्दिया गांव के नाम से जाने जाते थे.

सत्तर के दशक से राष्ट्रीय उद्यान के अंदर वन विभाग और वन्यजीव-जंतु प्रेमियों द्वारा गांव की मौजूदगी का जमकर विरोध किया जाता रहा है, जिसके चलते पिछले तीस सालों के दौरान देश के विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों से हज़ारों परिवारों को संविधान के अनुच्छेद 21 की मंशा के ख़िला़फ और बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए बेरहमी से बेदख़ल किया गया, लेकिन 2006 में बने वनाधिकार क़ानून ने वनों में रहने वाले समुदायों के साथ हुए अन्याय को दूर करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों को संकटग्रस्त वन्यजीव-जंतु आवास क्षेत्र घोषित करने की योजना में वहां रहने वाले ग्रामीणों की भागीदारी को स्वीकारा और उन्हें वनों के अंदर रहने की अनुमति प्रदान की. देखने में आ रहा है कि जहां लोग संघर्ष कर रहे हैं, वहां तो वनाधिकार क़ानून के सहारे ग्रामीणों द्वारा सरकार और वन विभाग का दोहरापन सामने लाने की कोशिश की जा रही है. राष्ट्रीय पार्कों में वनाधिकार क़ानून लागू न करके वन विभाग द्वारा लोगों को दस लाख रुपये का लालच देकर गांव खाली करने के लिए फुसलाया जा रहा है. कई जगहों पर वन विभाग की मनमानी अब भी क़ायम है, वहां वनों से लोगों की बेदखली बदस्तूर ज़ारी है. सूरमा का संघर्ष तमाम थारू क्षेत्र की गरिमा का सवाल था. यह केवल कुछ परिवारों के अस्तित्व का संघर्ष नहीं था, बल्कि इन परिवारों के साथ जुड़ी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में वनों एवं वन्यजीव-जंतुओं को बचाने का भी संघर्ष था. आज़ादी के बाद से ही दुधवा के अंदर वनों का अंधाधुंध दोहन शुरू हो गया. वन विभाग, पुलिस एवं सशस्त्र सीमाबल की साठगांठ से वन्यजीव-जंतुओं की बड़े पैमाने पर तस्करी के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय हुए. आदिवासियों के लिए वन उनकी जीविका का साधन होते हैं, इसलिए वनों का विनाश उनके लिए नुक़सानदायक था. बाघों के साथ उनका जीवन सहज ही था. बाघ और मनुष्य में किसी प्रकार का बैर नहीं था, लेकिन वनों को राजस्व प्राप्ति का साधन मान लिए जाने के कारण स्थानीय लोगों-आदिवासियों को वनों का दुश्मन क़रार दे दिया गया.

सूरमा गांव का इतिहास 1861 में वन विभाग की स्थापना के बाद बनी इस क्षेत्र की विभिन्न कार्य योजनाओं में मिलता है. उनमें बताया गया है कि यह गांव 1857 से भी पूर्व से बसा है, जब ब्रिटिश हुक़ूमत ने वन विभाग की स्थापना भी नहीं की थी. यहां थारुओं के 37 गांव थे, जो बर्दिया गांव के नाम से जाने जाते थे. 28 फरवरी, 1879 को ये नेपाल सीमा के रिजर्व फारेस्ट घोषित कर दिए गए. यह इलाका उस समय अवध प्रांत की खैरीगढ़ रियासत का हिस्सा था, जिसे महारानी खैरीगढ़ ने 1904 में हुए एक करारनामे पर हस्ताक्षर करके वन विभाग के अधीन कर दिया था. यह गांव कब राजस्व गांव से वनग्राम बन गए, यह पूरी कहानी वन विभाग के दस्तावेज़ों में अंकित है. वनग्राम बनाने का मतलब था इन गांवों के तमाम अधिकारों का खात्मा और इनसे वनों के अंदर बेगार कराना. ये वन विभाग की संपत्ति बना दिए गए. 1978 तक ये गांव वन विभाग के नियंत्रण में रहे. दुधवा नेशनल पार्क की घोषणा के बाद 37 में से 35 थारू गांव राजस्व विभाग को सौंप दिए गए, जबकि सूरमा और गोलबोझी को वन विभाग के अधीन छोड़ दिया गया. 2 फरवरी, 1978 को विख्यात वन्यजीव-जंतु प्रेमी बिली अर्जन सिंह द्वारा इस वन क्षेत्र को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान बनाए जाने के प्रस्ताव को केंद्र सरकार की मंजूरी मिल गई. दुधवा नेशनल पार्क बना, लेकिन आज़ाद भारत में थारुओं के तमाम संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए और इन्हें वन विभाग का गुलाम बना दिया गया. यह वही बिली अर्जन सिंह हैं, जिन्होंने 12 साल की उम्र में बाघ का शिकार किया था. बिली ने इस नेशनल पार्क के अंदर और बाहर 400 एकड़ भूमि पर क़ब्ज़ा भी कर लिया, जिसमें से 80 एकड़ भूमि अभी हाल में बसपा सरकार द्वारा ज़ब्त की गई. इन जंगलों में बिली अर्जन सिंह द्वारा बाघों का शिकार किया गया. उन्होंने एक बाघिन को पालतू बनाकर रखा था, जो नरभक्षी हो गई थी. बाघिन ने 80 के दशक में एक विदेशी पर्यटक के बच्चे को अपना शिकार बना लिया, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई. एक तऱफ शिकारियों को प्रोत्साहन मिला और दूसरी तऱफ थारू आदिवासियों को उपेक्षा एवं तिरस्कार.

घने जंगलों में बसे, विकास की हर किरण से दूर और हिकारत भरी नज़रों से देखे जाने वाले सूरमा गांव के निवासियों ने जीवन का सूर्य कभी अस्त नहीं होने दिया. वे बिना किसी सरकारी मदद के अपने बलबूते पर मिट्टी के घरों में आबाद रहे, खेती नहीं छोड़ी और बच्चों पढ़ाया भी. इन जंगलों में बाघों के लिए करोड़ों रुपये का बजट आता था, लेकिन विडंबना यह थी कि वनों में रहने वाले बाघ उपेक्षित थे और थारू भी. नेशनल पार्क बनने के बाद बाघों की तस्करी धड़ल्ले से होने लगी और अपराधी ठहराए जाते सूरमा में रहने वाले आदिवासी. अन्याय और उत्पीड़न की इंतहा कर दी गई. एक बारह वर्षीय स्कूली बच्चे को वन विभाग के कर्मचारियों ने पकड़ कर जेल मे ढाई साल तक सड़ाया. जवाहर नामक ग्रामवासी को शेर की खाल रखने के झूठे आरोप में छह महीने तक जेल में रखा गया, स़िर्फ इसलिए कि वह वन विभाग की पोल जानता था और उसके द्वारा की जा रही चोरी के ख़िला़फ आवाज़ उठाता था. आज से महज़ चार वर्ष पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि किसी राष्ट्रीय उद्यान के कोर ज़ोन के अंदर किसी गांव को मालिकाना हक़ भी प्राप्त हो सकता है. यह तभी संभव हो पाया, जब 2006 में अनुसूचित एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) अधिनियम पारित हुआ और वनों में रहने वाले आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन समुदायों को अंग्रेज़ों के ज़माने से स्थापित वन विभाग की गुलामी से मुक्ति मिली. हम कह सकते हैं कि सूरमा को 15 अगस्त, 1947 के बजाय 8 अप्रैल, 2011 को आज़ादी मिली.

इस गांव को वन विभाग द्वारा उजाड़ने की पूरी रणनीति बन चुकी थी, लेकिन जनसंगठनों, राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच, थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच और मीडिया के सक्रिय सहयोग के सहारे सूरमा ने अपना संघर्ष ज़ारी रखा. वनों में रहने वाले अन्य गांवों को साथ लेकर एक सशक्त संगठन बनाया गया. अपना अस्तित्व बचाने के लिए सूरमा पिछले 33 वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहा था. दुधवा नेशनल पार्क बनने के बाद इन दोनों गांवों को बेदखली के आदेश जारी कर दिए गए थे. सूरमा की कुल क़रीब 1250 एकड़ ज़मीन के बदले क़रीब 550 एकड़ ज़मीन 6 खंडों में बांटकर देने का प्रस्ताव किया गया, लेकिन इन 6 खंडों में भी पहले से ही अन्य थारू आदिवासी परिवार बसे हुए थे. सूरमा के लोगों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार न करते हुए 1980 में उच्च न्यायालय की शरण ली. 23 सालों तक चले इस मुक़दमे का निर्णय 2003 में आया. अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने भी पार्क प्रशासन के आदेशों को दोहराते हुए सूरमा को अपनी जगह से हटने का आदेश जारी किया. पार्क प्रशासन द्वारा गांव हटाने के लिए तमाम तरह की कार्रवाइयां की गईं, जिनमें हथियारबंद कार्रवाई भी शामिल थी. बावजूद इसके यहां के लोगों ने अपना संघर्ष ज़ारी रखा. सूरमा का आंदोलन रंग लाया और 2002 में राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के घटक संगठन के रूप में थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच का गठन करके संघर्ष और तेज़ कर दिया गया. 2005 में राष्ट्रीय मंच ने राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान हैदराबाद के साथ सूरमा, ध्यानपुर, पटिहन, बसंतापुर कलां और मकनपुर आदि पांच गांवों का अध्ययन किया. अक्टूबर 2007 में इस अध्ययन की रिपोर्ट के आधार पर यहां के ब्लॉक पलिया कलां में एक जन सुनवाई हुई, जिसमें सूरमा के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया. 15 दिसंबर, 2006 को संसद में वनाधिकार क़ानून पारित होने और एक जनवरी, 2008 को इसके लागू हो जाने के बाद संघर्ष ने और भी तेज़ी पकड़ ली.

इस क़ानून के तहत गठित राज्य निगरानी समिति में जब सूरमा का मामला उठा, तब जाकर सरकार जागी. पड़ताल करने पर राज्य निगरानी समिति ने पाया कि उच्च न्यायालय में वन विभाग द्वारा जो तथ्य पेश किए गए थे, वे झूठे थे. इसलिए अब नया क़ानून आने के बाद सूरमा के विषय में पुन: विचार किया जा सकता है. सूरमा का मामला चूंकि राष्ट्रीय उद्यान के कोर ज़ोन का मामला था, इसलिए इसे राज्य निगरानी समिति द्वारा न्याय विभाग को सौंपा गया, जिसने अंतत: दिसंबर 2010 में इस गांव को पार्क क्षेत्र में वनाधिकार क़ानून के तहत बसाए जाने की स़िफारिश की. वनाधिकार क़ानून की धारा 4 (2) एवं 4 (5) और राज्य सरकार द्वारा 13 मई, 2005 के पूर्व अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के क़ब्ज़े वाली ज़मीनों को नियमित करने के आदेशों को भी ध्यान में रखते हुए यह घोषणा की गई. इस तरह तमाम क़ानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद सूरमा को 8 अप्रैल, 2011 को आज़ादी मिल गई. यह एक ऐतिहासिक जीत थी, जो न स़िर्फ सूरमा या खीरी या उत्तर प्रदेश के लिए, बल्कि पूरे देश के वन क्षेत्रों में रहने वाले वनाश्रित समुदायों और जन संगठनों के आंदोलनों की जीत है. हालांकि उत्पीड़न की इंतहा ने यहां के लोगों के सामने हथियारबंद आंदोलन का रास्ता खोल दिया था, लेकिन उन्होंने जनवादी तरीक़े से अपनी आवाज़ बुलंद की. अब सूरमा जैसी नज़ीर पैदा हो जाने के बाद देश के अन्य नेशनल पार्कों में स्थित ऐसे कई गांवों को ताक़त मिलेगी. वे अब वन विभाग की विस्थापन की चाल कामयाब नहीं होने देंगे, वे अब जंगलों को बचाएंगे और वन्यजीव-जंतुओं को भी.


साभार- चौथिदुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/05/surma-desh-ka-pahala-vangram-bana-ab-bagh-our-insan-sath-rahenge.html

घटता पानी, बढ़ती प्यास

बेतवा, शहजाद, केन, धसान, मंदाकिनी, यमुना, जामनी, एवं सजनाम जैसी सदा नीरा नदियां होने के बावजूद पानी के लिए तरस रहे लोगों के दर्द को समझना बड़ा कठिन है. बुंदेलखंड में जल युद्ध होने से कोई रोक नहीं सकता. बुंदेलखंड पैकेज के नाम पर हुई लूट ने हालात बदतर कर दिए हैं. 2003 में हुई वर्षा 1044.88 एमएम से घटते-घटते वर्ष 2009 तक 277.30 एमएम रह गई. दो हज़ार से अधिक चंदेलकालीन तालाबों में पानी नहीं है. ललितपुर जनपद में प्रदेश के सर्वाधिक कृत्रिम जलाशय होने के बावजूद यहां के चार ब्लॉक संकट की स्थिति में  हैं. गर्मी ने अभी स़िर्फ दस्तक दी है, फिर भी बुंदेलखंड में पानी के लिए त्राहि-त्राहि शुरू हो गई है. चित्रकूट के पाठा का पथरीला इलाक़ा हो या भरतकूप का खदानों वाला क्षेत्र या फिर मंदाकिनी के किनारे बसे तिरहार क्षेत्र के दर्जनों गांव, इस समय हर जगह की कहानी लगभग एक जैसी है. गांव तो गांव, शहर के हैंडपंप भी हांफ रहे हैं. एक हज़ार हैंडपंपों को रीबोर करने की स्वीकृति मिलने के बाद ज़िलाधिकारी इसे बड़ी राहत मान रहे हैं, वहीं जल निगम के अधिकारी अभी मंदाकिनी को बचाने की कार्ययोजना की शुरुआत नहीं कर सके हैं. चौदह हज़ार हैंडपंपों वाले इस ज़िले के अधिकांश हैंडपंप गंदा पानी दे रहे हैं. मानिकपुर के कई गांवों के लोगों ने तो जोहड़ों की शरण लेना शुरू कर दिया है.

जल निगम द्वारा आदर्श पेयजल योजना के अंतर्गत रामनगर, सिकरी, छीबों, पियरिया माफी, खटवारा, बिनौरा, अकबरपुर एवं लोढ़वारा में हैंडपंपों की हालत सरकारी काग़ज़ों में सही बताई जा रही है, लेकिन इन गांवों में शायद ही कहीं पर सही ढंग से पानी मिल रहा हो.

जल निगम द्वारा आदर्श पेयजल योजना के अंतर्गत रामनगर, सिकरी, छीबों, पियरिया माफी, खटवारा, बिनौरा, अकबरपुर एवं लोढ़वारा में हैंडपंपों की हालत सरकारी काग़ज़ों में सही बताई जा रही है, लेकिन इन गांवों में शायद ही कहीं पर सही ढंग से पानी मिल रहा हो. कांशीराम शहरी आवासों में रहने वाले लगभग नौ सौ परिवार पानी की कमी से अक्सर जूझते हैं, पर अभी तक उनकी इस समस्या का निपटारा नहीं हो सका. नोनार पेयजल योजना एवं बालापुर खालसा पेयजल योजना का हाल भी ख़राब है. सांसद आर के सिंह पटेल ने जब पथरा माफी, लोहदा एवं पिपरोदर की जलापूर्ति का हाल देखा तो वह अवाक रह गए. जलापूर्ति के लिए बनाई गईं टंकियां सफेद हाथी बनी खड़ी हैं. ग्रामीणों ने बताया कि चालीस में से कुल पांच हैंडपंप पानी दे रहे हैं. ग्राम लोहदा में पैंतालिस में से केवल पांच हैंडपंप पूरा पानी देते हैं, बाक़ी दो-चार बाल्टी ही पानी देते हैं. पेयजल संकट से जूझ रहे ग्रामीणों ने जल निगम के अधीक्षण अभियंता समेत अनेक अधिकारियों को बंधक बना लिया, जिन्हें सांसद पटेल की पहल पर बड़ी मुश्किल से छुड़ाया जा सका. अधिशासी अभियंता जल संस्थान मनोज कुमार आर्या स्वीकारते हैं कि पिछले दिनों पानी उठाने का काम कुल 6 एमएलडी का हुआ, जिससे कई इलाक़ों को कम आपूर्ति की गई. ज़िलाधिकारी ने खंड विकास अधिकारी को मंदाकिनी की सफाई और जल निगम को मशीन लगाकर युद्ध स्तर पर कचरा साफ कराने के आदेश दिए हैं. अगर जल्द ही मंदाकिनी को साफ न किया गया तो गर्मी में शहरवासियों को पानी की कमी झेलनी पड़ सकती है.

नहरों की स्थिति

स्थान संख्या 2006-07 2007-08
झांसी 160 81 19
जालौन 291 289 16
ललितपुर 119 95 00
बांदा 184 09 00
महोबा 97 36 00
हमीरपुर 100 28 00
चित्रकूट 88 22 00
म.प्र. के  कुछ हिस्से 11 06 02
कुल 1050 566 37

हमीरपुर के अपर ज़िलाधिकारी एच जी एस पुंडीर ने बताया कि जल संकट के मद्देनज़र यहां के हैंडपंपों को प्राथमिकता के आधार पर ठीक कराया जाएगा और मौदहा बांध, लघु डाल नहर एवं नलकूपों से तालाबों को भर लिया जाएगा. 16,561 हैंडपंपों में से 797 हैंडपंप रिबोर की स्थिति में हैं. जल निगम हैंडपंपों की मरम्मत करा रहा है. ग्राम पंचायतों को भी ख़राब हैंडपंपों को ठीक करने का आदेश जारी हो चुका है. झांसी जनपद के सपरार बांध का जलस्तर लगातार घटने से मई माह से ही पेयजल आपूर्ति की समस्या उत्पन्न हो सकती है. सपरार बांध से मऊरानीपुर में पेयजल आपूर्ति की जाती है. मऊरानीपुर में बांध के पानी के अलावा ट्यूबवेल एवं कुएं आदि जल के स्रोत हैं, किंतु बड़ी आबादी बांध के पानी पर आश्रित है. बांध में इस समय लगभग 220 मिलियन घन फुट पानी बचा हुआ है. वहां से प्रतिदिन लगभग साढ़े तीन एमएलडी पानी की आपूर्ति की जा रही है. सपरार प्रखंड के अधिशासी अभियंता ए के सक्सेना का कहना है कि मऊरानीपुर में सुबह और शाम तीन-तीन घंटे जलापूर्ति की जाती है. प्रतिदिन खपत एवं भीषण गर्मी से वाष्पीकरण का औसत बढ़ने से बांध से अधिकतम 20 मई तक जलापूर्ति संभव है. उन्होंने बांध के घटते जलस्तर के मद्देनजर जल संस्थान के अधिशासी अभियंता सुरेश चंद्र को पत्र लिखकर मऊरानीपुर की जलापूर्ति में कटौती करने के लिए कहा है. महोबा जनपद का वार्ड हवेली दरवाजा भीषण पेयजल संकट से जूझ रहा है. यहां के ऊंचाई वाले इलाक़ों में पूरे साल टैंकरों से जलापूर्ति होती है. गर्मी की शुरुआत होते ही पेयजल संकट गहरा गया है. स्थानीय निवासी विपिन तिवारी एवं आनंद द्विवेदी बताते हैं कि पानी के लिए लोगों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है. आपूर्ति के लिए वार्ड में पाइप लाइन डालने की योजना लंबित है. जल निगम की लापरवाही से पाइप लाइन नहीं पड़ सकी. क़स्बा मुस्करा में ट्रांसफार्मर ख़राब होने से पेयजल के लिए हाहाकार मच गया. हैंडपंपों पर एक-एक बाल्टी पानी के लिए लंबी-लंबी लाइनें लग गईं. तीन दर्जन से अधिक गांव पूरी तरह से अंधेरे में डूबे हुए हैं. ललितपुर के मैदानी इलाक़ों के साथ-साथ पठारी इलाक़ों में भी पेयजल की समस्या उत्पन्न हो गई है. मड़ावरा क्षेत्र की संजीवनी मानी जाने वाली नदियां सूखी पड़ी हैं.

चित्रकूट धाम मंडल

कुल आबादी-34,06,449

पानी की स्थिति

स्थान जरूरत आपूर्ति
शहरी इलाक़े 83 एमएलडी 69 एमएलडी
ग्रामीण क्षेत्र 56 एमएलडी 48 एमएलडी

मुख्य जलस्रोत

बेतवा, यमुना, बागेन, केन, प्यस्वनी, मंदाकिनी, ओहनडेम, अर्जुन सागर, मदन सागर, बेलाताल, कबरई तालाब एवं ट्यूबवेल. इनमें अधिकांश सूख चुके हैं और कुछ सूखने की कगार पर हैं.

ख़र्च धनराशि

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 58 करोड़ रुपये आए, अभी तक एक पैसा ख़र्च नहीं. केंद्र से 4 करोड़ 63 लाख 92 हज़ार रुपये मिले, ख़र्च 4 करोड़ 62 लाख 78 हज़ार रुपये.

झांसी मंडल

कुल आबादी-47 लाख

पानी की स्थिति

स्थान जरूरत आपूर्ति
शहरी इलाक़े 203.26 एमएलडी 147.92 एमएलडी
ग्रामीण क्षेत्र 150 एमएलडी 110 एमएलडी

मुख्य जलस्रोत

माता टीला बांध, गोविंद सागर बांध, राजघाट बांध, सपरार बांध, हैंडपंप, कुएं, तालाब और नलकूप. सभी बांधों पर पानी घटा. तीस प्रतिशत से ज़्यादा हैंडपंप, तालाब और कुएं सूखे हैं.

ख़र्च धनराशि

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत 11 करोड़ रुपये आए, जिसमें से 9.50 करोड़ ख़र्च हुए. केंद्र एवं राज्य से 98 करोड़ 40 लाख रुपये आए, ख़र्च हुए केवल 85 करोड़ 33 लाख रुपये.

मध्य प्रदेश के कुछ इलाक़ों में पानी बरस गया था, इस वजह से कुछ बांध भर गए थे. वहीं पठारी इलाक़ों की स्थिति पहले की तरह है. इन क्षेत्रों में जल संरक्षण के व्यापक इंतज़ाम किए गए थे, लेकिन प्राकृतिक आपदा के कारण जल संकट बरक़रार है. पानी के भंडारण और जलस्तर बनाए रखने के लिए चेकडैम एवं बंधियों का निर्माण किया गया था, जो सूख चुके हैं. ऊंचाई पर मौजूद इस विकास खंड के कुर्रट गांव में पानी का भीषण संकट है. इस ग्राम पंचायत के मजरे कुर्रट, जैतूपुरा एवं लखंजर काफी उपेक्षित हैं. वहां तक पहुंचने के लिए लोगों को धसान नदी पार करनी पड़ती है. वे सागर जनपद के गांव बराठा से रोजमर्रा की ज़रूरत का सामान ख़रीदते हैं. इस क्षेत्र के अन्य ग्रामों में भी पानी का संकट बना हुआ है. प्रदेश में 20 एकड़ भूमि में आवासीय कॉलोनी बनने पर एक एकड़ भूमि पर तालाब बनना अनिवार्य है, लेकिन नगर विकास और आवास विकास विभाग इस नियम का पालन नहीं कर रहे हैं. भूमिगत जल संग्रहण के लिए केंद्र सरकार से मिलने वाली धनराशि का 25 प्रतिशत हिस्सा ज़िलाधिकारी ख़र्च करते हैं. उस राशि को जल संग्रहण की जगह ख़र्च किया जाना ज़रूरी है. भूगर्भ जल के गिरते स्तर को रोकने के लिए नगर विकास, आवास विकास, जल निगम, ग्राम्य विकास, वन विभाग एवं भूमि विकास विभाग भी तैयार नहीं हैं. भूगर्भ जल विभाग को बीते वर्ष 175 लाख रुपये पीजो मीटर स्थापना के लिए मिले हैं. बुंदेलखंड के पठारी जनपद बांदा, चित्रकूट, महोबा एवं ललितपुर के हालात बदतर होते जा रहे हैं. बांदा एवं चित्रकूट में जलस्तर बहुत तेज़ी से नीचे खिसक रहा है. कई विकास खंडों को तो डार्क एरिया घोषित कर दिया गया है.

केंद्रीय भूगर्भ जल सर्वेक्षण आयोग की रिपोर्ट को यदि सच मानें तो बुंदेलखंड में खेती के लिए ख़तरे की घंटी बज गई है. 1950-60 के दशक में इस क्षेत्र में जीवांश की मात्रा .52 थी, जो आज .20 रह गई है. जीवांश की कमी से उत्पादन कम हो रहा है. मई-जून में तापमान 53 डिग्री तक हो जाने से खेतों में जीवांश ख़त्म हो जाता है. वनों की कटान के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है. केंद्रीय भूगर्भ जल सर्वेक्षण आयोग द्वारा के अनुसार, विकास खंड मऊ, मानिकपुर, कर्वी, पहाड़ी एवं रामनगर डार्क एरिया में आते हैं. नरैनी जसपुरा ग्रे एरिया (चेतावनी स्तर) पर हैं. इन क्षेत्रों में यदि रिचार्जिंग की व्यवस्था नहीं हुई तो धीरे-धीरे यहां भी जलस्तर मानक से नीचे खिसक जाएगा. बांदा मंडल के महुआ, कमासिन एवं बबेरू और झांसी मंडल के महरौनी, तालबेहट, बबीना, मऊरानीपुर एवं बड़ा गांव को व्हाइट एरिया माना गया है. ललितपुर जनपद के मडावरा एवं जखोरा ब्लॉक के अनेक ग्रामों का भी जलस्तर मानक से नीचे है. शासन द्वारा जलस्तर बनाए रखने के लिए कुछ चेकडैमो का निर्माण कराया गया था, लेकिन यथार्थ और सरकारी आंकड़ों में भारी अंतर है. स्वयंसेवी संस्था जन कल्याण समिति द्वारा पठारी क्षेत्रों में जलस्तर के संबंध में जुटाए गए आंकड़े भयावह तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. मई और जून माह में बुंदेलखंड के 50 प्रतिशत हैंडपंप जलस्तर गिर जाने से बेकार हो जाते हैं. क्षेत्रीय सांसद एवं केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य का कहना है कि राज्य सरकार के कारण कुछ नहीं हो पा रहा है. प्रदेश सरकार के मंत्री दद्दू प्रसाद का गृह जनपद ही पानी के लिए तरस रहा है.


साभार-चौथीदुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/04/declining-water-growing-thirst.html