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जैतापुर न्यूतक्लियर प्रोजेक्टः6 बर्बादी की यह योजना बंद करें

भारत सरकार ने 2032 तक 63 हज़ार मेगावाट न्यूक्लियर ऊर्जा के उत्पादन का फैसला लिया है. सरकार का मानना है कि यह क़दम ऊर्जा की भारी मांग की वजह से उठाया जा रहा है. इसी के तहत 2005 में भारत सरकार ने महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के मदबन में दस हज़ार मेगावाट क्षमता के एक विशाल न्यूक्लियर प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी. यह अपने आप में एक विशेष प्रोजेक्ट होगा. अभी तक दुनिया की किसी भी एक जगह पर इतनी क्षमता का एक ही प्रोजेक्ट स्थापित नहीं किया गया है. अगले 15 से 18 सालों में इस प्रोजेक्ट को दो चरणों में पूरा करने का प्रस्ताव है. पहले चरण में 3300 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए दो रिएक्टर लगाने की योजना है. आगे इसे 9900 मेगावाट में तब्दील कर दिया जाएगा. इसके लिए 938 हेक्टेयर ज़मीन का इस्तेमाल होगा, जिसमें से प्लांट के लिए 692 हेक्टेयर और आवासीय उपयोग के लिए बाकी ज़मीन का इस्तेमाल होगा. 2335 ज़मीन मालिकों एवं उनके परिवारों की जीविका और मज़दूरों की ज़िंदगी इस प्लांट के लिए दांव पर लगेगी. इस प्रोजेक्ट की वजह से मछुआरों की समस्या भी बढ़ने वाली है.

फ्रांस की कंपनी अरेवा यहां पर 6 रिएक्टर लगाने वाली है, प्रत्येक की क्षमता 1650 मेगावाट होगी. अरेवा फ्रांस की सरकार नियंत्रित कंपनी है. अरेवा ने यूरोपियन प्रेशराइज्ड रिएक्टर (ईपीआर) तकनीक का विकास किया है. लेकिन सच्चाई यह है कि अब तक एक भी ईपीआर का पूर्ण निर्माण नहीं हो सका है, जिसे ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल में लाया जा सके.

फ्रांस की कंपनी अरेवा यहां पर 6 रिएक्टर लगाने वाली है, प्रत्येक की क्षमता 1650 मेगावाट होगी. अरेवा फ्रांस की सरकार नियंत्रित कंपनी है. अरेवा ने यूरोपियन प्रेशराइज्ड रिएक्टर (ईपीआर) तकनीक का विकास किया है. लेकिन सच्चाई यह है कि अब तक एक भी ईपीआर का पूर्ण निर्माण नहीं हो सका है, जिसे ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल में लाया जा सके. अरेवा ने पहला ईपीआर फिनलैंड को बेचा, लेकिन अब तक इस रिएक्टर से उत्पादन कार्य शुरू नहीं हो सका है. इसकी डिजाइन की वजह से फिनलैंड का प्रोजेक्ट अब तक पूरा नहीं हो पाया है. उल्टे प्रोजेक्ट की कीमत 50 फीसदी और बढ़ चुकी है. फिनलैंड के रिएक्टर की कीमत 5.7 बिलियन यूरो है. चीनी रिएक्टर की कीमत 5 बिलियन यूरो है. इस हिसाब से जैतापुर के छह रिएक्टरों के लिए जनता के लगभग 1 लाख 93 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हो जाएंगे. जबकि भाप चालित, कोयला आधारित पावर स्टेशन की कीमत प्रति मेगावाट 5 करोड़ रुपये आएगी.

बहरहाल, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से जैतापुर प्रोजेक्ट के लिए एनवायरमेंटल क्लियरेंस पाने के लिए एनपीसीआईएल ने नागपुर स्थित नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई) को इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर का मूल्यांकन करने को कहा. एनईईआरआई ने एनवायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट तैयार किया और 16 मई, 2010 को एक जन सुनवाई भी की. हालांकि एनईईआरआई की रिपोर्ट की प्रति स्थानीय भाषा में गांव वालों के बीच बांटी गई थी, लेकिन स़िर्फ एक गांव में, वह भी जन सुनवाई के स़िर्फ5 दिन पहले. इसके अलावा बाकी के 5 गांवों में रिपोर्ट की प्रतियां नहीं दी गईं. जन सुनवाई के व़क्त भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई थी. एनईईआरआई की जांच रिपोर्ट भी अवैज्ञानिक है.

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से आरटीआई के इस्तेमाल से मिली जानकारी के मुताबिक़, जैतापुर भूकंप जोन-4 में आता है, लेकिन ईआईए रिपोर्ट में इसे जोन-3 में दिखाया गया है. अब चाहे जोन 3 हो या जोन 4, दोनों ही हालत में इस क्षेत्र में भूकंप आने की अधिक आशंका है. 1995-2005 के बीच जैतापुर और इसके आसपास के इलाक़े में 60 भूकंपीय कंपन जीएसआई द्वारा दर्ज किए गए. यहां तक कि 2005 में आए भूकंप की तीव्रता रिएक्टर स्केल पर 4.1 थी और उसका केंद्र बिंदु जैतापुर में जहां प्लांट लगना है, लगभग वही था.

जैव विविधता पर भी इस प्लांट का ग़लत असर होगा. नेरी की रिपोर्ट के अनुसार, मदबन पठार एक ऊसर-बंजर जगह है, जहां पर कोई जैव विविधता नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है. दरअसल, मदबन पठार की पहाड़ियों पर अर्ध सदाबहार जंगल है, आर्द्र भूमि है, अर्जुन नदी है और ऐसा दर्रा है, जिसमें विभिन्न प्रकार के समुद्री जंतु रहते हैं. ये सारे मिलकर एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं और इसी कारण यह परियोजना कोस्टल रेगुलेशन जोन के तहत अवैध है. जैतापुर के 6 न्यूक्लियर पावर प्लांट कुल 432 हेक्टेयर भूमि घेर लेंगे, जिससे जीव और वनस्पति दोनों का ही मदबन पठार से खात्मा हो जाएगा.

रेडियो एक्टिव कचरे के निस्तारण को लेकर भी यह परियोजना आसपास के इलाक़ों और जनता के लिए हानिकारक है. न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन इंडिया लि. के अनुसार, कम और मध्यम स्तर के नाभिकीय कचरे को ज़मीन से ऊपर ही निस्तारित किया जाएगा. इसके विरुद्ध ईआईए कहता है कि निस्तारण ज़मीन की सतह के नीचे होना है. दरअसल, नाभिकीय कचरा, जो ज़मीन में दबा दिया जाता है, उसका तीन सौ वर्षों तक निरीक्षण करना होता है. लेकिन यह सब कैसे होना है, ईआईए की रिपोर्ट में इसका कोई उल्लेख नहीं है. नाभिकीय ईंधन, जिसका इस्तेमाल हो चुका है, को भी  दोबारा पुन: संशोधित करना है, लेकिन यह बात भी ईआईए रिपोर्ट में नहीं है. इस काम के लिए न तो कोई जगह तय की गई है और न किसी संसाधन की बात कही जा रही है.

सारी ग्राम पंचायतों ने इस नाभिकीय ऊर्जा पार्क के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया है. यहां के लोग विगत पांच सालों से शांतिपूर्वक और प्रजातांत्रिक तरीक़े से विरोध कर रहे हैं. बावजूद इन सभी विरोधों और नाभिकीय प्लांट के विरुद्ध पाए गए सारे तथ्यों के, केंद्र एवं महाराष्ट्र सरकार और एनपीसीआईएल यह प्लांट लगाने पर अडिग हैं. राज्य सरकार ने ज़बरन भूमि का अधिग्रहण किया और विरोध करने वालों पर लाठियां चलवाईं. सरकार के सारे अत्याचारों के बाद भी यहां की जनता अपनी भूमि के बदले मुआवजा लेने को तैयार नहीं है. 16 अक्टूबर, 2010 को महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री ने मुंबई में ऐलान किया कि एनपीसीआईएल और राज्य सरकार ने एक ऐसे अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत इस योजना से प्रभावित लोगों का पुनर्वास किया जाएगा. उन्होंने कहा कि स्थानीय किसान इस परियोजना के विरोध में नहीं हैं. मंत्री के इस बयान पर जनता गुस्से में आ गई और उस अ़खबार की सामूहिक होली जलाई गई, जिसमें मंत्री का उक्त बयान छपा था.

29 अक्टूबर, 2010 को स्थानीय जनता ने पुलिस द्वारा लगाए गए प्रतिबंध आदेश को शांतिपूर्वक विरोध के सहारे तोड़ दिया और तीन हज़ार लोगों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी. उनके अनुसार, जब वे अपने खेत नाभिकीय प्लांट के लिए देना ही नहीं चाहते तो मुआवजे का सवाल कहां उठता है. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 28 नवंबर, 2010 को जैतापुर प्लांट को हरी झंडी दे दी. इसके पीछे कारण कूटनीतिक और सामरिक बताए गए. इस प्रकार फ्रांसीसी कंपनी अरेवा के साथ अनुबंध करने का रास्ता सा़फ हो गया. ऐसा तब किया गया, जब फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी भारत यात्रा पर आए हुए थे. इसके विरोध में 5 हज़ार मछुआरों, खेतिहरों और गांव के अन्य लोगों ने मदबन में अरेवा वापस जाओ-सरकोजी वापस जाओ के नारे के साथ जेल भरो आंदोलन किया.

बीती 18 दिसंबर को एनपीसीआईएल की एक सूमो गाड़ी, जिसे पुलिस वाले इस्तेमाल कर रहे थे, की टक्कर एक स्कूटर से हुई, जिसमें स्कूटर सवार की मृत्यु हो गई. मृतक एक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता का भांजा था. ध्यान देने की बात यह है कि उक्त सामाजिक कार्यकर्ता इस प्लांट का विरोध कर रहे थे. इससे पहले भी पुलिस द्वारा आपत्तिजनक ढंग से गाड़ी चलाना जनता को खटकता रहा है. पूरी स्थिति पर पुलिस ने जो असंवेदनशील रवैया अख्तियार किया, वह बहुत ही ग़ैर ज़िम्मेदाराना था. पुलिस ने कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के खिला़फ गंभीर धाराएं लगाईं जैसे दंगा फैलाना, घातक हथियारों का प्रयोग और यहां तक कि हत्या का प्रयास. निर्दोष लोगों को अग्रिम ज़मानत भी नहीं दी गई. दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने अध्यापकों को निर्देश दिया कि वे स्कूली बच्चों को यह समझाएं कि यह नाभिकीय पावर प्लांट स्वच्छ और सुरक्षित है. इसके विरोध में बच्चों ने स्कूल का बहिष्कार किया, जो सौ फीसदी सफल रहा.

18 जनवरी, 2011 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने एक मीटिंग बुलाई, जिसमें बार्क, एनपीसीआईएल, नाभिकीय ऊर्जा विभाग और स्थानीय लोगों को आमंत्रित किया गया. यह आमंत्रण स्थानीय लोगों ने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि सरकार जानकारी साझा करने में ईमानदारी नहीं दिखा रही थी और यह लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन था. महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री नारायण राणे ने खुलेआम उन लोगों को धमकी दी है, जो इस प्लांट के विरोध में हैं. उन्होंने कहा कि कुछ लोग कोंकण का भला नहीं चाहते. जो लोग इस प्लांट के विरोध में हैं, वे अपने घरों को वापस नहीं पहुंच पाएंगे. सरकार ने जनता की जनतांत्रिक मांगों के विरुद्ध काम करने का मन बना लिया है. यहां तक कि सरकार लोगों के शांतिपूर्ण विरोध को भी बलपूर्वक दबाने के लिए तत्पर दिख रही है. भले ही राज्य तंत्र के पास अधिक मशीनें या अधिक बल हो, लेकिन जनता ने इस संघर्ष को अंतिम परिणाम तक ले जाने का मन बना लिया है.

क्या है मांग?

1.      जैतापुर न्यूक्लियर प्रोजेक्ट को तत्काल बंद किया जाए.

2.      ज़बरन अधिग्रहीत ज़मीन को लौटाया जाए.

3.      कार्यकर्ताओं के विरुद्ध पुलिस केस वापस लिए जाएं.

4.      कोंकण में प्रस्तावित और मौजूद विकास परियोजनाओं के समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाए.

5.      कोंकण में चल रहे सभी ताप बिजली संयंत्रों, खनन कार्यों और रासायनिक उद्योगों को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाए.

6.      जनता को साथ में लेकर विकास के लिए अन्य दीर्घकालिक योजनाएं बनाई जाएं.

(लेखिका कोंकण बचाओ समिति की चेयरमैन एवं पर्यावरणविद्‌ हैं.)

साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/02/jaitapur-nyukliyar-project.html


जल संकट और सरकारी भ्रष्‍टाचार……

पश्चिमी उत्तर प्रदेश आज जल संकट की ज़बरदस्त मार झेल रहा है. यहां आज पीने और कृषि दोनों के लिए पानी की कमी है. जब पीने को पानी नहीं रहेगा और न ही कृषि के लिए, तो जनजीवन का क्या होगा? आज इसी सवाल से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता दो-दो हाथ कर रही है. लेकिन ये स्थितियां अचानक नहीं खड़ी हो गई हैं. इसके अनेक कारण रहे हैं. जनता भी उतनी ही दोषी है, जितनी आज और कल की सरकारें. पानी का अंधाधुंध दोहन होता रहा है. किसानों ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि ऐसे उन्मुक्त दोहन से क्या हो सकता है? वैसे इसमें किसानों का भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि उन्हें बताने वाला कोई नहीं था. सरकार ने स़िर्फ इस बात पर ध्यान दिया कि किसानों का मुंह कैसे बंद रखा जाए. कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर तो कभी उर्वरकों पर सब्सिडी बढ़ाकर. कभी यह नहीं सोचा गया कि आख़िर जब पानी रहेगा, तभी तो इन सब चीज़ों की ज़रूरत पड़ेगी. आज जो पानी की कमी की बात की जा रही है, वह कोई नई नहीं है. पहले भी सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठन इस समस्या की तऱफ उंगलियां उठाते रहे हैं, लेकिन हुआ कुछ नहीं. लघु सिंचाई एवं सिंचाई विभाग स़िर्फ गड्ढे खोदने में लगे रहे और ग़लत पंप और हैंडपंप बनाते रहे. आगरा मंडल के तहत जो ज़िले आते हैं, वे हैं आगरा, मथुरा, हाथरस एवं फिरोज़ाबाद. पहले अलीगढ़ भी इसी मंडल के अंतर्गत था. अलीगढ़ की बात यहां इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि वहां भी यही समस्या है. याद रखने की बात है कि यह पूरा इलाक़ा गहन कृषि क्षेत्र है. यहां पानी का अधिकाधिक प्रयोग बहुत पहले से होता आ रहा है. पूरे क्षेत्र की संपन्नता और रोज़गार कृषि पर ही आधारित है. इस कारण यहां पर पानी की कमी किसी भी शहरीकृत क्षेत्र से अधिक चिंतित करने वाली है.

आज दुनिया इस बात पर लड़ रही है कि पर्यावरण को किसने ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया और किसने प्रकृति का अधिक दोहन किया है. बड़ी-बड़ी कांफें्रस होती हैं, बड़े-बड़े देशों के पर्यावरणविद्‌ एवं मंत्री भाषण देते हैं, पर्यावरण और धरती की अमूल्य धरोहरों को बचाने की कसमें खाते हैं, लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात. उसी पुराने ढर्रे पर ही जीवन चलता रहता है, दोहन होता रहता है, चाहे पानी का हो या तेल का. पानी कितना अमूल्य है, यह कोई बताने की बात नहीं है. बिन पानी न तो मानव रह सकता है और न ही पशु और वनस्पति जगत, लेकिन सरकार ने इस बहुत बड़ी सच्चाई से मानो मुंह मोड़ रखा है.

आज स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि इस पूरे क्षेत्र में पानी साठ से सत्तर मीटर गहराई में पाया जाता है. यह पानी भी कोई बहुत मीठा या पीने के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं है. स़िर्फयह है कि इस पानी से किसी तरह काम चल सकता है. मतलब यह है कि पानी खारा तो है, लेकिन बाक़ी जगहों से कम. बात यह है कि पीने या खेती करने के लिए पानी एक स्तर तक ही खारा हो सकता है. अगर बहुत खारा पानी है तो वह न पीने के काम आ सकता है और न खेती के लिए, क्योंकि अगर ज़्यादा खारा पानी सिंचाई के काम में ले लिया जाए तो ज़मीन यानी खेत के ऊसर हो जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है. इस स्तर का पानी पशुओं को भी पिलाने के काम नहीं आ सकता. ऐसा नहीं है कि इस पानी को खेती के लिए उपयोग करने के बारे में सोचा नहीं गया. लेकिन एक और समस्या है कि यह पानी तेलिया है. मतलब इसमें तेल है. तेल होने की वजह से यह पानी खेत की मिट्टी में समाता ही नहीं, ऊपर ही रह जाता है. जिस स्तर तक पानी है, मतलब साठ से सत्तर मीटर तक, ज़ाहिर है कि इसी स्तर तक के पानी का दोहन किया जा सकता है. यही किया भी गया है, लेकिन इसका दुष्प्रभाव यह रहा कि पानी का स्तर और नीचे गिर गया है. मतलब यह कि अब लोग उस स्तर की अंतिम सीमा पर पहुंच गए हैं, जहां से खारा पानी शुरू होता है और यह पानी किसी काम का नहीं है. दरअसल आगरा जनपद और आसपास के इलाक़ों की स्थिति इतनी ख़राब नहीं थी. 1980 में यहां का जलस्तर सामान्य था. 1996 में जलस्तर घटकर 34 मीटर चला गया. अगले दस सालों में यह जलस्तर भयावह रूप से 42 मीटर चला गया और 2010 आते-आते 45 मीटर तक. पूरे क्षेत्र में 1280 सरकारी और 68000 ग़ैर सरकारी ट्यूबवेलों से अंधाधुंध पानी की निकासी की जा रही है. फिरोज़ाबाद में भी यही स्थिति है. मथुरा और अलीगढ़ क्षेत्रों में भी 2-4 मीटर का ही अंतर है.

समस्या यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. जैसा कहा गया है कि पानी का स्ट्राटा (वह आख़िरी सीमा, जहां तक ठीक पानी मिलता है) 60-70 मीटर है और स्तर 40-45 मीटर है. यह जलस्तर लगातार दोहन की वजह से गिरता जा रहा है. हर साल एक से डेढ़ मीटर की गिरावट दर्ज की जा रही है. ऐसा अनुमान है कि अगर जलस्तर इसी मानक से गिरता रहा तो दस-पंद्रह साल में सारा मीठा पानी ख़त्म हो जाएगा. यदि यह पानी ख़त्म हो गया तो फिर क्या होगा? क्योंकि आगे का पानी तो बस नाम का पानी है, जिसका प्रयोग मुमकिन नहीं है. मतलब यह है कि सारी खेती ख़त्म हो जाएगी, सारे पशु या तो मर जाएंगे या भाग जाएंगे. जहां तक लोगों की बात है, उन्हें भी पलायन के लिए मजबूर होना पड़ेगा. आज का आगरा, जो ताजमहल के लिए विश्व प्रसिद्ध है, रेगिस्तान बनकर रह जाएगा और पर्यटक ऊंची क़ीमतों पर पानी ख़रीद कर पिएंगे. जैसा कि चिली के कई शहरों के साथ हुआ, इस क्षेत्र के भी कई शहर सुनसान हो जाएंगे.

इन सारी समस्याओं का एक और पहलू है. बात करनी होगी मथुरा और आगरा की दक्षिणी सीमा के पास के स्थानों की, जो चंबल से लगे हुए हैं और राजस्थान की ओर पड़ते हैं. समूचे चंबल घाटी क्षेत्र में गड्‌ढों की भरमार है. आख़िर ये गड्‌ढे कैसे बन गए? हुआ यह कि यहां भी जलस्तर बहुत तेज़ी से गिरता चला गया. इस कारण ज़मीन से पानी बहुत नीचे चला गया. मतलब यह कि मिट्टी ऊसर हो गई और फिर यह बंजर मिट्टी रेत में बदल गई. जब यहां बारिश होती है तो यह सारी रेतीली मिट्टी तेजी से बहकर चंबल में चली जाती है. ज़ाहिर है कि राजस्थान का मरुस्थल इस ओर बढ़ रहा है. गर्मियों में राजस्थान की रेत तेज़ हवाओं के साथ उड़कर आने से दिल्ली तक मरुस्थलीकरण का ख़तरा पैदा हो गया है. ऐसे में इस क्षेत्र के लिए मरुस्थलीकरण का पैमाना क्या होगा, यही सोचने वाली बात है. अगर आगरा और आसपास की जगहों पर पानी का स्तर इसी तरह तेज़ी से गिरता गया तो इनका भी मरुस्थलीकरण होने से रोकना असंभव होगा.

इस विषय में सरकारी महकमों और सरकारों ने भी कोई ध्यान नहीं दिया. जब बात आती है सरकारी भूमिका की, तो पानी मुहैय्या कराना अफसरों और मंत्रियों के लिए पैसा बनाने का साधन बन जाता है. पानी एक बड़ा गोरखधंधा बन गया है. ऐसा ही यहां भी हुआ है. सरकार नलकूप और हैंडपंप लगाने की बहुत सारी योजनाएं लाती रहीं, लेकिन वे अपनी अनुमानित अवधि से पहले ही बेकार हो जाते हैं या सूख जाते हैं. मतलब पानी नहीं देते. अब ऐसा होता क्यों है? क्या सरकार की ओर से पर्याप्त पैसा नहीं आता ऐसी योजनाओं के लिए? ऐसा नहीं है. क्या अफसर सारा पैसा खा जाते हैं? क्या हैंडपंप बनाते समय नियमावली का ध्यान नहीं रखा जाता? सच बात तो यह है कि नलकूप और हैंडपंप बनाने का ठेका सरकार स्थानीय ठेकेदारों को दे देती है. ठेकेदार सारे नियम-क़ानून ताक पर रखकर कम पैसा लगाते हैं, रद्दी सामान का प्रयोग करते हैं और जिस गहराई तक बोरिंग होनी चाहिए, उतनी नहीं करते. सरकारी अफसर उनसे मिले हुए हैं. ऐसे ठेकेदारों से सामान का लेनदेन होता है, जो रिश्वत देते हों. सरकारी अफसर ऐसा स़िर्फ अपने लिए नहीं करते, उन्हें आगे भी पैसा पहुंचाना पड़ता है. 2009-10 में आगरा जनपद में लगाए गए हैंडपंप बेकार हो गए, सूख गए. जांच बैठी तो पाया गया कि हैंडपंप लगाते समय नियमों का पालन नहीं किया गया था. जितनी बोरिंग होनी चाहिए, उतनी नहीं हुई और भुगतान पूरा ले लिया गया. दरअसल हैंडपंप लगाना बच्चों का खेल नहीं है. पहले तो अगर 2.5 इंच का डिस्चार्ज चाहिए तो 4-6 इंच का बोर होना चाहिए. फिर उसे मोटी रोड़ी से भरा जाता है, ताकि नीचे बोरे में पाइप पर मिट्टी न गिर पड़े. ऐसा इसलिए, क्योंकि पानी के स्रोत पर पाइप छेद वाला होता है और रोड़ी न भरी जाए तो छेद मिट्टी से भर जाते हैं और पानी आना बंद हो जाता है. ठेकेदार और सरकारी अफसर इन सारे चरणों पर पैसा बचाने की जुगत में रहते हैं, इसलिए हैंडपंप सूख जाते हैं. आगरा जनपद में भी सब कुछ ऐसा ही हुआ था. बोरिंग होनी थी 60 मीटर, लेकिन हुई 40 मीटर. गर्मी आते ही पानी का स्तर नीचे चला गया और हैंडपंप सूख गए. ठेकेदारों ने हर पंप पर मीटर पाइप और बोरिंग आदि का पैसा बचाकर अपनी जेब में डाल लिया. जांच अधिकारियों ने भी अपनी रिपोर्ट में यही लिखा है कि नियमावली का पालन न करने और तकनीकी कमी के कारण पंप सूख गए थे. कई जगह ऐसा भी देखा गया कि जहां सरकारी महकमों यानी जल निगम, यू पी एग्रो और नलकूप निगम को बोरिंग करनी चाहिए थी, वहां किसानों को ख़ुद ही बोरिंग करानी पड़ी अपना पैसा लगाकर.

सरकारी रवैय्या भी बहुत नकारात्मक रहा इस पूरे मामले में. सरकार ने आज तक कोई ऐसा नियम-क़ानून नहीं बनाया, जिसके आधार पर पानी के दोहन की सीमा तय की जा सके. बात बहुत दिनों से चल रही है, लेकिन आज तक इस मामले में सरकार ने कोई विधेयक पेश नहीं किया. ऊपर से यमुना एक्सप्रेस-वे जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना बनाते समय भी इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि जल संकट के कारण भविष्य में पूरी परियोजना पर ताला लग सकता है. एक्सप्रेस-वे से लगा हुआ एशिया का सबसे बड़ा शहर बसाने की योजना भी है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जब पानी ही नहीं रहेगा तो शहर बसा कर क्या होगा? इसी एक्सप्रेस-वे के मामले में किसानों ने आंदोलन छेड़ा. मीडिया से लेकर सरकार तक ने इसे हर्जाने और किसानों की क्षतिपूर्ति का मामला बताया, लेकिन इस बात पर किसी की नज़र नहीं गई कि किसान सिर्फ अपने खेतों की सही क़ीमत ही नहीं मांग रहे थे, उनकी एक बड़ी मांग यह भी थी कि उन्हें खेती के लिए पानी की किल्लत हो रही है और सरकार उन्हें पानी मुहैय्या कराए.

हर साल फतेहपुर सीकरी और आसपास के कई इलाक़ों में पानी के लिए क़त्ल-बलवा होता है. जल संकट की वजह से सामाजिक तनाव बढ़ रहा है और जीवनदायक पानी जीवन ले रहा है. सरकार की एक और योजना है गंगा का पानी इस पूरे इलाक़े में लेकर आना. आज तक उस योजना पर कोई कार्य नहीं हुआ. यह योजना 1200 करोड़ रुपये की है, लेकिन आम जनता का मानना है कि इससे कोई भला नहीं होने वाला. यमुना का पानी इतना दूषित है कि वह पीने या खेती करने लायक़ नहीं बचा है. दिल्ली से आते हुए यमुना में बड़े पैमाने पर गंदगी का डिस्चार्ज हो जाता है, इसीलिए यह स्थिति पैदा हो गई है. यही पानी कुछ तरीक़ों से फ़िल्टर करके जनता को पिलाया जाता है, जो कई बीमारियों को जन्म देता है. समाज का अमीर वर्ग तो पानी खरीद कर पी रहा है, लेकिन ग़रीब आदमी पानी जैसी मूलभूत ज़रूरत पर कहां से पैसा खर्च करे. इसी कारण उसे यही गंदा और खारा पानी पीकर काम चलाना पड़ता है.

सोचने वाली बात है कि जब यह समस्या आज की नहीं है, नई नहीं है तो फिर सरकार का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया? अगर बात यह है कि परियोजनाएं बनी और पैसा आवंटित हुआ तो वह पैसा कहां गया? जब यह समस्या बढ़ रही थी, तब कोई सुधार और शोध क्यों नहीं हुआ? बात यह है कि पानी का अन्वेषण और पानी मुहैय्या कराना मंत्रियों और अफसरों के लिए पैसा बनाने की तकनीक बन गया है. पानी बेचने वालों का धंधा चल निकला है. आज तक या तो अन्वेषण-शोध हुआ ही नहीं, हुआ तो रिपोर्ट को अनदेखा कर दबा दिया गया. क्यों? सरकार के एजेंडे पर यह सबसे पहला काम होना चाहिए था.

साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/02/aagara-jal-sankat-our-sarkari-bhratachar.html

Invite you for a lecture ……………………

CENTRE FOR EXTRA-MURAL STUDIES & INSTUCEN TRUST

Invite you for a lecture

‘The Unsettled Science Of Global Warming: Where Do We Go From Here?’

By

Prof. Dr. Madhav Khandekar

Dr Bal Phondke, nuclear biologist and science communicator will preside

On Friday, 25th February 2011

From 4.00 p.m. to 5.30 p.m.

Marshal Hall, Jawaharlal Nehru Library,

Vidyanagari, University of Mumbai, Santacruz (East), Mumbai

Abstract- There is an intense debate on the topic of global warming & climate change in recent years in the media as well as in the scientific community. The term ‘global warming’ refers to the warming of the earth’s surface (land-water combined) due to human-added carbon dioxide because of worldwide industrial activity. This talk will survey the global warming science and will highlight several uncertainties in the science. The talk will discuss other processes like large-scale atmosphere/ocean circulation changes, urban impact and solar variability, which influence mean temperature over various regions of the earth. The talk will then discuss present and future global warming impact on extreme weather events, sea level rise and other climate events and changes. Finally, the talk will present an alternative approach of a simple adaptation strategy to “combat” future climate change.

Brief Bio– Dr. Madhav Khandekar is a former research scientist from Environment Canada (in Toronto, Canada) and has been in the weather & climate science for over 53 years. He holds an M. Sc. degree in Statistics from Pune University and an M. S. and Ph. D. degree in meteorology from the Florida State University, USA. Dr. Khandekar has published well over 130 research papers. Khandekar is presently on the Editorial Board of the International Journal ‘Natural Hazards’ (Kluwer Publications, Netherlands) and was an Expert Reviewer for the 2007 IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change, a UN Body of scientists) Climate Change Documents.

Dr. Khandekar continues his research at present on global warming/extreme weather link and Indian/Asian Monsoon inter-annual variability.

Mugdha D.Karnik, Director
Centre for Extra-Mural Studies, University of Mumbai,
Vidyanagari, Kalina, Santacruz(E),
Mumbai 400098

Tel: 022-65952761/65296962
www.extramural.org

भवताल : जलक्षेत्रात लोकसहभाग की एकाधिकार?

उद्योग, वीजप्रकल्प व इतर संस्थांना पाण्याचे हक्क देण्याचा अधिकार कोणाचा?.. राज्यात हा प्रश्न सध्या वादग्रस्त बनला आहे. जलक्षेत्रात सुधारणा घडवून आणण्यासाठी सरकारने २००५ साली कायदा करून महाराष्ट्र जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाची (एम.डब्ल्यू.आर.आर.ए.) स्थापना केली. पाण्याचे हक्क ठरविण्याचे आणि विविध घटकांसाठी पाण्याचे दर ठरविण्यासाठी तत्त्व ठरविण्याचे अधिकार प्राधिकरणाला दिले. ही व्यवस्था उभी राहत असतानाच आता सरकारने पाण्याचे हक्क देण्याचे अधिकार स्वत:कडे घेतले आहेत. त्यामुळेच हे अधिकार सरकारकडे एकवटायचे की लोकांशी सल्लामसलत करणाऱ्या प्राधिकरणाकडे द्यायचे हा प्रश्न उपस्थित झाला आहे. या घडामोडींचे दूरगामी परिणाम होणार आहेत. त्यामुळेच या प्रश्नाकडे तातडीने आणि गांभीर्याने लक्ष पुरविण्याची आवश्यकता आहे.
पाण्याचे नियंत्रण केवळ शासनाकडे न राहता त्यात लोकसहभाग वाढावा व पाण्याचा कार्यक्षम वापर व्हावा म्हणून जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाची स्थापना झाली. पाण्याचे समन्यायी वाटप, पाण्याची गळती-प्रदूषण रोखणे अशा महत्त्वाच्या गोष्टींवर लक्ष, हे सर्व करताना ठिकठिकाणी सुनावण्या घेऊन लोकांशी चर्चा, त्यांचे आक्षेप ऐकून घेऊन वाद सोडविणे अशा प्रकारे लोकसहभागाद्वारे जलसंपत्तीचे नियमन करणे हा मुख्य हेतू या स्थापनेमागे होता. पाण्याचे हक्क देण्याचे अधिकार प्राधिकरणाला दिले असले तरी प्रत्यक्षात मात्र पाणीवाटप शासनाच्या ‘उच्चाधिकार समिती’कडून केले जात आहे. आता तर प्राधिकरणाच्या कायद्यात बदल करून हे अधिकारच आपल्याकडे घेण्याचे प्रयत्न सरकारकडून सुरू आहेत. या प्रकरणाला पाश्र्वभूमी आहे.. पाण्याचे हक्क देण्याचे अधिकार पूर्वी जलसंपदा विभागाकडे होते. मात्र, २००३ साली जलसंपदा मंत्र्यांच्या अध्यक्षतेखाली एक उच्चाधिकार समिती स्थापन करण्यात आली. ज्या धरणांमधील २५ टक्क्य़ांपेक्षा जास्त पाणी शेतीव्यतिरिक्त इतर कामांसाठी द्यायचे आहे त्या पाण्याचे वाटप करण्याचे अधिकार या समितीकडे सोपविण्यात आले. त्यासाठीचा शासन आदेश काढण्यात आला. मात्र, २००५ साली जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाचा कायदा झाल्यानंतर हे अधिकार कायद्याने प्राधिकरणाकडे जाणे अपेक्षित होते. मात्र, तरीसुद्धा उच्चाधिकार समितीने पाणीवाटपाचे काम सुरूच ठेवले.
जलक्षेत्रातील सुधारणांचा पाठपुरावा करणाऱ्या पुण्यातील ‘प्रयास’ या संस्थेने माहितीच्या अधिकारात याबाबत काही माहिती उघड केली आहे. या माहितीनुसार, २००३ नंतर ते जानेवारी २०१० पर्यंत या समितीने २५ बैठका घेऊन शेतीचे पाणी इतर प्रकल्पांना दिले. त्यापैकी १६ बैठकांची माहिती उपलब्ध झाली आहे. त्यानुसार उच्चाधिकार समितीने शेतीचे १५०० दशलक्ष घनमीटर पाणी इतरत्र वळवले. त्यामुळे साडेसहा लाख एकरपेक्षा जास्त क्षेत्र सिंचनापासून वंचित राहिले आहे. त्यापैकी ९० टक्के क्षेत्र २००७ ते २००९ या काळात शेतीपासून वंचित झाले. शेतीपासून काढून घेतलेल्या पाण्यापैकी ५४ टक्के उद्योगांसाठी, तर ४६ टक्के शहरांकडे वळविण्यात आले. उच्चाधिकार समितीच्या अध्यक्षपदी जलसंपदा मंत्री असतात. अर्थ, कृषी, उद्योग, पाणीपुरवठा खात्यांचे कॅबिनेट मंत्री आणि पाणीपुरवठा विभागाचे राज्यमंत्री असे त्याचे सदस्य असतात. या समितीने केलेल्या पाणीवाटपापैकी अमरावती जिल्ह्य़ात अप्पर वर्धा धरणाचे पाणी सोफिया औष्णिक वीजनिर्मिती प्रकल्पासाठी दिले, तर कोकणातील नव्या मुंबईतील हेटवणे धरणाचे पाणी सिडकोला दिले. या दोन्ही प्रकरणांमध्ये उच्चाधिकार समितीच्या पाणी वाटपाच्या अधिकाराबाबतच न्यायालयात दाद मागण्यात आली.
उच्चाधिकार समिती शासन निर्णयानुसार स्थापन झाली, तर जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाची स्थापना कायद्याद्वारे झाली आहे. त्यामुळे २००५ साली प्राधिकरणाच्या स्थापनेनंतर उच्चाधिकार समिती अर्थहीन ठरते, असा हा आक्षेप होता. पण २००५ नंतर समितीने तर भरपूर पाणी वाटले होते. ते बेकायदेशीर ठरले तर सरकारवर नामुष्कीची वेळ येईल. त्यामुळे मग सरकारने गेल्या सप्टेंबर महिन्यात अध्यादेश काढला. त्याद्वारे जलसंपदा नियमन कायद्यात दुरुस्ती करून हे पाणीवाटपाचे अधिकार उच्चाधिकार समितीकडेच असल्याचे दाखविण्याचा प्रयत्न केला, इतकेच नाही तर समितीच्या निर्णयाविरुद्ध कोणत्याही न्यायालयात दाद मागता येणार नाही, असेही या नव्या अध्यादेशात म्हटले. नागपूर येथील हिवाळी अधिवेशनात कायद्यात तसा बदल करून घेण्याचा सरकारचा प्रयत्न होता. पण त्यात यश आले नाही. त्यामुळे पुन्हा गेल्या ११ जानेवारी रोजी सरकारने हाच अध्यादेश नव्याने काढला.
या खटाटोपामुळे सरकारची नामुष्की कदाचित टळेलही. पण त्यात प्राधिकरणाचे पंख छाटले जाऊन खरा प्रश्न निर्माण होणार आहे- पाणीवाटपाच्या अधिकाराचा! त्यासाठी प्राधिकरणासारखी यंणत्रा उभी केली असेल, तर हे अधिकार उच्चाधिकार समितीकडे ठेवण्याचा अर्थ काय? एकीकडे जलक्षेत्रात सुधारणा करण्याची भाषा करायची आणि हजारो-लाखो लाभधारकांशी संबंधित पाणीवाटपाचा निर्णय उच्चाधिकार समितीतील सहा मंत्र्यांनी करायचा का? असे निर्णय घेताना राजकीय कुरघोडी करण्याची संधी असल्याने त्यात राजकारण आले नाही तरच नवल! समितीत सहा मंत्री असले तरी बहुतांश बैठकांना केवळ एक किंवा दोनच मंत्री असल्याचे हे अधिकार एक-दोघांकडेच एकवटलेले आहेत. नेमकेपणाने सांगायचे तर ते अजित पवार यांच्याकडे होते. उच्चाधिकार समितीच्या स्थापनेपासून ते मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यांच्या नेतृत्त्वाखालील सरकार स्थापन होईपर्यंत जलसंपदा खाते अजित पवार यांच्याकडेच होते. त्यानंतर ते सुनील तटकरे यांच्याकडे आले. त्यामुळे आताही त्यावर कोणाचे नियंत्रण आहे हे वेगळे सांगायला नको. पाणीवाटपातील अशा एकाधिकारामुळे कदाचित निर्णय झटपट होतील, पण या झपाटय़ात कितीजणांचे हक्क चिरडले जातील हे सांगताही येणार नाही.
जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाचा कायदा स्पष्टपणे सांगतो की पाणीवाटपाचे हक्क देण्याबाबत व पाण्याचे दर ठरविण्याबाबत तत्त्व प्राधिकरणाने ठरवायचे. त्यानुसार त्या-त्या भागातील नदी खोरे महामंडळांनी त्याची अंमलबजावणी करायची. त्यात शासनाचा हस्तक्षेप अपेक्षित नाही. एखाद्या घटकाला पाणीपट्टीत सवलत देण्यापुरतीच शासनाची मर्यादित भूमिका आहे. हे इतके स्पष्ट असताना आणि मंत्र्यांच्या समितीपेक्षा प्राधिकरणाची कार्यपद्धती अधिक लोकाभिमुख असताना उच्चाधिकार समितीची एकाधिकारशाही कशासाठी? राज्याच्या विकासासाठी उद्योग, वीजप्रकल्प, व्यावसायिक संस्थांची आवश्यकता आहे आणि त्यांना पाणी द्यावे लागणार आहेच. पण हे करताना कोण्या एका समितीने निर्णय घेण्यापेक्षा प्राधिकरणाचे व्यासपीठ अधिक समावेशक आणि शाश्वत ठरेल. हे अधिकार आपल्याकडे घेण्यापेक्षा सरकारने प्राधिकरण व त्याला पूरक ठरणाऱ्या नदी खोरे महामंडळे लवकरात लवकर कशी बळकट होतील याकडे लक्ष द्यावे. निर्माण होत असलेली व्यवस्था पंगू बनवून आपल्या हातात अधिकार घेऊ नयेत.. त्यात काही मंत्र्यांचे हित असले तरी राज्याच्या हिताचे निश्चितच नाही!

शासनाकडून जलसंपदा नियमन प्राधिकरणाच्या अधिकारांवर अतिक्रमण केले जात असताना प्राधिकरणाकडून कसलाही आक्षेप घेतला जात नाही. प्राधिकरणावरील नेमणुका राजकीय असल्या तरी त्यावरील सदस्यांनी सरकारच्या किंवा विशिष्ट मंत्र्यांच्या चालीने चालणे अपेक्षित नाही. याउलट लोकांच्या हितासाठी सरकारशी संघर्ष करायलाही मागे-पुढे पाहता कामा नये, मग पुढच्या वेळी प्राधिकरणावर नियुक्ती झाली नाही तरी बेहत्तर! कारण महत्त्वाचे अधिकारच काढून घेतलेल्या प्राधिकरणात राहण्यापेक्षा त्यापासून दूर राहणेच बरे नाही का?

अभिजित घोरपडे,

साभार – लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=135150:2011-02-09-15-11-33&catid=96:2009-08-04-04-30-04&Itemid=108

गंगोत्री में ही गंगा मैली….

हर धर्म की अपनी मान्यताएं-परंपराएं होती हैं. आस्था को विज्ञान की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु ऐसा भी नहीं कि उसमें कोई तर्क न हो. यदि धर्म न हो तो समाज में समरसता, भाईचारा और उल्लास देखने को न मिले. धर्म हमें अनुशासन सिखाता है और अधर्म के मार्ग पर चलने वाले को लगातार सजग करता है. हर धर्म की मान्यताएं अलग हैं, जो स्थान, समय एवं परिस्थितियों के अनुसार रहती हैं. तैंतीस करोड़ देवी- देवताओं की मान्यता वाले हिंदू धर्म में प्रकृति एवं परिवेश को सर्वोपरि और पूजनीय माना गया है. प्रकृति के वे तत्व जो जीने के लिए अपरिहार्य हैं, उन्हें हिंदू धर्म में देवी या देवता का स्थान प्राप्त है. इनमें जल का स्थान सर्वोपरि है और उसे विष्णु का स्थान प्राप्त है. नदियों को पूजनीय माना गया है और गंगा को मां का स्थान मिला है. हिंदू धर्म में यदि गंगा न हो तो कई मान्यताएं उलट हो जाएं. मुंडन से लेकर अंतिम संस्कार तक गंगा ही याद आती है, वहीं गंगा की पूजनीयता का वैज्ञानिक आधार भी है.

“गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा कौन नहीं जानता. अपने पूर्वजों के तारण के लिए भगीरथ ने कई हज़ार साल तक तपस्या की थी. हालांकि इस कथा को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु हिमालय की चोटियों को शिव की जटाओं के रूप में माना जाता है. जहां पर वह ग्लेशियरों के रूप में विद्यमान है, वहां से उसका जल नियंत्रित रूप से प्रवाहित होता रहता है.”

गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा कौन नहीं जानता. अपने पूर्वजों के तारण के लिए भगीरथ ने कई हज़ार साल तक तपस्या की थी. हालांकि इस कथा को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु हिमालय की चोटियों को शिव की जटाओं के रूप में माना जाता है. जहां पर वह ग्लेशियरों के रूप में विद्यमान है, वहां से उसका जल नियंत्रित रूप से प्रवाहित होता रहता है. गोमुख से उतरने पर गंगा का वेग बड़ा उग्र होता है, लेकिन जैसे-जैसे वह हिमालय की पहाड़ियों से नीचे उतरती है, उसका वेग मंद पड़ने लगता है. हिमालय से अनेक धाराएं निकलती हैं. गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक नदी की धारा जहां से भी गुजरती है, उन स्थानों की तीर्थ जैसी महिमा है. हिमालय को देवभूमि कहा जाता है, जहां गंगा के तट कई ॠषि-मुनियों की तपस्थली थे. उत्तराखंड में भागीरथी एवं अलकनंदा के किनारे बसे स्थलों को तीर्थ का स्थान हासिल है. कहा जाता है कि गंगोत्री में गंगा का मंदिर वह स्थान है, जहां राजा भगीरथ ने तपस्या की थी. इस मंदिर के दर्शनार्थ प्रति वर्ष लाखों लोग आते हैं. इससे आगे सबसे बड़ा नगर उत्तरकाशी पड़ता है, जो उत्तर की काशी कहा जाता है, जहां भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है. उत्तरकाशी से आगे गंगा टिहरी के डूबने तक गणेश प्रयाग में मिलती थी. बांध बनने के कारण गणेश प्रयाग का अस्तित्व अब नहीं रहा. टिहरी से आगे देव प्रयाग में उसका मिलन अपनी बड़ी बहन अलकनंदा से होता है, जो एक प्रमुख संगम है. यहां से आगे भागीरथी एवं अलकनंदा मिलकर गंगा कहलाती है. मान्यता है कि देव प्रयाग में भगवान श्रीराम ने ब्रह्म हत्या के प्रायश्चित हेतु तप किया था.

गंगा आज अपने उद्गम से मैली हो रही है. कई स्थानों पर यह इतनी प्रदूषित है कि इसका जल पीने योग्य नहीं रहा. शहरों की गंदगी गंगा में जाने से रोक पाने में कोई भी सरकार सफल नहीं हो सकी. गंगाजल यदि पवित्र है तो हमें भी उसे पवित्र रखना चाहिए. बड़ी संख्या में लोगों के हिमालय में आने से भी गंगा में कचरे एवं प्लास्टिक की भरमार हो रही है

यूं तो गंगा जहां से गुजरती है, वे सब स्थल तीर्थ समान हैं, किंतु गंगा को तीर्थत्व हरिद्वार में प्राप्त होता है. रावण वध के उपरांत श्रीराम ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए हरिद्वार आए और फिर गंगा में स्नान करके उन्होंने देव प्रयाग की ओर प्रस्थान किया. मान्यता है कि हरिद्वार, प्रयाग और गंगा सागर में स्नान मात्र से ब्रह्मलोक, विष्णुलोक एवं शिवलोक की प्राप्ति होती है. हरिद्वार के अधिष्ठाता देवता ब्रह्मा हैं, जहां हरि पादुकाएं हैं. हरिद्वार आदिकाल से महात्माओं, ॠषियों एवं साधकों की तपस्थली रहा है. जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर आदिनाथ ने भी गंगा के तट पर मायापुरी में तपस्या की. कालांतर में शंकराचार्य ने यहां आश्रमों की स्थापना की. हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, बिठूर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना एवं गंगा सागर के तटों पर हर प्रमुख पर्व पर लाखों हिंदू धर्मावलंबी स्नान हेतु आते हैं और पुण्य लाभ की कामना एवं एक नए विश्वास के साथ घर लौटते हैं. ॠग्वेद में गंगा की महिमा का विवरण त्रिपथगा यानी तीन पथों पर चलने वाली नदी के रूप में मिलता है. गंगा का उद्भव स्वर्ग से हुआ, जहां वह पहले प्रवाहमान थी. अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए भगीरथ इसे पृथ्वी पर लाए. इसका तीसरा पथ पाताल लोक में होगा. इसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि अत्यधिक दोहन से यह समाप्त हो जाएगी.

भारत के लिए गंगा सिर्फ नदी नहीं, बल्कि एक दर्शन है. कुछ लोग गंगा को जीवनदायिनी मानते हैं तो कुछ मोक्षदायिनी. हरिद्वार एवं प्रयागराज में पर प्रति 12 साल में कुंभ होता है और 6 साल में अर्द्धकुंभ. चार माह तक चलने वाले इन मेलों के दौरान करोड़ों लोग जाति, संप्रदाय एवं पंथ भूलकर गंगा स्नान करते हैं. साधु-संत एवं उनके अखाड़े भी इस अवसर पर जुटते हैं. प्रयागराज अध्यात्म एवं ज्ञान की धाराओं का भी संगम है, जो मोक्ष का मार्ग दिखाता है. मान्यता है कि कुंभ के दौरान प्रयाग में कल्पवास करने से मनुष्य को जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है. गंगा आगे विंध्याचल से होते हुए बनारस पहुंचती है. यहीं श्मशान घाट पर भगवान ने राजपाट गंवा चुके राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा ली थी. मान्यता है कि बनारस में जीवन त्याग करने से व्यक्ति को स्वर्ग में स्थान मिलता है. इसीलिए हज़ारों लोग अपने उन बुज़ुर्गों को मृत्यु से पूर्व यहां ले आते हैं. यहां के मणिकर्णिका एवं हरिश्चंद्र घाट पर चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती. गंगाजल की अमृत जैसी महिमा है. गंगाजल को शास्त्रों में सोमरस की संज्ञा दी गई है. सोम मनुष्य के दीर्घजीवन के लिए एक औषधि है. इसी क्षेत्र में अनगिनत जड़ी-बूटियां उत्पन्न होती हैं.

गंगाजल को यदि अमृत समान माना गया है तो उसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं. गंगा की धारा हिमालय की धवल चोटियों से निकलती है. वहीं शिवालिक की पहाड़ियों से निकली लघु जलधाराएं इसके स्वरूप को विस्तारित करती हैं. जिस रास्ते से जलधाराएं गुजरती हैं, वहां के खनिज- लवण इसमें घुलते चले जाते हैं. गंगाजल में कई प्रकार के रोगों से मुक्ति प्रदान करने की क्षमता है. यह ऐसा रोगनाशक है, जो लंबे समय तक रखने के बाद भी ख़राब नहीं होता. गंगाजल की महिमा यह है कि हर पूजा- अनुष्ठान में इसे विघ्न-बाधा दूर करने के लिए चारों दिशाओं में छिड़का जाता है. उत्तराखंड आने वाले श्रद्धालु अपने साथ गंगाजल ले जाना नहीं भूलते. सम्राट अकबर भी गंगाजल के औषधीय गुणों को मानते थे, इसलिए उनके पीने का पानी हरिद्वार से ऊंटों द्वारा आगरा लाया जाता था. गंगा करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती है, इसका जल फसलों को जीवन देता है और यह असंख्य लोगों की आजीविका का माध्यम है. विश्व की विभिन्न सभ्यताएं किसी न किसी नदी के किनारे ही विकसित हुईं. भारत में भी हिमालय से लेकर गंगा सागर तक अनेक सभ्यताएं बसीं. कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं छायाकारों को गंगा के अनेक रूपों ने प्रभावित किया. वर्तमान में कलियुग का प्रथम सोपान चल रहा है और आस्था की प्रतीक गंगा अपवित्र होती जा रही है. यह आशंका अपने अवतरण से पहले गंगा ने राजा भगीरथ के सम्मुख रखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था, मैं एक और कारण से पृथ्वी पर नहीं जाना चाहती. मुझे लगता है, पृथ्वी के लोग तो मुझमें अपने पाप धो देंगे, लेकिन मैं उन पापों को कहां धोऊंगी? इस पर भगीरथ ने कहा था, हे माता, पृथ्वी पर इच्छा का त्याग करने वाले ब्रह्मनिष्ठ एवं पवित्र लोग भी रहते हैं, जिनमें भगवान का वास है और वे स्नान करके तुम्हारे पापों को भी दूर कर देंगे. लेकिन भगीरथ का वह कथन आज कलियुग में उलटा सिद्ध हो रहा है. भगीरथ जिस लोक कल्याण की भावना से गंगा को पृथ्वी पर लाए थे, अब वह भावना हमारे कर्णधारों में नहीं दिखती. गंगा पर जबसे भोगवादी दृष्टि पड़ी है, तबसे उसका रसातल की ओर जाने का द्वार मानो खुल गया है.

गंगा आज अपने उद्गम से मैली हो रही है. कई स्थानों पर यह इतनी प्रदूषित है कि इसका जल पीने योग्य नहीं रहा. शहरों की गंदगी गंगा में जाने से रोक पाने में कोई भी सरकार सफल नहीं हो सकी. गंंगाजल यदि पवित्र है तो हमें भी उसे पवित्र रखना चाहिए. बड़ी संख्या में लोगों के हिमालय में आने से भी गंगा में कचरे एवं प्लास्टिक की भरमार हो रही है. गंगा में पूजा के नाम पर जो कुछ भी डाला जाता है, उससे गंगाजल दूषित ही होता है. गंगा में फैक्ट्रियों का दूषित जल एवं कचरा जिस प्रकार मिलाया जा रहा है, उससे गंगा विषैले नाले में परिवर्तित हो चुकी है. अधजले शवों, कोयले, लकड़ी और राख आदि से गंगा कितनी प्रदूषित हो रही है, यह कन्नौज, कानपुर, वाराणसी एवं पटना में देखा जा सकता है. आगे अनेक नदियों के मिलने से जलराशि बढ़ जाती है, जिससे उतनी गंदगी नज़र नहीं आती. फरक्का के बाद गंगा का प्रवाह कम हो जाता है, इसकी एक धारा बांग्लादेश चली जाती है. यहां एक बार फिर यह भागीरथी कहलाने लगती है और आगे जाकर हुगली. कोलकाता जैसे महानगर से गुजरने के बाद भी काफी गंदगी इसमें मिलती है. गंगाजल जब तक शुद्ध है, तभी तक यह लाभप्रद है. वैदिककालीन लोग दूषित जल को व्याधियों का कारण मानते थे. उनका कहना था कि शुद्ध जल औषधि समान है, उसके सेवन और उससे स्नान करने से रोगों का नाश होता है.

वैदिक काल में दूषित जल के शमन के भी नियम थे. गड्‌ढे खोदकर उसे इस प्रकार दबा दिया जाता था, जिससे बीमारी न फैले. गंगा करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती है. अमीर अब बोतलबंद पानी इस्तेमाल करने लगे हैं, लेकिन ग़रीब ऐसा नहीं कर सकता. सरकार की प्राथमिकता उद्योगों की स्थापना एवं बिजली उत्पादन है. इसलिए आज गंगा की पवित्रता के स्थान पर उसके दोहन की योजनाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है. गंगा की अमृत समान धारा को बिजली की धारा के रूप में देखा जा रहा है. गंगा के अधिक दोहन के परिणाम हम देख रहे हैं. हिमालय को छलनी करके गंगा एवं सहायक नदियों पर अनेक जल विद्युत परियोजनाएं इस प्रकार बन रही हैं कि उनकी कलकल बहती धारा सुरंगों-बांंधों में कैद होने को अभिशप्त हो जाएंगी. जहां कभी नदी बहा करती थी, आज वहां सूखी घाटियां नज़र आती हैं. उत्तर भारत की जीवन रेखा मानी जाने वाली गंगा पूरे भारत की सांस्कृतिक छवि का प्रतिबिंब है, एक दर्शन है, जिसकी धारा से मनुष्य के जीवन-मृत्यु के सवाल जुड़े हैं. गंगा का कलकल निनाद एवं निरंतरता उसकी पहचान है. आज जिस प्रकार उसके साथ छेड़छाड़ हो रही है, उससे उस आस्था का समाप्त होना लगभग तय है, जो हिंदू धर्म का एक प्रमुख आधार है.

साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/02/gangotri-me-hi-ganga-maili.html

साफ माथे का समाज…

आज तालाबों से कट गया समाज, उसे चलाने वाला प्रशासन तालाब की सफाई और साद निकालने का काम एक समस्या की तरह देखता है और वह इस समस्या को हल करने के बदले तरह-तरह के बहाने खोजता है। उसके नए हिसाब से यह काम खर्चीला है। कई कलेक्टरों ने समय-समय पर अपने क्षेत्रा में तालाबों से मिट्टी नहीं निकाल पाने का एक बड़ा कारण यही बताया है कि इसका खर्च इतना ज्यादा है कि उससे तो नया तालाब बनाना सस्ता पड़ेगा। पुराने तालाब साफ नहीं करवाए गए और नए तो कभी बने ही नहीं। साद तालाबों में नही, नए समाज के माथे में भर गई है।
तालाब में पानी आता है, पानी जाता है। इस आवक-जावक का पूरे तालाब पर असर पड़ता है। वर्षा की तेज बूंदों से आगौर की मिट्टी धुलती है तो आगर में मिट्टी घुलती है। पाल की मिट्टी कटती है तो आगर में मिट्टी भरती है। तालाब के स्वरूप के बिगड़ने का यह खेल नियमित चलता रहता है। इसलिए तालाब बनाने वाले लोग, तालाब बनाने वाला समाज तालाब के स्वरूप को बिगड़ने से बचाने का खेल भी उतने ही नियमपूर्वक खेलता रहा हैं। जो तालाब देखते ही देखते पिछले पचास-सौ बरस में नष्ट कर दिए गए हैं, उन तालाबों ने नियम से खेले गए खेलों के कारण ही कुछ सैकड़ों बरसों तक समाज का खेल ठीक से चलाया था। पहली बार पानी भरा नहीं कि तालाब की रखवाली का, रख-रखाव का काम शुरू हो जाता था। यह आसान नहीं था। पर समाज को देश के इस कोने से उस कोने तक हजारों तालबों को ठीक-ठाक बनाए रखना था, इसलिए उसने इस कठिन काम को हर जगह इतना व्यवस्थित बना लिया था कि यह सब बिलकुल सहज ढंग से होता रहता था। आगौर में कदम रखा नहीं कि रख-रखाव का पहला काम देखने को मिल जाएगा। देश के कई क्षेत्रों में तालाब का आगौर प्रारंभ होते ही उसकी सूचना देने के लिए पत्थर के सुंदर स्तंभ लगे मिलते हैं। स्तंभ को देखकर समझ लें कि अब आप तालाब के आगौर में खड़े हैं, यहीं से पानी तालाब में भरेगा। इसलिए इस जगह को साफ-सुथरा रखना है। जूते आदि पहन कर आगौर में नहीं आना है, दिशा मैदान आदि की बात दूर, यहां थूकना तक मना रहा है। ‘जूते पहन कर आना मना है’, ‘थूकना मना है’ जैसे बोर्ड नहीं ठोंके जाते थे पर सभी लोग बस स्तंभ देखकर इन बातों का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे। आगर के पानी की साफ-सफाई और शु(ता बनाए रखने का काम भी पहले दिन से ही शुरू हो जाता था। नए बने तालाब में जिस दिन पानी भरता, उस दिन समारोह के साथ उसमें जीव-जंतु लाकर छोड़े जाते थे। कहीं-कहीं जीवित प्राणियों के साथ सामथ्र्य के अनुसार चांदी या सोने तक के जीव-जन्तु विसर्जित किए जाते थे। छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में अभी कोई पचास-पचपन बरस पहले तक तालाब में सोने की नथ पहनाकर कछुए छोड़े गए थे।
पहले वर्ष में कुछ विशेष प्रकार की वनस्पति भी डाली जाती थी। अलग-अलग क्षेत्रा में इनका प्रकार बदलता था पर काम एक ही था- पानी को साफ रखना। मध्य प्रदेश में यह गदिया या चीला थी तो राजस्थान में कुमुदिनी, निर्मली या चाक्षुष। चाक्षुष से ही चाकसू शब्द बना है। कोई एक ऐसा दौर आया होगा कि तालाब के पानी की साफ-सफाई के लिए चाकसू पौधे का चलन खूब बढ़ गया होगा। आज के जयपुर के पास एक बड़े कस्बे का नाम चाकसू है। यह नामकरण शायद चाकसू पौधे के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए किया गया हो। पाल पर पीपल, बरगद और गूलर के पेड़ लगाए जाते रहे हैं।
तालाब और इन पेड़ों के बीच उम्र को लेकर हमेशा होड़-सी दिखती थी। कौन ज्यादा टिकता है-पेड़ या तालाब? लेकिन यह प्रश्न प्रायः अनुत्तरित ही रहा है। दोनों को एक-दूसरे का लंबा संग इतना भाया है कि उपेक्षा के इस ताजे दौर में जो भी पहले गया, दूसरा शोक में उसके पीछे-पीछे चला गया है। पेड़ कटे हैं तो तालाब भी कुछ समय में सूखकर पट गया है और यदि पहले तालाब नष्ट हुआ है तो पेड़ भी बहुत दिन नहीं टिक पाए हैं। तालाबों पर आम भी खूब लगाया जाता रहा है, पर यह पाल पर कम, पाल के नीचे की जमीन में ज्यादा मिलता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्रा में बहुत से तालाबों में शीतला माता का वास माना गया है और इसलिए ऐसे तालबों की पाल पर नीम के पेड़ जरूर लगाए जाते रहे हैं। बिना पेड़ की पाल की तुलना बिना मूर्ति के मंदिर से भी की गई है। बिहार और उत्तर प्रदेश के अनेक भागों में पाल पर अरहर के पेड़ भी लगाए जाते थे। इन्हीं इलाकों में नए बने तालाब की पाल पर कुछ समय तक सरसों की खली का धुआं किया जाता था ताकि नई पाल में चूहे आदि बिल बनाकर उसे कमजोर न कर दें। ये सब काम ऐसे हैं, जो तालाब बनने पर एक बार करने पड़ते हैं, या बहुत जरूरी हो गया तो एकाध बार और। लेकिन तालाब में हर वर्ष मिट्टी जमा होती है। इसलिए उसे हर वर्ष निकालते रहने का प्रबंध सुंदर नियमों में बांध कर रखा गया था। कहीं साद निकालने के कठिन श्रम को एक उत्सव, त्यौहार में बदल कर आनंद का अवसर बनाया गया था तो कहीं उसके लिए इतनी ठीक व्यवस्था कर दी गई कि जिस तरह वह चुपचाप तालाब के तल में आकर बैठती थी, उसी तरह चुपचाप उसे बाहर निकाल कर पाल पर जमा दिया जाता था। साद निकालने का समय अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम को देखकर तय किया जाता रहा है। उस समय तालाब में पानी सबसे कम रहना चाहिए। गोवा और पश्चिम घाट के तटवर्ती क्षेत्रों में यह काम दीपावली के तुरंत बाद किया जाता है। उत्तर के बहुत बड़े भाग में नव वर्ष यानी चैत्रा से ठीक पहले, तो छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बंगाल, बिहार और दक्षिण में बरसात आने से पहले खेत तैयार करते समय। आज तालाबों से कट गया समाज, उसे चलाने वाला प्रशासन तालाब की सफाई और साद निकालने का काम एक समस्या की तरह देखता है और वह इस समस्या को हल करने के बदले तरह-तरह के बहाने खोजता है। उसके नए हिसाब से यह काम खर्चीला है। कई कलेक्टरों ने समय-समय पर अपने क्षेत्रा में तालाबों से मिट्टी नहीं निकाल पाने का एक बड़ा कारण यही बताया है कि इसका खर्च इतना ज्यादा है कि उससे तो नया तालाब बनाना सस्ता पड़ेगा। पुराने तालाब साफ नहीं करवाए गए और नए तो कभी बने ही नहीं। साद तालाबों में नही, नए समाज के माथे में भर गई है। तब समाज का माथा साफ था। उसने साद को समस्या की तरह नहीं बल्कि तालाब के प्रसाद की तरह ग्रहण किया था। प्रसाद को ग्रहण करने के पात्रा थे किसान, कुम्हार और गृहस्थ। इस प्रसाद को लेने वाले किसान प्रति गाड़ी के हिसाब से मिट्टी काटते, अपनी गाड़ी भरते और इसे खेतों में पफैला कर उनका उपजाउफपन बनाए रखते। इस प्रसाद के बदले वे प्रति गाड़ी के हिसाब से कुछ नकद या पफसल का कुछ अंश ग्राम कोष में जमा करते थे। पिफर इस राशि से तालाबों की मरम्मत का काम होता था।
आज भी छत्तीसगढ़ में लद्दी निकालने का काम मुख्यतः किसान परिवार ही करते हैं। दूर-दूर तक साबुन पहुंच जाने के बाद भी कई घरों में लद्दी से सिर धोने और नहाने का चलन जारी है। बिहार में यह काम उड़ाही कहलाता है। उड़ाही समाज की सेवा है, श्रमदान है। गांव के हर घर से काम कर सकने वाले तालाब पर एकत्रा होते थे। हर घर दो से पांच मन मिट्टी निकालता था। काम के समय वही गुड़ का पानी बंटता था। पंचायत में एकत्रा हर्जाने की रकम का एक भाग उड़ा ही के संयोजन में खर्च होता था। दक्षिण में धर्मादा प्रथा थी। कहीं-कहीं इस काम के लिए गांव की भूमि का एक हिस्सा दान कर दिया जाता था और उसकी आमदनी सिपर्फ साद निकालने के लिए खर्च की जाती थी। ऐसी भूमि को कोडगे कहा जाता था। राज ओर समाज मिलकर कमर कस लें तो पिफर किसी काम में ढील कैसे आएगी। दक्षिण में तालाबों के रख-रखाव के मामले में राज और समाज का यह तालमेल खूब व्यवस्थित था। राज के खजाने से इस काम के लिए अनुदान मिलता था पर उसी के साथ हर गांव में इस काम के लिए एक अलग खजाना बन जाए, ऐसा भी इंतजाम था। हर गांव में कुछ भूमि, कुछ खेत या खेत का कुछ भाग तालाब की व्यवस्था के लिए अलग रख दिया जाता था। इस पर लगान नहीं लगता था। ऐसी भूमि मान्यम् कहलाती थी। मान्यम् से होने वाली बचत, आय या मिलने वाली पफसल तालाब से जुड़े तरह-तरह के कामों को करने वाले लोगों को दी जाती थी। जितनी तरह के काम, उतनी तरह के मान्यम्। जो काम जहां होना है, वहीं उसका प्रबंध किया जाता था, वहीं उसका खर्च जुटा लिया जाता था। अलौति मान्यम् से श्रमिकों के पारिश्रमिक की व्यवस्था की जाती थी। अणैंकरण मान्यम् पूरे वर्ष भर तालाब की देखरेख करने वालों के लिए था। इसी से उन परिवारों की जीविका भी चलती थी, जो तालाब की पाल पर पशुओं को जाने से रोकते थे। पाल की तरह तालाब के आगौर में भी पशुओं के आने-जाने पर रोक थी। इस काम में भी लोग साल भर लगे रहते थे। उनकी व्यवस्था बंदेला मान्यम् से की जाती थी।
तालाब से जुड़े खेतों में पफसल बुवाई से कटाई तक पशुओं को रोकना एक निश्चित अवधि तक चलने वाला काम था। यह भी बंदेला मान्यम् से पूरा होता था। इसे करने वाले पट्टी कहलाते थे। सिंचाई के समय नहर का डाट खोलना, समय पर पानी पहुंचाना एक अलग जिम्मेदारी थी। इस सेवा को नीरमुनक्क मान्यम् से पूरा किया जाता था। कहीं किसान पानी की बर्बादी तो नहीं कर रहे- इसे देखने वालों का वेतन कुलमकवल मान्यम् से मिलता था। तालाब में कितना पानी आया है, कितने ख्ेातों में क्या-क्या बोया गया है, किसे कितना पानी चाहिए- जैसे प्रश्न नीरघंटी या नीरुकुट्टी हल करते थे। यह पद दक्षिण में सिपर्फ हरिजन परिवार को मिलता था। तालाब का जल स्तर देखकर खेतों में उसके न्यायोचित बंटवारे के बारीक हिसाब-किताब की विलक्षण क्षमता नीरुकुट्टी को विरासत में मिलती थी। आज के कुछ नए समाजशास्त्रिायों का कहना है कि हरिजन परिवार को यह पद स्वार्थवश दिया जाता था। इन परिवारों के पास भूमि नहीं होती थी इसलिए भूमिवानों के खेतों में पानी के किसी भी विवाद में वे निष्पक्ष होकर काम कर सकते थे। यदि सिपर्फ भूमिहीन होना ही योग्यता का आधार था तो पिफर भूमिहीन ब्राह्मण तो सदा मिलते रह सकते थे। लेकिन इस बात को यहीं छोड़ें और पिफर लौटें मान्यम् पर। कई तालाबों का पानी सिंचाई के अलावा पीने के काम भी आता था। ऐसे तालाबों से घरों तक पानी लेकर आने वाले कहारों के लिए उरणी मान्यम् से वेतन जुटाया जाता था। उप्पार और वादी मान्यम् से तालाबों की साधारण टूट-पूफट ठीक की जाती थी। वायक्कल मान्यम् तालाब के अलावा उनसे निकली नहरों की देखभाल में खर्च होता था। पाल से लेकर नहरों तक पर पेड़ लगाए जाते थे और पूरे वर्ष भर उनकी सार-संभाल, कटाई, छंटाई आदि का काम चलता रहता था। यह सारी जिम्मेदारी मानल मान्यम् से पूरी की जाती थी।
खुलगा मान्यम् और पाटुल मान्यम् मरम्मत के अलावा क्षेत्रा में बनने वाले नए तालाबों की खुदाई में होने वाले खर्च संभालते थे। एक तालाब से जुड़े इतने तरह के काम, इतनी सेवाएं वर्ष भर ठीक से चलती रहें- यह देखना भी एक काम था। किस काम में कितने लोगों को लगाना है, कहां से कुछ को घटना है- यह सारा संयोजन करैमान्यम् से पूरा किया जाता था। इसे कुलम वेट्टु या कण्मोई वेट्टु भी कहते थे। दक्षिण का यह छोटा साधारण-सा वर्णन तालाब और उससे जुड़ी पूरी व्यवस्था की थाह नहीं ले सकता। यह तो अथाह है। ऐसी ही या इससे मिलती-जुलती व्यवस्थाएं सभी हिस्सों में, उत्तर में, पूरब-पश्चिम में भी रही ही होंगी। पर कुछ काम तो गुलामी के उस दौर में टूटे और पिफर विचित्रा आजाद के इस दौर में पूफटे समाज में यह सब बिखर गया। लेकिन गैंगजी कला जैसे लोग इस टूटे-पूफटे समाज में बिखर गई व्यवस्था को अपने ढंग से ठीक करने आते रहे हैं। नाम तो था गंगाजी पर पिफर न जाने कैसे वह गैंगजी हो गया। उनका नाम स्नेह, आत्मीयता के कारण बिगड़ा या घिसा होगा लेकिन उनके शहर को कुछ सौ साल से घेर कर खड़े आठ भव्य तालाब ठीक व्यवस्था के टूटे जाने के बाद धीरे-धीरे आ रही उपेक्षा के कारण घिसने, बिगड़ने लगे थे। अलग-अलग पीढ़ियों ने इन्हें अलग-अलग समय में बनाया था, पर आठ में से छह एक श्रृंखला में बांधे गए थे। इनका रख-रखाव भी उन पीढ़ियों ने श्रृंखला में बंध कर ही किया होगा। सार-संभाल की वह व्यवस्थित कड़ी पिफर कभी टूट गई। इस कड़ी के टूटने की आवाज गैंगजी के कान में कब पड़ी, पता नहीं। पर आज जो बड़े-बूढ़े पफलौदी शहर में हैं, वे गैंगजी की एक ही छवि याद रखे हैं: टूटी चप्पल पहने गैंगजी सुबह से शाम तक इन तालाबों का चक्कर लगाते थे। नहाने वाले घाटों पर, पानी लेने वाले घाटों पर कोई गंदगी पफैलाता दिखे तो उसे पिता जैसी डांट पिलाते थे। कभी वे पाल का तो कभी नेष्टा का निरीक्षण करते। कहां किस तालाब में कैसी मरम्मत चाहिए – इसकी मन ही मन सूची बनाते। इन तालाबों पर आने वाले बच्चों के साथ खुद खेलते और उन्हें तरह-तरह के खेल खिलाते। शहर को तीन तरपफ से घेरे खड़े तालाबों का एक चक्कर लगाने में कोई 3 घंटे लगते हैं। गैंगजी कभी पहले तालाब पर दिखते तो कभी आखिरी पर, कभी सुबह यहां मिलते तो दोपहर वहां और शाम न जाने
कहां। गैंगजी अपने आप तालाबों के रखवाले बन गए थे। वर्ष के अंत में एक समय ऐसा आता जब गैंगजी तालाबों के बदले शहर की गली-गली घूमते दिखते। साथ चलती बच्चों की फौज। हर घर का दरवाजा खुलने पर उन्हें बिना मांगे एक रुपया मिल जाता। बरसों से हरेक घर जानता था कि गैंगजी सिपर्फ एक रुपया मांगते हैं, न कम न ज्यादा। रुपये बटोरने का काम पूरा होते ही वे पूरे शहर के बच्चों को बटोरते। बच्चों के साथ ढेर सारी टोकरियां, तगाड़ियां, फावड़े, कुदाल भी जमा हो जाते। पिफर एक के बाद एक तालाब साफ होने लगता। साद निकाल कर पाल पर जमाई जाती। हरेक तालाब के नेष्टा का कचरा भी इसी तरह साफ किया जाता। एक तगाड़ी मिट्टी-कचरे के बदले हर बच्चे को दुअन्नी इनाम में मिलती। गैंगजी कल्ला कब से यह कर रहे थे- आज किसी को याद नहीं। बस इतना पता है कि यह काम सन् 55-56 तक चलता रहा। पिफर गैंगजी चले गए। शहर को वैसी किसी मृत्यु की याद नहीं। पूरा शहर शामिल था उनकी अंतिम यात्रा में। एक तालाब के नीचे ही बने घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। बाद में वहीं उनकी समाधि बनाई गई। जो तालाब बनाते थे, समाज उन्हें संत बना देता था। गैंगजी ने तालाब तो नहीं बनाया था। पहले बने तालाबों की रखवाली की थी। वे भी संत बन गए थे। पफलौदी में तालाबों की सफाई का खेल संत खिलवाता था तो जैसलमेर में यह खेल खुद राजा खेलता था। सभी को पहले से पता रहता था पिफर भी नगर-भर में डिंडोरा पिटता था। राजा की तरपफ से, वर्ष के अंतिम दिन, फाल्गुन कृष्ण चैदस को नगर के सबसे बड़े तालाब घड़सीसर पर ल्हास खेलने का बुलावा है। उस दिन राजा, उनका पूरा परिवार, दरबार, सेना और पूरी प्रजा कुदाल, फावड़े, तगाड़ियां लेकर घड़सीसर पर जमा होती। राजा तालाब की मिट्टी काट कर पहली तगाड़ी भरता और उसे खुद उठाकर पाल पर डालता। बस गाजे-बाजे के साथ ल्हास शुरु। पूरी प्रजा का खाना-पीना दरबार की तरपफ से होता। राजा और प्रजा सबके हाथ मिट्टी में सन जाते। राजा इतने तन्मय हो जाते कि उस दिन उनके कंधे से किसी का भी कंधा टकरा सकता था। जो दरबार में भी सुलभ नहीं, आज वही तालाब के दरवाजे पर, मिट्टी ढोर रहा है। राजा की सुरक्षा की व्यवस्था करने वाले, उनके अंगरक्षक भी मिट्टी काट रहे हैं, मिट्टी डाल रहे हैं। ऐसे ही एक ल्हास में जैसलमेर के राजा तेजसिंह पर हमला हुआ था। वे पाल पर ही मारे गए थे। लेकिन ल्हास खेलना बंद नहीं हुआ। यह चलता रहा, पफैलता रहा। मध्य प्रदेश के भील समाज में भी ल्हास खेला जाता है, गुजरात में भी ल्हास चलती है। वहां यह परंपरा तालाब से आगे बढ़ कर समाज के ऐसे किसी भी काम से जुड़ गई थी, जिसमें सबकी मदद चाहिए। सबके लिए सबकी मदद। इसी परंपरा से तालाब बनते थे, इसी से उनकी देखभाल होती थी। मिट्टी कटती थी, मिट्टी डलती थी समाज का खेल ल्हास के उल्हास से चलता था।
अनुपम मिश्र


लेखक प्रख्यात गांधीवादी विचारक एवं पर्यावरणविद् हैं। ‘आज भी खरे हैं तालाब’ इनकी बहुचर्चित पुस्तक है। संपर्क: गांधी शांति प्रतिष्ठान 223, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग नई दिल्ली-110002 ;‘आज भी खरे हैं तालाब’ से साभार.

साभार- संवेदनाओ के पंख

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/

Draft Strategic Plan 2010-2022, for Rural Drinking Water – Comments requested by DDWS (MoRD) by 31 January 2011

The Department of Drinking Water and Sanitation (DDWS), Ministry of Rural Development, has finalized a draft of its Strategic Plan (2010-22) and is inviting comments from the public, to finalise the draft.

DDWS had initiated the process of preparing a new Strategic Plan for Rural Drinking Water early last year. The purpose of the plan is to guide DDWS’ work on rural drinking water up to the year 2022.

Drinking water has formed part of India’s development agenda since the First Five Year Plan. The government prioritized it by launching the National Drinking Water Mission to improve access in rural areas in the early 1980s. However, this centralized, demand-driven approach took a uniform approach for the entire country.

The draft document has the following main sections:

  • Part One sets out the Aspirations and Goals for the Strategic Plan of the Department of Drinking Water and Sanitation and the rural drinking water sector as a whole.
  • Part Two outlines the rising aspirations, current situation, and challenges concerning the rural drinking water sector.
  • Part Three sets out the Strategy. The Department of Drinking Water and Sanitation has identified four Strategic Objectives (Enable Drinking Water Security; Water Quality Management; Strengthen Decentralised Governance, and Build Professional Capacity) to achieve its overall objective of providing improved, sustainable water services in rural communities.
  • Part Four provides options from which each State can formulate its own Implementation Plan depending on its needs, capacity and resources, and establish a timeframe for achieving transformation.
  • Part Five outlines the necessary Learning Agenda, Resources Required and Key Performance Indicators to monitor progress against the Strategy and Implementation Plans.

The Government of India, through the Department of Drinking Water and Sanitation, has already taken significant steps to meet this challenge through the National Rural Drinking Water Programme (NRDWP). This document has been prepared to help operationalise the NRDWP by setting out a Strategic Plan in terms of aspirations, goals, objectives and strategic initiatives for the sector for the period 2010-2022.

Please consider the following points while responding:

  • Current situation and challenges
    1. Source sustainability
    2. Water quality
    3. O&M
    4. Inter-sector coordination
    5. Continuous professional support
    6. Impact of climate change
  • Strategy and implementation
    1. Enable drinking water security planning and implementation
    2. Water quality management
    3. Strengthen decentralized governance
    4. Build professional capacity
    5. Regulation
  • Institutional structure
  • Learning agenda, resources required and key performance indicators as mentioned in the document.

Inputs requested around the following main questions:

  • What are the current challenges from the point of view of Source sustainability, quality, operation and maintenance, inter-sector coordination, professional support and climate change (page 6)?
  • How can DDWS strategise (page 9) and implement solutions (page 19) for drinking water security planning and implementation, improve water quality, build professional capacity and strengthen decentralization?
  • How can DDWS strengthen regulation (page 28) and institutional structures (page 14)?
  • What is the learning agenda (page 32), the resources required and key performance indicators (page 34)
  • How can the goals and aspirations be achieved especially in the States with very low coverage of piped water supply schemes like UP, Bihar, Jharkhand, MP, Rajasthan, Orissa, Assam and Chhattisgarh?

The last date for sending in comments to DDWS is 31 January, 2011.

Please send in your comments to:

Sujoy Majumdar
Director (RWS)
Department of Drinking Water and Sanitation,
Ministry of Rural Development, Government of India,
8th Floor, Paryavaran Bhawan, CGO Complex, Lodi Road, New Delhi – 110003.

Ph: +91-11-24360102
Fax: +91-11-24363253

Email: sujoy.m@nic.in; Please cc portal@arghyam.org.