Monthly Archives: December 2010

क्रशरों का कहर: लोगों का जीना दूभर

यूं तो बुंदेलखंड के वीरों की गाथाएं एवं दंतकथाएं विश्वविख्यात हैं, लेकिन यहां के मौजूदा हालात मरता क्या न करता जैसे हैं. गड्‌ढों में तब्दील हो चुके पहाड़ और अंधाधुंध खनन बुंदेलखंड की सबसे बड़ी त्रासदी है. कभी चंदेलकालीन सरोवरों एवं देशावरी पान के लिए प्रसिद्ध बुंदेलखंड आज अपनी पहचान के लिए खनिज उद्योग का मोहताज है. जब-जब बुंदेलखंड की बदहाली का शोर उठा तो शासन-प्रशासन ने खनिज उद्योग का हवाला देकर उसे दबा दिया. बुंदेलखंड सदियों से विंध्य पर्वत श्रंखला का गढ़ माना जाता है, लेकिन अब न केवल पर्वतों का अस्तित्व संकट में है, बल्कि उनकी मौजूदगी ने यहां के किसानों एवं मजदूर तबके की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं. क्रशर उद्योग को काल मानने वालों की संख्या अकेले महोबा जनपद में 20 से 25 हज़ार है.

किसी क्षेत्र की बदहाली दूर करने की बात उठे और उद्योगों का जिक्र न हो, यह मुमकिन नहीं, लेकिन जब कोई कहे कि उद्योग ही उस क्षेत्र की बदहाली का कारण है तो यह हजम करना मुश्किल होगा, पर बुंदेलखंड की ज़मीनी हक़ीक़त कुछ ऐसी ही है. झांसी, हमीरपुर, चित्रकूट, बांदा और महोबा में उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुके क्रशर लोगों के लिए जी का जंजाल बन गए हैं. क्रशरों से उड़ने वाली धूल के चलते हज़ारों बीघा कृषि भूमि बंजर हो चुकी है. विस्फोट के समय पत्थर टूटकर खेतों पर गिरते हैं, नतीजा मुंह का निवाला भी छिन जाता है. रही-सही कसर क्रशरों को कच्चे माल की आपूर्ति करने वाले वाहन फसल रौंद कर पूरी कर देते हैं. कुछ लोगों ने धूल से खेती को होने वाले ऩुकसान के बारे में ज़िला कृषि अधिकारी से जन सूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो उन्होंने यह तो माना कि पत्थरों की धूल उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल असर डालती है, लेकिन वह इससे भूमि के बंजर होने संबंधी सवाल का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके.

कबरई सहित निकटवर्ती डेढ़ दर्जन गांवों के खेत आज इसकी खुली गवाही दे रहे हैं. इस काम से जुड़े मजदूर भी इससे ख़ुश नहीं हैं. वर्ष 2008 में इस कारोबार की भेंट चढ़ चुके भोजा का परिवार हो या फिर अपने हाथ-पैर गंवाने वाले तुलाराम, पिंटू, शिव नारायण एवं बलवंत, सभी का मानना है किकबरई अब मौत की मंडी बन गया है. व्यापारी भी इस उद्योग से परेशान हैं. क्रशर उद्योग में लगे ओवर लोड वाहनों के आवागमन के चलते यहां सड़कों का नामोनिशान मिट गया है. लोगों को 185 किलोमीटर के सफर में पांच-सात घंटे बर्बाद करने पड़ते हैं. कपड़ा व्यापारी शंकर सिंधी हों या किराना व्यापारी सलीम, सब्जी का कारोबार करने वाले इसराइल हों या दवा विक्रेता अतुल शर्मा, सभी यही कहते हैं कि सड़कों की दुर्दशा के लिए क्रशर उद्योग ज़िम्मेदार है. ऐसा नहीं है कि प्रशासन इससे अनभिज्ञ है, पर निजी स्वार्थों और उद्योग से जुड़े लोगों की ऊंची पहुंच के चलते वह मजबूर है. तत्कालीन मंडलायुक्त विजय शंकर पांडेय एवं महोबा के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अजय मिश्रा को स्थानांतरण और अपमान का दंश झेलना पड़ा, क्योंकि उन्होंने क्रशर स्वामियों पर शिकंजा कसने की हिमाकत की थी. इन अधिकारियों की जनता के प्रति सकारात्मक सोच ही इनकी दुश्मन बन गई थी.

माननीयों की हुकूमत

क्रशर उद्योग भारी मुना़फा कमाने का एक शॉर्टकट रास्ता है. जहां बात सरल तरीक़े से अधिक लाभ कमाने की हो तो वहां गरीब या छोटी पूंजी वाले लोग कैसे टिक सकते हैं. इसलिए यहां राजनीतिक पहुंच रखने वालों अथवा पैसे वालों की तूती बोल रही है. कबरई के क्रशर उद्योग पर वही लोग काबिज़ हैं, जो इस समय सत्ता में हैं या पहले सत्ता में रह चुके हैं. कबरई सहित ज़िले के विभिन्न हिस्सों में आबाद इन मौत की दुकानों पर अधिकांशत: सफेदपोशों का ही क़ब्ज़ा है. आज यहां पूर्व एमएलसी जयवंत सिंह, पूर्व विधायक अरिमर्दन सिंह, कुंवर बहादुर मिश्रा एवं पूर्व मंत्री सिद्ध गोपाल साहू की तूती बोलती है. वर्तमान सरकार में कैबिनेट मंत्री बादशाह सिंह, दद्दू प्रसाद एवं बसपा सांसद विजय बहादुर सिंह सरीखे लोग इस कारोबार से जुड़े हैं. मुख्यमंत्री मायावती के खासमखास एवं खनिज विभाग के मुखिया बाबू सिंह कुशवाहा भी इस उद्योग का अहम हिस्सा हैं. परोक्ष न सही, पर अपरोक्ष रूप से माननीय के कई क्रेशर आबाद हैं. दर्जनों पहाड़ों पर इनके नाते-रिश्तेदार वैध-अवैध खदानें चला रहे हैं. नियमों को रौंदकर चलते इनके क्रशरों पर हाथ डालने का साहस प्रशासन के वश की बात नहीं है. अजय मिश्रा एवं आलोक कुमार जैसे ईमानदार अधिकारियों ने यह गलती की तो उनका तबादला कराकर माननीयों ने अपनी ताक़त का एहसास करा दिया. यही वजह है कि अब कोई अधिकारी इस ओर देखने की ज़ुर्रत भी नहीं करता. इस कारोबार में सपा के चौधरी छत्रपाल यादव, कबरई नगर पंचायत के अध्यक्ष शिवपाल तिवारी, भाजपा के पूर्व ज़िलाध्यक्ष दीप प्रकाश द्विवेदी, भाजपा नेता डॉ. ज्ञानेश अवस्थी एवं कबरई ब्लॉक के पूर्व प्रमुख जीतेंद्र शुक्ल का जलवा भी देखने लायक़ है. खनिज अधिकारी मुइनुद्दीन को दो जनपदों का प्रभार सौंपा जाना उनकी वफादारी का ईनाम है. इसी प्रकार विजय विश्वास पंत की डीएम के रूप में खेली गई त्रिवार्षिक पारी को भी लोग माननीयों को ख़ुश रखने का नतीजा बता रहे हैं. इन अधिकारियों ने अपने इष्ट मित्रों-रिश्तेदारों की भी क़िस्मत चमका दी है. भटीपुरा निवासी एक कथित नंबरदार के पास कभी एक पहाड़ का पट्टा हुआ करता था, लेकिन आज उसके पास दो पहाड़ों के पट्टे हैं. इसकी वजह ज़िलाधिकारी और खनिज अधिकारी से उसकी निकटता बताई जाती है.

यहां न नियम हैं, न क़ानून

कबरई में चल रहे खनन कार्य में जिस प्रकार भारी क्षमता वाली विस्फोटक सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है. सुरक्षा के लिहाज़ से यह और भी संवेदनशील है, क्योंकि यह काम अप्रशिक्षित लोगों के हाथ में है. नियमों के मुताबिक़, विस्फोट दोपहर

12 बजे से 2 बजे के बीच होना चाहिए, लेकिन यहां तो जब खदान मालिक का मन होता है, डायनामाइट बिछाकर आग लगा दी जाती है. भारी क्षमता के विस्फोटक का इस्तेमाल होने से पहाड़ों के इर्द-गिर्द स्थित मकानों में दरारें पड़ गई हैं. क़स्बे में बना विद्यालय इस कथन की पुष्टि करता है. खदान और क्रशर मालिक मजदूरों की सुरक्षा से जुड़े नियमों को लेकर भी उदासीन हैं. हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी के दो क्रेशरों को छोड़कर शेष कहीं भी डॉक्टर तैनात नहीं है. मजदूर प्राथमिक उपचार के अभाव में मर जाते हैं या फिर अपाहिज हो जाते हैं. यहां मजदूरों को काम करते समय मास्क और हेलमेट आदि भी नहीं उपलब्ध

कराए जाते. कबरई में सर्व शिक्षा अभियान दम तोड़ रहा है. यहां बच्चों के हाथों में हथौड़ी नज़र आना कोई नई बात नहीं है.

सांसों में घुलता जहर

झांसी से लेकर चित्रकूट तक फैली विंध्य पर्वत श्रंखला का अस्तित्व खतरे में है. जिस रफ्तार से पहाड़ों का खनन किया जा रहा है, उससे लगता है कि कुछ समय बाद सारे पर्वत जमींदोज हो जाएंगे. अकेले महोबा में विलुप्त हो चुके पहाड़ों की संख्या काफी है. कबरई के लौंडा एवं रमकुंडा पहाड़ों को ही लें, आज वहां जगह-जगह तीन-तीन सौ फुट गहरी खाई दिखाई पड़ती है. यही हाल पचपहरा, डहर्रा, जमाला, कुम्हरौड़ा एवं गौरहारी के पहाड़ों का है. पानी की कमी का सामना कर रहे

महोबा-बुंदेलखंड की स्थिति और अधिक बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं. पहाड़ों के खत्म होने का सीधा अर्थ है भूजल स्तर में गिरावट. क्रशर उद्योग पर्यावरण संतुलन को भी नुक़सान पहुंचा रहा है. कबरई के आसपास क़रीब 20 किलोमीटर की परिधि में बसे गांवों के लोग टीबी जैसी घातक बीमारी की चपेट में हैं. दो दर्जन गांवों की लगभग 90 हजार आबादी आंशिक रूप से बीमार है. पिछले साल कबरई के सामाजिक कार्यकर्ता मंगल सिंह ने जब जिला अस्पताल से जानकारी मांगी तो बताया गया किउड़ती धूल का स्वास्थ्य पर ज़्यादा प्रतिकूल असर नहीं पड़ता. हालांकि इससे सिलीकोसिस, क्रानिक एवं ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी जैसी बीमारियां हो सकती हैं. दूसरी ओर कबरई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों की एक लंबी कतार देखने को मिली. इनमें नाक, कान एवं गले के रोगियों की संख्या खासी थी. इलाज के इंतजार में बैठे रमसुखा, घुटइया, परसू एवं विमला देवी ने बताया कि यह रोग यहां आम बात है. कबरई में क्रशर उद्योग के असर को लेकर सरकारी मशीनरी और स्वास्थ्य विभाग का रवैया गुमराह करने वाला है. एक निजी चिकित्सक कहते हैं कि यहां की आबोहवा सेहत के लिहाज़ से बेहद घातक है. हवा में हमेशा 4-5 माइक्रोन के कण मौजूद रहते हैं, जो श्वांस नली की एल्वोलाई में फंसकर उसे चोक कर देते हैं, जिससे सांस की बीमारी हो जाती है और शरीर की रक्त शोधन क्षमता कम होने के साथ-साथ पाचन तंत्र भी गड़बड़ा जाता है. परिणामस्वरूप लोग धीरे-धीरे अस्थमा के मरीज बन जाते हैं.

पिछले साल ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के मंडल अध्यक्ष दिनेश खरे ने कई बार धरना-प्रदर्शन किया. इसके बाद बांदा के तत्कालीन मंडलायुक्त एस सी सक्सेना ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सभी क्रशरों का निरीक्षण कराया. 11 क्रशरों को बंद करने के आदेश दिए गए. महोबा के तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक कुमार ने भी कबरई के वातावरण में प्रदूषण की जांच कराई. जांच परिणाम न केवल चौंकाने वाले थे, बल्कि बेहद डरावने थे. जांच रिपोर्ट के अनुसार, हवा में छोटे-छोटे कणों की मात्रा जहां 200 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होनी चाहिए, वहीं कबरई में यह मात्रा 1800 माइक्रोग्राम पाई गई, जो सामान्य से नौ गुना ज़्यादा है. आलोक कुमार ने सभी क्रशरों को पर्यावरण सुरक्षा संबंधी उपाय अपनाने के निर्देश जारी किए, पर इससे पहले कि क्रशर मालिकों की मनमानी पर लगाम लग पाती, इन दोनों अधिकारियों को चलता कर दिया गया. खनिज विभाग के अनुसार, वर्तमान में यहां 225 पहाड़ों पर करीब 300 पट्टाधारक काबिज हैं, जबकिपिछले एक दशक में क्रशरों की संख्या दो सौ से अधिक हो चुकी है. अभी हाल में राजधानी से आए अधिकारियों की एक टीम ने जांच-पड़ताल के बाद कई पट्टों के निरस्तीकरण और कई क्रशरों को बंद किए जाने की घोषणा की थी, लेकिन थोड़े समय बाद यह घोषणा भी ठंडे बस्ते में चली गई.

साभार- चौथी दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2010/12/crasharon-ka-kahar.html

Dr Binayak Sen Sentenced To Life Imprisonment

New Delhi/Ranchi: Eminent human rights’ activist and award winning doctor, Binayak Sen has been sentenced to life imprisonment by a session court of Raipur, Chhattisgarh on Friday early evening along with Piyush Guha, a businessman, and Narayan Sanyal, a Maoist ideologue. He is convicted under section 124A (sedition) and 120 B (conspiracy) of IPC and Chhattisgarh Special Public Security Act.

Calling it a judgment which has no substantial evidences and base, Kavita Srivastva, a senior human rights’ activist and friend said, “You need to have evidences beyond feasible doubt to grant life imprisonment,” while talking to TwoCircles.net from Raipur. “It is a desperate attempt to assert the state might, which was exposed by the activists like Binayak”, she added when asked what could be the reason of this kind of judgment. “We will appeal this judgment the high court as soon as it reopens.”

The news of his conviction stunned the groups of human rights’ movements, activists, academicians, advocates and journalists. “The People’s Union for Civil Liberties (PUCL) is deeply disappointed at the miscarriage of justice reflected in the judgment of Raipur Additional District and Sessions Judge B. P. Verma sentencing our National Vice President Dr. Binayak Sen to life imprisonment”, said a press note by PUCL. “The whole human rights community will feel outraged at the judgment and many more protesting voices will be heard in the days to come,” said Mahipal Singh, General Secretary, PUCL, Delhi. Mahipal’s counterpart in Jharkhand, Dr. Shashibhushan Pathak echoes his voice. We are stunned by the judgment and are planning protest meeting in coming days”, he told TwoCircles.net. Academician and Writer, Dr. Anand Teltumbde, “What’s going on in this country? I do not have good enough words to express my protest!”. Lateef Mohd. Khan, General Sectretary of Civil Liberties’ Monitoring Committee (CMLC), Hyderabad termed the judgment unjust and called Binayak a victim of Operation Green Hunt.

Meanwhile, Peoples’ Union of Democratic Rights (PUDR), Delhi has given a call of protest at Jantar Mantar, New Delhi on 27th December and urged all the justice loving people to join it. Dr. Binayak Sen is the general secretary of Chattishgarh State PUCL. Sen, a medical doctor by profession, has been awarded by several awards for his outstanding work in the field of public health and human rights including prestigious Jonathan Mann Award for Global Health and Human Rights in the year of 2008. He was first arrested on May 14, 2007 in Bilaspur on the alleged charges of carrying messages between Piyush Guha and Narayan Sanya. He was released on bail 25 May 2009.

By Md. Ali & Mahtab Alam

http://www.countercurrents.org/alam251210.htm

घोटालों की भेंट चढ़ा संसद का शीतकालीन सत्र

यह हमें अभी तक शायद पता नहीं है कि संसद की एक दिन की कार्यवाही में आम जनता का कितना खर्च होता है। हमें पता भी हो, तो शायद हम इसे गंभीरता से नहीं लेते। आखिर इस देश में इतने बड़े-बड़े कांड हो रहे हैं, उसमें जनता की मेहनत की कमाई कुछ स्वार्थी तत्वों की जेब में जा रही है। उसके अनुपात में संसद में होने वाला खर्च तो मामूली है। पर यही मामूली खर्च की राशि बताई जाए, तो 146 करोड़ रुपए होती है। यानी संसद की कार्यवाही ठप्प होने के दौरान आम जनता की जेब से 146 करोड़ रुपए ऐसे ही निकल गए। आम जनता के हाथ क्या आया? कुछ नहीं। इस राशि को यदि घोटाले की राशि में जोड़ दिया जाए, तो? कई विधेयक पारित होने से रह गए, केवल दोनों दलों की जिद के कारण। उस जिद ने कितना बड़ा नुकसान आम आदमी का किया है, इसे समझने की जरुरत किसी को नहीं है।
संसद की कार्यवाही ठप्प पड़ गई। पूरा शीतकालीन सत्र जिद की भेंट चढ़ गया। मानो इस देश में स्पेक्ट्रम घोटाल के सामने चर्चा का कोई विषय ही नहीं है। हमारे रणबाँकुरे सांसदों की एक ही रट है कि स्पेक्ट्रम घोटाले की जाँच केवल जेपीसी से ही कराई जाए। यहाँ जाँच महत्वपूर्ण न होकर जेपीसी महत्वपूर्ण हो गई है। सांसद यह अच्छी तरह से जानते हैं कि जेपीसी की माँग सरकार कभी नहीं मानेगी। इसलिए जिसे वह नहीं मान रही है, उसी के लिए जिद की जाए। ताकि मामला इसी तरह से आगे बढ़ता रहे। हमारे सांसद यह समझ नहीं पा रहे हैं कि जनता की मेहनत की कमाई को किस तरह से अपव्यय होने से रोका जाए। जेपीसी से सच्चई सामने आ ही जाएगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। उधर रतन टाटा के बयान से भाजपा को मानो साँप सूँघ गया। भाजपाई खेमा सकते में आ गया है। ऐसे में उन्हें संसद की कार्यवाही ठप्प होने पर ही फायदा है। ताकि अपनी कमजोरी को छिपाने का अवसर मिल जाए।
क्या संसद में चर्चा के लिए अन्य कोई मुद्दा ही नहीं है? कई ऐसे मुद्दे हैं,जिन पर विचार किया जाना है। पर जब संसद की कार्यवाही ही ठप्प हो, तो फिर मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। हाशिए पर गए हुए मुद्दों की फिर चर्चा ही क्योंे की जाए? महँगाई लगातार बढ़ रही है, इस पर किस तरह से लगाम कसी जाए, यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है, लेकिन सांसद अपनी जिद में आकर महँगाई को बढ़ाने का ही काम कर रहे हैं। वैसे भी उनहें महँगाई की चिंता नहीं है। उन्हें इतना कुछ मिल रहा है कि महँगाई उनके सामने नतमस्तक है। संसद की कार्यवाही ठप्प रहे, इस पर कांग्रेस का भी फायदा है। इसलिए वह भी नहीं चाहती कि संसद में आकर भाजपा उसकी और फजीहत करे। इसलिए दोनों मुख्य दल मिलकर जनता की मेहनत की कमाई को गवाँ रहे हैं। जब दोनों ही दल की सोच ऐसी हो, तो फिर आम-आदमी की पीड़ा किसी कोने में सिसकती ही रह जाती है।
राजनीति की लीला अपरम्पार है। इसे कोई नहीं समझ पाता। आम जनता के प्रतिनिधि ही आम जनता के साथ खिलवाड़ करते हैं। पाँच वर्ष में एक बार भिखारी बनकर वोट माँग लेते हैं, फिर तो वे राजा हो जाते हैं। हमारी संसद में इतने सुलझे लोग राजनीतिज्ञ हैं। फिर भी कुछ ऐसा नहीं हो पा रहा है, जिससे हमारे सांसद की सोच को बदला जा सके। आखिर जनता के प्रति उनकी भी जवाबदेही है? राजनीति की गहरी सोच के पीछे आम आदमी की पीड़ा सामने होनी चाहिए। जो अब दिखाई नही देती।
संसद में इतने लम्बे गतिरोध के लिए आखिर दोषी किसे माना जाए? इसके लिए विपक्ष जितना दोषी है, तो फिर सत्तारुढ़ दल भी कम दोषी नहीं है। यह तो साफ दिख रहा है कि सत्तारुढ़ दल ने स्पेक्ट्रम घोटाले को छिपाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसके लिए विपक्ष की कमजोरी भी सामने आई। इससे विपक्ष भी इंकार नहीं कर सकता। संसद की गरिमा उसके चलते रहने में ही है और सांसद की गरिमा उसे चलाए रखने में है। पर जब सांसद ही उसे चलाए नहीं रखना चाहते, तो फिर कैसे चल पाएगी संसद? गरिमा तार-तार हो चुकी है। कब, कौन देख पाएगा इस हारी हुई संसद को? शायद कोई नहीं!
डॉ. महेश परिमल

साभार – संवेदनाओं के पंख

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/search?updated-max=2010-12-15T12%3A56%3A00%2B05%3A30&max-results=1

The endgame at Cancun

As I write this, some 24 hours are left to finalise the agreement at the 16th Conference of Parties to the climate change convention being held in Cancun. At this moment it seems the predictable deadlock in talks will continue. Like all other global climate meetings,the world remains deeply divided on the matter of how to cut emissions of greenhouse gases that even today determine economic growth. Not much is expected to happen at the beach city of Cancun.

But this assessment borders on the simplistic. Over the past three years—since the meeting held in Bali—much has changed in the negotiations and much will change in Cancun. In the past years
developing countries have done all they can to break the deadlock; they have budged from their held positions, they have been proactive in international negotiations and they have developed a domestic agenda for climate change mitigation. But each forward shift in the position of the emerging world has only meant a backward slide and hardening of position of the rich countries. Worse, there has been aggressive and often clandestine movement to shift the very nature of
the global climate agreement to suit the US. This is the endgame of Cancun. We need to understand this.

2007, Bali: The draft resolution asked for deep emission reduction cuts from the industrialised world—up to 20 per cent by 2020. The US was rigid in its stance that it would do nothing within a legal framework and nothing till China and India were similarly committed. There was much at stake as the world climate was clearly heating up. There was pressure to act. By now the global (read western) media had successfully painted China and India as the villains in the climate
pack. They had shifted public opinion away from the historical and rising pollution of the US to the chimneys of Beijing.

The developing world made a drastic shift in its position to bring the US on board. One, it agreed to a separate regime for the US based on its domestic actions that would not be legally binding. Two, it agreed to take on national actions to mitigate emissions, but underlined that
these would have to be enabled by technology and funding. It also agreed that the supported actions would be subject to an international regime for monitoring and verification. The world was given two years to firm up this action plan.

2009: By now it was clear that the Democratic government of Obama was not different from its predecessor Bush’s. It was only more visible and more determined to have its way. The bar of compromise was shifted again. The concession made by the developing world at Bali was brushed
aside as too little. The shrill call went out: China and India and others in our part of the world should state their emission reduction targets. Nobody asked what was the target the US was willing to put on the table. The pressure was on us to respond. It was also repeated that we were the deal breakers. India and China wanted growth at all costs. This line was fed to and swallowed by many Indian commentators and politicians alike.

So we caved in and complied once again. India put out its energy intensity reduction target and a national action plan on climate change. China went aggressive in building a renewable energy
portfolio. Brazil went on to cut its rates of deforestation. All this was done without any matching commitments from the US. The US continued to commission and build coal-based power stations and increase its gas-guzzling vehicle fleet.

2009, Copenhagen: By now the goal posts had been shifted again. The Obama administration made it clear: nothing or all. It also stitched up a coalition of the willing with the Bush-like motto, “with us or against us”. At this meeting the terms of the new agreement were revealed. It was simple: no global agreements would be legally binding on the rich countries. Instead, there would be one agreement for all. This would be based on domestic actions, not determined by historical emissions but by the willingness of each country to act. But all these actions would be measured, reported and verified. It would internationalise domestic actions. There would be no distinction
between the industrialised world and the rest. There would be no promise of money or technology. All this added up to a weak and effective deal, designed by and for polluters.

In Copenhagen, in spite of the Obama touch (he came, bullied and charmed), there was no agreement on this non-deal. Now in Cancun the negotiations are designed to move the pieces ahead. The goal is clear: by the next meeting in Durban all opposition to the new deal should be
removed, even at the cost of making the world bleed.

But the question remains: now that the US has got the world to sink even lower in its expectations for an agreement that will be effective or equitable, will it honour its side of the bargain? Till now there is little evidence to suggest that it will take on emission reduction targets commensurate with its historical responsibility. Till now there is every evidence that it will wreak the agreement and then walk out of doing even the little it has promised.

Then why should the world give up its chance to build an agreement on climate that will work effectively? Why?

Sunita Narain

CSE

http://downtoearth.org.in/node/2381

पर्यावरण साहित्य संमेलन- दापोली

या वर्षी पावसाळा बराच काळ लांबला, युरोप बरोबरच आपल्या देशातील लेह-लडाख आणि श्रीनगर सारख्या उत्तरेकडच्या भागात तुफान हिमवर्षाव होऊन उच्चांक गाठला गेला. आता आणखी पुढे काय वाढून ठेवलय? जागतिक तापमान वाढ आणि त्याचे होणारे परिणाम या बद्दल आता जनसामान्यात देखील चर्चा होताना दिसते. प्रसार माध्यमातसुद्धा आता हा चर्चेचा विषय होऊन राहिला आहे. हे सर्व मुद्दे विचारात घेऊन पर्यावरण विषयक साहित्याला वाहिलेलं असं अनोखं साहित्य संमेलन पर्यावरणतज्ज्ञ दिलीप कुलकर्णी यांच्या पुढाकाराने दापोली येथे आयोजित करण्यात आले आहे. हे संमेलन १७  व १८ डिसेंबरला जालगाव-ब्राह्मणवाडी येथील ज्ञानप्रसाद मंगल कार्यालयात होईल. संमेलनाचे उद्‌घाटन १७ डिसेंबरला दुपारी ४ वाजता होईल. कन्याकुमारी येथील विवेकानंद केंद्राच्या नैसर्गिक साधनसंपत्ती विकास प्रकल्पाचे जी. वासुदेव हे उद्‌घाटक म्हणून लाभले आहेत. याच दिवशी जैवविविधता : स्वरूप आणि महत्त्व या विषयावर डॉ. प्रकाश गोळे यांचे बीजभाषण, पर्यावरणविषयक अनुबोधपटांच्या निर्मात्यांच्या मुलाखती, नव्या पुस्तकांची प्रकाशने व रात्री प्रबोधक अनुबोधपटांचे प्रदर्शन हे कार्यक्रम होतील. १८ ला पर्यावरण साहित्याचा आढावा, पर्यावरणविषयक पुस्तके, नियतकालिके, शैक्षणिक साहित्य, अनुबोधपट वाहिन्या, संकेतस्थळे आदींचा आढावा घेण्यात येईल. वृत्तपत्रातून सातत्याने पर्यावरण विषयक लेखन करणारे लोकसत्ताचे उपसंपादक श्री. अभिजित घोरपडे, गंगाजलचे श्री. विजय मुडशिंगीकर यांचाही या संमेलनात सहभाग असणार आहे. पर्यावरण हा आता केवळ तज्ज्ञांचाच विषय राहिला नसून सामान्य माणसांमध्येही त्याबद्दल  जागृती निर्माण व्हावी असा या संमेलना मागचा उद्देश आहे.

– नरेंद्र प्रभू



Is bamboo a tree or a grass?

The definition is contested as the answer has immense economic implications. If bamboo is a tree or timber, it belongs to the forest department and can be auctioned to the paper and pulp industry, often at throwaway rates. If it is a grass, then it would be classified as a minor forest produce and people would have the right to cut bamboo for sale or for value addition by making furniture or baskets.

The Indian Forest Act 1927, the bible for forest managers in the country, says “forest produce” is what is found in or brought from a forest. This includes trees and leaves and plants that are not trees. Furthermore, trees include palms and bamboo. Timber is defined as trees, fallen or felled. Over the years, foresters have interpreted these provisions to mean that bamboo, being a tree, is timber and, therefore, under the control of the department. The legacy passed down
from generations of forest managers has meant that this grass-like tree is not included in the list of minor forest produce.

The minor produce of a forest is everything valuable that is not timber. This produce, from tendu used in beedi manufacture to lac resin and tamarind, is big bucks business. It is also the main source of earning a living for the people who live in and around the country’s forests. The opportunity is to use this ecological wealth for building economic wellbeing of the people, mostly poor, in these rich regions. But forest policy has worked deliberately to destroy this option.

So over the past years different state governments have nationalised different produce and differently handed them over to either federations or contractors or corporations to collect and sell. People, who live in the forests, have no right to sell the nationalised minor forest produce, other than to governments. They are wage labourers and collectors for contractors and forest departments.

B D Sharma, a former civil servant who has spent a lifetime campaigning for the rights of tribal communities to forest produce, will tell you that many attempts have been made to correct this distortion. In 1974, when the tribal sub plan was conceptualised, it was agreed that the collector would be the owner of the produce. But even as the policy got operationalised governments took control over the produce, leaving collectors to be just collectors.

Then in 1996, the Central Act for panchayats in Scheduled V (tribal) areas was passed. It directed state governments to ensure that in these areas gram sabha (the village assembly) would be given the “powers of ownership of minor forest produce”. But even before the ink on the Act was dry, the resource battle was lost again.

First, the forest department objected, saying PESA (as this act is known) did not define what constitutes minor forest produce.As Sanjay Upadhyay, a lawyer working in this area, points out this is when the Indian Forest Act does not define minor forest produce. Second, states made rules to bypass these provisions.

The fight for the minor produce does not stop here. In 2006, the Forest Rights Act (FRA) for the first time defined minor forest produce as including bamboo and tendu and many other things. It also gave tribals and other traditional forest dwellers the “right of ownership, access to collect, use and dispose of minor forest produce, which has been traditionally collected within or outside village boundaries.” Now the fat is in the fire. Tribals and other traditional
forest dwellers have the right to both collect and sell bamboo.

What happens now? As my colleagues found when they traversed the country’s tribal districts, the right exists only on paper. Of the 2.9 million claims settled under the FRA, only 1.6 per cent pertained to community rights. Worse, virtually no right of any community has been recognised for minor forest produce. They noted the missing right was
deliberate. Governments across the tribal districts ensured no information was ever provided to people that this right was available. The technique was simple: the form issued to people to ask for rights left out this provision.

Two villages did ask. Menda Lekha and Marda in Gadchiroli district of Maharashtra asked for the community right over their forest and its produce. The right was recognised. But as Mohan Hirabai Hiralal, an activist working with the villagers, will tell you this legal right is still not worth the paper it is written on. The forest department now says that people can indeed have control over the sale of the bamboo, but they cannot take it out of the forest. The transit rules over forest produce do not allow for transportation of any produce unless it has been “authorised”. The state forest department is busy inserting provisions to say that people have rights over the minor forest produce, but only if it is for self use.

The forest department will tell you these controls are needed to protect forests. But forests in India are the habitat of millions of people. The conservation of forests will require more productive benefits. The challenge is to use the green wealth and also regenerate it and increase it for the future. Putting a fence around it and negating its value as the livelihood of millions will not do.

So, let us hope that this time the definition of bamboo will remain settled. It is a tree-grass, one that can give a million new shoots and provide a million new jobs to the people.

Sunita Narain

CSE

http://www.downtoearth.org.in/node/2308

“Indian rivers have not been understood as ecosystems but are treated as conduits of water or wastewater” – Dr. Brij Gopal

Dr. Brij Gopal, Vice President, National Institute of Ecology and former Member, Working Group on Minimum Flows, constituted by the Water Quality Assessment Authority, talks to Parineeta Dandekar, India Water Portal about the urgent need of freshwater flows in Indian rivers, and the legal and institutional set ups required to ensure this.

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There is no law in India stating that rivers must have freshwater flows for performing their ecological functions and that abstraction must be limited. How severe do you think this problem is and what are its ramifications on various sectors?

Why do we need a law for everything? Do we need a law that every tree must have a stem and leaves? Like trees, the rivers are also a creation of nature that human tend to tame. A river is a river only if it flows, if the flow is natural, if there is enough space along the river for the natural variation in flow to pass, and if it has the ability to assimilate the organic and inorganic substances entering it. When the flow is stopped, it becomes a reservoir and it is a canal or a drain where flow is regulated by humans.

The problem is quite severe because we call the rivers as mothers or goddesses but treat them with utter contempt. In India, rivers have not been understood as ecosystems but are treated simply as conduits of water or wastewater. The ecological functions, or in current phraseology – the ecosystem services, of rivers as ecosystems have never been investigated or understood in India.  Rivers which flow naturally and unrestrained, sustain biodiversity, assimilate non-toxic wastes, enrich soils with fertility, support livelihoods, recharge groundwater, facilitate navigation, transport water and materials downstream, moderate microclimate, enhance aesthetics, and support recreational and spiritual activities. The fresh water and sediments carried by the rivers to the sea support mangroves, coastal fisheries,  prevent salt water intrusion, and even influence the climate. These services rendered by water flowing in the rivers have neither been assessed yet nor considered in cost-benefit analyses of various projects impacting upon them.

Can you suggest some changes in the present laws and policies that can be of help?

The rivers need to be first recognised as ecosystems for their conservation and management. The river conservation programme of the MOEF focuses upon “cleaning” by diverting and treating the point sources of wastewaters to a limited extent. Rivers must be treated as National Natural Heritage. The WATER that unites the living and non-living throughout this planet earth, should not be divided along man-made landscape units and should not be allowed to divide the people.

In the present day context, legal measures are required to regulate the “regulation of rivers” (through dams, barrages and embankments) and to ensure adequate flows to maintain ecological integrity of the rivers and to sustain the ecosystem services of the rivers. However, the laws and policies are required more urgently that aim at eliminating the wasteful use as well as promoting recycling/reuse of water in agriculture, urban and industrial sectors.

Which are the rivers you think are most severely affected and need immediate revival?

Practically all; most rivers have been channelised by embankments in name of flood control (the real purpose being reclamation of land for urban and industrial development). Some are affected by near total absence of flow, others receive too much waste of all kinds, and still others are impacted both ways. I have seen Yamuna disappearing and turning into a sewer before my eyes during the past 50 years;  Many stretches of Ganga are in a nearly similar state; I have witnessed  disappearance of river Banas;  several rivers of peninsular India are also nearly dead.

Above: Banas River near Kota
Source: Wikimedia Commons

In a scenario where allocations of water from a resource (river/ dam/canal) have already been made, how can this status quo be approached?

I do not understand what you mean with “status quo’. Man-made allocations are not like nature’s laws that cannot be altered.  Allocations are like denying the rights of the lower riparians to use the natural resources.  A river basin approach can help formulate appropriate management strategies; all sub-basins need to be considered together.

What was your experience, being a part of the Working Group on Minimum flows, appointed to advise the Water Quality Assessment Authority under the MoEF? What outcomes can be expected from this group? Is the Tennant methodology (supposed to be primitive), adopted by the group, good enough for India?

The subgroup constituted under the chairmanship of the Member (RM) of CWC was a rather small group and none (including myself) had any experience of the subject on which we were to advise. I and a couple of others disagreed with the term ‘minimum flow’ itself and wanted to discuss the ‘environmental flow’. The subgroup had also received inputs and views of international experts who attended a workshop organised by me in March 2005. But the majority prevailed upon ‘minimum flows’ that were determined by a method unknown to us. The Tennant’s method was mentioned in the Report but was not used in making the recommendations. To my knowledge, the report was not accepted by the WQAA. The efforts continued later but seem to have been abandoned.

How do we fill the gap between expert-centred methodologies and serious lack of trained personnel?

Before getting into methodologies, we need to appreciate and understand the flow requirement for different components and prioritise them. Do we need flow to maintain water quality, habitats or biodiversity or some other ecosystem services I mentioned earlier?In Australia, the NSW departments of Fisheries and Water Resources developed a method which relies on the judgement of a panel of scientific experts in aquatic ecosystems and river management, to assess the flow requirement for different components and processes, in terms of overall river ecosystem health. Such expertise does not arise from training but by prolonged experience in the field and comprehensive grasp of the global scientific knowledge. If you do not have experts, a beginning should be made with field research.

In what way can the communities be a part of the process? ( given the lack of personnel and direct impacts on the community)

The communities living along the rivers would have generally experienced the impacts of changes in flows over both short and long term on various components of thr river ecosystem and would also be able to relate them to their own livelihood and well being. These communities are not those who have come to occupy the land after rivers have been regulated and channelised.

Above: Fisherman in Souparnika estuary
Parineeta Dandekar

Above: Fishermen in Vashishthi Estuary
Parineeta Dandekar

What is your stand/ your recommendation for the last remaining free flowing rivers in the country?

All further regulation of rivers should be stopped. I fully subscribe to what Dr Ramaswamy Iyer (former Secretary, Ministry of Water Resources) says,  we must find out how much water can we abstract from the rivers without impairing its health, instead of asking how much water does the river need.

Above: Seetha Nadi near Agumbe, Malnadregion , Karnataka

Credits: Parineeta Dandekar

How do you see the way forward? When the water flows from the tap inside our houses and we are willing to pay a hefty price for a bottle of drinking water, who cares for the rivers? Delhi’s millions are contented with water brought to them from Ganga at Tehri; how many care for the sewer called Yamuna?

I do hear whispers about rivers and river flows; these have yet to turn into clear talks and then loud voices before there is a movement to restore the rivers. I am afraid by then many rivers will have died. We cannot keep our rivers alive on knowledge borrowed or imported from outside. There is as yet no serious research initiated on Indian rivers. We need a big, coordinated effort, big funding and a goal oriented institution for rivers.

Courtesy By –

http://www.indiawaterportal.org/post/13477