हम कब सुन पाएँगे, न्यायमूर्ति हाजिर हो!

भ्रष्टाचारियों को न्यायाधीश दंड देते हैं। पर जब न्यायाधीश ही भ्रष्टाचारी हों, तो फिर उन्हें कौन दंडित करेगा? भारतीय परिवेश में आज यह यक्ष प्रश्न चारों तरफ से सुनाई दे रहा है। भारतीय लोकतंत्र के जिस पाये को सबसे अधिक सशक्त होना था, आज वही अपने भ्रष्ट आचरण के कारण प्रजातंत्र को पंगु बना रहा है। कोलकाता के न्यायाधीश सौमित्र सेन और हरियाणा की महिला जज निर्मल यादव ने इस पूरी व्यवस्था पर एक प्रश्न चिह्न् ही लगा दिया है।
भारत के पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने रहस्योद्घाटन किया है कि देश की सुप्रीम कोर्ट के दस में से आठ मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। उनकी यह बात नक्कारखाने की तूती साबित हुई।
न्याय की बात करें, तो पर्शिया के राजा केम्बिसेस को पता चला कि उनके राज्य में न्यायाधीश ने रिश्वत ली है, तो उन्होंने रिश्वतखोर न्यायाधीशं का कत्ल करवा दिया। यही नहीं उनके शरीर की चमड़ी न्यायाधीश की कुर्सी पर चिपका दी। उसके बाद राजा ने उसी के पुत्र को न्यायाधीश की कुर्सी पर बिठाया और कहा कि इस कुर्सी पर किसकी चमड़ी चिपकी है, इस हमेशा याद रखना। प्राचीन जमाने के राजा न्याय के प्रति इतने अधिक सचेत रहते थे कि पता चलते ही वे न्यायाधीश को कठोर दंड देते थे। आज जब कदम-कदम पर भ्रष्टाचारी नेता हमें दिखाई पड़ रहे हैं, तो उस स्थिति में यह सोचा भी नहीं जा सकता कि न्यायाधीश भी कभी कठघरे में होंगे। आज भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कठोर कानून की आवश्यकता है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट ने इस आजिज आकर यह कह दिया कि क्यों न रिश्वत को कानून का रूप दे दिया जाए।
देश का न्यायतंत्र भ्रष्टाचार से आकंठ डूबा है। एक के बाद एक न्यायाधीशों पर रिश्वत के आरोप लग रहे हैं। अभी जो सबसे अधिक चर्चित मामले हैं, उसमें कोलकाता हाईकोर्ट के सिटिंग जज सोमित्र सेन का मामला है। उन पर आरोप है कि जब वे हाईकोर्ट में प्रेक्टिस कर रहे थे, तब 1993 में उन्होंने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया और शिपिंग कापरेरेशन ऑफ इडिया के बीच हुए विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार हो गए। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से सौमित्र सेन की नियुक्ति कोर्ट रिसीवर के रूप में की गई। सेन को कहा गया कि ‘सेल’ द्वारा जितने भी माल को रिजेक्ट किया गया है, उसकी सूची तैयार करें। इस माल को बेचकर उस रकम को एक अलग खाते में जमा किया। माल की बिक्री हो जाने के बाद श्री सेन से कहा गया कि इस रकम की 5 प्रतिशत राशि अपने मेहनताने के रूप में रख ले। शेष राशि को एक अलग एकाउंट में जमा कर दिया जाए। 2002 में जब सेल ने अपने माल की बिक्री से मिली रक और उसके ब्याज के बारे में सेन से पूछताछ की , तब वे उसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। तब सेल ने कोर्ट में आवेदन किया। कोर्ट ने सौमित्र सेन को आदेश दिया कि माल के बिक्री की राशि सेल के खाते में जमा कर दे। सौमित्र सेन ने इस आदेश को अनदेखा कर दिया। इस दौरान वे कोलकाता हाईकोर्ट के जज बन गए। बाद में पता चला कि फायरब्रिक्स की बिक्री से कुल 33 लाख 22 हजार रुपए प्राप्त हुए थे। इस राशि को अलग-अलग खाते में जमा किया गया था। हाईकोर्ट के सिंगल जज की बेंच ने फैसला दिया कि सौमित्र सेन का यह व्यवहार फौजदारी मामला बनता है। यह गबन का मामला है। फैसले में कहा गया कि सौमित्र सेन उस राशि को ब्याज समेत कुल 52 लाख 46 हजार 454 रुपए जमा करे। सौमित्र सेन के पास इस राशि को वापस देने के अलावा और कोई चारा न था। इस फैसले के बाद कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से सौमित्र सेन को न्यायालयीन कार्य देने पर रोक लगा दी।
भारतीय न्यायतंत्र का एक और सनसनीखेज मामला भी है। जो इस प्रकार है:- के. प्रकाश राम नामक एक आदमी एक बेग में 15 लाख रुपए की कड़कड़ाती नोट लेकर हरियाणा हाईकोर्ट की जज श्रीमती निर्मलजीत कौर के घर पहुँचा। उसने बिंदास होकर जज के हाथ में 15 लाख रुपए का बेग दे दिया। ये शख्स एडीशनल एडवोकेट जनरल संजीव बंसल का कारकून है। इसकी जानकारी जज साहब को थी। 15 लाख रुपए अपने सामने देखकर जज बौखला गई। उसने तुरंत ही पुलिस को फोन किया। पुलिस ने प्रकाश राम की धकपकड़ की। उससे पूछताछ में पता चला कि वास्तव में यह राशि एक अन्य जज निर्मल यादव को देनी थी, नाम के गफलत में वह राशि दूसरी महिला जज के पास पहुंेच गई। प्रकाश राम ने पुलिस को बताया कि यह राशि एडवोकेट जनरल संजीव बंसल के कहने पर पहुँचाई थी। छोटी उम्र में ही एडवोकेट जनरल के पद सँभालने वाले संजीव बंसल की छबि हाईकोर्ट में हाई प्रोफाइल लायर के रूप में है। वकील के रूप में वे कोई छोटे मामले पर हाथ भी नहीं रखते थे। पंजाब के कांग्रेसी नेताओं के साथ संजीव बंसल के धनिष्ठ संबंध थे। वे कांग्रेसी नेताओं को चुनाव के दौरान अपना खजाना ही खोल देते थे। एक कांग्रेसी नेता ने तो उन्हें एक स्पोर्ट्स कार भी भेंट की थी। संजीव बंसल के पास अपनी तीन लक्जरी कार है। वे पंजाब के अनेक रसूखदारों का केस लड़ने के लिए विख्यात हैं।
सीबीआई का कहना है कि उक्त 15 लाख रुपए निर्मल यादव के बदले निर्मलजीत कौर के बंगले पहुँच गए। इसी कारण पूरा मामला सामने आ गया। मामला सामने आते ही निर्मल यादव अवकाश पर चली गईं। उन्होंने इस पूरे मामले में स्वयं को निर्दोष बताया। लेकिन सूत्र बताते हैं कि निर्मल यादव के संजीव बंसल से अच्छे संबंध थे। निर्मल यादव ने 24 अगसत को हिमाचल प्रदेश के सोलन में 15 बीघा जमीन खरीदी है, यह जानकारी बाहर आई। यह पता चलते ही पंजाब हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति ने निर्मल यादव को मिलने के लिए बुलाया। वहाँ पर निर्मल यादव ने कहा कि क्या कोई हाईकोर्ट जज कानूनी रूप से जमीन नहीं खरीद सकता?
अब संजीव बंसल के बारे में जान लें। अभी उनकी उम्र केवल 43 वर्ष है। एक जूनियर एडवोकेट के रूप में अपना कैरियर शुरू करने वाले संजीव ने 1992 में स्वतंत्र प्रेेक्टिस शुरू की। उसके पास राजनेताओं और उद्योगपतियों के प्रापर्टी के मामले अधिक आते। उसने शायद ही कोई फौजदारी मामला अपने हाथ में लिया हो। केवल दस वर्ष की प्रेक्टिस में उसने दिल्ली के पॉश इलाके में अपना बंगला बना लिया, जिसकी कीमत दस करोड़ रुपए है। इसने पंजाब सरकार के जितने भी मुकदमे लड़े, उसमें से अधिकांश में सरकार की हार ही हुई है। उसके बाद भी उसकी समृद्धि लगातार बढ़ती रही। इन मामलों की भी सीबीआई जाँच चल रही है।
इस तरह से भारत का न्यायतंत्र लगातार खोखला होता जा रहा है। इस प्रश्रय दे रहे हैं हमारे देश के कथित भ्रष्ट राजनेता। सुप्रीम कोर्ट की इस दिशा में बार-बार की जाने वाली टिप्पणी भी असरकारक सिद्ध नहीं हो पा रही है। लोगों का कानून पर सेविश्वास उठता जा रहा है। यदि इस दिशा में शीघ्र ही कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

डॉ. महेश परिमल

साभार- संवेदनाओं के पंख

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/search?updated-max=2010-10-23T13%3A23%3A00%2B05%3A30&max-results=1

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *