Monthly Archives: April 2010

A river under a river…

In Cenote Angelita – Mexico , There is an underwater river. Under water rivers can be found in a cave, if you dive up to 30 meters depth, the water is fresh water, but if you dive 60 meters the water becomes salt water, therefore creating a “river” complete with trees and foliage. However this is not unusual because the river is a river of hydrogen sulfide layer that looks like a river. Hydrogen sulfide, H2S, is a coulourless gas, toxic, flammable and smells like rotten eggs. These gases can arise from biological activity when bacteria break down organic material in a state without oxygen (anaerobic activity), such as in the swamp, the sea and sewage. Gas was also featured on the gas arising from volcanic activity as natural gas.

As seen in the pictures the sensation that we can get is a unique natural phenomenon.

किस समाज में जी रहे हैं हम ?

एक कथित साधू पत्नी की पुण्यतिथि पर अपने आश्रम में भंडारे का आयोजन करता है, 20 हजार लोगों को भोजन कराता है। बाद में कपड़े और बरतन बाँटता है, जिसमें भगदड़ होती है, जिससे 64 लोगों की मौत हो जाती है। वह इसे अपनी नहीं, बल्कि भगवान की गलती करार देता है। दूसरे दिन वह फिर कहीं दूसरे स्थान पर लोगों को रुपए बाँटता है। इतनी मौतों का उसे कोई ग़म नहीं, वह शान से अपना काम करता है, भड़काऊ बयान देता है। हम खामोश होकर सब देखते हैं। एक और साधू इसी देश में सेक्स रेकैट चलाता है। उसके पास कद्दावर लोग आते हैं। वह उनकी सेक्स की भूख मिटाने का प्रबंध करता है। दिन में वह साधू का चोला पहनता है, रात में एक अय्याश व्यक्ति बन जाता है। उसकी पहुँच काफी ऊपर तक होती है। वह अपने आपको कृष्ण का अवतार मानता है और उसके यहाँ काम करने वाली युवतियों को वह अपनी गोपियाँ बताता है। एक प्रगतिशील राज्य का मुख्यमंत्री की हाजिरी भी उसके पास होती है। हम इसे भी देखते समझते हैं।
आखिर ये साधु-महात्मा देखते-देखते इतनी बड़ी संपत्ति के मालिक कैसे बन जाते हैं? इनके आश्रम कथित रूप से अय्याशी का अड्डा कैसे बन जाते हैं। आश्रम भी अतिक्रमण की भूमि पर बन जाता है। प्रशासन सोता रहता है। हर कथित साधू या महात्माओं के अपने राजनीतिक चेले होते हैं। इन्हें वे अपनी ऊँगलियों पर नचाते हैं। कई बार तो मंत्रिमंडल में अपनों को पद दिलाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अगर दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। चंद्रास्वामी को कौन नहीं जानता, जो सीधे प्रधानमंत्री से मिल सकते थे। उनकी जाँच भी नहीं होती थी। अपने आश्रम चलाने के अलावा सरकार चलाने में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उन्हें पूरी तरह से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। उन पर ऊँगली नहीं उठाई जा सकती थी। आखिर राजनीति में इनका दखल क्यों होता है? शायद ही कोई मंत्री, विधायक, सांसद ऐसा हो, जिनका अपना कोई ऐसा गुरु न हो, जो उन्हें राजनीतिक सलाह न देता हो। इनकी आड़ में ये गुरु कई ऐसे काम करते जाते हैं, जो समाज विरोधी होते हैं। हम ऐसे लोगों की लीलाएँ देखने सुनने के लिए विवश हैं।
समाज का एक ऐसा व्यक्ति जो नशीली दवाएँ लेता है। एक स्वर्गीय राजनेता का पुत्र है। जो तलाकशुदा है। फिर से शादी रचने को एक प्रायोजित कार्यक्रम बनाकर टीवी पर आता है। कई युवतियों को देखता पहचानता है। युवतियाँ भी उस पर फिदा होती हैं। उसके नाम पर तीन युवतियाँ अपने हाथों पर मेंहदी रचाती हैं। उसमें से वह एक से कथित तौर पर शादी करता है। बाकी दो युवतियाँ उसे अपना भाई मान लेती हैं। किसी युवती के हाथों पर एक ही बार मेंहदी रचती है। बार-बार तो रचती नहीं है। लेकिन हम ऐसा होता देख रहे हैं, इसे देखने में अपनी शान समझते हैं। शादी के नाम पर एक और अभिनेत्री तमाशे करती है। हम उसका यह तमाशा मजे लेकर देखते हैं। मीडिया ने जो परोसा,उसे सहजता के साथ ग्रहण भी करते हैं। हम क्या चाहते हैं, इसे जानने-समझने की फुरसत न तो मीडिया के पास है और न ही हमारे पास यह बताने का समय है कि हम क्या चाहते हैं? हमारे बच्चे अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए इनकी कठपुतली बनते हैं। इनके शोषण का शिकार होते हैं। लेकिन हमें Êारा भी शर्म नहीं आती।
यही नहीं हमारे मनोरंजन के संसाधनों पर आजकल सांस्कृतिक हमला हो रहा है। हम मजे लेकर उसे देख रहे हैं, साथ ही अपनी सक्रियता का परिचय भी दे रहे हैं। लम्बे समय तक देश की महिलाओं और पुरुषों को सास-बहू के प्रपंचों ने लुभाया। जहाँ एक ऐसे समाज को दिखाया गया, जिसमें 25 वर्ष की बहू करोड़ों रुपए की बात करती है, प्रपंच रचती है, इसमें उसका साथ देते हैं, समाज के कथित ठेकेदार। इनके द्वारा एक ऐसे समाज का निर्माण हुआ, जिसमें केवल घात और प्रतिघात है। करुणा-संवेदनाओं से इनका कोई नाता नहीं है। यह सिलसिला अब बंद हो गया है, पर समाज में कुछ स्थापित बुराइयों को छोड़ गया है। अब दूसरी तरफ हम फिर इस मुगालते में हैं कि धारावाहिकों को चलाने में एसएमएस भेजकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। एक आलीशान मकान में कुछ महिलाएँ, कुछ युवतियाँ, एक हिजड़ा, एक पहलवान का बेटा, एक विदूषक, एक संगीतकार आदि रहते हैं, हँसी-ठिठोली करते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं, एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं और अपने इसी व्यवहार के कारण वहाँ से निकल जाते हैं। पूरा देश उन्हें देख रहा है, पर वे अपने आपको नहीं देख रहे हैं। हमारा समय निकल जाता है। वे कैसा व्यवहार कर रहे हैं, यह बताने के लिए हम एसएमएस करते हैं। विज्ञापन एजेंसियाँ खूब कमाती हैं। हम ठगे जाते हैं। फिर भी हमें कोई चिंता नहीं। हम इनकी मानसिक गुलामी सहन करते हैं।
देश की आर्थिक राजधानी पर सशस्त्र हमला होता है। राजधानी 72 घंटे तक आतंकवादियों की गिरफ्त में होती है। कई आतंकवादी मारे जाते हैं। एक जिंदा पकड़ा जाता है। डेढ़ वर्ष तक हम मारे हुए आतंकवादियों की लाश को सँभालकर रखते हैं, उस पर करोड़ो रुपए खर्च करते हैं। जीवित आतंकी पर मुकदमा करते हैं, उसकी सुरक्षा पर भी करोड़ों रुपए खर्च होते हैं, वह बार-बार अपने बयान बदलता है। उसने जो किया, उसका फैसला नहीं हो पाता। हम मजे से उनकी खबर पढ़ते हैं। हमारा खून नहीं खौलता। एक कमरे में कैद एक वृद्ध आदमी कथित तौर पर दादागिरी करता है। उसे मुगालता है कि वह देश की आर्थिक राजधानी को चलाता है। देश के सम्मानीय हस्तियों को लेकर उल्टे-सीधे बयानबाजी करता है। हमारे देश के कृषि मंत्री उसके तलुए चाटते हैं। फिर भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
कहीं ऐसा नहीं लगता है कि हम जिस समाज में जी रहे हैं, वह एक वायवीय समाज है? जहाँ संवेदना का कोई स्थान नहीं। करुणा जहाँ शरमाती है। अपनों के प्रति प्यार नहीं है। साजिश, दगाबाजी, छल-प्रपंच, रिश्वत आदि समाज के स्थायी भाव बनकर रह गए हैं। ऐसे में कोई अच्छा काम होता है, तो समाज उसे नकार देता है। मीडिया में उसे जगह नहीं मिलती। समाज को एक बेहतर संदेश देने वाले कार्यक्रम न जाने कहाँ खो गए। ऐसे व्यक्ति भी आज समाज के लिए बोझ बने हुए हैं। अच्छी बातें सामने नहीं आ रही हैं, एक साजिश के तहत हम सब ठगे जा रहे हैं। फिर भी यह मुगालता कि हम देश के सभ्य नागरिक हैं।
डॉ. महेश परिमल

साभार- संवेदनाओं के पंख

http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/search?updated-max=2010-03-10T11%3A42%3A00%2B05%3A30&max-results=1

निसर्गथरार

आइसलँडमध्ये आठवडय़ापूर्वी झालेल्या ज्वालामुखीच्या उद्रेकाने युरोपची विमानवाहतूक आठवडय़ासाठी ठप्प केली.. ज्वालामुखींच्या इतिहासाचा मागोवा घेतल्यास हा उद्रेक अगदीच किरकोळ ठरेल, कारण प्राचीन काळातील उद्रेकांनी पृथ्वीच्या हवामानात मोठय़ा प्रमाणावर बदल घडवून आणले आणि ते हिमयुग अवतरण्यासही कारणीभूत ठरले. आदीमानवाच्या विकासाच्या टप्प्यातही या उद्रेकांनी मोठा प्रभाव टाकला.. विशेष म्हणजे हजारो किलोमीटर अंतरावर झालेल्या या उद्रेकांच्या खाणाखुणा राखेच्या रूपात भारतात आणि महाराष्ट्रात आजही जतन झाल्या आहेत!

निसर्गाच्या स्वभावाची नेमकी व्याख्या करणे हे अत्यंत कठीण काम! कारण निसर्ग म्हणजे एकाच वेळी सर्वात नियमित आणि तितकाच अनिश्चित. म्हणून तर ग्रहगोलांचे फिरणे, एकापाठोपाठ येणाऱ्या ऋतूंमधील नियमितता थक्क करते. पण त्याच वेळेस चक्रीवादळं, भूकंप, ज्वालामुखींचे उद्रेक आणि उल्का-अशनींचे आघात हे अनिश्चिततेचे दर्शन घडवतात. किनारी प्रदेशात धडकणारी चक्रीवादळे आणि भूकंपांच्या विध्वंसातून निसर्गाचे अक्राळविक्राळ रूप पाहायला मिळते. गेल्याच आठवडय़ात आइसलँडमध्ये उद्रेक झालेल्या ज्वालामुखीने निसर्गाच्या आणखी एका रूपाचे दर्शन घडविले. प्रचंड उद्रेकामुळे ज्वालामुखीच्या विवरातून हजारो टन राख बाहेर फेकली गेली आणि तिने आइसलँडवरचा आसमंत व्यापलाच, शिवाय ती वाऱ्यावाटे शेकडो किलोमीटर अंतरावर पसरली. या उद्रेकामुळे शेकडो किलोमीटर अंतरावरील युरोप व कॅनडामधील विमानवाहतूक ठप्प झाली आणि विमान कंपन्यांना रोजचे एक हजार कोटी रुपयांहून अधिक नुकसान सोसावे लागले; जागोजागी अडकून पडलेल्या प्रवाशांचे हाल झाले ते वेगळेच. इतकेच नाही तर खुद्द आइसलँडमध्ये आरोग्याची चिंता उभी राहिली आहे. माणसांसाठी काळजी घेणे शक्य आहे, पण जनावरांचे काय? असा प्रश्न उभा ठाकला आहे. कारण वातावरणात फेकल्या गेलेल्या आणि आता हळूहळू वरून बरसणाऱ्या ज्वालामुखीच्या राखेमुळे अनेक समस्या येऊ घातल्या आहेत. या राखेत असलेले फ्लोराईड व इतर घटकांमुळे जनावरे मृत्युमुखी पडण्यास सुरुवात झाली आहे. अशा अनेक समस्या आज त्या देशाला आणि परिसरातील देशांना भेडसावत आहेत.. एरवी पोषक व पूरक समजल्या जाणाऱ्या निसर्गाचेच हे एक रूप!
ज्वालामुखींच्या उद्रेकांचा इतिहास
आइसलँडमध्ये पाहायला मिळाली ती या रूपाची केवळ एक झलक आहे. कारण पृथ्वीचा इतिहास असा असंख्य अचाट व विध्वंसक घटनांनी भरलेला आहे. त्यांनी वेळोवेळी अनिश्चिततेचे दर्शन घडविलेसुद्धा आहे. युरोपातील अनेक देशांना जेरीस आणणारा आइसलँडचा आताचा उद्रेक अगदी किरकोळ ठरावा अशा भयंकर घटनांनी पृथ्वीला हादरवले आहे. त्याचे पुरावे आजही आपल्याच आसपास पाहायला मिळतात.. अगदी आपल्या भारतात आणि महाराष्ट्रातसुद्धा! विशेष म्हणजे याच घटनांनी माणसाचा इतिहास घडवला आहे, माणसाच्या विकसित होण्यावर आपला प्रभाव टाकला आहे. त्याचा शोध घ्यायला लांब कुठे जायची आवश्यकता नाही. अगदी पुणे जिल्ह्य़ात बारामतीजवळ मोरगाव, नारायणगावजवळ बोरी किंवा विदर्भात पूर्णा खोऱ्यात अंदोरा, गांधीग्राम, कपिलेश्वर तसेच, वर्धा खोऱ्यातही अशा ठिकाणी या इतिहासाचे स्पष्ट पुरावे आजही अस्तित्वात आहेत. इंडोनेशियातील टोबा ज्वालामुखीच्या प्राचीन काळी झालेल्या उद्रेकांचेच हे पुरावे! या ज्वालामुखीच्या विध्वंसक उद्रेकामुळे प्रचंड प्रमाणावर राख बाहेर फेकली गेली. ती इंडोनेशियाच्या आसपास तर बरसलीच, शिवाय कित्येक किलोमीटर उंचावर जाऊन भारतीय उपखंडात परसली. संपूर्ण भारतीय उपखंड, हिंदी महासागर, अरबी समुद्र, बंगालचा उपसागर आणि चीनच्या समुद्रातही जमा झाली. माणसाचा विकास होत असताना अलीकडच्या काळात घडलेली ही सर्वात विध्वंसक आणि पृथ्वीवर परिणाम करणारी घटना. टोबा ज्वालामुखीचे उद्रेक हे खरंतर कमालीचे थरारक व चित्तवेधक प्रकरण! कारण या ज्वालामुखीने वेगवेगळ्या कालखंडात आग ओकली आणि आपला प्रभाव संपूर्ण पृथ्वीवर दाखवून दिला. इतका, की ग्लोबल वॉर्मिग थांबविणे हा जणू या ज्वालामुखीचा ‘बाये हाथ का खेल!’ कारण गेल्या सव्वाशे वर्षांमध्ये पृथ्वीच्या वातावरणाचे तापमान जितके वाढले (सुमारे पाऊण अंश सेल्सिअस) त्याच्या कितीतरी पट तापमान कमी करण्याची क्षमता या ज्वालामुखीच्या एका उद्रेकात आहे. त्याचा अनुभव पृथ्वीने वेळोवेळी घेतलासुद्धा आहे. त्याच्या ज्ञात इतिहासानुसार गेल्या १२ लाख वर्षांमध्ये त्याने चार प्रचंड उद्रेक पाहिले आहेत आणि प्रत्येक उद्रेकाने पृथ्वीच्या हवामानात (पर्यायाने जीवसृष्टीतही!) मोठी उलथापालथ घडवून आणली आहे. या प्रकरणाचा अभ्यास कित्येक दशकांपासून सुरू आहे आणि त्याद्वारे नवनव्या रहस्यांचा उलगडासुद्धा होत आहे.
पण त्याआधी अलीकडच्या काळात इतरही काही उद्रेकांनी पृथ्वीवर टाकलेल्या प्रभावाची माहिती घ्यावी लागेल. तो धागा धरून भूतकाळात डोकावणे हे हा संपूर्ण इतिहास समजून घेण्याच्या दृष्टीने अधिक संयुक्तिक ठरेल. ज्वालामुखी, भूकंप या आपल्यासाठी आपत्ती असल्या, तरी पृथ्वी जिवंत असल्याचे ते पुरावेच. तिच्या अंतरंगात साठलेली प्रचंड ऊर्जा या घटनांद्वारे बाहेर पडते. पृथ्वीवर विशिष्ट पट्टय़ात ज्वालामुखी व भूकंपांची निर्मिती मोठय़ा प्रमाणात होते. त्यात सर्वात सक्रिय पट्टा म्हणजे प्रशांत महासागराला वेढणारा गोल पट्टा! तिथे जगातील सर्वाधिक सक्रिय ज्वालामुखी असल्याने तो ‘रिंग ऑफ फायर’ या नावानेही ओळखला जातो. पृथ्वीच्या ज्ञात इतिहासात सर्वात घातक ज्वालामुखींना जन्म देणारे इंडोनेशिया, मलेशिया हे देशही याच ‘रिंग ऑफ फायर’वर आहेत. याशिवाय दुसरा सक्रिय पट्टा म्हणजे अटलांटिक महासागराच्या मधोमध असलेला ‘मिड अटलांटिक किंवा मिड ओशियानिक बेल्ट’! गेल्या आठवडय़ात बरसलेला आइसलँडमधील ज्वालामुखी या पट्टय़ात मोडतो. तिसरा पट्टा आहे, ‘अल्पाईन-हिमालयन बेल्ट’; हिमालयापासून युरोपातील आल्प्स पर्वतापर्यंत पसरलेला! इटलीमधील माउंट वेसुवियस यांसारखे प्रसिद्ध ज्वालामुखी या पट्टय़ात मोडतात. हेच पट्टे सक्रिय असण्याचे कारण म्हणजे हे पट्टे पृथ्वीच्या कवचाच्या विविध प्लेट्सच्या सीमारेषांवर आहेत. या प्लेट्सची सतत हालचाल होत असते, त्यामुळे अधिकाधिक ऊर्जा येथूनच बाहेर पडते. ज्वालामुखीच्या उद्रेकातून काय बाहेर पडते, त्यावर त्याचे स्वरूप ठरते. त्यातून प्रवाही लाव्हारस बाहेर पडतो, त्याचप्रमाणे खडकाच्या मोठाल्या शिळा तसेच वेगवेगळ्या आकाराची राखसुद्धा बाहेर पडते. राख सूक्ष्म आकाराची असेल तर ती कितीतरी किलोमीटर (अगदी १० किलोमीटरपासून ते ३० किलोमीटपर्यंत) उंचावर फेकली जाते आणि उंचावरील वाऱ्यांच्या प्रवाहासोबत ती हजारो किलोमीटरचा प्रवास करून दूरवरच्या प्रदेशात कुठेतरी जमा होते.
तंबोरा, पिनाटुबो आणि क्रोकाटोआ
टोबाच्या प्रकरणाकडे वळण्यापूर्वी अलीकडच्या काळातील प्रचंड अशा तंबोरा, पिनाटुबो, क्रोकाटोआ या ज्वालामुखींच्या उद्रेकाची दखल घ्यावी लागेल. कारण त्यांनीसुद्धा पृथ्वीचे वातावरण व हवामानावर मोठा प्रभाव टाकला आहे. या उद्रेकांमधून जितकी जास्त प्रमाणात राख बाहेर पडेल आणि ती जितक्या जास्त अंतरावर पसरली जाईल, तितका जास्त प्रभाव जागतिक हवामानावर पडतो. कारण ही राख वातावरणात पसरते, तेव्हा पृथ्वीवर येणाऱ्या सूर्याच्या किरणांना रोखते. त्यामुळे जागतिक तापमान कमी होते. याशिवाय उद्रेकातून बाहेर पडणाऱ्या सल्फर डायऑक्साईड वायूमुळेसुद्धा तापमान कमी होण्यास मदत होते. फिलिपिन्समधील लूझॉन बेटावरील ‘माऊंट पिनाटुबो’ ज्वालामुखीचा अलीकडे म्हणजे १९९१ साली उद्रेक झाला. त्यातून तब्बल १० घनकिलोमीटर इतकी राख बाहेर पडली. त्याचा परिणाम असा झाला, की आताच्या जागतिक तापमानवाढीच्या युगातही वातावरणाचे तापमान काही काळासाठी तब्बल ०.४ ते ०.५ अंश सेल्सिअसने कमी झाले. त्यापूर्वी १८८३ साली इंडोनेशियातील क्रोकाटोआ ज्वालामुखीचा उद्रेक त्याहून भयंकर होता. इतका भयंकर की हे बेटच कायमचे कोलमडून पडले. या बेटाचे क्षेत्रफळ साधारणत: २३ चौरस किलोमीटर होते. त्यापैकी दोन-तृतीयांश बेट या उद्रेकात पूर्ण उडाले. आणि त्याचे रूपांतर तब्बल सहा किलोमीटर व्यासाच्या विवरात झाले. त्याच्या प्रचंड हादऱ्यामुळे तब्बल साडेचार हजार किलोमीटरवरची जमीनही हादरली होती. या विध्वंसाबरोबरच तप्त राख व विषारी वायूंचा परिणाम म्हणून बेटावरील हजारो लोक मृत्युमुखी पडलेच, शिवाय त्याचा प्रभाव हवामानातील बदलांच्या रूपात जगभर पाहायला मिळाला. या दोन प्रचंड उद्रेकांनाही लहान ठरविणारा उद्रेक १८१५ साली इंडोनेशियामध्ये झाला. तो होता तंबोरा ज्वालामुखीचा. या उद्रेकात तब्बल ५० घनकिलोमीटर इतकी प्रचंड प्रमाणात राख बाहेर पडली. त्यापैकी काही राख उद्रेकानंतर लगेचच या चार किलोमीटर उंचीच्या ज्वालामुखीवरून वेगाने खाली उतरली. त्या तप्त राखेत दहा हजारांहून अधिक लोकांचा मृत्यू झाला. अलीकडच्या काळातील हवामानावर सर्वात मोठा परिणाम करणारा हा उद्रेक ठरला, कारण त्यातून बाहेर पडलेल्या राखेमुळे जागतिक तापमान तब्बल ०.४ ते ०.७ अंश सेल्सिअसने कमी झालेच पण त्याहून मोठा परिणाम म्हणजे या उद्रेकानंतरच्या वर्षी उत्तर गोलार्धातील बऱ्याचशा प्रदेशात (अमेरिका व युरोपसह) उन्हाळा पडलाच नाही. ते वर्ष उन्हाळ्याविनाच गेले.
या उद्रेकांची आणि त्यांच्या प्रचंड स्वरूपाची ओळख करून घेतल्यावर आता टोबाच्या उद्रेकांची माहिती पचविणे सोपे जाईल. कारण आतापर्यंत वाचलेले वर्णन अगदीच फिके ठरावे असाच टोबाचा इतिहास आहे. माऊंट टोबा हासुद्धा इंडोनेशियाच्या सुमात्रा बेटावरील ज्वालामुखी; बराच काळ निद्रिस्त अवस्थेत असणारा, पण जागा झाला की संपूर्ण पृथ्वीवर आपली छाप सोडणारा! कारण आतापर्यंतच्या ज्ञात इतिहासात टोबाचे एकूण चार प्रचंड उद्रेक झाले आहेत. त्या सर्वच्या सर्व उद्रेकांच्या खाणाखुणा आजही जागोजागी अस्तित्वात आहेत; केवळ इंडोनेशिया किंवा जवळच्या परिसरात नव्हे, तर त्या जगभर विखुरलेल्या आहेत. त्याच्या खुणा म्हणजे त्यातून बाहेर पडलेली प्रचंड प्रमाणातील राख ठिकठिकाणी साठून राहिली आहे. त्याच्या चार प्रमुख उद्रेकांपैकी सर्वात जुना म्हणजे- १२ लाख वर्षांपूर्वीचा. त्यापाठोपाठ आठ लाख, पाच लाख आणि सर्वात अलीकडचा ७४ हजार इतक्या वर्षांपूर्वी त्याचे उद्रेक झाले. या उद्रेकांचे प्रमाण कमालीचे प्रचंड असल्याने हवामानावर त्याचा प्रचंड परिणाम झालाच, शिवाय हा काळ अर्वाचीन माणसाच्या विकासासाठी महत्त्वाचा असल्याने त्याच्यावरही या बदलांचा खूप मोठा परिणाम झाला. इतका की काही तज्ज्ञांच्या मते तर सर्वात अलीकडच्या काळातील म्हणजे ७४ हजार वर्षांपूर्वीच्या उद्रेकामुळे झालेल्या बदलांमुळे संपूर्ण माणूस जात नष्ट होण्याच्या मार्गावर होती. याबाबत अनेक अभ्यासकांचे अनेक मतप्रवाह आहेत. मात्र, त्या उद्रेकाचे प्रचंड स्वरूप तसेच, त्याचे हवामानावर आणि माणसावर झालेले परिणाम याबाबत कोणाचेही दुमत नाही.
टोबाची महाआपत्ती
‘टोबा महाआपत्ती सिद्धांता’नुसार साधारणत: ७४ हजार वर्षांपूर्वी झालेला टोबाचा उद्रेक हा पृथ्वीवरील आतापर्यंतच्या माहीत असलेल्या उद्रेकांपैकी सर्वात भीषण मानला जातो. हा एक ज्वालामुखी नव्हता, तर ते अनेक ज्वालामुखींचे सुमारे १०० किलोमीटर बाय ३५ किलोमीटर आकाराचे विस्तृत असे केंद्र असल्याचे समजले जाते. त्यातून तब्बल २००० ते ३००० घन किलोमीटर इतक्या प्रचंड प्रमाणातून लाव्हारस, खडक, राख, अनेक वायू असे पदार्थ बाहेर पडले. त्यापैकी राखेचे व वायूंचे प्रमाण तब्बल ८०० ते १००० घन किलोमीटर इतके होते. अलीकडच्या काळातील तंबोरा ज्वालामुखीच्या उद्रेकाशी तुलना केली, तर ही राख १६ ते २० पटीने जास्त होती. तंबोरामुळे एक वर्ष उन्हाळा पडला नाही, तर टोबामुळे काय झाले असेल? टोबामुळे तेच घडले- या उद्रेकामुळे पृथ्वीभोवती जणू या राखेचे आवरणच निर्माण झाले होते. त्यामुळे सूर्यप्रकाश अडून जगभर सलग सहा ते दहा वर्षे हिवाळाच अनुभवायला मिळाला. एवढय़ावर भागले नाही, तर त्यानंतरच्या एक हजार वर्षांहून अधिक काळासाठी पृथ्वीवर छोटे हिमयुग अवतरले होते. काहींच्या मते वातावरणाचे तापमान तीन-साडेतीन अंशांनी कमी झाले होते. जगाचे तापमान एका झटक्यात इतके कमी होणे ही अनोखी आणि अपवादात्मकच घटना! काही अभ्यासकांच्या मते तर तापमानातील घट तब्बल १५ अंश इतकी जास्त होती. या सर्व घडामोडींचा परिणाम संपूर्ण जीवसृष्टीवर झाला तसाच तो माणसाच्या पूर्वजांवरही झाला. या काळात माणसाची लोकसंख्या इतकी कमी झाली की मनुष्य जात नष्ट होण्याच्या काठावर येऊन पोहोचली होती. त्या वेळी जगातील माणसांची संख्या केवळ १० हजारांच्या आसपास उरली होती आणि प्रजननक्षम जोडप्यांची संख्या तर एक हजारापर्यंत झाली आली होती, असे काही अभ्यासक मानतात. माणसाच्या इतिहासात हा काळ ‘पॉप्युलेशन बॉटलनेक’ म्हणून ओळखला जातो. (अर्थात, याबाबत सर्व अभ्यासकांचे एकमत नाही.) या आपत्तीतून तावून-सुलाखून निघाल्यावर मात्र पुढच्या काळात माणसांची संख्या झपाटय़ाने वाढत गेली. टोबाच्या उद्रेकाचा परिणाम म्हणून माणसाच्या पूर्वजांमध्ये असलेली वांशिक विविधता नष्ट झाल्याचेही काही तज्ज्ञ मानतात. या उद्रेकात असे काही गट नामशेष झाल्याचे त्यांच्याकडून सांगितले जाते. पण या सिद्धांताबाबतही अभ्यासकांचे एकमत नाही.
टोबाच्या उद्रेकाचा सर्वाधिक प्रभाव आशिया खंडात, मुख्यत: भारतीय उपखंडात पडल्याचे मानले जाते. त्यातून बाहेर पडलेल्या राखेचे सुमारे अर्धा-अर्धा फूट जाडीचे थर आजही भारतीय उपखंडात अनेक ठिकाणी तसेच, हिंदी महासागर, बंगालचा उपसागर, अरबी समुद्र, चीनचा समुद्र येथे ठळकपणे पाहायला मिळतात.
टोबा आणि भारत
याचा अर्थ काही अभ्यासकांनी असा लावला, की या काळात भारतीय उपखंडातील व एकूणच या भागातील माणसाचा वंश नष्ट झाला आणि त्यानंतर तो हिमयुगाच्या काळात (विशेषत: आफ्रिका-युरोपमार्गे) ठिकठिकाणी पोहोचला. बऱ्याच पाश्चात्त्य अभ्यासकांनी हा सिद्धांत उचलून धरला होता. त्यामुळे टोबा हा विषय केवळ भूशास्त्र-पर्यावरण यापुरता मर्यादित राहिलेला नाही तर तो विविध प्रदेशांच्या अस्मितांच्या दृष्टीनेही अभ्यासाचा भाग बनला आहे. अलीकडच्या काळातील टोबाच्या अभ्यासावरून मात्र हा पाश्चात्त्यांचा सिद्धांत टिकणारा नसल्याचे दिसून आले. हा निव्वळ खोडसाळपणा आणि प्रसिद्धी मिळविण्यासाठी केलेला फार्स असल्याचे अनेक भारतीय तज्ज्ञ सांगतात. कारण या म्हणण्याला पुरावेच नव्हते, तरीही तो पुढे रेटण्यात आला होता. आता हेच तज्ज्ञ आपला सिद्धांत खोटा असल्याचे सांगून पुन्हा प्रसिद्धी मिळवत आहेत.
टोबासारख्या उद्रेकांचा आणखी एक फायदा म्हणजे त्यामुळे आदीमानवाशी संबंधित अनेक पुरातत्त्वीय ठिकाणांचा काळ ठरविणे शक्य झाले आहे. एकतर ज्वालामुखीची राख जमा झाल्याने ही ठिकाणे व तेथील साहित्य त्या राखेखाली आहे तसे टिकून राहते. शिवाय किरणोत्सारी पद्धत वापरून राखेचा कालखंड काढता येतो त्यामुळे आदीमानवाशी संबंधित असलेल्या त्या ठिकाणांचाही काळ सांगता येतो. त्यामुळेच केवळ भूशास्त्रज्ञांच्या दृष्टीनेच नव्हे, तर पुरातत्त्वाच्या अभ्यासकांसाठीसुद्धा टोबा किंवा असे ज्वालामुखीचे उद्रेक तितकेच उपयुक्त ठरत आहेत. भारतातही महाराष्ट्र, मध्य भारत व दक्षिण भारतात अनेक ठिकाणी अशी राख व आदीमानवाशी संबंधित ठिकाणे आढळतात. पुण्यातील डेक्कन कॉलेज किंवा इतर संशोधक संस्थांकडून त्याचा अभ्यास सुरू आहे. भारतात महाराष्ट्रातील बोरी, मोरगाव तसेच आंध्र प्रदेशातील ज्वालापूरम या ठिकाणच्या अभ्यासात आढळलेली एक बाब म्हणजे- या राखेच्या थराखाली व वरसुद्धा आदीमानवाची एकाच प्रकारची हत्यारे मिळाली आहेत. याचा अर्थ ज्वालामुखीच्या उद्रेकांच्या आघाताचा माणसावर परिणाम झाला असला, तरी या धक्क्य़ातून येथे तरी तो सावरला असल्याचे पाहायला मिळते. डेक्कन कॉलेजचा अभ्यासही त्याला दुजोरा देतो. केंब्रिज विद्यापीठातर्फे आधी वेगळाच सिद्धांत मांडला जात होता- टोबाच्या उद्रेकामुळे भारतातील माणूस नष्ट झाल्यामुळे त्यानंतर बाहेरून माणूस येथे स्थलांतरित झाला. पण अलीकडे भारतातील टोबाच्या राखेचा व पुरातत्त्वीय ठिकाणांच्या अभ्यासावरून हे तज्ज्ञसुद्धा, असे स्थलांतरण झाले नसल्याच्या निष्कर्षांपर्यंत पोहोचले आहेत.. याबाबत वेगवेगळ्या अभ्यासकांचे वेगवेगळे सिद्धांत असले, तरी टोबाच्या उद्रेकांनी जगात उलथापालथ केल्याचे सर्व जण मान्य करतात.
..टोबा व एकूणच ज्वालामुखींच्या उद्रेकांचा विचार करता भविष्यात त्यांच्याकडून कोणती उलथापालथ घडवून आणली जाईल, हे नेमकेपणाने सांगता येणार नाही. मात्र, असे उद्रेक होत राहणार, हे निश्चित! हे कधी घडणार हाच कळीचा प्रश्न आहे. या प्रचंड उद्रेकांच्या राखेमुळे भविष्यात वातावरणाचे तापमान कमी होऊन कदाचित काही काळासाठी ग्लोबल वॉर्मिगला आळा बसेल. पण  असे उद्रेक माणसाच्या विकासावर व प्रगतीवर परिणाम करतील की आणखी काही परिणाम घडवून आणतील हे येणारा काळच सांगेल.
टोबाच्या उद्रेकांनी भूतकाळातील अनेक रहस्ये उलगडून दाखवली आहेत. त्याचबरोबर निसर्गाच्या रौद्र रूपाचे दर्शन घडवून निसर्गाबद्दलच्या आपल्या गोंडस कल्पनांना छेदही दिला आहे. त्यामुळे पचायला कितीही जड असले, तरी निसर्गातील नियमिततेबरोबरच त्याच्या अनिश्चिततेचे वास्तवसुद्धा स्वीकारावेच लागेल. नाहीतर आपल्याला संपूर्ण निसर्ग समजला असे म्हणता येणार नाही.. निसर्गात सर्व काही चांगलेच घडते असे नाही. तर अनिश्चितता, विध्वंस, रौद्रता हेसुद्धा त्याचे अविभाज्य भाग आहेत. त्यावर मात करून टिकून राहणे हेच काय ते आपल्याला करावे लागणार आहे.

महाराष्ट्रातील राखेचे गूढ
महाराष्ट्रात मोरगाव व बोरी येथे आढळणाऱ्या टोबाच्या राखेच्या काळाबाबत गूढ कायम आहे. सर्वसाधारणपणे अभ्यासक या राखेचा संबंध टोबा ज्वालामुखीच्या सर्वात अलीकडच्या (७४ हजार वर्षांपूर्वीच्या) उद्रेकाशी जोडतात. मात्र, पुण्यातील डेक्कन कॉलेजच्या डॉ. शीला मिश्रा व त्यांच्या सहकाऱ्यांनी प्राचीन चुंबकत्वाचे तत्त्व आणि पुरातत्त्वीय हत्यारांचा अभ्यास केला आहे, त्यावरून या राखेचा काळ बराच मागे जातो. बोरी येथील राखेचा काळ आठ लाख वर्षांच्या मागे जातो, तर मोरगाव येथील राखेचा काळ १२ लाख वर्षांचा असल्याचे त्यावरून दिसते. मात्र, इतर आणखी पुरावे तपासून हा काळ निश्चित करावा लागेल, असे डॉ. मिश्रा यांनी सांगितले.

अभिजित घोरपडे

साभार लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=64932:2010-04-24-15-46-50&catid=55:2009-07-20-04-00-45&Itemid=13

से नो टू सीओटू

गेल्या काही काळात ‘ग्लोबत वॉर्मिग’ हा सगळ्यांच्याच चर्चेचा विषय झाला आहे. अगदी नाक्यापासून ते लोकसभेपर्यंत या ग्लोबल वॉर्मिगची अगदी तावातावाने चर्चा झाली. तरीसुद्धा ग्लोबल वॉर्मिगचा आणि आपला संबंधच काय, अशा अविर्भावात सामान्य माणूस वावरताना आपल्याला दिसतो. पंरतु, नेमक्या स्थानिक पातळीवरच ग्लोबल वॉर्मिगविषयक काम झाले पाहिजे हे हेरून याच क्षेत्रात काम करणाऱ्या काही तरूण मंडळींनी तज्ज्ञ मार्गदर्शकांच्या सहाय्याने एक अनोखा प्रकल्प हाती घेतला आहे. ‘नो टू सीओटू’ असे या मोहिमेचे नाव आहे.
ग्लोबल वॉर्मिगला आपणच प्रत्यक्षरित्या कसे कारणीभूत आहोत, हे सर्वसामान्यांना पटवून देण्यासाठी त्यांनी एक मोहीम हाती घेतली आहे. याद्वारे लोकांना ते त्यांच्या दैनंदिन दिनचर्येतून ग्लोबल वॉर्मिग होण्यास कसा हतभार लावत आहेत याची संपूर्ण आकडेवारी उपलब्ध करून देण्यात येत आहे. आपल्या प्रत्येक व्यक्ती कार्बन उत्सर्जित करत असते, जे ग्लोबल वॉर्मिग होण्यास कारणीभूत असते. ‘नो टू सीओटू’ या मोहिमेअंतर्गत या तरूणांनी प्रत्येक व्यक्ती किती प्रमाणात कार्बन उत्सर्जित करते याचे मोजमाप करणारा आराखडा तयार केला आहे. हा आराखडा संपूर्णपणे शास्त्रीयदृष्टय़ा तयार करण्यात आला असून २००६ च्या आयपीसीसीच्या निर्देशांना प्रमाण मानून तो तयार करण्यात आला आहे. आपण कुठे राहतो, काय खातो, कसा, किती आणि कुठे प्रवास करतो, किती ऊर्जा वापरतो असे अनेक निकष हा आराखडा तयार करण्यासाठी वापरण्यात आले आहेत. यात काही सरळसोप्या प्रश्नांची उत्तरे देऊन ग्लोबल वॉर्मिग वाढण्यास आपण कसा हातभार लावतो हे जाणून घेऊ शकतो.
हा आराखडा तयार करण्यासाठी आयआयएम अहमदाबादचे प्राध्यापक आणि अमित गर्ग व मुरली श्रीनिवास अशा तज्ज्ञांचे मार्गदर्शन लाभले आहे. तसेच विवेक गिलानी, जोया चक्रवर्ती, गौतम सिखनीस, सौरीन देसाई आणि सविता विजयकुमार ही तरुण मंडळीदेखील या प्रकल्पासाठी मेहनत घेत आहेत. http://www.no2co2.in/ या संकेतस्थळावर ही प्रश्नावली व आराखडा उपलब्ध करण्यात आला असून त्याद्वारे लोकांना जागृत करण्याचे आव्हान त्यांनी पेलले आहे. फक्त प्रतीव्यक्ती कार्बन उत्सर्जनाचे प्रमाण माहिती करून देणे इतकेच या प्रकल्पाचे वैशिष्टय़ नसून ‘रिअलाइज, मिनिमाइज, न्यूट्रलाइज’ या त्रिसूत्रीवर हा उपक्रम आधारलेला आहे. या मोहिमेद्वारे लोकांना कमीतकमी कार्बन उत्सर्जन व्हावे यासाठी मार्गदर्शनसुद्धा करण्यात येत आहे. सध्या गाजत असलेल्या आयपीएल सामन्यांमध्येदेखील ही मंडळी हे कार्बन उत्सर्जनाचे प्रमाण मोजत आहेत. तसेच ब्लू फ्रॉग, बिबो वॉटर, आयआयएम अहमदाबाद अशा अनेक मोठय़ा संस्था  ‘नो टू सीओटू’ उपक्रम यशस्वी करण्यासाठी पुढे आल्या आहेत.

अमेय गिरोल्ला

साभार लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=64071:2010-04-21-14-54-49&catid=41:2009-07-15-03-58-17&Itemid=81

Five Ways You Can Help Save Life On Earth !

Forty years ago we were living in a different world. Ohio’s Cuyahoga River had recently caught fire, nuclear testing had dispersed radioactive material across the West, California was reeling from a massive oil spill, Americans sputtered about their endless highways spewing leaded fumes as the country continued on a post-World War II path bent on industrializing food and farming while growing industry at all cost — pollution and chemicals be damned.

Michigan Senator Gaylord Nelson, with the help of young organizer Denis Hayes, is credited with lighting the fuse of the modern environmental era on April 22, 1970 with the first Earth Day — an event that garnered the support of an incredible 20 million Americans across the country.

Many Republicans and Democrats alike got on board. Government responded in the next few years by creating the Environmental Protection Agency and passing the Clean Air Act, the Clean Water Act, the Endangered Species Act, the Safe Drinking Water Act, and the Toxic Substances Control Act, to name a few.

Yet, four decades later, we’re still staring down the barrel of environmental catastrophe. Many of those same pieces of legislation have been whittled away, and although we’ve made massive gains in many areas we are still faced with a global climate crisis, along with food and water systems that are being pushed to the brink, and are downright failing in many places. In a recent story, Denis Hayes recollects the first Earth Day and credits the event with embracing all people who are trying to help the planet — in any way big or small. But, Hayes says, we need to do more. The time has come for more radical action.

So what can we do? Here’s five good ideas that industrious greens in our mix are already working on — will you join in?

1. A Clean Water Trust Fund

Most people living in the U.S. are fortunate to have clean and safe drinking water available at their tap at a very low cost. We turn on the water and it comes out, we don’t have to think about where that water comes from. But what many people don’t know is that our water systems are on the verge of collapse. Lurking beneath our streets are 1.5 million miles of aging pipes. Food and Water Watch reports that U.S. cities have 250,000 to 300,000 water main breaks a year and we lose one-fifth of our water through leaks and contaminate our waterways with 1.2 trillion gallons of wastewater annually.

The price tag for fixing all this is going to be big. The EPA estimates that we have a potential funding gap of $150-400 billion between projected needs and current levels of spending over the next 10 years. The New York Times reported that, “There are 16,000 publicly owned wastewater treatment plants in the United States that operate 100,000 major pumping stations, 600,000 miles of sanitary sewers and 200,000 miles of storm sewers, according to U.S. EPA. That system received a grade of D- from the American Society of Civil Engineers in its latest ‘Report Card for America’s Infrastructure.'”

One of the reasons for this is a drop in federal funding in the last few decades. In 1978, 78 percent of money for new water infrastructure projects came from the federal government, but by 2007 that number had fallen to 3 percent. Additionally the Clean Water State Revolving Fund, which many communities have relied on to help keep their water clean, has also been slashed. The federal government cut spending on this program by 66 percent from 1991 to 2007.

To counter this imbalance, water advocates have been calling for the creation of federal trust for clean water — similar to what already exists for highways and airports — and what has been created at the state level with North Carolina’s Clean Water Management Trust Fund.

Ken Kirk, executive director of the National Association of Clean Water Agencies (NACWA) said, “Communities currently bear 95 percent of the cost of clean water, and ratepayers will continue to see increases unless they see some financial assistance from the federal government to help them fill this gap. A clean water trust fund, financed broadly by fees potentially on such things as bottled beverages, flushable products, pesticides and agricultural chemicals, and pharmaceuticals will help cities cover the staggering cost of meeting their water quality objectives.”

The Government Accountability Office recently released a report looking into the various funding strategies and how it could be structured and NACWA, along with other advocates like Food and Water Watch, is calling on Congress to create legislation for a clean water trust fund.

2. Eating for the Planet

Judging from the reception of Anna Lappe’s new book, Diet for a Hot Planet: The Climate Crisis at the End of Your Fork and What You Can Do About It, we are more than ready to shift our consciousness when it comes to eating. Diet for a Hot Planet outlines how we can transform our diets for a sustainable planet and prevent climate change.

“A key part of the core message is that it matters how your food was made,” said Lappe in an interview with AlterNet’s Jill Richardson. “The less processed the foods are, of course, the less energy used to produce it. And meat, particularly that raised in factory farms is many times more carbon-intensive than produce and vegetarian sources of protein. A Cornell study found that meeting the annual dietary needs of a typical meateater in New York State requires nearly five times as much farmland as that of a plant-centered eater.”

Eating lower on the food chain, eating local, knowing your farmer, skipping processed food, and buying products with minimal (or no) packaging are all helpful. Of course, we can’t stop the freight train of global warming simply with personal choices.

“What we’re talking about when we talk about the food and climate crisis is a system-wide failure,” said Lappe. “System-wide failures need collective actions to fix them.” This means greening our food infrastructure and changing our economic structure that supports agribusiness over sustainable agriculture. “We wouldn’t expect individuals to personally excavate subway tunnels, purchase a fleet of fuel-efficient buses, or lay down tracks for high-speed rail,” she said. “Similarly, we shouldn’t expect individuals to fix our broken food infrastructure on their own. We need public investment in climate-friendly food that makes choosing locally raised, organically grown, fresh whole foods as easy as grabbing a Big Mac, fries and shake at the drive-thru.”

Farm Sanctuary is one organization putting this idea into practice. Its Green Foods Campaign helps people reach out to their local governments to introduce resolutions to deal with the environmental and health impacts of the food we eat. “A Green Foods Resolution is a city or town council resolution designed to counteract the health threats, animal cruelty and massive environmental damage caused by animal agriculture by calling on citizens to eat lower on the food chain,” the organization explains. “This forward-thinking legislation enables cities to take responsibility for their carbon ‘foodprint’ by encouraging greater access to nutritious plant-based foods, supporting local farmers markets and community gardens, and educating citizens about the health and environmental benefits of consuming more plant-based foods.”

3. The Limits of Growth

Annie Leonard’s hit Internet film and book, The Story of Stuff, helped to popularize research about overconsumption. And the recent book Eaarth: Making a Life on a Tough New Planet by Bill McKibben drives the point home even further. For decades people have been talking about the threat of overpopulation — can our planet support so many people? When do we hit the breaking point? But in recent years, the mainstream discussion has been expanded to include the ever-pertinent addendum to the questions of population — is the problem the number of people we have or how much we are consuming? How do we know when we’ve hit the limits of growth? Can we and should we stop?

President Obama, McKibben writes, said, “It’s going to be an impossible task to balance our budget or even approximate it if we are boosting our growth rates.” But far more troubling, McKibben contends, is our mounting ecological debt: “Growth is what we do. Who ever really dreamed it might come to an end.”

But, faced with collapse, what are our options? There is another possibility, that “We might chose instead to manage our descent,” he explains. “That we might aim for a relatively graceful decline. That instead of trying to fly the plane higher when the engines start to fail, or just letting it crash into the nearest block of apartments, we might start looking around for a smooth stretch of river to put it down in.”

McKibben eloquently explains how “bigness” spells trouble and what we can begin to do to counter it — an idea that is also afoot elsewhere.

Filmmaker Dave Gardner will soon be releasing the documentary, Hooked on Growth: Our Misguided Quest for Prosperity, which takes on this critical question and offers an antidote for how we can become more sustainable. Already, the growth-centric ideas are being challenged on different levels with projects addressing Slow Food, Slow Money, Slow Design and the like, with communities teaming up to declare that less is more.

4. Put Your Money Where Your Mouth Is

Thinking small works well when it comes to finance, too. In recent years, people have been embracing the idea of microloans — small investments, sometimes as little as $20, that can go a long way in helping people in some of the poorest parts of the world. One company leading the way is Oikocredit, which helps provide financing to trade cooperatives, fair trade organizations and small-to-medium enterprises in the developing world.

“As one of the world’s oldest and largest international microfinance organizations, Oikocredit currently reaches 19 million poor entrepreneurs in over 70 countries with small loans that help them escape poverty,” explained Terry Provance, executive director of Oikocredit’s U.S. office. “Oikocredit is also one of just a few microfinance organizations with transparency and environmental clauses, and supports fair trade cooperatives in 70 countries. Last year, Oikocredit USA — the U.S. operation for Oikocredit International — received over $4 million from U.S. investors.”

When it comes to the environment, microfinance may be able to play a significant role. “With roughly 3.5 billion people around the world living on less than $2 a day, it is impossible for the poor to escape the cascading effects of climate change such as increasing mosquito populations and malaria, and droughts that make growing food unfeasible. Microfinance–small loans to the world’s working poor–is one proven method for giving working entrepreneurs the tools they need to adapt to these changes, and to engage in sustainable practices to help minimize their impact on the environment,” said Provance. “For instance, the loans allow the poor to build assets and invest in sustainable business practices that protect the environment versus exploiting it for immediate and desperate gain, such as slash and burn farming or using water-needy pesticides to grow food. The ability of microfinance to positively impact the environment increases as more people are lifted from poverty, and can provide a sturdy future for themselves.”

5. A Clean Energy Future

On April 21, the Department of Energy announced it had awarded $452 million in federal grants to 25 cities and states to help with programs to create clean energy jobs. Proponents of clean energy are fighting for funding as a new climate bill is poised to hand away many millions more to nuclear and coal initiatives. Nowhere is the battle between clean and dirty energy as visible as in Appalachia — where Big Coal reigns and the destructive practice of mountaintop removal (MTR) mining is blowing up whole ecosystems and destroying the communities around them.

But folks there have a vision for a different, cleaner future, in which the jobs are better and safer, too. Coal River Mountain is on the chopping block — facing annihilation from a mountaintop removal mining operation run by Massey Energy (you may have heard Massey’s name in the news lately after the deaths of 29 miners). But instead of seeing another mountain destroyed, locals have come up with a plan, and a damn good one, to cover those mountain ridges with wind farms.

“Set aside for a moment the many health and social ills of MTR–the toxic drainages, the dusty air, the undrinkable tap water–and still the economic argument alone for Coal River Wind is compelling,” wrote Ben Jervey for GOOD. He explains:

A 2007 wind potential study found capacity for 328 megawatts of clean energy on Coal River Mountain, enough to power 70,000 West Virginian homes. The revenue would produce $1.7 million in property taxes that would benefit the local communities. That’s over 50 times the $36,000-per-year that coal mining would generate in severance taxes, and the wind money wouldn’t dry up when the coal runs out in an estimated 14 years. (The coal revenue itself flows immediately out of state.) A wind farm would also create at least 50 permanent jobs that also last long after the coal would disappear. Again, this isn’t even to mention the external costs of public health and environmental quality.

One economic study found that by factoring in such externalities–health expenses, environmental cleanup costs and lost resources from tourism and ginseng harvesting–the Massey mines would wind up costing the community $600 million over their brief lifespans. Coal River Wind has the potential to rewrite the economics of mountaintop removal.

Faced with the enormity of our climate and energy problems, can replacing one coal mine with one wind farm make a dent in our quest for a more sustainable future? Of course! It makes a difference in the same way that investing $100 can change a family’s life; in the same way that personally knowing your farmer makes a difference in your health and the health of your community; in the same way that starting one teach-in on the environment in 1970 drew 20 million people and awakened a country’s consciousness.

So where will we be 40 years from now? Which road do we choose? How many people can we get to join us on that path?

By Tara Lohan

http://www.countercurrents.org/lohan220410.htm

Earth Day !

Concerns

Concerns

“. . . on April 22, 1970, Earth Day was held, one of the most
remarkable happenings in the history of democracy. . . ”

-American Heritage Magazine, October 1993

Act Now

How the First Earth Day Came…

What was the purpose of Earth Day? How did it start?

Actually, the idea for Earth Day evolved over a period of seven years starting in 1962. For several years, it had been troubling me that the state of our environment was simply a non-issue in the politics of the country. Finally, in November 1962, an idea occurred to me that was, I thought, a virtual cinch to put the environment into the political “limelight” once and for all. The idea was to persuade President Kennedy to give visibility to this issue by going on a national conservation tour. I flew to Washington to discuss the proposal with Attorney General Robert Kennedy, who liked the idea. So did the President. The President began his five-day, eleven-state conservation tour in September 1963. For many reasons the tour did not succeed in putting the issue onto the national political agenda. However, it was the germ of the idea that ultimately flowered into Earth Day.

I continued to speak on environmental issues to a variety of audiences in some twenty-five states. All across the country, evidence of environmental degradation was appearing everywhere, and everyone noticed except the political establishment. The environmental issue simply was not to be found on the nation’s political agenda. The people were concerned, but the politicians were not.

After President Kennedy’s tour, I still hoped for some idea that would thrust the environment into the political mainstream. Six years would pass before the idea that became Earth Day occurred to me while on a conservation speaking tour out West in the summer of 1969. At the time, anti-Vietnam War demonstrations, called “teach-ins,” had spread to college campuses all across the nation. Suddenly, the idea occurred to me – why not organize a huge grassroots protest over what was happening to our environment?

I was satisfied that if we could tap into the environmental concerns of the general public and infuse the student anti-war energy into the environmental cause, we could generate a demonstration that would force this issue onto the political agenda. It was a big gamble, but worth a try.

At a conference in Seattle in September 1969, I announced that in the spring of 1970 there would be a nationwide grassroots demonstration on behalf of the environment and invited everyone to participate. The wire services carried the story from coast to coast. The response was electric. It took off like gangbusters. Telegrams, letters, and telephone inquiries poured in from all across the country. The American people finally had a forum to express its concern about what was happening to the land, rivers, lakes, and air – and they did so with spectacular exuberance. For the next four months, two members of my Senate staff, Linda Billings and John Heritage, managed Earth Day affairs out of my Senate office.

Five months before Earth Day, on Sunday, November 30, 1969, The New York Times carried a lengthy article by Gladwin Hill reporting on the astonishing proliferation of environmental events:

“Rising concern about the environmental crisis is sweeping the nation’s campuses with an intensity that may be on its way to eclipsing student discontent over the war in Vietnam…a national day of observance of environmental problems…is being planned for next spring…when a nationwide environmental ‘teach-in’…coordinated from the office of Senator Gaylord Nelson is planned….”

It was obvious that we were headed for a spectacular success on Earth Day. It was also obvious that grassroots activities had ballooned beyond the capacity of my U.S. Senate office staff to keep up with the telephone calls, paper work, inquiries, etc. In mid-January, three months before Earth Day, John Gardner, Founder of Common Cause, provided temporary space for a Washington, D.C. headquarters. I staffed the office with college students and selected Denis Hayes as coordinator of activities.

Earth Day worked because of the spontaneous response at the grassroots level. We had neither the time nor resources to organize 20 million demonstrators and the thousands of schools and local communities that participated. That was the remarkable thing about Earth Day. It organized itself.

By Senator Gaylord Nelson, Founder of Earth Day

http://earthday.envirolink.org/history.html

Bullets are not the answer to development !

The massacre of 76 policemen in Dantewada by naxalites is reprehensible. Yet we cannot brush aside the underlying poverty, deprivation and sheer lack of justice that are breeding tension and anger in vast areas of rural, tribal India. We cannot say that these developmental issues are long term—as the Congress spokesperson has reportedly said—while the immediate task is to annihilate the Naxalites. Because, unless we can fix what is broken here, let us be very clear, there is no real solution at hand.

I have written earlier about the devastating irony that vast parts of our country, that are the richest in terms of minerals, forests and water, are also where the poorest people live. Again I ask, again and again: what is wrong with our development model that the poorest people live in the richest lands of the country?

We know naxalites profit from the anger against the collective loot of the resources these lands possess. These are the lands we get minerals from; the electricity that lights our homes is enabled here. But the people who live there have no electricity. They should own the minerals, or forests; they should profit from development. But they get no benefit from the resources that are simply extracted. By policy and design, their lands are taken away, their forest cut, water polluted, their livelihoods destroyed. Development makes them poorer than they were.

But we want to hear none of this. A few years ago, in Raipur, Chhattisgarh, while releasing our detailed report on mining and environment, I saw how intolerant we have become. The state’s governor was to release the report. But even before we arrived, there was a media buzz our critique of mining policies and practices meant we were partners with naxalites. At the release function, the room was “filled” with mining-at-all-cost supporters. They shouted down any voice that spoke of the problems, and poverty, mining had caused in the region. The governor was visibly in a bind. He could not deny our data and analysis. But he was also desperate to brand us as insurgents who raise uncomfortable issues.

The next day, the machinery whirred into action. It openly challenged us. It presented no data on how it had shared revenues of mining with people. It did not explain how it had controlled the enormous and deadly pollution from the sponge iron factories that encircled the region. It did not also explain why it was allowing open manipulation and misuse of laws to dispossess people from their lands, against their will. It only incited violence against us, saying since we had questioned mining policies and were seeking new answers, we were against development. The next step: we were against the state, so we were with naxalites. With us or against us. This is a Bush slogan, but also a war syndrome, which cannot buy us peace at any cost.

We have to rethink the development India has practised so far. Let’s just think forests. These are the very lands where India’s tree wealth exists. Some 60 per cent of the country’s dense and most bio-diverse and economically rich forests are in these tribal districts. Think minerals now. The bulk of what we need for growth—iron ore for steel, bauxite for aluminium and coal for power stations—is located here. These are also the same districts—poor and backward—our beloved tigers roam in. Here’s where the country’s major watersheds are located.

How can we build a growth model which uses the wealth of the region for local development first? Such a development model would mean listening to people who live on these lands, about what they need and want for their growth. It means seceding to what people want: the right to decide if they want a mine in their backyard, or the forests cut. It means taking democracy very seriously.

If this is accepted, protests will have to be seen in a new light. There are no misguided people, or naxalites, holding up Vedanta in Orissa, or Tata in Chhattisgarh. These many, and there are many, mutinies will have to be carefully heard. This country cannot brush aside people’s concerns, in the name of a ‘considered’ decision taken, in Delhi or somewhere else. Government must stop believing it knows what is best.

Once we accept local veto over development decisions, the tough part begins. For, this means seriously engaging with people to find ways that benefit all. It means sharing revenue from minerals with villagers, not the poisoned peanuts they get now. It means changing priorities: valuing, for instance, a standing forest as protector of water, wildlife, even a low-carbon future. It means paying directly to local communities so that they decide to protect forests, because it benefits them.

Ultimately, listening to dissenters means reinventing development. Accept we cannot mine all the coal, bauxite, iron ore—whatever—that lies below forests people live in, and depend on. It will make us get careful about how to use less minerals for more growth? Can India do more with less? There’s a lesson India’s poor teach: walk lightly on the earth you have. Let us not riddle them with bullets.

by Sunita Narain

http://www.downtoearth.org.in/editor.asp?foldername=20100430&filename=Editor&sec_id=2&sid=1

We Are The People Of India Too !

On March 9 2010, activist Himanshu Kumar gave a talk in Kolkata at a public meeting organised by Ekhon Bisanbad, speaking about his experiences in Dantewada over 18 years, and about the ongoing “Operation Green Hunt” being conducted to ostensibly root out left wing extremists. The following is his speech, transcribed and edited by Sanhati members Ishita Das and Suvarup Saha.

Hi , I am Himanshu. I have been living to Dantewada since the past 18 years. For the last 3 months I have been out of Dantewada.

I went there with my wife in 1992. When we got our independence, Gandhiji had said that if we really want an India to progress in the future, considering that in a democracy the powerful lobbies can control all resources and prosperity, we need to foster growth in every village, for only then can there be an equal distribution of wealth or resources. Our youth should go and live in villages and help achieve that development, or else this nation will end up being ruled by hooligans.

My wife and I went to Dantewada trying to follow his guideline. My father had worked with Gandhiji before, he had set fire to the station in Muzzaffarpur (which is where we are from) in 1942 and absconded. He had then corresponded with Gandhiji and who invited him over to Sevagram, where he lived till 1946. He had also participated in the Bhoo Daan movement led by Vinobha Bhave. So working for the true development of the country runs in the family. That was inspiration enough for us to go and live with the adivasis.

What we found there, talking to the adivasis, bewildered us. The adivasis were in dire straits. They didn’t know what country it was that they were a part of. Didn’t know its name or of its existence. It looked to us that the British occupation had never reached them, they had continued to live in their own world right through the period of colonization of our country. Then we had got our independence, set up our government and unilaterally declared that the adivasis were now Indians to be governed by people who were as ignorant about them as the adivasis were about the government.

The only way our government actually reached them, was as police. To take away their land. I remember now, there is a village called Dhulli, where Essar wants to install a steel plant. We have a law in the Bakhtar area, which is a scheduled area, where in case there is any work to be done by outsiders to the village – you need to occupy a piece of land or anything – the adivasi gram-sabha makes the decision. But the gram-sabha turned out to be CRPF patrolling in front of every house. Villagers couldn’t even go to bring water for their children. If they ventured out, they were caught by their necks and brought to the school in the center of the village. This was overseen by a collector, SP and the MLA from Congress Mr. Mahendra Karma. The adivasis were expected to come through one door, leave their thumb print on a paper that dispossesses them of their own land and exit through another.

Now, if I were an adivasi and was in the same situation, it would seem to me that the only reasons for losing my land and my resources were because the “government” agents were not on my side and that they had guns. So the only way to oppose them and save my resources, would be to have guns of my own.

If we had brought the constitution to the adivasis and taught them to respect the law, in a lawful manner, they could have respected them both. But they weren’t taught that, they were taught the power of the guns.

When my wife and I were in there, we saw that the ration shops had no rations, there were no teachers in the schools and no transportation. We started to interact with the ladies of the village to tell them that the constitution provides for all of that for them. But if they asked for any of that, they were Naxalites. If we wanted progress, even then we were called Naxalites.

When the Chattisgarh state was formed, the government wanted to use the land for mining and they got many MoUs. Then as an afterthought they remembered there were many Naxalites in the area. One of my friends had gone to a CII meeting. The businessman there were saying that while we have a license to do work, the Naxalites are not letting us progress.

An MoU was signed between the government and a very big iron company. Within a day they started Salwa Judum. In Salwa Judum the government said that the villagers were supporting the Naxalites. The adivasis were told to leave their homes and live in the camps around the police station, in order to cure the evil of Naxalites. These adivasis are not used to living in confinement, they live in the open forests.

Many government officials would go to them, carrying guns, to persuade people to leave. People who didn’t want to go to the camps were coerced using guns. Guns were given to a gang of hooligans who would fire at fleeing adivasis. Many girls were raped. Little children were killed. People who ran away were labeled Naxalites. Their homes were burned . The poor adivasis tried to come back and rebuild their houses but they were burned again and again.

When that happened we went against the government. Our ashram was promptly demolished. Our workers were arrested. Seven hundred villages were burnt, about three- four lakh population. 50,000 were taken to the camp, 50000 fled to AP and Orissa or Maharashtra, 3 lakhs fled to the forest where they are still under attack. Our representative, Nandini Sundar went to the Supreme Court. The Supreme Court ordered the government to rebuild all the villages. Not a single village was rehabilitated by the government. The Supreme Court ordered the government to give compensation to the adivasis, not a single adivasi has received any compensation.

Finally the SC asked NHRC to send a team to Dantewada. This team had a hundred policemen. There is a village called Nendra which had been burned four times. The adivasis from there went to give affidavits to the NHRC, there were four girls missing from that village and ten people had been killed. When these adivasis were trying to go back, they were held up in a Salwa Judum camp for a whole day. They were beaten all day and forced to place their thumbprints on papers stating that they had been forced to give the affidavits, and that they had nothing to say against Salwa judum. The village was burnt yet again four days later.

We told the NHRC team about the atrocities the adivasis were facing, because they had dared to come give their affidavits against Salwa Judum; they refused to be of any help, saying that their job here was only to take the affidavits.

When I saw the state of the burned down village, I felt their deep sorrow and that became my empowerment. It is true that we are Gandhivadis, who are non-violent by nature. But I thought that attachment to that tenet was not as important as rebuilding the hopes and lives of villages full of innocent people, who are also citizens of this democratic country, but are not being treated as such. I decided that we will help rebuild their village. If the government says that anyone who is not with Salwa Judum is a Naxalite then that is fine.

Then we started living in Nendra. When we addressed the villagers in a gathering, telling them that we were going to live there and do whatever we could to help them re-establish their homes, one villager in the gathering got up and said that they could rebuild their homes themselves, the only thing they asked from us was to make sure that once they did start living in those homes and farming, no one would come and kill them. To an open letter to the Chief Minister I wrote that even now, the only thing these adivasis want from us, is to spare their lives. Nothing more. When asked if there was anything more we could do, one old man got up and said my daughter was kidnapped two yrs ago by Salwa Judum and the police, she is still being held in the houses of one of the leaders of Salwa Judum, can I bring her back home?

In the same letter to the CM, I asked, is his heart or mind also not bound to our great Nation as our anthem says it is for all Indians? Jana Gana Mana Adhinayak Jaya he? Are all these people in their tattered clothes and burned homes not one of “We, the people of India”?

Our number one priority was to bring back the daughter of the old man. What scared me was she was taken not by the dacoits, but government officials on government duty. For a minute I thought, can my daughter also be taken forcefully by law officials? But then the constitution of India gave me some consolation, as I knew and understood the constitution and my rights and its power, perhaps no one could take my daughter in the same way. Since the officials know that the adivasis don’t know the law, they do as they please with no respect for humanity or people’s lives.

While two girls had been killed with no trace of their bodies, two girls were still alive in the Salwa Judum camp. We were able to bring the girls back to the village, back to her father. The next day a tree trunk lay on the road, blocking the way into the village. When we saw that we went around asking why, the villagers had uncharacteristically resorted to something symbolically linked to Naxalites. In turns out that one of the girl’s father had cut the tree to prevent the police to come back to the village and take her again.

A lot of these mis-happenings there are linked to innocuous reasons. Kopa Kunjam is our associate from the adivasi groups who has helped rebuild thirty villages, like Nendra. He is a young adivasi who is not with the Salwa Julum or in the other camp. He is absolutely neutral. He works for the adivasis.

Then one day we were sitting in a village, a young girl came towards us, hiding something from us. When we asked her what it was, she showed us a wooden pistol. She was carrying it to scare the Salwa Judum’s SPOs police officers when they attacked her. Girls that carry wooden pistols to preserve their virtue are being called Naxalites by the government, which is actually supposed to be protecting them.

I met Mr. Gopal Pinde, griha sachiv. He gave me his mobile number and told me to call him whenever there was an indication of a problem caused by the police officers. Four adivasi girls had been gang–raped by the officials of Salwa Judum. We tried to file a report in the police station, but of course how can they take a complaint against their own people. Even the SP refused to take down an FIR. After a lot of dilly-dallying by the courts in accepting the complaints of the girls, official warrants were taken out against responsible police officers or Salwa Judum leaders. But the official report said that the police officers were absconding and there was no way of ever catching them. This, when the very same officials hold meetings along with the aforementioned SP, trying to instigate the villagers against me.

December 19th, 2009, the incriminated officials went to the village and forced the four victims to give their thumb impressions on papers. As soon as we came to know of that incident, I SMSed the Home Minister Mr. P Chidambaram and the Chief Secretary to tell them that these girls were rape victims with ongoing court cases against the officers who are apparently absconding, but were clearly able to force their victims and complainants in the village to get their thumb impressions, without being seen or caught by the police. Next day, the same girls were taken to jail and imprisoned for four days. One of them was not even allowed to wear her saree. None of them were fed. They were forced to leave thumb impressions on many more documents. On the fifth day they were left (or rather tossed) in the village with the threat that if they were to ever meet me again their village would be burned down.

On Dec 25th, some of us went to the village and I SMSed the same people about what had transpired. No official steps were taken. I got only one reply from the Chief Secretary of Chhattisgarh, saying, “We have verified. Stop this ugly motivated campaign against the state.”

Just two days ago, Gopal Krishna has said that the Naxalites want to take over the Indian government by 2050, to that my response is, had I been the father of those girls, I couldn’t wait till then, I would want my right to justice today. (applause)

The government, the democracy that can’t protect my daughter’s from getting repeatedly humiliated and punished for no fault of theirs, I would not want any part in that democracy. For me, a democratic India has no meaning, if there isn’t a democratic Dantewada.

There is religion and there is blasphemy and then there is false-religion. False religion is worse than blasphemy. If the government says that it is trying to salvage democracy by acting in this way, I want to know why “democracy” doesn’t exist for the adivasis. When we were there in the villages, all we wanted was democracy. Universal respect for the law.

What these adiviasis got was discrimination by the law, which allowed the Tatas to build a plant there, with no regard to their welfare. I talked to the DCP there, you want the end of Naxalism here, but you saw that because of the plant there people are forced to give their land away. People are being cheated off their land or simply coerced to give it up. You are here to hold up law, you should be telling the CM to follow the law in the transfer of property. Or else you would arrest him. The day the police raise their guns for the poor and the victimized, there will be no need for Naxalism.

Mr. Chidambaram told me that he doesn’t want to talk to the Naxalites. I said fine, talk to the people of the villages. For the past fifteen years, no one has come to Dantewada. No one has heard about the crimes being committed there, that the poor villager has no defense against. While he tried to relegate the responsibility to the state government, I reminded him of the atrocities committed against the numerous girls and the innocent lives being taken. The fact that the Chief Minister had accepted bribes of four thousand crores and forgetting his real job, started to overlook all the crimes of the industrialists. Under the assault of his corrupt government, villagers were being cheated out their lives and livelihood. Unrest of such a high order in any part of the country would affect the whole country and would soon become directly his problem. He said that he would come. But then he signaled Raman Singh and all our associates started getting arrested and the victims who could have told their stories were all picked up. I was surrounded by the police all the time. I wanted to go around the villages informing them of the upcoming visit from the home minister, who they could tell their problems to. To prevent us from doing just that, trees were cut and roads blocked. The collector forbade me, in writing, from leading any kind of peaceful procession or “shanti-poorna padayatra”.

Today, no acitivist can go to any tribal village. No reporter can go to any such village. Why? What are you doing in those villages that needs to be hidden away? This has happened many times in history. We all know of the old tales when the gods defeated the dark devils, originally living in this land. The dark devils described seem a lot like the adivasis of today, who are in danger of being robbed off their land. In this day we need minerals for progress and wherever the adivasis live there are minerals. So now the adivasis are the enemies of progress. Just like killing Muslims is justified by calling them traitors, we find excuses to condone the atrocities committed against the adivasis. The only way we know of solving a problem is to kill the enemy. Though all over history we have seen that killing anything has never solved the problem or ended anything. Modi thought that the Muslims were an enemy for all Hindus and decided to commit genocide against all Muslims. Which didn’t really solve the problem but actually increase communalism. Mr. Chidambaram now thinks that all the adivasis are Naxalites and they should also be killed.

When the first five–year plan was made, the planners said that we can forget about 20% of the people. We can’t provide them with food, clothes or homes or education. In the 90s, the figure rose to 40% who don’t benefit from the economic development, if there is any. Now the figure has risen to 60%.

My question is, when the figure rises to 80%, what are we going to do with all those people? Are we going to kill them all too? We will just let them die, out of hunger and deprivation. In the fight of 20% rich and the 80% poor, the poor are likely to lose. Gandhiji had forecasted that this type of economic planning could only lead to conflict. In our time, the biggest problem is because of social conflict. As the fight for resources gets more skewed, more problems and insecurity will arise. Insecurity for the rich is because of the poor, they think that they will be killed by the poor.

Today the main fight is for the minerals under the ground. Who do these minerals belong to? Do they not belong to the next generation as well? Why do we need to take them all out now? Because that is what is being done to a certain extent. As an example,there is a company that mines iron, which is imported to Japan at the cost of four hundred rupees per ton, whereas an Indian industrialist would have to buy it for six thousand rupees per ton. Japan, is running out of space to store things and is dumping a lot of it into the ocean. If we don’t estimate how much mining, for how many people at what cost, correctly, there is bound to be conflict. Inequality always gives rise to conflict, it is not just the Naxalites that create violence. It is something we call structural conflict.

For us, everything is good, we eat twice a day, our children go to school. We are respected. All’s well with the world. Then where is the problem? When we think about it, really think about it, all the natural resources of this planet, sunlight, water, should be equally distributed among everyone. But in reality that doesn’t happen. We create our superiority by instilling the feeling of inferiority in others. What started with the caste system thousands of years ago, ostracizing all the people of low caste from respectable society is now being carried on by status due to education or which side of town you were born in. The higher castes and the educated or rich claim more than their fair share of all resources, leaving very little for the poor. All these ways of keeping the disparity alive make sense to us – the beneficiaries of the skewed distribution of resources. We want it to stay that way so that we keep getting our meals without having to work in the fields. After all, we are good, civilized people and “they” are low caste people who don’t work hard enough.

But for the poor man, who lives in Lalgarh or Beriyaghat, this is violence. He works all day and yet doesn’t have enough to eat, while you have never been in a field. His houses are being burned down, his wife is being raped, so that the disparity stays as it is. The government and the police work for the rich to maintain this structural violence, which is deeply rooted in the Vedic system and the value system.

But one day this will all be challenged and this value system will and get broken. As Gandhiji had said that if the poor don’t revolt, we should tell them to stop accepting this inhumane treatment and declare war against it. If they don’t then the they will get decimated because of the twenty percent minority is all set, armed with the media, the police and the army to kill the rest of the eighty percent just to maintain status quo. However, they find ways to camouflage it by stating that all the adivasis are causing unrest. They are beheading government police officers in their villages.

Ask me, what beheading is, a thirteen year old was beheaded in Dantewada just three months ago. When people ask me why we never discuss the beheading of the police officer in Dantewada, I want to know why the thirteen year old child was beheaded, by none other than the CRPF. The force right under the command of Mr. Chidambaram. Why does he not ever say anything about that? He has never confirmed this, so shall we take it that it was done under his command? If the police commits crimes then we are told that until the court proves them guilty they can’t be called criminals. Whereas, when an adivasi is said to have something, he is immediately labeled guilty of the act, without even getting a trial.

“Main kahaa se pesh karta ek bhi sachcha gawah, jurm bhi tha aapka kardar bhi aap hi the”

One of my friends is a reporter, she asked me that, if like you say this is “structural” violence, then why is it not happening everywhere? Why is it not there in UP, or Bombay or Delhi? I told her that there are three types of poor. Some of them, who are making a living because of the rich, like your maid or the person that irons your clothes. They are happy that some people are rich so they can also make a living. The second type are those, that think it is their fault that they are poor. They may think it is either their fate or their low caste or their illiteracy or because they live in a village, that makes them poor. They don’t blame the rich for their lot. The third are the type that you affected because you wanted to be rich. They didn’t want anything from you and had been living happily in the forests, until you decided to take their peace and their livelihood away from them without any heed of their welfare. Now, they want revenge. The real problem, for the rich, will arise if all these poor come together and take on the minority of rich people.

Workers association and rickshaw pullers association have invited me to talk. All three types of the poor are beginning to understand that they are poor because of the structural violence. The independence of the country didn’t come just for the rich, it belongs to you more than it belongs to the rich. Until it reaches everyone, we are not going to sit still. We will make every sacrifice that has to be made to bring it to the door of every poor villager. Our fight for true freedom will continue right up until then.

Some people may ask, what about the violence going on now? Well, I have seen violence from real close. 700 villages were burned in Bastar. A little adivasi girl had died from drowning in one of the villages. So the police were informed. Many of them came in a car and for their pleasure was brought good food – chicken and alcohol. The little girl’s dead body was lying on the ground , right next to these policemen as they ate and drank merrily. What kind of message is that?

When seven hundred villages were burned during Salva Judum, the number of Naxalites had more than doubled. When they had burned the village, they had burned the schools, aangan badis, ration shops villagers were not allowed to go to the bazaar to buy food. In the hope that they would be forced to go move to the camp, to avoid starvation. Leaving their land. So a woman who lives close to a bazaar, which she cannot go to because if she does, she is likely to get recognized. Then, she could be raped or forced to go to the camp or possibly killed. What she does is, walks to a bazaar eighty kilometers away. Takes her four days per week, just to bring back rice. We asked her why she wouldn’t just buy the ration for a whole month. She said, that we don’t have money, we only have mahua, which we barter for food. We carry as much as we can on our head and then bring back whatever we can in exchange for that.

How can you expect non-violence in such a condition? Right now, any adivasi living there, feels that the Naxalites are their protectors and the government and its police their enemy.

A young girl came to me one day and told me that she had been taken to the Bastar police station and raped repeatedly for two days by the police and if I could help her gain justice. I wrote to the SP, who didn’t reply. We went to the Supreme Court which asked the state government what had been done about the issue. Then, the SP replied that the accused Salwa Judum leaders had denied any such act. They said that the girl was trying to ruin the reputation of the good people of Salva Judum, by accusing them of rape. Hence the state government says that the Salwa Judum leaders had been falsely charged. I am not sad that the state government or the SP said this. What makes me sad is that the Supreme Court believed them.

After episodes like that, it seems that even the doors of the courts of this country are closed for these adivasis. They have no one to turn to, the police were already against them, as was the administration. Who can they go to in the hope of help ? They are only left with the option of turning towards the Naxalites. This shouldn’t have happened. They should have had the government on their side, felt a part of a democracy. But that didn’t happen. They feel that the Naxalites are their own. We could change the situation. I asked Mr. Chidambaram to visit the villages, to address the adivasis as the country’s home minister and to listen to their grievances. If it had been Sardar Patel, he would have gone. But he is too arrogant to meet the people. He just wants their land and he sends his police force to get it. The police force which rapes the women and burns the houses of the adivasis. Mr. Chidambaram thinks that he can get what he wants without any repercussions. He wants peace, even then.

This false democracy is not going to last, it doesn’t need Naxalites to fall on its face. We are the last people trying to save it. We are trying to tell you that if a war is fought against eighty percent of the people of the nation, that is not going to be acceptable to the people. Democracy is not just the observation of parades at India gate, the speeches, the Parliament, Members of Parliament or the Supreme Court. If people don’t get justice, there is no way of fighting poverty, no one listens to the people’s problems, then democracy based just on the structural farces cannot last. We need the real values of democracy to be implemented. Unlike what our Prime Minister said, Naxalites are not our greatest threat to internal security. The government itself is.

If democracy is not applied to the grass root level, then there is no alternative to large-scale unrest. I even met Mr. Rahul Gandhi. Today he is very powerful. I asked him to come to Dantewada. He asked me meet someone else. No one wants to meet the tribes. If some politician wants to go there, he will not be allowed to go. No activist can live there, leaving no avenues open for the adivasis to express their problems or their frustration. The outcome of all this suppressed angst can only be violent.

A few days ago the new Operation Green Hunt was started. Sixteen adivasis were killed early one morning by the CRPF, in Bompar. A two year old boy’s – Suresh’s fingers were cut. The boy’s mother was first knifed in her head, she was raped after she died. His eight year old sister was stabbed to death. His father was also killed. A seventy year old man who couldn’t run was also killed. A seventy-year old woman’s breasts were chopped off before she was killed. We took some of the afflicted people to Delhi. We filed a case in the Supreme Court. When all these people came to Dantewada to talk to Chidambaram, they were detained by the police. They are still in jail. This nation’s democracy is silent, as is the Supreme Court and the media. While Suresh and a woman who was shot in the leg are being held in the jail.

I say, don’t let us help the villagers, don’t give justice to anyone, kill everyone you can. Then we hope that the broken pieces of this fake democracy can fall on your head.

By Himanshu Kumar

http://www.countercurrents.org/hkumar190410.htm

बहुमोल : हातात झाडू घेतला अन् आपोआप लोक जोडले गेले

‘सातत्य हे यशाचे दुसरे नाव आहे’.. हे लक्षात ठेवून परिसर स्वच्छतेसाठी झाडू हाती घेतला आणि आपोआप लोक जोडले गेले. त्याचा परिणाम म्हणून एक टेकडी हिरवी झाली, एक नदी स्वच्छ करण्यासाठी लोक पात्रात उतरले आणि एक संपूर्ण गाव कार्बनमुक्त करण्याचे आव्हानही घेतले.. पुण्यातील राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाळेत (एनसीएल) तांत्रिक अधिकारी म्हणून कार्यरत असताना कामाव्यतिरिक्त मिळणारा वेळ अशा समाधानाच्या कामी लागत आहे. काही वर्षांपूर्वी एका शास्त्रज्ञाच्या लेखात ग्लोबल वॉर्मिगच्या धोक्यांबाबत वाचले होते. त्यामुळे कार्बन डायऑक्साईड व मिथेन या वायूंचे उत्सर्जन रोखणे किती महत्त्वाचे आहे याची जाणीव झाली. त्याला मुहूर्त लाभला २००६ सालच्या गणपतीत. गणपतीसाठी वेगवेगळ्या मंडळांना चार-पाच हजार रुपये देण्याऐवजी ती वापरून परिसर स्वच्छ करायचे ठरवले. पुण्यात बाणेर येथे घराजवळ स्वच्छता सुरू केली. तुम्ही काम सुरू केले की लोक ऐकतात. त्यामुळेच रविवारी सकाळी एक तास परिसर स्वच्छ करण्यासाठी हातात झाडू घेतला. सुरुवातीला लहान मुलांची साथ लाभली. एक-दोन महिने काम सुरू राहिल्यावर ते मित्रांना समजले, दहा मित्र सहभागी झाले. मग आम्ही नाव घेतले- वसुंधरा स्वच्छता अभियान! दर रविवारी सकाळी घराजवळ स्वच्छता आणि जवळच्या तुकाई टेकडीवर झाडे लावण्याची मोहीम हाती घेतली. कचऱ्यातून मिथेन वायू निर्माण होतो, स्वच्छतेमुळे त्याची निर्मिती थांबेल. झाडे लावल्याने हवेतील कार्बन डायऑक्साईड वायू शोषला जाईल. टेकडीवर झाडे लावताना लोकांनी अनेक शंका काढल्या. आम्ही उत्तर देत राहिलो- ‘आम्ही पाप करत नाही, कोणी अडवलेच तर त्याचे पाय धरू आणि दुसरीकडे झाडे लावू. आपल्याकडे ओसाड जागा काही कमी आहे का?’ पण प्रत्यक्षात कोणीच आडवे आले नाही, उलट लोक जोडले गेले. झाडांसाठी पाणी टेकडीवर पोहोचवणे हे अवघड काम होते. उन्हाळ्यात कधी साखळी करून व नंतर वरती टाकी बांधून पाणी पोहोचवले. लहान-मोठय़ा अडचणी येतातच. कधी सिगारेट ओढणाऱ्यांमुळे वणवे लागले, कधी कोणी झाडे उपटली. पण मार्ग निघत गेला. त्याचे फळ म्हणजे ती ओसाड टेकडी आता सात हजार झाडांनी बहरली आहे, तिथे नव्याने देवराई निर्माण करायची आहे. आमचा हेतू केवळ पर्यावरण हाच आहे हे समजल्यावर गावकरी, स्थानिक नगरसेवक, महापालिका, कंपन्या सर्वाचेच सहकार्य मिळत गेले. हळूहळू दहाचे शंभर कार्यकर्ते झाले.
परिसरातील स्वच्छता व टेकडीवरील झाडे लावण्याच्या कामात सातत्य आल्यानंतर मुळा-मुठा नद्यांच्या स्वच्छतेचे काम हाती घ्यायचे ठरविले. पण नदी घाण होते ती तिला मिळणाऱ्या ओढय़ा-नाल्यांमुळे. म्हणूनच सुरुवात केली मुळा नदीला मिळणाऱ्या १८ किलोमीटर लांबीच्या रामनदीपासून. संपूर्ण नदीला हात घालणे लगेच शक्य नव्हते. त्यामुळे पाषाणजवळचा एक किलोमीटरचा टप्पा निवडला. लोकच नदी जास्त घाण करत होते- उंबऱ्याच्या आत साफ आणि समोर नदी घाण! आम्ही काम सुरू केल्यावर लोक लाजायचे. विनोद बोधनकर यांच्यासारखे कार्यकर्ते येऊन सहभागी झाले. ज्येष्ठ ग्रामस्थ गुलाबराव तापकीर यांच्या ७६ व्या वाढदिवसानिमित्त नदीच्या कडेला बांबूची ७६ झाडे लावली. स्थानिक नगरसेवक, आमदार यांना कार्यक्रमाला बोलावले आणि आमचे हेतू स्वच्छ असल्याचे स्पष्ट केले. आठवडय़ातून दोनदा सकाळी श्रमदान करूनही स्थानिक लोकांचा सहभाग मिळेना. महिलांशी पाणीप्रदूषणाबाबत बोलल्यावर मात्र त्या सहभागी व्हायला तयार झाल्या, वेळ त्यांच्या सोयीनुसार दुपारची ठरली. परिणाम होत गेला आणि आता दीड वर्षांनंतर ८० टक्के स्थानिक रहिवाशांनी रामनदीत कचरा टाकणे बंद केले. पाषाणच्या प्रसिद्ध सोमेश्वर मंदिरात हजारो भाविक येतात, पण मागे घाण साचत होती, जलकुंडही अशाच पाण्याने तुंबले होते. लोक जवळच उघडय़ावर शौचाला बसायचे. पण मंदिराचे विश्वस्त व आम्ही कार्यकर्त्यांनी १० हजारांची वर्गणी आणि श्रमदानातून ते स्वच्छ केले. त्यामुळे आता ९० टक्के लोकांनी तिथे शौचास बसणे बंद केले. रामनदीच्या वेगवेगळ्या टप्प्यांत काम करणारे गट तयार झाले. बावधनला शैलेंद्र पटेल उभे राहिले. त्यातही सातत्य आल्यावर म्हाळुंगे गावच्या सरपंच रेखाताई पाडाळे व त्यांचे पती यांच्या पुढाकाराने हे गाव कार्बनमुक्त करण्याचे आव्हान घेतले आहे. गावातून जितका कार्बन वायू उत्सर्जित केला जातो, तितक्या प्रमाणात झाडे लावण्याची ही योजना आहे. आनंदाची बाब म्हणजे गावकऱ्यांबरोबरच तिथल्याच किलरेस्कर ब्रदर्स लिमिटेडचे अधिकारी जी. पी. कुलकर्णी यांनी पुढाकार घेतला आणि यासाठी भरीव मदत करण्याचे पक्के केले.
पिंपरी-चिंचवड महापालिकेने पवना नदीची स्वच्छता करण्याचे ठरविले तेव्हा रामनदीच्या अनुभवायाचा उपयोग करून घ्यायचे ठरले. तेसुद्धा काम सुरू आहे. सुरुवातीला आठवडय़ातून एका तासापुरते सुरू झालेले पर्यावरणाचे काम आता चार वर्षांनंतर व्यापक बनले. सध्या काम सांभाळून काम सुरू आहे. तोवर काम पुढे जाईलच. सहा वर्षांनी निवृत्त झाल्यावर मात्र रामनदी संपूर्ण स्वच्छ करण्याचे आव्हान पेलायचेच आहे!

अनिल गायकवाड

साभार लोकसत्ता

http://www.loksatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=63588:2010-04-19-15-37-04&catid=96:2009-08-04-04-30-04&Itemid=108

मुंबई आणि महाराष्ट्र धनदांडग्यांच्या विळख्यात !

संयुक्त महाराष्ट्राच्या स्थापनेच्या  सुवर्णजयंतीला  केवळ एका मोठय़ा उत्सवाचे स्वरूप आले आणि संयुक्त महाराष्ट्राच्या चळवळीचा पूर्वेतिहास रंगमंचाच्या झगमगीत पडद्यामागे झाकला गेला तर आपण पूर्वी कुठे होतो, आज कुठल्या चक्रात अडकलो आहोत आणि भविष्यात दडले तरी आहे काय याचा काहीच पत्ता लागणार नाही.
ढोल बजने लगा, गाँव सजने लगा! संयुक्त महाराष्ट्राच्या स्थापनेची सुवर्णजयंती जसजशी जवळ येत चाललीय तसतसे त्याचे पडघम ऐकू यायला लागलेत. ही सुवर्णजयंती शासकीय, व्यवस्थापकीय पद्धतीने पेशवाई थाटात साजरी होणार, राज्यशासन, महापालिका, निरनिराळे राजकीय पक्ष आपल्याकडे जनतेचे लक्ष आकर्षित करण्यासाठी स्पर्धेत उतरणार, महाराष्ट्राचे दैवत असलेल्या शिवाजी महाराजांचा जयघोष होणार, सांस्कृतिक कार्यक्रमांची उधळण होणार यात शंका नाही; परंतु या सुवर्णजयंतीला केवळ एका मोठय़ा उत्सवाचे स्वरूप आले आणि संयुक्त महाराष्ट्राच्या चळवळीचा पूर्वेतिहास रंगमंचाच्या झगमगीत पडद्यामागे झाकला गेला तर आपण पूर्वी कुठे होतो, आज कुठल्या चक्रात अडकलो आहोत आणि भविष्यात दडले तरी आहे काय याचा काहीच पत्ता लागणार नाही.
महाराष्ट्राच्या एकीकरणाची मागणी प्रथम १९४६ साली बेळगावात झालेल्या साहित्य संमेलनात करण्यात आली. त्या वेळी होत असलेल्या साहित्य संमेलनात साहित्य व राजकारण या दोन्ही विषयांवरील चर्चा रंगत असत. मुंबई साहित्य संघाच्या वार्षिक नाटय़महोत्सवात तर साहित्यिकांनी काम केलेलं नाटक सादर करण्याची प्रथा सुरू झाली होती. १९५१ सालची गोष्ट. रंगेल असं नाटकच सापडेना. मग आचार्य अत्र्यांनी एकटाकी मोलिअरच्या ‘लाव्हार’ या नाटकाचं ‘कवडीचुंबक’ या नावानं रूपांतर केलं, नाटकातील कलाकार होते अनंत काणेकर, वसंत बापट, आप्पा पेंडसे, शं. ना. नवरे, अनंतराव गद्रे, प्रबोधनकार ठाकरे, कुसुम कुळकर्णी आणि कवडीचुंबकाच्या मुख्य भूमिकेत खुद्द आचार्य अत्रे. प्रबोधनकार शेवटच्या एण्ट्रीत एकच वाक्य म्हणतात, ‘ए चंदन, कस्तुरीचा बाप या ठिकाणी उभा असताना तुला कस्तुरी देणारा हा तुझा बाप कोण?’
कॉ. डांगे यांचे १९१९ पासूनचे स्नेही ग. त्र्यं. माडखोलकर बेळगावच्या साहित्य संमेलनाचे अध्यक्ष होते. त्यांनी महाराष्ट्राच्या एकीकरणासंबंधीच्या ठरावाचा मसुदा कॉ. डांगे यांच्यासकट निरनिराळ्या पक्षांच्या नेत्यांकडे पाठवून त्यांचे मत अजमावले. माडखोलकरांनी लिहिलंय : ‘‘संयुक्त महाराष्ट्राच्या बाबतीत एकनिष्ठ व चळवळ करावयासही उत्सुक असे कार्यकर्ते महामहोपाध्याय दत्तो वामन पोतदार, बॅ. रामराव देशमुख, केशवराव जेधे व शंकरराव देव हे चौघेच काय ते मला आढळले. देव, जेधे, मोरे, भोपटकर, डॉ. खरे, जयकर, ना. ग. गोरे यांनी चळवळीला जी अनुकूलता दर्शविली होती, ती केवळ वैयक्तिक नात्यानेच होय. पक्ष या दृष्टीने फक्त कम्युनिस्ट पक्ष तेवढाच एक संयुक्त महाराष्ट्राचा प्रश्न आणि त्यासंबंधीची चळवळ उचलून धरायला संपूर्णतया आणि उत्साहपूर्वक अनुकूल होता.’’ (ग. त्र्यं. माडखोलकर : व्यक्तिरेखा, दुसरी आवृत्ती- जुलै १९६६)
साहित्य संमेलनात पारित झालेल्या ठरावात मुंबईचा स्पष्ट उल्लेख केलेला नव्हता. गांधी, नेहरू आणि सरदार पटेल मुंबई शहराचा संकल्पित संयुक्त महाराष्ट्रात समावेश करण्यास तयार नव्हते. ‘मुंबईविरहित महाराष्ट्र म्हणजे मस्तक विरहित धड! ते घेऊन आम्ही काय करू?’ शंकरराव देव म्हणाले.
बेळगाव साहित्य संमेलनानंतर १७ जुलै १९४६ ला स्थापन करण्यात आलेल्या सर्वपक्षीय संयुक्त महाराष्ट्र परिषदेची सूत्रे शंकरराव देवांच्या हातात सोपविण्यात आली. माडखोलकरांनी कॉ. डांगे यांना २८ जुलैस परिषदेच्या कार्यकारिणीचे सदस्य होण्यास संमती द्यावी, अशी विनंती केली. डॉ. आंबेडकरांप्रमाणेच कॉ. डांगे यांनी हसत हसत पहिलाच प्रश्न विचारला, ‘‘शंकरराव देव या चळवळीत शेवटपर्यंत टिकतील, असं तुम्हाला खरोखरीच वाटतं का? काँग्रेस पक्षाच्या अनुकूलतेने हे काम करून घेण्याची तुमची कल्पना चुकीची आहे. काँग्रेसची सूत्रे भांडवलदारांच्या हाती आहेत. ते संयुक्त महाराष्ट्र सुखासुखी होऊ देणार नाहीत.’’ त्यानंतरच्या घडामोडी लक्षात घेतल्या तर कॉ. डांगे यांनी केलेले निदान अचूक असल्याची साक्ष इतिहास देतो. अर्थात या परिषदेशी त्यांनी आरंभापासून सहकार्य केले होते.
वातावरण पुढे हळूहळू तापत गेले. १४ डिसेंबर १९५३ रोजी पुणे येथे झालेल्या कम्युनिस्ट पक्षाच्या मुंबई व महाराष्ट्र समित्यांच्या संयुक्त परिषदेत खालील महत्त्वाचे मुद्दे मांडण्यात आले- (१) संयुक्त महाराष्ट्राचा लढा देशभर चाललेल्या भाषावार प्रांतरचनेच्या लढय़ाचा एक भाग समजूनच लढविला पाहिजे. (२) भाषावार प्रांतरचनेचे शत्रू प्रांतिक दुराभिमान चेतवून वेगवेगळ्या भाषिक गटात कलह पेटविण्याचे पद्धतशीर प्रयत्न करीत आहेत. आपण विशेषत: कर्नाटकी व गुजराती जनता व महाराष्ट्रीय जनता यांच्यामध्ये प्रचार करून सीमांच्या प्रश्नांची योग्य तत्त्वावर सोडवणूक केली पाहिजे. (३) डांगसारख्या प्रश्नांबाबत गुजरात-महाराष्ट्रामध्ये तीव्र स्वरूपाचे वाद उत्पन्न होत आहेत. त्यामध्ये खुद्द डांगमधील आदिवासी जनतेची निष्कारण ओढाताण होत आहे. महाराष्ट्राच्या उत्तर सरहद्दीवरील लक्षावधी आदिवासी जमातींना संपूर्ण लोकशाही हक्क देऊन त्यांना लोकशाही जीवनाच्या प्रवाहात एकरूप करून घेणे हा खरा मूलभूत प्रश्न आहे. (४) गोमंतकीय जनतेपुढीलदेखील मुख्य प्रश्न पोर्तुगीज साम्राज्यशाहीच्या गुलामीतून मुक्तता हा आहे. कोकणी-मराठी, ख्रिस्ती-हिंदू या वादांपासून गोमंतकीय मुक्तीसंग्रामाचा व संयुक्त महाराष्ट्राच्या लढय़ाचा आपण बचाव केला पाहिजे. (५) मुंबईचा प्रश्न हा संयुक्त महाराष्ट्राच्या लढय़ातील सर्वात गुंतागुंतीचा व स्फोटक प्रश्न आहे. मुंबईच्या अन्य भाषिक अल्पसंख्याकांच्या भाषिक, सांस्कृतिक, आर्थिक हक्कांची हमी घेऊन व त्यांच्या भाषावार राज्यपुनर्रचनेच्या लढय़ाशी संयुक्त महाराष्ट्राच्या लढय़ाची सांगड घालून आपण त्यांचे सहकार्य मिळविले पाहिजे. (६) हैदराबाद संस्थान बरखास्त करणे ही दक्षिणेतील भाषावार राज्यरचनेच्या लढय़ाची गुरुकिल्ली आहे.
जेव्हा नेतेच भावनाविवश होतात, तेव्हा काय होऊ शकते त्याचा एक गंमतीदार किस्सा इथे सांगणे अप्रस्तुत ठरणार नाही. या चळवळीत एकदा अत्रे-डांगे डांगच्या दौऱ्यावर गेले होते. पहिल्याच सभेला तेथील आदिवासी मोठय़ा संख्येने आले होते. अत्र्यांनी दांडपट्टा फिरवायला सुरुवात केली. मध्येच विनोदाचा धबधबा. तरी श्रोते निर्विकार. ‘काय माणसं आहेत का दगड?’ अत्र्यांनी कॉ. डांगेंना विचारले. कॉ. डांगे हळूच त्यांच्या कानात म्हणाले, ‘अहो, त्यांना मराठी बिलकूल समजत नाही!’ राज्य पुनर्रचना आयोगाचा अहवाल अधिकृतरीत्या १० ऑक्टोबर १९५५ ला प्रसिद्ध झाला असला तरी मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्राची मागणी फेटाळल्याच्या बातम्या आधीच वृत्तपत्रांत प्रसिद्ध झाल्या होत्या. नानासाहेब गोरे तेव्हा गोव्याच्या तुरुंगात सजा भोगत असल्यामुळे त्यांच्याऐवजी प्रजासमाजवादी पक्षाचे प्रतिनिधित्व एस. एम. जोशी करीत होते. डांगे व एसेम या दोघांनीही मुंबईसह महाराष्ट्राखेरीज अन्य पर्याय स्वीकारण्यास निकराचा विरोध केला. ७ नोव्हेंबर १९५५ हा संयुक्त महाराष्ट्र मागणी दिन म्हणून साजरा करण्याचे आवाहन करण्यात आले. त्याआधी मुंबईतील ९० कामगार संघटनांनी एसेमच्या अध्यक्षतेखाली झालेल्या सभेत द्विभाषिक राज्याला, तसेच मुंबई शहराचे स्वतंत्र राज्य करण्याच्या कल्पनेला विरोध करणारा ठराव मंजूर केला. कॉ. डांगे यांनी या विशेष सभेचे उद्घाटन केले. १८ नोव्हेंबरला वयोवृद्ध क्रांतिकारक सेनापती बापट यांच्या नेतृत्वाखाली मोर्चा निघाला. २१ नोव्हेंबरला संप व निदर्शने करण्याचा निर्णय जाहीर झाला. या संपात बँक व विमा कर्मचारीदेखील सामील झाले. परळ-लालबागहून एक लाखावर गिरणी कामगारांचा आक्रमक मोर्चा फ्लोरा फाऊण्टनच्या दिशेने जोरदार घोषणा करीत आला. पोलिसांनी केलेल्या गोळीबारात १५ जण ठार व ३०० जखमी झाले. त्या दिवसापासून १६ जानेवारी १९५६ पर्यंत आंदोलनाच्या लाटा भरती आलेल्या समुद्रासारख्या उसळत होत्या. १५ जानेवारी १९५६ ला १२ संयुक्त महाराष्ट्रवादी नेत्यांच्या घरांवर पोलिसांनी धाड टाकून त्यांना अटक करून तुरुंगात डांबले. एक प्रबोधनकार ठाकरे सोडले तर उर्वरित सर्वजण कामगार चळवळीतील कम्युनिस्ट नेते होते. लालजी पेंडसे, नाना पाटील यांच्यापासून कृष्णा देसाई, जी. एल. रेड्डीपर्यंत सर्वजण. १६ जानेवारीला नेहरूंनी मुंबई शहर केंद्रशासित करण्याचा निर्णय जाहीर करताच प्रथम पोलिसांनी ठाकूरद्वारला गोळीबारास सुरुवात केली आणि या चळवळीतील युद्धपर्वाला सुरुवात झाली. ‘१६ ते २० जानेवारी हे इतिहास घडविणारे मुंबईतील पाच दिवस’ असे वर्णन ‘युगांतर’मध्ये आले. हा सबंध महिना लढय़ाला मार्गदर्शन करणारे कोणीच मुंबईत मुक्त नसल्यामुळे लढय़ाची अवस्था निर्नायकी झाली होती. सार्वत्रिक संपास प्रजासमाजवादी तयार नव्हते.१७ जानेवारीला कम्युनिस्ट पक्षाच्या दळवी बिल्डिंगमधील कार्यालयात गुप्त सभा भरवून सरकार उलथून पाडण्याचा कट रचण्याच्या आरोपावरून डॉ. अधिकारी, अहिल्या रांगणेकर, तारा रेड्डी अशा १६ कम्युनिस्ट कार्यकर्त्यांना अटक करण्यात आली. चार दिवसानंतर वाङ्मय परिषदेचे अध्यक्ष म्हणून बडोद्यास गेलेले आचार्य अत्रे परत आले व त्यांना ठाण्याच्या तुरुंगात डांबण्यात आले. तिथे होते त्यांच्या सोबतीला डांगे, मिरजकर, नाना पाटील इ. ‘कऱ्हेचे पाणी’ या आत्मचरित्राच्या ५ व्या खंडात अत्र्यांनी लिहिलंय, ‘‘भाई डांगे यांनी आपल्या आयुष्यातली एकंदर १४ वर्षे तुरुंगात घालविली होती. मासा पाण्यात जितक्या आनंदाने राहतो तितक्या सहजतेने ते कारागृहात वावरत असत.’’
कम्युनिस्ट नेते तसेच आचार्य अत्रे व प्रबोधनकार ठाकरे तुरुंगात असताना पुण्यात एका सर्वपक्षीय परिषदेत संयुक्त महाराष्ट्र समितीची स्थापना झाली. १९५६ च्या मेअखेपर्यंत जवळपास ३२ हजार व्यक्तींना अटक करण्यात आली. ‘समाजवादी भारतात समाजवादी महाराष्ट्र’ या घोषणेने लोकांच्या मनाची पकड घेतली. ‘जनतेच्या सत्तेची ज्योत जागती- गर्जा संयुक्त महाराष्ट्र भारती-’ अमरशेख बुलंद आवाजात गायचा.
संयुक्त महाराष्ट्र चळवळीचे नेतृत्व करताना डांगे आणि एसेम या दोघांनी संकुचित प्रांताभिमान फोफावू नये आणि भाषावार राज्यासाठी लढताना राष्ट्रीय प्रश्नांची विस्मृती होऊ नये यासाठी शक्य तितके प्रयत्न केले. पुढे शिवस्मारक समितीच्या निमंत्रणानुसार नेहरू ३० नोव्हेंबर १९५७ रोजी प्रतापगडावरील शिवछत्रपतींच्या पुतळ्याचे अनावरण करण्यासाठी येणार असल्याचे वृत्त प्रसिद्ध होताच नेहरूंनी संयुक्त महाराष्ट्राच्या राज्याला विरोध केला म्हणून त्यांच्याविरुद्ध निदर्शने करण्याचा निर्णय घेण्यात आला. या संबंधात डांगे व नेहरू यांच्यामध्ये झालेला पत्रव्यवहार प्रसिद्ध झालेला आहे. काँग्रेसच्या पुढाऱ्यांनी ब्राह्मण-मराठावादाचा वन्ही पुन्हा एकदा पेटविला. प्रतापगडावर निदर्शने करून समिती मराठा जातीचा अपमान करीत असल्याची आरोळी ठोकली. शंकरराव मोरे म्हणाले, ‘अफझलखानाच्या थडग्याशेजारी समितीच्या पुढाऱ्यांची थडगी बांधली जातील.’ वाईहून प्रतापगडाकडे जायच्या वाटेवर पसरणीच्या घाटात जमलेल्या हजारो लोकांनी शांततापूर्ण शिस्तबद्ध निदर्शने केली. मात्र आयुष्यभर जनतेच्या प्रेमाचा स्वीकार करीत उघडय़ा गाडीतून फिरणाऱ्या नेहरूंना प्रथमच बंद मोटारीतून जावे लागले. यासंबंधी नेहरू म्हणाले, ‘‘महाराष्ट्राने एकेकाळी माझ्यावर अमर्याद प्रेम केलेले असल्यामुळे आता माझ्यावर रागावण्याचा देखील त्यांना हक्क आहे.’’ (आचार्य अत्रे : ‘कऱ्हेचे पाणी’ खंड ५) शेवटी हो ना करता करता दिल्लीश्वरांनी मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्राची मागणी मान्य केली. राज्य स्थापनेसाठी मुहूर्त कोणता? शिवजयंतीचा की गुढीपाडव्याचा? कॉ. डांगे गरजले, ‘‘मुंबईसह संयुक्त महाराष्ट्रासाठी कामगार लढले. या राज्याची स्थापना कामगार दिनालाच झाली पाहिजे.’’ अशा तऱ्हेने १ मे १९६० ला शिवाजी पार्कला झालेल्या सोहळ्यात भारताचे पंतप्रधान जवाहरलाल नेहरू यांनी संयुक्त महाराष्ट्राचा ‘मंगल कलश’ यशवंतराव चव्हाणांच्या हाती दिला. संयुक्त महाराष्ट्राच्या लढय़ात खरा राजकारणाचा प्रश्न झाला होता मुंबईचा. हिंदुस्थानच्या भांडवलदारवर्गाचे नेतृत्व मुंबईच्या गिरणी मालकांकडे होते आणि त्यांना त्यांच्या वर्गहितासाठी अर्निबध हालचाली करता याव्यात यासाठी मुंबई केंद्रशासित हवी होती. प्रत्यक्षात मुंबई झाली महाराष्ट्राची राजधानी. त्यातून सबंध गिरणगावात सत्ता होती लाल बावटय़ाची आणि त्यांना हा एक मोठा अडथळा होता. मग ज्यांनी पुढे संपूर्ण त्याज्य ठरविण्यात आलेली बॅक-बे रेक्लमेशनची योजना चतुराईने अंमलात आणली, ते ताडोबाच्या जंगलात शिकारीला जाणारे मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक भांडवलदारांच्या सांगण्यावरून नव्या शिकारीसाठी सज्ज झाले. गिरणी कामगार लाल बावटय़ाशी इमान राखून होते; पण त्यांच्या मुलांना रोजगार उपलब्ध नव्हता. ‘लुंगीवाल्यां’च्या आक्रमणामुळे तुमचा रोजगार गेला, असे त्यांना भासविण्यात आले. ही शुद्ध बनवाबनवी होती. त्या काळात जे कोणी दाक्षिणात्य मुंबईला आले ते कुठल्यातरी ऑफीसमध्ये नोकरी मिळविण्यासाठी, गिरण्या कारखान्यात काम करण्यासाठी नाही; पण बेरोजगार एवढा विचार करीत नाही. ‘बजाव पुंगी- हटाव लुंगी’, ‘लाल बावटा जला दो’ आणि ‘टाटा-बिर्ला आमचे अन्नदाते आहेत’ या तीन वरकरणी परस्परांशी संबंध नसणाऱ्या घोषणा एकाच वेळी, एकाच ठेक्यात देण्यात आल्या. यावरूनच हे षड्यंत्र किती विचारपूर्वक बनविण्यात आले होते ते समजायला वेळ लागत नाही. बेरोजगारीचे वास्तव, नेहमीच कुठेही भरकटत जाणारा मध्यमवर्ग आणि वसंतराव नाईकांनी दिलेला राजकीय राजाश्रय यामुळे शिवसेना एकाएकी फोफावली.

कालांतराने वारे थोडेफार उलटे फिरायला लागले. कित्येक वर्षांच्या समाजकार्यातून परळ-लालबागच्या अनेक व्यायामशाळांशी व तरुणांच्या गटांशी मैत्रीचे संबंध प्रस्थापित झालेल्या हिम्मतबाज कृष्णा देसाईने नवी मोहीम सुरू केली.  या मोहिमेचा ‘गेम’ करण्याचे कारस्थान रचण्यात आले. त्याची हत्या करणारे सर्वजण शिवसैनिक होते. सज्जड पुरावा सादर केला असतानाही कोणाला फाशीची शिक्षा झाली नाही. जास्तीत जास्त ११ वर्षे तुरुंगवासाची शिक्षा. तीदेखील पुरती भोगायला लागली नाही. तुरुंगात रांगोळी प्रदर्शनाचे नाटक करून ‘चांगल्या वर्तणुकी’साठी शिक्षा कमी करण्याची व्यवस्था वसंतरावांनी केली! आता गिरणी कामगारांवर मालकांनी जास्त जोरात हल्ले चढविण्यास सुरुवात केली. काही वर्षांनंतर लढण्याची जिद्द असलेले पण लाल बावटय़ाची शक्ती क्षीण झाल्यामुळे एक प्रकारे असहाय्य झालेले गिरणी कामगार डॉ. दत्ता सामंतांच्या नेतृत्वाकडे झेपावले. १९८२ च्या संपाला प्रचंड प्रतिसाद मिळाला. ३-४ महिन्यांनंतर कॉ. डांगे यांनी सामंतांना सल्ला दिला, ‘आता तात्पुरती माघार घ्या. अशावेळी सैन्य वाचविणे महत्त्वाचे असते.’ सामंत ऐकण्याच्या मन:स्थितीत नव्हते. शेवटी सैन्याची सर्रास कत्तल झाली. गिरण्या उद्ध्वस्त झाल्या. कामगार देशोधडीला लागले. संप वेळेवर मागे घेतला असता तर गिरण्या व कामगार या दोघांचेही अस्तित्त्व काही काळ तरी टिकले असते आणि चळवळीची पुढील वाटचाल ठरविता आली असती. याच सुमारास शेकडो कारखाने धडाधड बंद पडायला लागले. अनेक मोठय़ा कंपन्या बंद पडल्या. ‘अन्नदात्यां’नी कामगारांची अन्नान्नदशा करून टाकली. डॉ. दत्ता सामंतांचा माफियाने बळी घेतला. या प्रक्रियेत शहरविकासाच्या नियोजनाचा पुरता बोजवारा उडाला. जमिनींच्या किमती आकाशाला भिडायला लागल्या. मिळेल तिथे जमिनीचा कब्जा घेऊन बेलगाम इमारती बांधकाम सुरू झाले. १९९५ ते २००५ या १० वर्षांत बिल्डर लॉबीसाठी नद्या आणि खाडय़ा बुजवून वा भर घालून एकूण ८८० भूखंड ‘डिरिझव्‍‌र्ह’ करण्यात आले, अतिशय मोक्याच्या जागा एकदम माफक किंमतीत बिल्डरांच्या टोळ्यांना दिल्या गेल्या. सर्व पक्षांतील राजकारणी, बिल्डर्स व माफिया यांची अभद्र युती झाली. मुंबईच्या उच्च न्यायालयाला शपथपत्र देण्याचा गनिमी कावा करून विलासरावांनी अर्बन लँड सिलिंग अ‍ॅक्ट रद्द करून टाकला. मुंबईच्या ५ लाख कुटुंबांना छोटी घरे मिळण्याची स्वप्ने धुळीला मिळाली. वसंतराव ते विलासराव अशी गाडी चालू राहिली. गिरण्याच्या जागांसंबंधात मुंबईच्या उच्च न्यायालयाने आपल्या निकालात म्हटले, ‘‘योजनाकारांनी विकासाच्या नावाखाली सर्व नैसर्गिक स्रोत नष्ट करण्याचा सपाटा लावला, मुंबईतील पाण्याचे साठे, तळी बरीचशी संपुष्टात आणली हे जुलै २००५ च्या शेवटच्या आठवडय़ात आलेल्या जलप्रलयाचे एक प्रमुख कारण होते.’’ कुठूनही जमीन हडप करायची हा राजकारण्यांचा, तथाकथित लोकप्रतिनिधींचा, प्रमुख व्यवसाय झालेला आहे. मुंबईच्या सुप्रसिद्ध हाफकिन्स इन्स्टिटय़ूटमधील श्वानदंश, धनुर्वात असे एकेक उत्पादन विभाग पद्धतशीरपणे बंद पाडले जात आहेत. निसर्गदत्त हिरवळीने समृद्ध असलेल्या या २८ एकराच्या जागेवर अनेकांचा डोळा आहे.  आता सरकार व वाळू माफिया पैशाच्या नशेत वाळूचादेखील भरमसाठ उपसा करीत आहेत. महापालिका शिवसेनेच्या ताब्यात. गेल्या पंचवार्षिक योजनेत पायाभूत सोयींसाठी मंजूर झालेल्या रकमेपैकी ५० टक्के रक्कम वापरलीच नाही. या पंचवार्षिक योजनेच्या सुरुवातीस सार्वजनिक सुविधांसाठी मिळालेल्या ४८ मोकळ्या जागांपैकी फक्त ५ जागांचा उपयोग करण्यात आला. रस्ता दुरुस्तीसाठी २५० कोटी रुपये खर्च केल्याचा महापालिकेचा दावा न्यायालयाने फोल ठरविला आणि या बाबतीत जो निष्काळजीपणा झाला त्याबद्दल कंत्राटदार व महापालिकेचे अधिकारी यांच्याविरुद्ध फौजदारी खटले चालविले पाहिजेत, असेही सांगितले. अन्नधान्याच्या निर्मितीसाठी आधीच कमी प्रमाणात उपलब्ध असलेल्या जमिनीचा बराचसा भाग ज्या पिकांपासून डिझेल बनविता येईल अशा पिकांसाठी उपयोगात आणायला सुरुवात झाली. आता ज्वारी-बाजरीचा उपयोग मद्यार्कनिर्मितीसाठी करणार. स्वयंघोषित शेतकरी नेते शरद जोशी म्हणाले, ‘‘यामुळे शेतकरी श्रीमंत होणार असतील तर इतर परिणामांची आम्हाला पर्वा नाही.’’ सर्वच मस्तवाल! काही वर्षांपूर्वी एक दलितांची मिरवणूक हुतात्मा स्मारकाकडे आली होती. त्यांच्या स्पर्शामुळे स्मारक अपवित्र झाले म्हणून एका अतिप्रतिष्ठित नेत्याने त्याची शुद्धी करवून घेतली. आता १ मेला भ्रष्टाचारात आकंठ बुडालेले अनेक पक्षांचे नेते जेव्हा हुतात्मा स्मारकास वंदन करतील तेव्हा त्या स्मारकाच्या शुद्धिकरणासाठी काशीहून गागाभट्टाचे वंशज आणावे लागतील!

अरविंद नाचणे

साभार लोकसत्ता

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