नई दिल्ली। मानसून की मार के बाद अब पेयजल की किल्लत के लिए तैयार रहिए। शहरों को पानी पिलाने वाली नदियां और झीलें जहां खुद प्यासी हैं, वहीं बड़ी संख्या में देश की ग्रामीण बस्तियों के नलकूप या तो सूख चुके हैं या सूखने वाले हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को फिलहाल कोई संकट नजर ही नहीं आ रहा है। जाहिर है कि केंद्र कोई विशेष कदम उठाने वाला नहीं हैं।
सूखे को लेकर पिछले दिनों केंद्र से लेकर राज्य तक आपाधापी शुरू हो चुकी है। इससे निपटने के तरीकों पर व्यापक विचार-विमर्श का दौर चल रहा है। लेकिन पानी और खासकर पेयजल को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है। जबकि हालत यह है कि शहरों को पानी पिलाने वाली नदियों और जलाशयों में बीस से तीस फीसदी ही पानी बचा है और गावों में जलस्तर इतना नीचे जा चुका है कि सरकार के पिछले प्रयास विफल हो गए हैं। लगभग तीन लाख बस्तियां ‘स्लिप बैक’ यानी पेयजल उपलब्धता की श्रेणी से नीचे हटकर अनुपलब्धता की श्रेणी में जा चुकी हैं। तो फिर अनुमान लगा लीजिए कि मवेशियों का क्या होगा। चारा पहले ही सूखे की भेंट चढ़ चुका है, अब उन्हें पानी भी तरसाने वाला है।
नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि कई बड़े शहरों को पानी पिलाने वाली गंगा अपनी पूरी क्षमता के मुकाबले सिर्फ सोलह फीसदी पानी पर जिंदा है। यह भी जान लीजिए कि इसी सोलह फीसदी में गंगा की सभी सहायक नदियां यमुना, सरयू, रामगंगा, गोमती और घाघरा का पानी भी शामिल है। अब जब गंगा ही प्यासी हो तो उस पर और उसकी सहायक नदियों पर बने जलाशयों से आपको कितना पानी मिलेगा। तेनूघाट, टिहरी, गंगा सागर, बाणसागर समेत दूसरे सभी जलाशयों में भी क्षमता का 20 से 30 फीसदी ही पानी है। गोदावरी, महानदी और सिंधु की स्थिति थोड़ी ही बेहतर है। ध्यान रहे कि उत्तर भारत के अधिकतर शहरों में पेयजल की आपूर्ति यहीं से होता है। जब स्त्रोत ही प्यासा हो तो टैंकर आपकी कितनी मदद करेंगे यह समय ही बताएगा।
बहरहाल, गावों की स्थिति कुछ ज्यादा खराब हो सकती है। बड़ी संख्या में बस्तियों में स्लिप बैक और जहरीले पानी की शिकायत पाई गई है। सरकारी आंकड़ों को ही मानें तो लगभग ढाई लाख स्थानों पर पानी पीने लायक नहीं है। मानसून की मार ने भूजलस्तर को भी नीचे ला दिया है। हरियाणा और पंजाब ने सूखे के बावजूद भूजल को खींचकर खरीफ फसल बचा ली है। जबकि इन राज्यों में पहले ही कई स्थानों की जमीनें पानी के अतिरिक्त दोहन के कारण सूख चुकी थीं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार हरित क्रांति के गढ़ रहे पंजाब व हरियाणा 40-55 प्रतिशत जमीनों के जल सूख चुके हैं। अब स्लिप बैक बस्तियों की संख्या बढ़े तो चौंकने वाली बात नहीं होगी। परेशानी की बात यह नहीं राज्य सरकारें पेयजल योजनाओं को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रही हैं, चिंता यह है कि अब केंद्रीय ग्रामीण मंत्रालय को भी कोई संकट नहीं दिख रहा है। आसन्न पेयजल संकट को लेकर मंत्रालय में न तो कोई सुगबुगाहट है और न ही हरकत।
साभार- याहू जागरणhttp://in.jagran.yahoo.com/
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