देश में अवैध खनन का कारोबार बदस्तूर जारी है. राजनेताओं के संरक्षण और अ़फसरों की मिलीभगत से खनन मा़फिया देश के खनिज बहुल राज्यों में प्राकृतिक खनिजों को लूटने में जुटे हैं. अ़फसोस की बात तो यह है कि लोकतांत्रिक देश की सरकार और जनप्रतिनिधि जनहित को ताक़ पर रखकर पूंजीपतियों के एजेंट की भूमिका निभा रहे हैं. कर्नाटक के लोकायुक्त एन संतोष हेग़डे की अवैध खनन मामले में आई रिपोर्ट भी इस अवैध कारोबार में सरकार और जनप्रतिनिधियों की संलिप्तता को साबित करती है. अवैध खनन के कारोबार में कांग्रेस और भाजपा नेताओं का गठजो़ड रहा है. संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के साथ ही पिछले दस साल में कर्नाटक की कांग्रेस, जनतादल सेक्युलर और भाजपा की सभी सरकारों को दोषी क़रार दिया गया है. हालांकि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा विदेश मंत्री एस एम कृष्णा का कहना है कि उनके कार्यकाल में खनन का कोई लाइसेंस नहीं दिया गया. लोकायुक्त कोर्ट के विशेष न्यायाधीश एन के सुधींद्र राव द्वारा अवैध खनन मामले में उनकी जांच के आदेश दिए जाने के बाद उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए मैंने खान एवं भूगर्भ विभाग अपने पास कभी नहीं रखा.

पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी.

बंगलुरु के व्यापारी टी जे अब्राहम ने एक याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि एस एम कृष्णा, धर्म सिंह और एच डी कुमारस्वामी के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में अवैध खनन हुआ, जिसे उन्होंने नहीं रोका. याचिका में 11 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है. एस एम कृष्णा 11 अक्टूबर, 1999 से 28 मई, 2004 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे. इसके बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर गठबंधन की सरकार में एन धर्म सिंह 28 मई, 2004 से 28 जनवरी, 2006 तक मुख्यमंत्री रहे. जबकि इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी और जनता दल सेक्युलर गठजो़ड की सरकार में एच डी कुमारस्वामी 2 फरवरी, 2006 से 8 अक्टूबर, 2007 तक मुख्यमंत्री रहे. एन धर्म सिंह इस समय उत्तरी कर्नाटक के बिदर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं, जबकि कुमारस्वामी बंगलुरु के समीप रामनगरम से सांसद हैं. रिपोर्ट में मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा और कई अन्य मंत्रियों को दोषी ठहराया गया, जिनमें पूर्व मंत्री कट्टा सुब्रमन्या नायडू, एस एन शेट्टी और मौजूदा गृह मंत्री आर अशोका, उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी एवं गृह निर्माण मंत्री वी सोमाना शामिल हैं. इससे जहां भाजपा की खासी किरकिरी हुई, वहीं येदियुरप्पा को अपनी कुर्सी भी गंवानी प़डी. कर्नाटक में लोकायुक्त की जांच के  घेरे में आने वाले सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की तादाद बढ़ती ही जा रही है. विधानसभा अध्यक्ष के जी बोपैया के खिला़फ भी धन का दुरुपयोग करने के मामले में जांच शुरू हो चुकी है. हाल में केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने आंध्र प्रदेश की भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी वाई श्रीलक्ष्मी को जेल भेज दिया. उन पर आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की सरकार के कार्यकाल में खनन विभाग की सचिव रहते हुए रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम कंपनी को लाइसेंस देने में पक्षपात करने का आरोप है. खनन माफिया, अ़फसरों और नेताओं का गठजोड़ चांदी कूटने के साथ ही सरकारी खज़ाने को अरबों का चूना भी लगा रहा है. कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेग़डे की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006-2010 के बीच राज्य से क़रीब तीन करो़ड टन अवैध लौह अयस्क का खनन किया गया. इससे देश को क़रीब 16,200 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ. वहीं गोवा में 12,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है. पिछले पांच वर्षों में राज्य में 1.42 करो़ड टन अवैध खनन हुआ. राज्य का खनन विभाग मुख्यमंत्री दिगंबर कामत के पास है. यहां से सालाना 5.4 करो़ड टन लौह अयस्क का निर्यात होता है.

पिछले दिनों भाजपा ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री कामत, गोवा कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और सरकार के मंत्रियों के इसमें शामिल होने का आरोप लगाया. भाजपा ने राज्य में 25 हज़ार करो़ड रुपये के अवैध खनन का आरोप लगाते हुए इसे बेल्लारी से भी ब़डा घोटाला क़रार दिया है. कांग्रेस सांसद शांताराम नाईक का कहना है कि केंद्रीय खान मंत्रालय ने गोवा में खनन उद्योगों की जांच का आदेश दे दिया है. उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर न्यायमूर्ति एम बी शाह आयोग की रिपोर्ट लीक करने वालों के खिला़फ कार्रवाई की जाएगी. पिछले दिनों लीक हुई इस रिपोर्ट में राज्य में ब़डे खनन घोटाले का ज़िक्र किया गया था. उड़ीसा में देश का लगभग एक तिहाई लौह अयस्क भंडार है. यहां की 243 खदानों में वर्ष 2009 से खनन बंद है. अकेले उड़ीसा में अवैध खनन से सरकारी खज़ाने को तीन लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो चुका है. सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक़, अवैध खनन के कारण पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश में क़रीब 1500 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी एक रिपोर्ट में अवैध खनन के मामले में राज्य के खनन मंत्री राजेंद्र शुक्ल और लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को ज़िम्मेदार ठहराया है, जबकि दोनों ही मंत्रियों ने इन आरोपों को ग़लत बताया है. छत्तीसग़ढ में 700 करो़ड रुपये का नुक़सान हुआ है. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़, झारखंड में अवैध खनन से सरकार को सालाना 600 करो़ड रुपये का ऩुकसान होता है. यहां के पूर्व मुख्यमंत्री मधु को़डा पर भी अवैध खनन में शामिल होने के आरोप लगे हैं. राजस्थान में पिछले पांच वर्षों में सरकार को 150 करो़ड रुपये के राजस्व का नुक़सान हुआ है.

खनन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि देश में अवैध खनन का कारोबार फल-फूल रहा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, 2006 से 2010 तक देश भर में अवैध खनन के एक लाख 61 हज़ार 140 मामले सामने आए. इनमें सर्वाधिक 39670 मामले अकेले आंध्र प्रदेश के थे. इसके बाद गुजरात में 24936 मामले दर्ज किए गए. महाराष्ट्र में 22885, मध्य प्रदेश में 17397, कर्नाटक में 12191, राजस्थान में 11513, केरल में 8204, छत्तीसगढ़ में 7402, तमिलनाडु में 5191, हरियाणा में 3897, हिमाचल प्रदेश में 2095, गोवा में 492, झारखंड में 953 और पश्चिम बंगाल में 901 मामले सामने आए. अ़फसोस की बात यह है कि कई राज्यों में तो अवैध खनन के मामलों में प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हुई है. देश भर में स़िर्फ 44 हज़ार 445 मामलों में ही कार्रवाई हुई. आंध्र प्रदेश में कोई भी मामला अदालत तक नहीं पहुंच पाया, जबकि छत्तीसग़ढ में 2383, गुजरात में आठ, हरियाणा में 138, हिमाचल प्रदेश में 711, झारखंड में 39, कर्नाटक में 771, मध्य प्रदेश में 16157, महाराष्ट्र में 13, उड़ीसा में 86, राजस्थान में 59, तमिलनाडु में 421 और बंगाल में 91 मामले अदालत में गए. गुजरात में 158 मामले पुलिस में दर्ज किए गए, जबकि हरियाणा में 103, झारखंड में 205, कर्नाटक में 959, मध्य प्रदेश में पांच, महाराष्ट्र में 20197, उड़ीसा में 57, राजस्थान में 607, तमिलनाडु में 579 और पश्चिम बंगाल में 974 मामले पुलिस तक पहुंचे.

देश के विभिन्न राज्यों में कोयला, एल्यूमिनियम, अभ्रक, तांबा और मैगनीज आदि क़ीमती खनिजों का भंडार है. सुप्रीमकोर्ट की सख्त हिदायतों के बावजूद अवैध खनन पर रोक नहीं लग पा रही है. अवैध खनन के कारण पर्यावरण को खतरा पैदा हो गया है. पश्चिम बंगाल के रानीगंज, आसनसोल और झारखंड के झरिया का उदाहरण सबके सामने है. अवैध खनन के कारण यहां का एक ब़डा क्षेत्र कभी भी भयानक रूप ले सकता है, क्योंकि यहां ज़मीन के भीतर आग दहक रही है. यहां ज़मीन में प़डी दरारों से आग की लपटें निकलती हैं. यहां का क़ीमती कोयला हर पल राख के ढेर में बदल रहा है. काग़ज़ों में तो यहां की कई खदानें बदं प़डी हैं, लेकिन कोयला माफियाओं के लिए यहां आज भी काम बदस्तूर जारी है. अवैध खनन के कारण जहां मज़दूरों की जान खतरे में रहती है, वहीं अत्यधिक खनन से खनिजों के भंडार भी खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं, मगर राजनीतिज्ञों के संरक्षण के कारण यह धंधा बिना रोक-टोक के चल रहा है. इस धंधे ने लोगों को स़डक से उठाकर मंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया है. जनार्दन रेड्डी को ही लीजिए. सामान्य हेड कांस्टेबल चेंगा रेड्डी के घर में पैदा हुए जनार्दन रेड्डी ने 1995 में बेल्लारी में चिटफंड कंपनी खोली, लेकिन तीन साल बाद ही खुद को दिवालिया घोषित करके उसे बंद कर दिया. इसके बाद उन्होंने होटल और मीडिया बिजनेस शुरू किया, वहां भी उन्हें घाटा उठाना प़डा, लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव के व़क्त उनके दिन बदल गए. सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज के  बीच चुनावी म़ुकाबले में उन्होंने सुषमा स्वराज के लिए काम किया. सुषमा स्वराज को भले ही हार का मुंह देखना प़डा हो, लेकिन रेड्डी बंधुओं का भला हो गया. सियासत में आते ही उन्होंने खनन उद्योग में क़दम रखा और अवैध खनन के चलते वे दौलतमंद होते चले गए. जनार्दन रेड्डी और उनके साले श्रीनिवास रेड्डी ने राजनीतिज्ञों से संबंधों के कारण कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पैर जमा लिए. हालत यह हो गई कि उन्होंने बेल्लारी की लोहे की खानों को खाली कर डाला. कर्नाटक में अवैध खनन पर जारी लोकायुक्त की रिपोर्ट के मुताबिक़, 2009-10 में ही रेड्डी बंधुओं ने 4635 करोड़ रुपये का अवैध खनन किया. रेड्डी बंधु भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं और जी जनार्दन रेड्डी के अलावा उनके भाई जी करुणाकर रेड्डी कर्नाटक की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. आंध्र प्रदेश के  पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी का भी उन्हें संरक्षण हासिल था. यह रेड्डी बंधुओं का प्रभाव ही था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2009 में आंध्र प्रदेश की तत्कालीन के रोसैया सरकार द्वारा अनंतपुर ज़िले में अवैध खनन और धांधली के आरोप में रेड्डी बंधुओं की ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के खिला़फ मामला दर्ज कराने के बावजूद सीबीआई ने उनके खिला़फ कार्रवाई करने में देर की. इसमें कोई दो राय नहीं कि सर्वदलीय सहमति और केंद्रीय खनन मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय खनन ब्यूरो और सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत के बग़ैर इतना ब़डा अवैध खनन का कारोबार चल ही नहीं सकता. केंद्र सरकार की नीतियों ने भी अवैध खनन को ब़ढावा देने का काम किया. 1993 में केंद्र की नरसिम्हाराव सरकार ने खनन को निजी और विदेशी पूंजी के हवाला कर दिया. नतीजतन, पोस्को से लेकर वेदांता जैसी कंपनियां भी क़ीमती खनिजों की लूट में शामिल हो गईं.

सिद्धांतों का ढोल पीटने वाली भाजपा ने भी अवैध खनन को का़फी ब़ढावा दिया. भाजपा शासित प्रदेश उत्तराखंड में गंगा में अवैध खनन जारी है. इसके खिला़फ आमरण अनशन पर बैठे स्वामी निगमानंद की कथित हत्या के बाद भी सरकार खनन पर रोक नहीं लगा पाई. स्वामी निगमानंद के गुरु शिवानंद का आरोप है कि खनन माफिया पार्टी फंड के लिए चंदे के रूप में एक मोटी रक़म देता है, इसलिए भाजपा सरकार ने उसे खनन की खुली छूट दे रखी है. अवैध खनन से जहां सरकारी खज़ाने को ऩुकसान होता है, वहीं इससे सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश पर भी विपरीत असर प़डता है. आदिवासियों से उनकी पैतृक ज़मीन छीनी जा रही है. आदिवासियों को अपनी पुश्तैनी जगह छो़डकर दूरदराज के इलाक़ों में पलायन करना प़ड रहा है. इससे उनके सामने रोज़गार का संकट पैदा हो गया है, उनकी सांस्कृतिक पहचान, उनके रीति-रिवाज भी खत्म होते जा रहे हैं. विकास के लिए खनन ज़रूरी है, लेकिन सुधार के नाम पर किए जा रहे अति खनन यानी अवैध खनन के दूरगामी नतीजे अच्छे नहीं होंगे. सरकार को चाहिए कि वह जनहित के मद्देनज़र अवैध खनन पर रोक लगाए, वरना वह दिन दूर नहीं, जब खानों से खनिजों के भंडार समय से पहले खत्म हो जाएंगे.

अवैध खनन रोकने की सरकारी क़वायद

अवैध खनन रोकने की क़वायद का दावा करते हुए इसी साल सितंबर माह में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है. इसमें प्रावधान है कि कोयला खनन कंपनियों को हर साल अपने शुद्ध लाभ का 26 फीसदी और अन्य खनिज कंपनियों को रॉयल्टी के बराबर धनराशि ज़िलास्तरीय खनिज न्यास को देनी होगी. इस रक़म का इस्तेमाल स्थानीय लोगों के विकास के लिए किया जाएगा. केंद्रीय खान मंत्री दिनशा पटेल का कहना है कि खनन से पहले प्रभावित होने वाले लोगों से बात करना अनिवार्य होगा. अवैध खनन से संबंधित मामलों के निपटारे के लिए राज्य स्तर पर विशेष अदालतें स्थापित करने का प्रावधान किया गया है. देश के 60 ऐसे ज़िलों में राष्ट्रीय खनन नियामक प्राधिकरण और राष्ट्रीय खनिज ट्रिब्यूनल बनाए जाएंगे, जहां खनिज संसाधन काफ़ी प्रचुर मात्रा में हैं. इस विधेयक के आने से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी 4500 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,500 करोड़ रुपये हो जाएगी. विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि खनन कंपनियों को राज्य सरकार को कुल रॉयल्टी पर 10 फीसदी और केंद्र सरकार को 2.5 फीसदी का उपकर जमा करना होगा. सरकार का दावा है कि इस विधेयक में अवैध खनन रोकने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं. आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखकर ही इसे तैयार किया गया. इसके तहत कोयला कंपनियों के शुद्ध लाभ का 26 फीसदी हिस्सा प्रभावित लोगों के विकास के लिए खर्च किया जाएगा. यह विधेयक खनन एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम 1957 की जगह लेगा.

 साभार- चौथि दुनिया

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यह है कि इनका प्रभाव भी का़फी निराशाजनक रहा है. हालांकि ये सभी क़ानून आधे मन से ही पारित किए थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जिनका उपयोग यदि उचित रूप में किया जाए तो इन समुदायों के जीवन स्तर को का़फी बेहतर बनाया जा सकता है.

समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

पृष्ठभूमि

जब गडचिरौली के आदिवासी ज़िले में मेंधा लेखा गांव के सामुदायिक नेता देवाजी तो़फा को 2011 में अपनी ग्राम सभा से ट्रांजिट पास मिला तो उनके समुदाय को खेती करने और अपने बांस बेचने की अनुमति मिल गई. यह सुविधा केवल प्रतीकात्मक ही नहीं थी, बल्कि उससे कहीं अधिक थी. इससे वन पर निर्भर लोगों के बेहतर भविष्य की संभावनाएं बढ़ी हैं. जहां एक ओर अधिकांश लोगों को भारत के जंगलों में शेरों और वनस्पतियों के चित्र ही दिखाई पड़ते हैं, वहीं एक और दुनिया है, जहां मेहनतकश लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग ग़रीबी रेखा के अंतिम छोर पर रहते हैं, लेकिन किसी का ध्यान उन पर नहीं जाता. एक अनुमान के अनुसार वनजीवी के रूप में पहचाने जाने वाले पचास मिलियन से अधिक लोग भारत के वन-प्रांतरों में रहते हैं और वनों पर निर्भर रहने वाले 275 मिलियन लोग अपनी आजीविका के कम से कम एक भाग के लिए तो वनों पर भी निर्भर करते हैं. दोनों प्रकार के लोग, वनों पर निर्भर रहने वाले लोग और विशेषकर वनजीवी लोग आर्थिक दृष्टि से बहुत पिछड़े और सामाजिक दृष्टि से कमज़ोर हैं. ये लोग साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के ऐतिहासिक दृष्टि में अन्याय के शिकार होते रहे हैं. इन क़ानूनों के कारण न तो इन्हें ज़मीन और संसाधनों के अधिकार मिले और न ही वन संरक्षण में भागीदारी मिली. शताब्दियों से वहां रहने पर भी 2006 तक न तो उन्हें मिल्कियत की सुरक्षा मिली और न ही संपत्ति के अधिकार मिले.

परिवर्तन की पहली लहर

पंद्रह वर्ष पूर्व भारत ने यथास्थिति को बदलने के लिए पहला क़दम उठाया था. अनुसूचित क्षेत्र के 1996 के पंचायत विस्तार अधिनियम ने ग्राम सभा को संसाधन प्रबंधन के केंद्र में लाकर और भूमि, जल और वन जैसे सामुदायिक संसाधनों पर आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देते हुए अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों के शासन को विकेंद्रित कर दिया. दस साल के बाद 2006 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) ने एक क़दम और आगे बढ़कर वनजीवी समुदायों के सशक्तीकरण का काम शुरू किया और वनजीवियों को उस ज़मीन की मिल्कियत दे दी, जिस पर वे रहते थे और वन्य उत्पादों (एमएफपी) के लिए उसका थोड़ा बहुत उपयोग भी करते थे.

यद्यपि ये दोनों ही क़ानून ऐतिहासिक महत्व के थे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो यही थी कि उनका कार्यान्वयन संतोषजनक नहीं रहा. राज्य के क़ानून भी इस अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं थे और कई मामलों में तो सबसे अधिक मूल्यवान वनोत्पादों के सामुदायिक मिल्कियत से भी उन्हें वंचित कर दिया गया. परंतु सामुदायिक वन अधिकार देने की प्रगति बहुत धीमी रही. आरोपित शासन प्रणाली, स्थानीय नौकरशाहों के विरोध और वनोत्पादों से राजस्व जुटाने के लिए वन विभाग की निर्भरता के कारण वन्य समुदायों के वास्तविक सशक्तीकरण पर रोक लग गई.

वन्य समुदायों के जीवन में चार परिवर्तन

यद्यपि ये बातें भारत के वनों पर निर्भर रहने वाले समुदायों के हालात तो बयान करती हैं, लेकिन हाल ही की कम से कम चार प्रवृत्तियों के कारण लगता है कि सशक्त नागरिक समुदायों और हाल ही की सरकारी कार्रवाई के कारण अंततः उनके जीवन में प्रकाश की किरणें फूटने लगी हैं. पहला प्रमुख परिवर्तन 2006 में क़ानूनी हक़ों के कार्यान्वयन के कारण हुआ था. इसके कार्यान्वयन के बाद से लेकर अब तक पहली बार एफआरए के कार्यान्वयन को गंभीरता से लिया जा रहा है. पर्यावरण व वन मंत्रालय ने यह शर्त लगा दी कि जब एक एफआरए का कार्यान्वयन हीं हो जाता, तब तक अगस्त 2009 तक की नई परियोजनाओं को वानिकी के संबंध में स्वीकृति नहीं दी जाएगी. उच्च प्रोफाइल की परियोजनाओं के मामले में भी सरकार इस कार्रवाई को लेकर का़फी गंभीर लगती है. उदाहरण के लिए, उड़ीसा में वेदांत ग्रुप की बॉक्साइट खनन परियोजना को रोककर सरकार ने स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दे दिया है कि वनजीवियों को दिए गए क़ानूनी अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें किसी भी क़ीमत पर कार्यान्वित किया जाएगा.

इसके अलावा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए और क़ानूनी उपाय भी किए जा रहे हैं. भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन लाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह भी अनुमोदित कर दिया है कि स्थानीय लोगों पर छोटे-मोटे अपराधों के लिए समझौता जुर्माना लगाने के लिए वन अधिकारियों को संबंधित ग्राम सभा से सलाह करनी होगी. वनजीवी समुदायों को वन अधिकारियों के उत्पीड़न से बचाने के लिए यह एक बड़ा क़दम माना जा रहा है.

दूसरा बड़ा परिवर्तन यह है कि स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन और संरक्षण में भागीदार बनाना. परंपरागत रूप में स्थानीय समुदायों को मोटे तौर पर वन संरक्षण और प्रबंधन से दूर रखा जाता रहा है और लंबे समय से यह क्षेत्र वन विभाग का ही माना जाता रहा है. वनजीवियों को सामुदायिक वन रक्षकों के रूप मेंरखने से दोनों ही लाभ में रहेंगे. अंततः अब इस बात को स्वीकार भी किया जाने लगा है और इसके प्रयोग देश-भर में किए जा रहे हैं.

स्थानीय आदिवासी युवाओं को वन प्रबंधन में प्रशिक्षित और नियोजित किया जा रहा है. पिछले दो वर्षों में इस दिशा में किए गए नए और महत्वपूर्ण प्रयासों के कारण ही प्रति वर्ष लगभग 2.5 मिलियन मानव दिवस इन स्थानीय समुदायों के लिए नियोजित किए गए. उदाहरण के लिए कार्बेट में वन गुर्जर, वन्य पशुओं के अवैध शिकार को रोकने के लिए आगे रहने वाले पैदल सिपाही के रूप में का़फी प्रभावी सिद्ध हो रहे हैं.

स्थानीय समुदायों के उपयोग के इसी प्रयोग के आधार पर सरकार ने हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन नाम से दस वर्षीय दस बिलियन डॉलर की एक परियोजना अभी हाल में शुरू की है, जिसके मूल में लोक-केंद्रित वन संरक्षण की भावना ही है. ज़मीनी स्तर पर मिशन के कार्यान्वयन के साथ पुनर्गठित संयुक्त वन प्रबंधन समितियां (जेएफएमसी) का गठन ग्राम सभाओं द्वारा ही किया जाएगा और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार भी होंगी. इससे रूपावली में एक नया परिवर्तन सामने आएगा, जिसमें निवेश और प्रबंधन के संदर्भ में लोक केंद्रिक निर्णयों की प्रमुख भूमिका होगी.

तीसरा परिवर्तन शायद जीविका की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और वह बांसों से संबंधित है. कई लोगों का मानना है कि आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक मूल्यवान फसल बांसों तक पहुंच होने के कारण वन पर निर्भर समुदायों की जीविका के अवसरों में बेशुमार वृद्धि होगी. मोटे अनुमानों से पता चलता है कि यदि इन समुदायों को बांसों की फसल उगाने की अनुमति मिल जाती है तो इससे उनकी आमदनी में प्रतिवर्ष 20,000-40,000 करोड़ रुपये का इज़ा़फा हो सकता है और पंद्रह मिलियन से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सकता है. बहस इस बात पर है कि बांस घास है या लकड़ी. यदि यह घास है तो एमएफपी (वे वन समुदाय, जिनकी वह मिल्कियत है) मूल्य संवर्धन और बिक्री के लिए उसकी फसल उगा सकेंगे और उसका उपयोग भी कर सकेंगे और अगर यह लकड़ी है तो इसे वन विभाग ही उगा सकेगा और इसकी बिक्री कर सकेगा. यह बहस उस समय तक चलती रही, जब तक पर्यावरण मंत्रालय ने हाल में मार्च, 2011 में यह स्पष्ट नहीं कर दिया कि बांस वास्तव एमएफपी है. इसका अर्थ यह होगा कि ये समुदाय अब ग्राम सभा की अनुमति से बांसों की खेती कर सकेंगे. ग्राम सभाओं को इसके परिवहन और बिक्री के लिए अनुमति देने के लिए कमाने का अवसर मिलने से का़फी लाभ होगा, क्योंकि बाज़ार में बांस की अच्छी क़ीमत मिल जाती है और कई देसी शिल्पों और कुटीर उद्योगों में इसका इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में किया जाता है. मेंधा लेखा गांव में इसका प्रतीकात्मक अनुष्ठान इस दिशा में पहला क़दम है. मेंधा लेखा से प्राप्त प्रारंभिक जानकारी से यह पता चला है कि इससे गांवों की आमदनी में का़फी इज़ा़फा होने की संभावना है.

चौथे परिवर्तन के कारण वन समुदायों को यह लाभ होगा कि वे स्थानीय जैव विविधता के अपने परंपरागत ज्ञान का लाभ भी उठा सकेंगे. भारत जैव विविधता पर संयुक्तराष्ट्र की कन्वेंशन, जिस पर अक्टूबर, 2010 में हस्ताक्षर किए गए थे, के अंतर्गत एक्सेस और बेनेफिट शेयरिंग प्रोटोकॉल (एबीएस) का प्रमुख प्रस्तावक रहा है. यह प्रोटोकॉल, देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य करता है कि आनुवांशिक संसाधनों से संपन्न स्थानीय समुदायों के ऐसे परंपरागत ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभ का उचित और समान वितरण किया जाए. घरेलू क़ानून (एफआरए और जैव विविधता अधिनियम) के साथ समर्थित एबीएस प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहला क़दम है कि वन्य समुदायों को उचित रूप में क्षतिपूर्ति का लाभ मिल सके.

इसी प्रकार भारत निर्वनीकरण व वन क्षरण (आरईडीडी) पहले के माध्यम से उत्सर्जन करने के लिए उन तमाम अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की वकालत करने में सक्रिय रहा है, जिनमें वनों के धारणीय प्रबंधन के लिए उत्सर्जन कम करने वाले देश प्रोत्साहन के रूप में संसाधन प्राप्त करने का हक़ हासिल कर सकेंगे. यद्यपि यह अभी आरंभिक अवस्था में ही है. कुछ अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में आरईडीडी+पहल होने से कार्बन सेवा प्रोत्साहन के रूप में इसे तीन बिलियन डॉलर से अधिक राशि प्रदान की जा सकती है. सरकार ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि आरईडीडी+पहल से मिलने वाले मौद्रिक लाभ को स्थानीय, वनजीवी और आदिवासी समुदायों में वितरित कर दिया जाएगा.

इस प्रकार चौथा परिवर्तन वन आधारित संसाधनों से होने वाले लाभ को स्थानीय समुदायों में वितरित करते हुए उसे संरक्षित, मोनेटाइज़ और प्रोत्साहित करना है.

कार्यान्वयन की चुनौतियां

आगे और भी चुनौतियां हैं. इन परिवर्तनों के लिए शासन तंत्र प्रणाली को विकसित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. हम सीखने के एक लंबे मोड़ पर हैं, जिसकी शुरुआत अस्सी के उत्तरार्ध में जेएफएमसी के दर्शन 1.0 से हुई थी और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, इसका विकास होता जा रहा है. इस अंतराल को पाटने के लिए शीर्ष स्तर के नेताओं का नेतृत्व और नगारिक समाज की निगरानी की निरंतर ज़रूरत पड़ेगी.

उचित प्रतिनिधित्व वाली और अच्छी तरह चलने वाली ग्राम सभा में सर्वानुमति से निर्णय लेने की बातें सैद्धांतिक रूप में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इन्हें व्यावहारिक रूप प्रदान करना बहुत कठिन होता है. यदि हम यह मान भी लें कि ग्राम सभाएं आम सहमति से निर्णय ले सकती हैं, लेकिन भद्रलोक की पकड़ (या किसी हितधारक समूह द्वारा उन्हें हथिया लेने) से उन्हें बचाए रखना आसान नहीं है. सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें महत्वपूर्ण क्षमता का निर्माण करना होगा.

इसके अलावा वनजीवियों और वन पर निर्भर रहने वाले समुदायों के प्रति वन विभाग और अन्य स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के रवैये, प्रशिक्षण और व्यवहार में अर्थात सभी स्तरों पर बदलाव की ज़रूरत है. यह इतना सीधा रास्ता नहीं होगा. वन विभाग अपनी नई भूमिका को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाएगा. वे लोग दानवीर के समान स्थानीय समुदायों को एमएफपी खास तौर पर बांस पर इतनी आसानी से अपनी पकड़ नहीं बनाने देंगे, क्योंकि बांस और अन्य एमएफपी राजस्व के मूल स्रोत रहे हैं और साथ ही उनके लिए ये शक्ति और नियंत्रण के स्रोत भी हैं.

एमएफपी के लिए बढ़िया प्रतियोगी मंडियां भी विकसित करनी होंगी, ताकि वनजीवियों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए नवोन्मेषकारी तंत्र की आवश्यकता होगी, जो मात्र न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से ही नहीं बन जाएगा. उदाहरण के लिए, वनजीवियों को प्रभावी पूर्तिकर्ता समूहों के रूप में संगठित करने के लिए संस्थागत सपोर्ट की आवश्यकता होगी और अतीत में सहकारी आंदोलनों के हमारे अनुभवों को देखते हुए यह कोई छोटी चुनौती नहीं होगी.

निष्कर्ष

वन पर निर्भर समुदायों के सशक्तीकरण के कारण न केवल ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म किया जा सकेगा और उनकी आजीविका में वृद्धि होगी, बल्कि हमारी प्राकृतिक वन संपदा और धरोहर का संरक्षण भी हो सकेगा. इसका अतिरिक्त लाभ यह होगा कि इन समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण के कारण नक्सलवाद (जिसे स्थानीय वन गांवों से ही शक्ति मिलती है और जिनको धन भी वनज उत्पादों से ही मिलता है) से लड़ने में यह एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा.

आशा है कि इन परिवर्तनों और अधिकारों के कारण जो गति आई है, उसकी मेंधा गांव से निकली मौन यात्रा हमारे वन्य समुदायों के जीवन को आलोकित करती रहेगी.

- प्रांजुल भंडारी

(वरद पांडे भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय में विशेषकार्य अधिकारी हैं और प्राजुंल भंडारी भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष कार्यालय में अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत हैं.)

साभार- चौथि दुनिया

http://www.chauthiduniya.com/2011/12/ray-of-light-in-forests.html


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